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भारतीय सिनेमा को नए दौर में ले जाने का श्रेय कलाकारों के साथ ही उन स्टूडियोज को भी जाता है जिनमें सदी की बेहतरीन फिल्में बनी। इन्हीं में से एक है हिंदी सिनेमा के आवारा राज कपूर का बनाया हुआ आरके स्टूडियो। इस स्टूडियो में कई कालजयी फिल्में बनी। कालजयी फिल्में बनने का गवाह यह स्टूडियो अब बिकने वाला है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक कपूर परिवार ने इस पर फैसला ले लिया है। आरके स्टूडियो कुछ वर्ष पहले तक बॉलीवुड का केंद्र हुआ करता है, पर अब वह धीरे-धीरे पिछड़ता जा रहा है। पिछड़ने का सिलसिला राज कपूर के निधन के बाद ही शुरू हो गया था। पिछले साल भीषण आग लगने की वजह से इसका एक बड़ा हिस्सा बर्बाद हो गया था।

शोमैन राजकपूर ने आरके प्रोडक्शन हाउस और स्टूडियो को जी जान से खड़ा किया था। यहां त्यौहारों पर रौनक देखते ही बनती थी। मौका गणेश उत्सव का हो या होली के हुड़दंग का। उस दौर के फिल्मी दुनिया के सितारे आरके स्टूडियो में महफिल जमाते थे। आरके स्टूडियो की होली एक यादगार मौके की तरह होती थी, जिसका सितारे पूरे साल इंतजार करते थे।

एक समय ऐसा भी आया था जब आरके स्टूडियो के पास पैसों की कमी होने लगी। उस मुश्किल वक्त में राज कपूर की कथित गर्लफ्रेंड और हिंदी सिनेमा की महान अभिनेत्री नरगिस ने उनका साथ दिया। मधु जैन अपनी किताब ‘फर्स्ट फैमिली ऑफ इंडियन सिनेमा-द कपूर्स’ में लिखती हैं, ‘नरगिस ने अपना दिल, अपनी आत्मा और यहां तक कि अपना पैसा भी राज कपूर की फिल्मों में लगाना शुरू कर दिया। जब आरके स्टूडियो के पास पैसों की कमी हुई तो नरगिस ने अपने सोने के कंगन तक बेच डाले।

उन्होंने आरके फिल्मस के कम होते खजाने को भरने के लिए बाहरी प्रोड्यूसरों की फिल्मों जैसे ‘अदालत’, ‘घर संसार’ और ‘लाजवंती’ में काम किया।’ बाद में राज कपूर ने उनके बारे में यहां तक कहा था, ‘मेरी बीबी मेरे बच्चों की मां है, लेकिन मेरी फिल्मों की मां तो नरगिस ही हैं।’

खबरों कि मानें तो कपूर परिवार इसको दुबारा बनवाने में आर्थिक रूप से व्यवहारिक नहीं मान रहा है। इसके बाद राज कपूर की पत्नी कृष्णा राज कपूर अपने बेटे रणधीर कपूर, ऋषि कपूर और राजीव कपूर, बेटी रितु नंदा और रीमा जैन सबने मिलकर ये फैसला लिया है। मुंबई की एक मीडिया रिपोर्ट की मानें तो ऋषि कपूर ने बताया, ‘हमने अपने दिलों पर पत्थर रखे हैं। छाती पर पत्थर रख कर, सोच समझ कर फैसला लिया है।’

यह खबर हिंदी फिल्म-प्रेमियों को बेहद चौंकाने वाली है। स्टूडियो निर्माण 1948 में उपनगरीय क्षेत्र चेंबूर में हुआ था। राजकपूर की कई फिल्मों का निर्माण इस स्टूडियो में किया था। पिछले साल 16 सितंबर को स्टूडियो में ‘सुपर डांसर’ के सेट पर आग लग गई थी जिससे इसका फ्लोर बेहद बुरी तरह जल गया था। तब ऋषि कपूर ने स्टूडियो को आधुनिक टेक्नोलॉजी के साथ फिर से तैयार कराने की इच्छा व्यक्त की थी। लेकिन उनके बड़े भाई रणधीर कपूर ने कहा कि यह व्यवहारिक नहीं है। रणधीर कपूर ने कहा, ‘हां, हमने आरके स्टूडियो को बेचने का फैसला किया है। यह बिक्री के लिए उपलब्ध है। स्टूडियो में आग लगने के बाद उसे फिर से बनाना व्यवहारिक नहीं था।’ आरके बैनर के तहत बनी फिल्मों में ‘आग’, ‘बरसात’ (1949), ‘आवारा’ (1951), ‘बूट पॉलिश’ (1954), ‘श्री 420’ (1955), ‘जागते रहो’ (1956), ‘जिस देश में गंगा बहती है’ (1960), ‘मेरा नाम जोकर’ (1970), ‘बॉबी’ (1973), ‘सत्यम शिव सुंदरम’ (1978), ‘राम तेरी गंगा मैली’ (1985) आदि शामिल हैं। आरके बैनर के तहत बनी आखिरी फिल्म ‘आ अब लौट चलें’ थी जिसे ऋषि कपूर ने निर्देशित किया था। राजकपूर के 1988 में निधन के बाद उनके बड़े पुत्र रणधीर ने स्टूडियो का जिम्मा संभाला। बाद में राजकपूर के सबसे छोटे पुत्र राजीव कपूर ने ‘प्रेम ग्रंथ’ का निर्देशन किया।

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