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शूटर दादी की रियल लाइफ पर आधारित है फ़िल्म ‘सांड की आँख’

‘दादी’ शब्द सुनकर आपके जेहन में जो तस्वीर कौंधती है, दादी नाम सुनते ही लगता है लोरिया सुनाती हुई कोई बुजुर्ग महिला होगी या फिर पालने में नन्हें बच्चे को खिलाती हुई ममता की कोई मूरत। लेकिन उत्तर प्रदेश में बागपत के जोहडी गांव की शूटर दादी प्रकाशी तोमर और चंद्रो तोमर ने  इस कहावत को सच कर दिखाया कि सपने देखने की कोई उम्र नहीं होती।

25 अक्तूबर को रिलीज़ होने वाली फ़िल्म ‘सांड की आँख’ दोनों दादी की रियाल लाइफ पर आधारित है। फ़िल्म ‘सांड की आँख’ में चंद्रो तोमर का किरदार निभा रही हैं भूमि पेडनेकर और प्रकाशी तोमर का किरदार निभा रही हैं तापसी पन्नू।

अपने पहनावे को लेकर बहुत गर्व करती है दादी 

‘सांड कि आँख’ फ़िल्म के ट्रेलर में दिखाया गया है कि दोनों शूटर दादी ने अपना पहनावा नहीं छोड़ा।
इस पर चंद्रो तोमर कहती हैं, ”हमें अपनी बोली पर, अपनी पहनावे पर गर्व है, हमने अपना पहनावा कभी नहीं छोड़ा, हमने किसी की परवाह नहीं की। बस काम करने की लगन होनी चाहिए, हिम्मत करे इंसान तो सहायता करे भगवान।”

किस तरह से संघर्ष किया दादी ने

 

तोमर परिवार की बहू चन्द्रो और प्रकाशी तोमर ने शुरू से ही संघर्ष किया है। इन्होंने हमेशा रोटी बनाने से लेकर जानवरों की देख-रेख जैसी हर जरुरी जिम्मेदारी और अपने पतिओं की सेवा की, खेतों में बहुत काम किया और अपने बच्चों को पढ़ाया -लिखाया इससे ज़्यादा कुछ ख़ास कर नहीं पाईं।

दादी चंद्रो की पोती शैफाली को निशानेबाजी में दिलचस्पी थी। जब शैफाली शूटिंग सीखने जाया करती थी तो एक दिन चंद्रो दादी अपनी पोती का डर दूर करने गयी दादी ने जब पिस्तौल उठायी तब उनकी ज़िंदगी बदल गयी। क्योंकि दादी ने बिना अभ्यास किये पहली ही बार में शूट कर दिखाया। दादी के इस कमाल को देखकर कोच भी हैरान रह गया। सबने कहा दादी तूने तो कमाल कर दिया। उसके बाद कोच ने दादी को शूटिंग रेंज में लगातार आने को बोला।

तब से ही दादी की जिंदगी का दौर बदल गया। जब दादी रोज जाने लगी तो घर वालों ने उनको रोकने की कोशिश की तो वो छुप -छुपकर जाने लगी। जब चंद्रो दादी छुपकर जाया करती थी तो एक दिन प्रकाशी दादी को शक हुआ की मेरी जेठानी (चंद्रो ) कहाँ जाती है जब प्रकाशी दादी को सब सच पता चल गया तो वो भी उनके साथ जाने लगी और उन्होंने भी चंद्रो दादी के साथ शूट करना सीख लिया। दोनों दादी को कुछ कर दिखने की इस तरह तमन्ना हुई कि वो रात में भी एक कमरे में बंद होकर जग में पानी भरकर निशाना लगाया करती थी।

दादी के घर वालों ने भी उनको खेलने के लिए आज्ञा दे दी। फिर दोनों दादी खुलकर खेलने लगी। उसके बाद दादी ने समाज के लोगों के ताने सुने। लोग तोमर परिवार का मजाक बनाने लगे। कहने लगे कि ये बुढ़ापे में पिस्तौल चलाकर क्या कारगिल में जायेंगी। लेकिन यह सब उनकी इच्छाशक्ति को तोड़ नहीं पाया। जिन्होंने शुरुआत में प्रकाशी तोमर  का मजाक उड़ाया था अब वे अपनी बेटियों को उनके पास निशानेबाजी सीखने के लिए भेजते हैं। देखते ही देखते दादी स्टेट फिर इंटरनेशनल चैम्पियन भी बन गई।

दादी ने अपने परिवार के बच्चों को भी बड़े मुकाम तक पहुंचाया है। 

दादी का बहुत बड़ा परिवार है और दादी के बच्चें और पोते -पोती भी इसी तरह से आगे बढ़ते रहें हैं जिस तरह से दादी इस मुकाम तक पहुंची हैं। दादी ने हमेशा से अपने परिवार वालों को संघर्ष करने की और आगे बढ़ने के लिए उन्हें सहानुभूति दी है। उनकी बेटी सीमा तोमर भी एक अंतर्राष्ट्रीय निशानेबाज हैं। सीमा तोमर शूटिंग विश्व कप में कोई मेडल जीत कर लाने वाली पहली भारतीय महिला हैं, और गांव के लोग उनका नाम गर्व और सम्मान के साथ लेते हैं।

दादी की इतनी अच्छी सेहत का राज़ 

दादी ने बताया कि ”हम घर का खाना खाते हैं जैसे दाल चावल दलिया खिचड़ी अगर खाने के बाद मीठा चाहिए होता है तो गुड़ खाते  हैं, जब बाहर होटल में होते हैं तो गुलाब जामुन। दूध और दही के बिना तो हमसे रहा नहीं जाता।”

दादी को मिला सम्मान 

भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा इन्हें ‘आइकन लेडी’ पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। वर्ष 2016 में इन्हें देश की 100 वीमेन अचीवर्स  में शामिल किया गया था तथा राष्ट्रपति भवन में इन्हें पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के साथ दोपहर के भोज में आमंत्रित किया गया था।

अपने लगातार अभ्यास के लगभग दो साल बाद उन्हें दिल्ली में आयोजित एक शूटिंग प्रतियोगिता में भाग लेने का मौका मिला। इस प्रतियोगिता में उनका मुकाबला उस समय के दिल्ली के डीआईजी से हुआ दादी ने डीआईजी को भी अपने निशानेबाजी में हराकर गोल्ड मेडल हासिल किया। जिससे डीआईजी को बहुत शर्मिंदगी भी महशूस हुई थी। निशानेबाजी में वृद्ध शूटर दादी प्रकाशी तोमर को ग्रामीण क्षेत्र में खेल उपलब्धि प्राप्त करने पर राज्यपाल रामनाइक, प्रदेश सरकार की महिला कल्याण मंत्री डा. रीता बहुगुणा जोशी द्वारा सम्मानित किया गया।
इसी तरह शूटर दादी महिलाओं के लिए एक प्रेरणा बन गई हैं।

 

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