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पाकिस्तानी सिनेगा ने बढ़ती लोकप्रियता

पाकिस्तानी सिनेमा अपने ड्रामा और फिल्मों के लिए जाना जाता है। दुनियाभर के लोग इसे काफी पसंद करते हैं। दर्शकों और फिल्म समीक्षकों का कहना है कि इनके नाटक इतने शालीन और सभ्य होते हैं कि इन्हें परिवार के साथ देख सकते हैं। जिसके कारण पाकिस्तानी सिनेमा में लोगों की दिलचस्पी बढ़ रही है

भारतीय सिनेमा जगत में कई ऐसे टीवी सीरियल, फिल्में हैं जिन पर समाज में अश्लीलता फैलाने के आरोप लगे और कई सीरियल ऐसे भी हैं जिनकी कहानी वर्षों से बार-बार दोहराई जा रही है और वे अभी तक प्रसारित हो भी रहे हैं। इनसे दर्शकों का मन ऊब गया है। यही कारण है कि दर्शक अब पाकिस्तानी सीरियलों को देखना ज्यादा पसंद कर रहे हैं जिससे दिन प्रतिदिन इनकी मांग के साथ-साथ पाकिस्तानी सिनेमा की लोकप्रियता बढ़ती ही जा रही है।

दरअसल, पाकिस्तानी सिनेमा अपने ड्रामा और फिल्मों के लिए जाना जाता है। दुनिया भर के लोग इसे काफी पसंद करते हैं। इनको पसंद करने के पीछे इनकी कहानियां, किरदार, और तहजीब का अलग होना शामिल है। दर्शकों और फिल्म समीक्षकों का कहना है कि पारिवारिक ड्रामा से लेकर लव स्टोरी तक इनमें सभी तरह का मनोरंजन देखने को मिलता है। पाकिस्तानी नाटक इतने शालीन और सभ्य होते हैं कि इन्हें परिवार के साथ देख सकते हैं। इन सीरियलों में सभी उम्र के लिए कुछ न कुछ जरूर मौजूद होता है जिसके कारण पाकिस्तानी ड्रामा में लोगों की दिलचस्पी बढ़ती ही जा रही है। इनमें उर्दू भाषा का उपयोग किया जाना भी लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करता है। पाकिस्तानी ड्रामा में एक अलग सी पवित्रता होती है जैसे यहां के लोग अपने से बड़े को तो इज्जत देते ही हैं साथ ही अपने से छोटे से भी बहुत इज्जत से बात करते हैं।

पाकिस्तानी ड्रामा की शुरुआत

पाकिस्तान के सबसे पुराने टेलीविजन नाटकों में से एक उर्दू धारावाहिक ‘खुदा की बस्ती’ है, जो 1969 में प्रसारित हुआ था। पाकिस्तानी नाटक, अन्य धारावाहिकों की तरह, देश की संस्कृति को दर्शाते हैं। पाकिस्तानी नाटक अपनी मजबूत कहानी, प्रासंगिक चरित्र और सामाजिक मुद्दों के यथार्थवादी चित्रण के लिए जाने जाते हैं। कई भारतीय दर्शक इन धारावाहिकों की गुणवत्ता की सराहना करते हैं और उनका आकर्षक और अच्छी तरह से तैयार की गई कहानियों के कारण उनकी ओर लगातार आकर्षित होते आए हैं। लेकिन 1990 का दशक आते-आते पकिस्तान की फिल्म इंडस्ट्री को पर्याप्त प्लेटफॉर्म्स न मिलने के कारण उनकी प्रतिभा कहीं छिप गई थी। वह दुनिया में अपनी छाप पंहुचा नहीं पा रहे थे। लेकिन 2000 का दशक आते-आते पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री ने फिर से आगे बढ़ना करना शुरू किया और आज पूरी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है।

सबसे ट्रेंडिंग पाकिस्तानी ड्रामा ‘तेरे बिन’ इस सीरियल का पहला एपिसोड 28 दिसंबर 2022 को जियो टीवी पर टेलीकास्ट हुआ था। इसमें वहाज अली (मुस्तसिम) और युमना जैदी (मीरब) की ‘नफरत’ से भरी लव स्टोरी को दिखाया गया है। इसे सिराज-उल-हक ने डायरेक्ट किया है। इस सीरियल का तो गाना तक इंडिया में धमाल मचा रहा है। हालांकि यह सीरियल अब खत्म हो चुका है लेकिन इसके चर्चे अभी तक भी लोगों की जुबां से नहीं हटे हैं।

‘मुझे प्यार हुआ था’
इसमें वहाज अली ने (साद) और हानिया आमिर ने माहीर का किरदार निभाया है। इसे बाबर महमूद ने डायरेक्ट किया है। ये सीरियल साल 2021 में आया था। इसे आईएमडीबी पर 10 में से 9 .2 की रेटिंग मिली है। इसमें अहमद अली अकबर ने दमदार एक्टिंग की थी, जिसकी खूब सराहना हुई। शो की कहानी, डायलॉग्स, कविताएं, सबकुछ काबिले-तारीफ है। इसके साथ ही पाकिस्तान के कुछ ऐसे ड्रामा भी हैं जिनसे हमें अपने समाज की दशा के बारे में पता चलता है जैसे ‘माई री’ यह ड्रामा बाल विवाह के ऊपर बनाया गया है। जिसमें बाल विवाह के बाद बच्चों की पढ़ाई समाज उनके जीवन पर इसके क्या परिणाम पड़ते हैं उनको इस ड्रामा से समझा जा सकता है। इसी के साथ ‘खुदा और मोहब्बत’ नाटक जिसको अभी तक सबसे ज्यादा दर्शकों ने देखा है उसमें एक लड़के और लड़की की ऐसी लव स्टोरी को बताया गया है जिसमें समाज का एक अलग रूप देखने को मिलता है। ‘मेरे हम सफर’ ड्रामा में एक छोटी उम्र की लड़की की बड़े उम्र के आदमी से शादी करवा देने के बाद की स्थिति को बेहद अच्छे से दर्शाया गया है। ऐसे अनगिनत ड्रामा पकिस्तान में बनाये जा चुके हैं जिन्हें दुनिया भर में बेहद प्यार मिल रहा है।

पाकिस्तानी फिल्मों का जादू
दुनिया भर में पाकिस्तानी फिल्मों की लोकप्रियता बढ़ने के कारण पाकिस्तानी इंडस्ट्री को काफी बढ़ावा मिल रहा है वह लोग नए-नए कॉन्सेप्ट के साथ नई-नई फिल्में बना रहे हैं। विश्व के दर्शकों द्वारा पाकिस्तान के अभिनेता और अभिनेत्रियों को भी काफी पसंद किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर न केवल पाकिस्तानी, बल्कि दुनिया भर के लोग इन्हें काफी पसंद कर रहे हैं। 2012 में फिल्म निर्माता शरमीन ओबेद चिनाय की फिल्म ‘सेविंग फेस’ ने सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री की कैटगरी में एकेडमी अवार्ड जीता था जिसके बाद शरमीन अपने देश के लिए ऑस्कर जीतने वाली पहली पाकिस्तानी महिला बनी थी। यह फिल्म पाकिस्तान में एसिड हमलों की पीड़ितों पर आधारित थी। इसके चार साल बाद उन्होंने 2016 में ऑनर किलिंग के विषय पर बनाई गई अपनी फिल्म ‘ए गर्ल इन द रिवर’, ‘द प्राइस ऑफ फॉरगिवनेस’ के लिए दूसरा ऑस्कर हासिल किया। इन दिनों वह 2025 में रिलीज होने वाली अगली ‘स्टार वार्स’ फिल्म के निर्देशन में व्यस्त हैं। शरमीन इस मुकाम तक पहुंचने वाली पहली महिला हैं। युवा फिल्म निर्माता आसिम अब्बासी की फिल्म ‘केक’ और वेब सीरीज ‘चुड़ैल्स’ की भी समीक्षकों द्वारा काफी प्रशंसा की जा रही है। फिलहाल वे ‘द फेमस फाइव’ के एक एपिसोड का निर्देशन कर रहे हैं।

गौरतलब है कि पाकिस्तानी सरकार ने 2019 में अपनी नीति बदल दी और भारतीय फिल्मों को पाकिस्तान में रिलीज होने से रोक दिया, तब से यह प्रगतिशील मोड से सर्वाइवल मोड में आ गए हैं। जब तक पाकिस्तानी निर्माता इसका कोई विकल्प नहीं ढूंढते या भारतीय फिल्मों को दिखाने की अनुमति नहीं दी जाती, यह सर्वाइवल मोड जारी रहेगा। बात यह है कि पाकिस्तानी उर्दू बोलते और समझते हैं। यह वह भाषा भी है जिसमें भारतीय फिल्में बनती हैं और लोग इसे समझते हैं। इसलिए पाकिस्तान में भारतीय फिल्मों को दिखाए जाना सोने पर सुहागा होना है। भारतीय फिल्मों के पाकिस्तान में रिलीज करने से वहां के दर्शक और निर्माता दोनों को ही काफी रोमांचक अनुभव प्राप्त होता है।

वैश्विक स्तर पर मिल रही पहचान

पाकिस्तानी फिल्म निर्माताओं को वैश्विक स्तर पर मिल रही पहचान से उत्साहित पाकिस्तानी फिल्म वितरक और प्रदर्शक नदीम मांडवीवाला कहते हैं ‘द लेजेंड ऑफ मौला जट्ट’ ने दुनिया भर के बॉक्स ऑफिस पर शानदार कारोबार किया। इसके बावजूद हमें लगता था कि हम विदेशों में कुछ नहीं कर पाएंगे, लेकिन बदलता माहौल फिल्म निर्माताओं के लिए निश्चित तौर पर उत्साहजनक है। इस बदलाव के पीछे कई कारक शामिल हैं। जिसमें सबसे बड़ा कारक आर्थिक सफलता से मदद मिलना है।’

अस्तित्व बचाए रखने की कोशिश
मांडवीवाला के अनुसार ‘सरकार ने 2019 में अपनी नीति बदल दी और भारतीय फिल्मों को देश में रिलीज होने से रोक दिया, तब से हम प्रगतिशील मोड से सर्वाइवल मोड में आ गए हैं। जब तक हम इसका कोई विकल्प नहीं ढूंढते या भारतीय फिल्मों को दिखाने की अनुमति नहीं दी जाती, यह सर्वाइवल मोड जारी रहेगा। अभिनेता अदनान शाह टीपू ‘मौला जट्ट’ की कमाई से खुश थे, लेकिन स्थानीय फिल्मों की गुणवत्ता को लेकर चिंतित भी थे। उनका कहना है कि मैंने हमेशा कहा है कि कॉन्टेंट को बेहतर बनाने की जरूरत है। एक बात यह भी है कि फिल्में देखने की लागत इतनी ज्यादा हो गई है कि आम जनता के लिए इतना पैसा खर्च करना मुश्किल है।’

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