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क्रिएटिविटी अंदर से आती है 

मुंबई के मध्यम परिवार में जन्मा एक युवा जो अपने करियर की शुरुआत एक क्लैपर ब्वाॅय के रूप में करता है और आगे चलकर वही युवा ब्लाॅक बस्टर फिल्में देता है। निर्देशक एन चंद्रा के खाते में ‘अंकुश’, ‘प्रतिघात’, ‘नरसिम्हा’, ‘तेजाब’ और बहुत-सी सुपरहिट फिल्में हैं। चंद्रा के शानदार सिनेमा सफर पर उनसे शोभा अक्षर की विशेष बातचीत

आजकल  जो सिनेमा है खासकर वेब सीरीज में, क्या आपको  नहीं लगता है कि वहां कलात्मक विषयों की कमी हो गई है और अश्लीलता और गाली गलौच पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है?  मेरे ख्याल से अभी भी सिनेमा में निर्देशकों के पास परोसने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन जिस तरह से समाज विकसित होता है वहां नए-नए माध्यम आ जाते हैं। माध्यम आ जाते हैं तो जो उनका डीलिमिटेशन है उनका फायदा उठाकर यानी कि उसको एडवांस तरीके से इस्तेमाल करके लोग उसे पेश करना चाहते हैं। आज जो वेब सीरीज आ रही हैं जिसमें फाउल लैंग्वेज इस्तेमाल की जा रही है, लेकिन उसके पीछे यदि कोई कंटेंट छुपा है तो हमें उसको भी देखना चाहिए, क्योंकि वे अपने सीरीज में अपशब्द डाल रहे हैं, इसलिए हम उन्हें गलत कहें यह सही नहीं होगा। हम तब किसी निर्देशक पर प्रश्न उठाएं जब वह बैड कंटेंट इस्तेमाल कर रहा हो। देखिये कंटेंट किरदार पर निर्भर होता है। एक किरदार है जो झोपड़ पट्टी का है जो झापड़ पर रियेक्ट नहीं करेगा क्यूंकि झापड़ खाना, चाकू चलाना, गाली बोलना उसके रोज के काम हैं, वहीं लुटियंस दिल्ली का जो किरदार होगा वह एक आध गाली भी सुनकर शरमा जायेगा और सहम जाएगा तो यह सब परवरिश की बात है। तो यदि निर्देशक अपने किरदार के मुताबिक फाउल लैंग्वेज इस्तेमाल कर रहा है तो इसमें गलत क्या है। पहले सेंसर इस तरह की भाषाओं को लिमिट में करने का काम करती थी, लेकिन सिर्फ फिल्मों में। अब निर्देशकों के पास एक ऐसा प्लेटफार्म आया जहां वे स्वतंत्र हैं, यहां उनके पास कोई लिमिटेशन नहीं हैं। इसीलिए अब कुछ निर्देशक अपने किरदारों का असली समाज दिखा रहे हैं।

‘अंकुश’ फिल्म बनाने के लिए आपने घर बेच दिया था, जेवर बेच दिया था, लेकिन जब वह फिल्म बन कर तैयार हुई दर्शकों के सामने आयी तो वह एक सुपरहिट फिल्म रही। उस दौरान के अपने इस जूनून के संस्मरण को हमसे साझा कीजिए?

वो फिल्म मैंने सड़क पर रह करके, सड़क के लड़कों को लेकर के बनाई थी। मतलब उस वक्त ऐसा हो गया था कि शूटिंग के लिए पैसा ही नहीं था। उस दौरान मैं वीडियो एडिटर था, बड़ी -बड़ी फिल्में एडिट करता था, पैसे नहीं थे तो एक दिन आॅफिस गया, कार्ला मेहता के यहां। वहां जाकर पता चला कि इन्स्टालमेन्ट मिल गया। तीन हजार रुपये का। उसको लेते ही मैंने शूटिंग की जगह पर फोन किया कि भैया तीन हजार मिला है। दो दिन की शूटिंग तो हो ही सकती है। इस तरह से तो उस फिल्म की शूटिंग शुरू हुई। प्रोडक्शन वाला भी जब बजट बनाता था तो हम पहले से सुबह सबको बता देते थे कि आज लंच नहीं मिलेगा सिर्फ बड़ा पाव से काम चलाना पड़ेगा। लेकिन किसी ने भी उस तंगी में कोई शिकायत नहीं की क्योंकि कहीं न कहीं उनको लग रहा था कि कोई अच्छी चीज बन रही है। बनते-बनाते किसी तरह शूटिंग पूरी हुई। अब बारी ब्रोकर्स की थी, फिल्म को बेचना था। ब्रोकर्स यह ध्यान देते हैं कि फिल्म उन्हें अच्छी लगे ऐसा न हो कि उसके वजह से मार्किट में उनका नाम खराब हो जाए। उनकी अच्छी लगती थी तभी वह अपने-अपने डिस्ट्रीब्यूटर को बोलते थे। इसमें तो मेरे साथ यह हुआ कि ब्रोकर्स पहले 10 दिन आने को ही तैयार नहीं हुए, मुझसे पूछते हीरो कौन है, मैं बताता नाना पाटेकर तो बोलते ये कौन है? मदन जैन, ये कौन है मालूम नहीं। सुहास पालिशेखर, ये कौन है मालूम नहीं ? अच्छा फोटो दिखाओ तो सब काले कलूटे मतलब सफेद रंग छोड़कर उसमें सब रंग के लड़के थे। तो सब मुझे कहते थे कि पता नहीं यार तूने क्या किया हुआ है। गलती से एक ब्रोकर ने देखी फिर दूसरे ने देखा, जब उन्होंने देखना शुरू किया तो 15 दिन के भीतर हर टेरिटरी में तीन-तीन डिस्ट्रीब्यूटर खड़े रहे खरीदने के लिए। तो यह होती है कंटेंट की स्ट्रेंथ।

‘प्रतिघात’, ‘अंकुश’ में लगातार नाना पाटेकर को आपने अपने फिल्मों में लिया फिर उसके बाद आपकी फिल्म ‘तेजाब’ आयी, उसमें नाना पाटेकर नदारद रहे, क्यों?

तेजाब में भी पहले वे थे, अगर आप उसका पुराना पोस्टर देखेंगे या उसका जो पहले सबसे बड़ा एडवरटीजमेंट छपा था। लेकिन फिर उनके डेट्स की  प्राॅब्लम की वजह से उन्हें रीप्लेस करना पड़ा।

‘तेजाब’ का जो  आइकोनिक गाना था ‘एक दो तीन…’ अगर मैं यूं कहूं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उस गाने के बाद ही अनिल कपूर अनिल कपूर बने और माधुरी दीक्षित माधुरी दीक्षित बनीं। उसका कुछ किस्सा बताइये कि उसका इस तरह फिल्मांकन करना है, यह कैसे आपके जेहन में आया?

उस गाने की अगर बात करूं तो मैं बहुत पहले से स्योर था कि उस गाने का फिल्मांकन कैसे करना है। देखिये अंकुश और प्रतिघात कल्ट फिल्में हैं, लेकिन ‘तेजाब’ आर्टिस्टिक केटेगरी में आती है। ‘तेजाब’ मेरी पहली फिल्म थी जो पूरी तरह कमर्शिअल सेट पर थी। जावेद अख्तर साहब लिरिसिस्ट थे और मैं पहली बार लक्ष्मीकांत और प्यारेलाल जैसे बड़े म्यूजिक डायरेक्टर के साथ काम कर रहा था। लक्ष्मी जी ने मुझसे पूछा था कि इस गाने का सिचुएशन क्या है। मैंने बोला कि यह थोड़ा अजीब है, लेकिन इसमें हीरोइन डांस कर रही है और आज ही विलेन उसे पकड़ने आ रहा है। उन्होंने कहा यह क्या घिसी पिटी पिक्चर बनाई है। अब उसमें क्या होना था वो मुझे ही पता था। तो एक दो मीटिंग्स हुईं उसमें से कुछ निकला नहीं। एक दिन लक्ष्मी जी ने स्टूडियो में डमी वर्ड्स भेजे, ‘एक दो तीन . . .’ तो जावेद साहेब जब अगले दिन आए तो वो इन्हीं शब्दों पर गाना लिख कर लाए। इसीलिए मैं जावेद साहब को कहता हूं ‘ही इज द मास्टर’।

आप नए निर्देशकों की फिल्मों को देख रहे होंगे उनमें कोई ऐसा कंटेंट जो आपने देखा हो और लगा हो कि इस पर मैं काम करना चाहता था।फिल्में बनाने को लेकर आपकी क्या भविष्य में कोई योजना है?

अभी तक तो नहीं, लेकिन आई एम स्टिल इन गेम। मैं
हिस्टोरिकल फिल्म शुरू से बनाना चाहता हूं, खासकर मुगलों को लेकर या अंग्रेजों को लेकर। क्यूंकि मैंने अभी तक नहीं देखा कि अंग्रेजों के भीतर के किसी किरदार को लेकर कोई खास काम सिनेमा में किया गया है। मैं अपनी अगली फिल्म जो लेकर आ रहा हूं उसका नाम सोच चुका हूं और उसे काॅपीराइट भी करा चुका हूं। जिसका नाम है ‘मैग्नीफिसेन्ट एनिमी’। एक ऐसा दुश्मन जो दुश्मन तो है पर मैग्निफिसेंट भी है।

आपने फिल्म ‘परिचय’ के दौरान गुलजार साहब के अंडर में रहकर काम किया, कैसा रहा उनके साथ का अनुभव?

गुलजार साहब के साथ तो हर दिन सीखा है। वो तमीज और तहजीब के ऐपिटोम हैं। उस वक्त मैं तो एक साधारण सा वर्ली नाके के चैल से आया एक बेतरतीब सा लड़का था। लेकिन गुलजार साहब के साथ जब मैंने 11 साल काम किया तो सीखा कि समाज से कैसे जुड़ना है। मैं पहले क्लैपर ब्वाॅय बना फिर सेकंड असिस्टेंट और फिर फस्र्ट असिस्टेंट बना। और इन्हीं तरक्कियों के साथ मैं इंसानियत के भी नए-नए पाठ सीखते चला गया। मेरे जीवन में मां के बाद अगर मैं किसी का ऋणी हूं तो वो गुलजार साहब ही हैं।

सर हम जानना चाहेंगे कि आपकी पसंदीदा फिल्में कौन कौन सी हैं? जिनका कंटेंट आपको बहुत पसंद आया हो।

ऐसी तो बहुत फिल्में हैं, लेकिन ‘मदर इंडिया’ मुझे बहुत पसंद आयी क्योंकि वो डाउन टुवर्ड कंटेंट पर बेस है। ‘गंगा जमुना’ भी उसी आम आदमी की कहानी बयान करती हैं जिस आदमी की बात हम करते हैं। जैसे कंटेंट पर मैं ज्यादा ध्यान देता हूं ठीक उसी तरह राजकुमार हिरानी ने इधर अच्छी फिल्में बनायीं हैं। नए निर्देशकों में अगर बात करूं तो अनुराग कश्यप, तिग्मांशु धूलिया अदि निर्देशक कल्ट विषयों पर अच्छा काम कर रहे हैं। इन लोगों ने यूपी के छोटे-छोटे शहरों के प्राॅब्लम्स को वल्र्ड स्क्रीन पर लाने का काम किया। जैसे मैंने वर्ली नाके की कहनियों के साथ किया।
क्या आपको लगता है कि पहले स्क्रिप्ट राइटिंग लेखक की परिकल्पनाओं के साथ-साथ समाज से सीधे तौर पर जुडी समस्याओं पर लिखा जाता था। लेकिन क्या अब जानबूझकर वो लाइनें लिखी जा रही है जिससे लेखक को लगता है कि ये चर्चा का ज्यादा विषय बनेगी? इस हिस्से को लिखेंगे तो ज्यादा लोग आकर्षक होंगे?
मैं इस बात पर आपसे 100 प्रतिशत सहमत हूूं कि जो लेखन पहले होता था वह अब नहीं है। मुझे ऐसा लग रहा है कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि जो लोग इंडस्ट्री में स्क्रिप्ट राइटर बनकर आ रहे हैं वो अपने साथ जिंदगी का लम्बा अनुभव लेकर नहीं आ रहे हैं जो पहले के लेखक लेकर आते थे। कोर्स करके आप राइटिंग का क्राफ्ट हासिल कर सकते हैं लेकिन जो क्रिएटिविटी है वो अंदर से आती है।

जो युवा साथी निर्देशक बनना चाहते हैं और इंडस्ट्री में कुछ योगदान देना चाह रहे हैं आप अपने इतने लम्बे अनुभव के साथ उन्हें क्या सलाह देंगे?

देखिए, सबसे पहले उन्हें यह समझना होगा कि सिनेमा एक भाषा है। कोई चीज लिखना और उसे सिनेमेटिक भाषा में लिखना ये दोनों अपने आप में दो अलग-अलग विषय हैं। जो लोग निर्देशक बनने इंडस्ट्री में आ रहे हैं उन्हें सबसे पहले तो अपने आस-पास की चीजों से अवेयर रहना होगा। उन्हें लिटरेचर समझना होगा। पाॅलिटिक्स समझनी होगी। उन्हें कविताएं समझनी होंगी। उन्हें पेंटिंग्स भी समझनी होगी ताकि जब वह फ्रेम लगाएं तो उन्हें पता चल सके कि कौन सा फ्रेम अच्छा है और कौन सा नहीं। अगर आपने सिनेमा की भाषा को नहीं समझा है तो हिंदी में आपने चाहे जितना अच्छा लिखा हो वह सिनेमेटिक नहीं।

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