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जुनून और जज्बे से एक समानांतर दुनिया बनाई जा सकती है, जहां लोगों को इंसान बने रहने के लिए सेंसेटाइज किया जा सके। ऐसी ही एक दुनिया है नीरज कुंदेर सीधी की, जिसे मैंने इस बार बेहद करीब से देखा।
अवसर मिला नीरज कुंदेर सीधी के नेतृत्व में और प्रवीण कुमार चौहान के निर्देशन में आयोजित पांचवें विंध्या इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में शिरकत करने का। कई मायनों में यह अहम फिल्म फेस्टिवल 05 जनवरी से 07 जनवरी 2024 तक सीधी, मट्टय प्रदेश में आयोजित हुआ। अनगिनत आयोजनों के बीच एक खास मकसद सीधी में हुए इस आयोजन को अलग खड़ा करता है। अलग इसलिए क्योंकि यहां शहर को, यहां के लोगों को बेहतर से बेहतर इंसान बनने के लिए सेंसेटाइज किया जा रहा है, स्कूल बच्चों को जहीन होने के मायने को व्यावहारिकता में पिरोना सिखाया जा रहा है।

पी अमुधवनन के निर्देशन में स्त्री-केंद्रित गंभीर विषयों पर आधारित तमिल भाषा की चर्चित फिल्म ‘ट3’ की भी स्क्रीनिंग यहां की गई। स्क्रीनिंग के उपरांत हॉल में दर्शक दीर्घा में उपस्थित एक बच्चे ने निर्देशक से फिल्म देखने के बाद पूछा कि ‘मुझे क्या एटीट्यूड रखना चाहिए लड़कियों के लिए जिससे वे सहज रहें!’ इस प्रश्न को समझिए, कितना जरूरी है यह। मेरा मानना है कि कम से कम स्त्रियों के लिए एक सहज और सुरक्षित वातावरण ऐसे ही प्रश्नों के उत्तर और उनके क्रियान्वयन से बनता है। मुझे महसूस हुआ यहां इस उत्सव में संवाद की हर गुंजाइश है।

साहित्य, कला और सिनेमा के अस्ल को पहचानना और फिर उसे आगे और बेहतर कर सौंपना, यह बेहद जरूरी है। जो सीट्टाी में नीरज जी और उनके साथी तमाम उपयोग, प्रयोग के साथ कर रहे हैं। साथियों में परिवार की परिपक्वता भी शामिल है। अद्भुत साथी लोग! मेरे लिए अद्भुत यात्रा। दिल्ली से रीवा और रीवा से सीधी। पहली मर्तबा ट्रॉपिक ऑफ कैंसर को इतने करीब से महसूस करना, मेरे अनुभव में बहुत कुछ जोड़ गया, रीवा-सीधी टनल मानो एक काल से दूसरे काल में प्रवेश करा रही थी। चारों तरफ के लाल पत्थर, लाल मिट्टी मानो क्रांति के गीत गा रहे हों, जिसमें आदिवासियों की आवाज सबसे बुलंद महसूस हो रही थी।
इस फिल्म फेस्टिवल के आयोजक नीरज कुंदेर सीट्टाी कहते हैं कि ‘हमने यही सोचा था कि देश-विदेश के सिनेमा के माध्यम से दुनिया को एक जगह बैठकर देखा जा सकता है। अनगिनत एहसासों को एक जगह बहुत सारे लोग एक साथ महसूस कर, उस पर बात कर सकते हैं, विमर्श कर सकते हैं। सिनेमा के माध्यम से इस सार पर बार-बार पहुंच कर कि नफरत से दुनिया नहीं चलती, प्रेम सार्वभौमिक सच और जरूरी तत्व है, दुनिया खूबसूरत इसी से है, इंसान इसी से है।

इस फेस्टिवल का उद्देश्य यही है कि ‘सीट्टाी सिनेमा क्लब’ के माध्यम से सिनेमा के सरोकार का एक बीज बोया जाए और हमने बीज बो दिया जो एक दिन वृक्ष बनेगा, अनगिनत वृक्ष एक दिन मिलकर जंगल बनायेंगे। सब कुछ प्रकृति की तरह सुन्दर।’ नीरज आगे इस यात्रा में अपने साथियों का जिक्र करते हैं, बताते हैं कि ‘फेस्टिवल की खास बात है कि इसमें जो लोग सहयोग करते हैं वो एकदम यूनिक है। जैसे संदीप चौरे चार्टेड अकाउंटेंट हैं, पिछले पांच वर्षों से सिर्फ फिल्म की स्क्रीनिंग करने भोपाल से आते हैं। शिवा कुंदेर इंदौर से अपनी टीम लेकर हर बार प्रांगण की सज्जा के लिए आता है, हर वो सारी टीम के बच्चे वॉलेंटियर बनकर काम करते हैं। प्रजीत एक लोक कलाकार और संगीतकार है, संस्था का ही सदस्य है, वो किसी से नहीं मिल पाता सिर्फ टेक्निकल चीजें देखता है। रजनीश एक्टर है पर पहले वो मैकेनिक था, पांच साल से वो सिर्फ प्रबंधान देख रहा है।

रोशनी प्रसाद मिश्र, रंगकर्मी-कवि-लेखक-निर्देशक हैं जो उद्घाटन समापन के सांस्कृतिक कार्यक्रम की रूपरेखा बनाते हैं।
मित्र राकेश जायसवाल की एक ट्रेवल्स कंपनी है, तीन छोटी-छोटी गाड़िया हैं उनमें से वह हमें दो गाड़ी पांच दिनों के लिए निःशुल्क देता है।
मित्र गौरव ने बतौर अभिनेता के रूप में लगभग एक दशक तक रंगमंच में काम किया, पर घर के दबाव के कारण बिजनेश करना पड़ा, पर कला से लगाव के कारण मैहर से आता है सारी जिम्मेदारी उठाता है और पैसों से भी मदद करता है। 2-2 होटल हैं- अक्षत रेजिडेंसी और मट्टाुसूदन होटल जो इस उत्सव में हमें हमेशा निःशुल्क रूम और भोजन प्रदान करते हैं।
इस बार ‘मास पब्लिक स्कूल’ के संचालक सूर्य प्रकाश सिंह जी ने स्कूल के बच्चों को न सिर्फ हमें सौंपा, बल्कि वो खुद हिस्सा बन गए।
सुनील चौधरी की एक फोटोकॉपी की दुकान है और वो सारी प्रिंटिंग की जिम्मेदारी उठाते हैं।
कुंदन वर्मा साफा बांधाता है, शादियों में छोटा-सा सहयोग उसका ये रहता है कि सैकड़ों लोगों को निःशुल्क साफा बांट्टाता है समापन अवसर पर। और संरक्षक त्रयी अनूप मिश्रा, इंजी. आर बी सिंह और विवेक सिंह जी तो है ही…

नीरज कुंदेर
सीधी मुसलसल प्रत्येक रविवार को शहर के बच्चों को मुफ्त में फिल्म दिखाते हैं। इस मंडली में कभी बड़े तो कभी बुजुर्ग भी शामिल होते हैं। वे जानते हैं, सिनेमा के पास समाज को आईना दिखाते रहने और उम्मीद की रोशनी बनाए रखने की अपार क्षमता है।
(लेखिका लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ से जुड़ी हैं एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

 

चुनौतियों के बावजूद सफल रहा कार्यक्रम
इंद्रावती नाट्य समिति के निदेशक और फिल्म फेस्टिवल के संयोजक नीरज ने कहा कि तमाम चुनौतियों के बावजूद सीधी के लोगों की वजह से इतना बड़ा कार्यक्रम लगातार सफल होता आ रहा है। सीधी जैसे छोटे शहर में इस तरह के आयोजन की कल्पना करना भी बेहद मुश्किल था।

 

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