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चौरी चौरा के विद्रोहियों की याद में ‘अवाम का सिनेमा’ फिल्म समारोह

जनार्दन कुमार सिंह 

गोरखपुर| चौरी चौरा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के पांचवे संस्करण की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। चौरी चौरा विद्रोह शताब्दी वर्ष से महज एक कदम दूर यह आयोजन राजधानी गांव से महानायक अब्दुल्ला और उनके विद्रोही साथियों की सलामी से शुरू होगा। इस वर्ष के आयोजन की थीम ‘चलो चौरी चौरा विद्रोहियों के द्वार’ है। इस आयोजन में ‘अवाम का सिनेमा’ आजादी आंदोलन की साझी विरासत को नयी पीढ़ी से रूबरू कराने की मुहिम है जो वर्ष 2006 से भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की विरासत को सहेजने के लिए शुरू हुई थी। धीरे-धीरे यह कारवां बड़ा होता गया। देश- दुनिया में न सिर्फ इसे समर्थन मिला, बल्कि लोगों का लगातार सहयोग भी हासिल होता रहा है। अवाम का सिनेमा देश के अलग-अलग हिस्सों में साल भर कला के विभिन्न माध्यमों को समेटे हुए विविध आयोजन करता आया है। अयोध्या से लेकर कारगिल तक अवाम का सिनेमा लोगों की मुलाकात जंग-ए-आजादी के शहीदों से कराता रहा है जिसमें सरोकारी सिनेमा की बड़ी भूमिका रही है।

हमख्याल साथियों के श्रम-सहयोग और जन सहयोग से अवाम का सिनेमा ने अयोध्या, फैजाबाद, मऊ,  ओरैया, इटावा, बिजनौर, दिल्ली, कारगिल, जयपुर, जम्मू, वर्धा, आजमगढ़, बरहज, चौरी चौरा, कानपुर, गोंडा, बनारस आदि जगहों पर लगातार आयोजन किया है। जहां एक दिवसीय आयोजनों से लेकर साप्ताहिक आयोजन किए जाते रहे हैं। इस दौरान सेमिनार, नाटक, गायन, जादू कला, कठपुतली, लोक संगीत, लोक नृत्य, फिल्म स्क्रीनिंग, चित्र प्रदर्शनी, रंगोली प्रतियोगिता, कविता पोस्टर, मार्च, क्रांतिकारियों की जेल डायरी, पत्र, तार, मुकदमे की फाइल आदि के जरिये संवाद करने की कोशिश की जाती है। आयोजन के दौरान किताबों का विमोचन और नये फिल्मकारों की सरोकारी फिल्में भी रिलीज की जाती रही हैं। अवाम का सिनेमा आयोजन में फिल्मों की कहानी यथार्थ की खुरदरी जमीन पर समाज की हकीकत बयां करती है, सवाल खड़ा करती है और बेहतर समाज गढऩे के लिए लोगों को प्रेरित करती है।

 

फिल्मों का मेला

-पांचवा चौरी चौरा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल आगामी 24-25 अक्टूबर को


– इस बार आयोजन की थीम ‘चलो चौरी चौरा विद्रोहियों के द्वार’

गौरतलब है कि 4 फरवरी, 1922 की  घटनाक्रम की सच्चाई कुछ इस तरह सामने आती है कि दोपहर बाद 4 बजे किसानों के नेतृत्व में दो हजार से ज्यादा गांव वालों ने चौरी चौरा थाना को घेर लिया था। ब्रिटिश सत्ता के लंबे उत्पीड़न और अपमान की प्रतिक्रिया में थाने की इमारत में आग लगा दी थी। जिसमें छुपे हुए 24 अत्याचारी सिपाही जलकर राख हो गए। चौरी चौरा प्रकरण में 273 विद्रोहियों को गिरफ्तार किया गया था, जबकि 54 फरार हो गए थे। इनमें से एक की मौत हो गई थी। 272 में से 228 पर मुकदमा चला, मुकदमे के दौरान तीन लोगों की मौत हो गई जिससे 225 लोगों के खिलाफ ही फैसला आया था। गोरखपुर सत्र न्यायालय का नाटकीय फैसला 9 जनवरी, 1923 को आया। ‘अब्दुल्ला और अन्य बनाम सम्राट’ सेशन कोर्ट आधारहीन तरीके से 172 आंदोलनकारियों को फांसी पर लटका देना चाहती थी। बाबा राघवदास की कोशिशों से इस केस में पं. मदनमोहन मालवीय, मोतीलाल नेहरू सहित उच्च न्यायालय के सभी बड़े वकीलों ने निःशुल्क पैरवी की। इस फैसले को बदलने के लिए 1 मार्च,1923 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील हुई और उच्च न्यायालय में 6 मार्च,1923 को इस मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई जिसका फैसला 30 अप्रैल,1923 को सुनाया गया| लेकिन उच्च नायायालय में प्रमाणित कर पाना मुश्किल था। लिहाजा उन्नीस नेतृत्वकर्ताओं को चुन-चुन कर फांसी की सजा दे दी गई। चौरी-चौरा की यह घटना विश्व इतिहास की महत्वपूर्ण घटना बन गई।

स्वराज पाने की चाहत में कुर्बान हुए चौरी-चौरा विद्रोहियों की याद में ‘अवाम का सिनेमा’ प्रति वर्ष आयोजन करता रहा है। इस बार पांचवें संस्करण की आयोजन समिति में अविनाश गुप्ता, योगेन्द्र यादव जिज्ञासु, डॉ. मोहन दास, रफी खान, धीरेन्द्र प्रताप, सुनील दत्ता, डॉ. सुनील कुमार पांडेय, सुरेन्द्र कुमार, अंतरिक्ष श्रीवास्तव, पारसनाथ मौर्या, विजेन्द्र अग्रहरि, सुनील तिवारी आदि शामिल हैं।

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