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नरेंद्र मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के पहले आम बजट को लेकर आम से लेकर खास लोगों में कहीं खुशी तो कहीं नाराजगी है। इस बजट को किसी ने सराहा तो किसी ने नकारा। बॉलीवुड में बजट की बात करें तो कई दशक पहले से ही मंदी, महंगाई, गरीबी और पैसों की मारामारी से जुड़े मुद्दों पर कई फिल्में बन चुकी हैं। इससे निपटने के लिए बॉलीवुड में अनोखे और हास्यास्पद तरीके सिखाती फिल्में आ चुकी हैं। तो आइए बात करते हैं कुछ ऐसी ही फिल्मों के बारे में।

वर्ष 2013 में आई संजय मिश्रा की अभिनीत फिल्म ‘सारे जहां से महंगा’ यह सिखाती है कि सही मायने में एक मध्यवर्गीय परिवार को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कैसे एक आदमी को चंद पैसों में गुजर-बसर करना पड़ता है। कैसे कोई फरमाइशों और ख्वाहिशों में कटौती करके जरूरत की चीजें खरीदने में उलझा रहता है। इसी उलझन में उसकी पूरी जिंदगी निकल जाती है। इस फिल्म में महंगाई कम करने का एक अनोखा फिल्मी नुस्खा बताया गया है। फिल्म में संजय मिश्रा दुकान खोलने के लिए 1 लाख का लोन लेता है, लेकिन इन पैसे से तीन साल का घरेलू राशन खरीद कर रख लेता है ताकि आगे जब महंगाई बढ़े तो उन्हें इससे कोई फर्क न पड़े।

 


इसी वर्ष आई आमिर खान प्रोडक्शन्स की फिल्म ‘पिपली लाइव’। इस फिल्म का जिक्र आता है तो हारमोनियम पर बैठे रघुवीर यादव की याद आ जाती है और याद एक ऐसे गाने जो देश का एंथम सॉन्ग होना चाहिए। गाने के बोल हैं ‘सखी सैंया तो खूब ही कमात हैं, महंगाई डायन खाए जात है’ यह गाना लगभग हर दूसरे घर की कहानी बन गया है। महंगाई कम होने का नाम नहीं लेती और आमदनी बढ़ने का। इंसान का जीवन महज जरूरतों भर में सिमट कर रह जाता है।

फिल्म ‘फंस गए रे ओबामा’ वर्ष 2010 में आई थी। इस फिल्म की मुख्य भूमिका में रजत कपूर थे। रजत अमेरिका से आए हुए एक एनआरआई होते हैं। जब अमेरिका मंदी के दौर से गुजर रहा होता है तब वे भारत अपनी पुश्तैनी सम्पति लेने आते हैं। मगर भारत आकर मुसीबत में फंस जाते हैं। इसके बाद उन्हें भारत से वापस जाने के लिए काफी पापड़ बेलने पड़ते हैं।

वर्ष 2004 में आई फिल्म ‘स्वदेश’। शाहरुख खान अभिनीत यह फिल्म गांव की असली हालत को बयां करने में कामयाब होती है। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर भले ही ज्यादा कमाई नहीं की हो, लेकिन फिल्म लोगों के दिलों में गहराती तक उतरती है। शाहरुख खान के नजरिए से भले ही फिल्म में देशप्रेम दिखाया गया हो, मगर यह भी साफ तौर पर सामने आता है कि वह आधुनिकीकरण के इस दौर में गांव तक में ढंग से बिजली और वाटर सप्लाई की सुविधाएं नहीं पहुंच पा रही। आज भी ढूंढ़ने पर भारत में ऐसे तमाम गांव मिल जाएंगे जहां सरकार कोई खास सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाई है।

दिसंबर 2001 में आई फिल्म ‘आमदनी अठन्नी खर्चा रूपइया’ की कहानी में ‘जितनी लंबी चादर उतने पैर पसारो’ की कहावत को चरितार्थ करती है। इस फिल्म की कहानी तीन परिवार की है, जहां पति अपनी रूढ़िवादी सोच रखते हैं और अपनी इस सोच तले पत्नियों को हमेशा दबाकर रखते हैं। वहीं, पत्नियां घर चलाने के साथ पैसा कमाने पर विश्वास रखती हैं।

मनोज कुमार के निर्देशन में आई फिल्म ‘रोटी कपड़ा और मकान’ 1974 में ये फिल्म दिल को झकझोर जाती है। कैसे अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए आदमी को बड़े शहरों में संघर्ष करना पड़ता है। यह एक मल्टीस्टारर फिल्म थी जिसमें मनोज कुमार के अलावा अमिताभ बच्चन, शशी कपूर और जीनत अमान जैसे कलाकार हैं।

वर्ष 1957 में आई महबूब खान की निर्देशित फिल्म ‘मदर इंडिया’। यह फिल्म 1940 में आई ‘औरत’ महबूब खान की ही निर्देशित फिल्म की रीमेक है। यह फिल्म मनुष्य खासकर भारतीय ग्रामीण महिलाओं की जिजीविषा का है। ‘मदर इंडिया’ मुख्य भूमिका में नरगिस की है जो नवविवाहिता के रूप में अपने ससुराल आती है और घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियां में पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती है। साहूकार से लिए गए कर्ज के जाल में नरगिस का परिवार हमेशा के लिए फंस चुका होता है। खेती मौसम के रहमो-करम पर निर्भर है और गरीबी का साया पीछे पड़ी है। ऐसे में एक दुर्घटना में अपने दोनों हाथ गंवाने के बाद स्वयं को परिवार पर बोझ मानकर नरगिस के पति भी साथ छोड़ जाता है। अकेली नरगिस तमाम मुश्किलों से लड़ती है। एक बच्चे को भी खोने के बाद दो बेटों को अकेले बड़ा करती है। इस सबके बीच वह अपने मूल्यों और सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं करती। इस फिल्म के यादगार दृश्यों में फिल्म का प्रतीक बन जाता है वह है बैल की जगह स्वयं नरगिस हल खींचकर अपना खेत जोतती है।

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