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पीरियड्स पर टूटी चुप्पी

भारत में मासिक धर्म से जुड़ी समस्याओं पर आधारित फिल्म ‘पीरियड एंड ऑफ सेंटेंस’ ने 91वें अकादमी पुरस्कार समारोह में डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट सब्जेक्ट की श्रेणी में ऑस्कर पुरस्कार जीता। फिल्म का निर्माण भारतीय फिल्मकार गुनीत मोंगा की ‘सिखिया एंटरटेनमेंट’ कंपनी ने किया है। फिल्म मासिक धर्म से जुड़ी वर्जनाओं के खिलाफ महिलाओं की लड़ाई और असल जिंदगी के ‘पैडमैन’ अरुणाचलम मुरुगनाथम के काम पर बात करती है। 26 मिनट की फिल्म उत्तर प्रदेश के हापुड़ की लड़कियों, महिलाओं और उनके गांव में पैड मशीन की स्थापना के ईद-गिर्द घूमती है।

फिल्म की कहानी बड़ी दिलचस्प है। इसमें गांव की लड़कियों से सवाल पूछे जाते हैं कि पीरियड क्या होता है? इस सवाल पर लड़कियां इतना शरमा जाती हैं कि जवाब ही नहीं देती। फिर यही सवाल गांव के स्कूल में पढ़ने वाले लड़कों से किया जाता है तो उनमें से एक कहता है कि पीरियड वही जो स्कूल में घंटी बजने के बाद होता है। दूसरा लड़का कहता है, ये तो एक बीमारी है जो औरतों को होती है, ऐसा सुना है। यहीं से शुरू होती है डॉक्यूमेंट्री। कहानी में हापुड़ की स्नेहा का अहम रोल है। जो पुलिस में भर्ती होना चाहती है। एक गांव जहां की बुजुर्ग महिलाएं पीरियड्स को भगवान की मर्जी और गंदा खून बताती हैं, उसी गांव की स्नेहा की सोच अलग है। वह कहती है जब दुर्गा को देवी मां कहते हैं, फिर मंदिर में औरतों की जाने की मनाही क्यों है। डॉक्यूमेंट्री में फलाई नाम की संस्था और असल जिंदगी के पैडमैन अरुणाचलम मुरंगनाथम की एंट्री भी होती है। उन्हीं की बनाई सेनेटरी मशीन को गांव में लगाया जाता है, जहां लड़कियां रोजगार के साथ-साथ पीरियड के दिनों में सेनेटरी के यूज के सही मायने को समझती हैं।

28 मई का दिन ‘विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य समाज में फैली मासिक धर्म संबंधी गलत भ्रांतियों को दूर करने के साथ महिलाओं और किशोरियों को माहवारी के बारे में सही जानकारी देना है। महीने के वो पांच दिन आज भी शर्म और उपेक्षा का विषय बने हुए हैं। इस फुसफुसाहट को अब ऐसा मंच मिल रहा है जहां इसे बुलंद आवाज में बदला जा सके।

ईरानी-अमेरिकी फिल्मकार रायका जेहताबची द्वारा निर्देशित फिल्म का निर्माण लॉस एंजेलिस के ओकवुड स्कूल के विद्यार्थियों के एक समूह और उनकी शिक्षिका मेलिसा बर्टन द्वारा स्थापित ‘द पैड प्रोजेक्ट’ ने किया है। उन्होंने यह पुरस्कार अपने स्कूल को समर्पित करते हुए कहा, ‘इस परियोजना का जन्म इसलिए हुआ क्योंकि लॉस एंजिलिस के मेरे विद्यार्थी और भारत के लोग बदलाव लाना चाहते हैं।’

इस पुरस्कार के लिए ‘पीरियड एंड ऑफ सेंटेंस’ का मुकाबला ‘ब्लैक शीप’, ‘एंड गेम’, ‘लाइफबोट’ और ‘ए नाइट एट द गार्डन’ के साथ था। इस पुरस्कार को लेने के लिए रेका जेहताबची और बर्टन मंच पर पहुंचीं, रायका जेहताबची ने कहा कि ‘मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि मासिक धर्म पर बनी फिल्म को ऑस्कर मिला है।’ उन्होंने कहा, ‘मैं इस पुरस्कार को फेमिनिस्ट मेजोरिटी फाउंडेशन, पूरी टीम और कलाकारों के साथ साझा करती हूं। मैं इसे दुनिया भर के शिक्षकों और विद्यार्थियों के साथ साझा करती हूं।’

चुप्पी तोड़ो बैठक : दिल्ली स्थित स्वयंसेवी संस्था ‘गूंज’ भारत के कई गांवों में माहवारी पर ‘चुप्पी तोड़ो बैठक’ कराती है। इनमें गांव की महिलाएं माहवारी से जुड़े अपने अनुभव साझा करती हैं। बैठक में उन्हें सैनिटरी पैड की अहमियत के बारे में बताया जाता है। ये बैठक माहवारी से जुड़ी शर्म और चुप्पी तोड़ने का एक जरिया है ताकि महिलाएं अपनी सेहत को माहवारी से जोड़ कर देख सकें और इस पर निःसंकोच अपनी बात रख सकें।

गीली कतरनें : पच्चीस वर्षीय राजस्थान निवासी दुर्गा कहती हैं, ‘एक ही कपड़े को बार-बार इस्तेमाल करना पड़ता है और माहवारी का एक-एक दिन पहाड़ जैसा लगता है।’ इस्तेमाल की गई कतरनों को वे ठीक तरह धो भी नहीं पातीं और शर्म के कारण कपड़ों के नीचे सूखने के लिए डाल देतीं हैं। कई बार कतरनें ठीक से सूख नहीं पातीं और गीले कपड़े इस्तेमाल करना पड़ता है।

डिग्निटी पैक्स : यह एनजीओ शहरों से प्राप्त पुराने कपड़ों से महिलाओं के लिए सूती कपड़े के सैनिटरी पैड बनाता है। इन्हें गांवों में ‘माहवारी डिग्निटी पैक्स’ के रूप में बांटा जाता है। एक किट में 10 कपड़े के बने सैनिटरी पैड के साथ-साथ अंडर-गारमेंट्स भी रखे जाते हैं। ये डिग्निटी पैक्स उन महिलाओं के लिए एक बड़ी राहत होते हैं, जिन्हें माहवारी के दौरान एक कपड़े का टुकड़ा भी नहीं मिल पाता।

दयनीय हालात : गरीबी और अज्ञानता के चलते महिलाएं अपनी ‘मासिक जरूरत’ को कभी मिट्टी, तो कभी घास या प्लास्टिक की पन्नी, पत्ते और गंदे कपड़ों से पूरा करती हैं। इसके चलते वे गंभीर बीमारियों का शिकार होती रहती हैं। माहवारी के दौरान हाथ-पैरों में सूजन और अत्यधिक रक्तस्राव होना बहुत-सी महिलाओं के लिए आम बात है। संस्था महिलाओं के साथ माहवारी से जुड़ी ऐसी मुश्किलों पर संवाद करती है।

माई पैड : शहरों में लोगों के घर से पुराने कपड़े जमा किए जाते हैं, जैसे चादर, पर्दे, साड़ियां इत्यादि। इन्हें अच्छी तरह धोकर साफ किया जाता है और फिर पैड के आकार में काटा जाता है। हर पैड हाथ से बनता है। कोई कपड़े की कटाई का काम करता है, कोई इस्त्री का तो कोई सिलाई का। हर पैड एक जैसे आकार का बनता है। इस पहल को नेजेपीसी यानी नॉट जस्ट अ पीस ऑफ क्लॉथ नाम दिया गया है।

आगे बढ़ो : इसके अलावा माहवारी पर बातचीत को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पूरे देश में ‘रेज योर हैंड’ नाम की एक मुहिम भी चलाई गई है। यह मुहिम महिलाओं की गरिमा और माहवारी दोनों को एक समय में एक साथ संवाद में लाने की कोशिश है। इसी के तहत चुप्पी तोड़ो बैठक का आयोजन किया जाता है। इस तरह की बैठकों से समाज की मानसिकता को बदलने की कोशिश की जा रही है।

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