भारतीय सिनेमा 105 साल का हो गया है। एक शताब्दी से ज्यादा के बॉलीवुड इतिहास में एक भी फिल्म ऐसी नहीं बनी, जिसे मूलतः बच्चों की कहा जाए। कोई फिल्म देखने को नहीं मिली जिसमें बच्चा समस्याओं से घिरता है। गलतियां करता है, गिरता है, उलझता है और फिर इन सबसे बाहर निकलने का रास्ता भी खुद ही निकालता है। बच्चों के नाम पर बेशक कुछ फिल्में बनी। मगर वह सिर्फ नाम की ही हैं। हां, रस्म अदायगी के लिए कुछ नाम अंगुली पर जरूर गिनाए जा सकते हैं। जैसे ‘आई एम कलाम’, ‘चिल्लर पार्टी’, ‘गट्टू’ आदि। यह नाकाफी है। लेकिन अब निर्देशक विनोद कापड़ी ने बॉलीवुड को रास्ता दिखाया है। दो साल की बच्ची को लेकर उन्होंने ‘पीहू’ बनाई। यह फिल्म पिछले सप्ताह ही रिलीज हुई है। फिल्म ने खूब वाहवाही लूटी है।

‘पीहू’ की कहानी उच्च मध्यवर्गीय परिवार के दो साल की बच्ची की है। यह एकल परिवार (पति, पत्नी और दो वर्षीय बच्ची) सोसाइटी में रहता है। इस सोसाइटी में ऊंची-ऊंची
बिल्डिंग हैं। इनमें से एक ऊंची बिल्डिंग के एक फ्लैट में फिल्म की पूरी कहानी बुनी गई है। जहां दो साल की एक बच्ची (पीहू) घर में अकेली है। न कोई फैमिली मेंबर और न ही कोई देखभाल करने वाली नौकरानी। पीहू के पिता ऑफिस के काम से शहर से बाहर गए हैं। मां नींद की गोली खाने के बाद बेड पर मरी पड़ी है। बच्ची को लगता है, उसकी मां सो रही है। वो दो साल की बच्ची जब कुछ समझ नहीं पाती तो नासमझी में ऐसे-ऐसे काम करने लगती है कि ऑडिएंस का कलेजा मुंह को आ जाता है।

पीहू जब दोस्तों से मिलने के लिए बालकनी की रेलिंग क्रॉस करने की कोशिश करती है तो देखने वालों के पसीने छूट जाते हैं। पीहू आपको धड़कनें रोक देने वाले कई सीन देती है। इस फिल्म में दिखाए जाने वाला एक-एक सीन हर पेरेंट्स के लिए किसी बुरे सपने की तरह है। इतनी छोटी बच्ची की शानदार परफॉर्मेंस देखकर आप भी चौंक जाएंगे और इसके लिए विनोद कापड़ी को तारीफें मिलनी चाहिए। मात्र दो साल की बच्ची से अभिनय कराना भी एक बहुत बड़ा टास्क है। जिसे निर्देशक ने बखूबी अंजाम दिया है। विनोद ने दो साल की बच्ची से अभिनय कराकर बॉलीवुड को यह संदेश भी दिया है कि सिर्फ बच्चों को फिल्म में लेकर भी कॉमर्शियल फिल्में बनाई जा सकती हैं। ‘पीहू’ को सिर्फ समीक्षकों की वाहवाही नहीं मिल रही, बल्कि बॉक्स ऑफिस पर भी यह अच्छा बिजनेस कर रही है।

इस फिल्म के जरिए पीहू का किरदार निभाने वाली मायरा विश्वकर्मा के तौर पर ऑडिएंस को एक ऐसी स्टार मिलती है जो कम उम्र में भी शानदार परफॉर्मेंस से एक-एक सीन में जान डाल देती है। पहले फ्रेम से लेकर आखिरी तक मायरा को ऑडिएंस बस देखती ही रही और फिल्म खत्म होने के बाद भी उनका चेहरा नहीं भूलती। मायरा का एक-एक इमोशन हंसना, रोना या फिर बातें सीन को और भी बेहतरीन बना देता है। विनोद कापड़ी भी शानदार तरीके से फिल्म में भयावह सीन्स डाले हैं। अपने निर्देशन के जरिए डायरेक्टर आज के वक्त पर न्यूक्लियर लाइफस्टाइल और अर्बन रिलेशनशिप के संघर्ष को बारीकी से दिखाने की कोशिश करते हैं। शानदार तरीके से गढ़ी गई ये फिल्म अभिभावकों के लिए फिर भी सही मैसेज देने में कामयाब होती है। आज का दौर तेज-तर्रार एक्शन फिल्मों और साइंस-फिक्शन फिल्मों का है। आज से पहले भी बच्चों को ध्यान में रखकर बहुत कम फिल्में ही बनाई जाती रही हैं। साठ के दशक में राजेश खन्ना की फिल्म ‘आखिरी खत’ आई थी। यह फिल्म उनके कैरियर की पहली थी। मगर उसके पहले ‘राज’ रिलीज हो गई। विनोद कापड़ी की ‘पीहू’ में दो साल की पीहू घर के अंदर भटकती है। वह अलग-अलग मासूम सी लेकिन खतरनाक हरकत करती है। वहीं राजेश खन्ना के ‘आखिरी खत’ में उनका दो साल का बेटा शहर में खो जाता है। वह पूरे शहर में भटकता रहता है। ‘आखिरी खत’ के निर्देशक चेतन आनंद ने भी विनोद की तरह बच्चे से बहुत अच्छा काम करवाया था।


बच्चों के लिए फिल्में नहीं बनने के कारण वह बड़ों की ही फिल्में देखते हैं। जिस कारण से वे आक्रामक एवं अन्य गलत व्यवहार करने लगते हैं। पूर्णतः बालमन के मुताबिक फिल्में तो बॉलीवुड में बहुत कम बनीं। लेकिन कुछ फिल्में ऐसी जरूर हैं, जिनमें बच्चों के लिए कुछ है। उनसे बच्चे अच्छा कुछ सीख सकते हैं। पुराने जमाने में भले ही बच्चों को सिनेमा देखने से रोका जाता था। अब ऐसा नहीं है। सिनेमा समाज का अभिन्न हिस्सा हो गया है। इसलिए ये सच है कि बच्चे फिल्मों से काफी कुछ सीख सकते हैं। अच्छी फिल्में बच्चों की भावनात्मक सोच को तो बढ़ाती ही हैं, साथ ही कई दूसरी बातों से भी रू-ब-रू कराती हैं।

हाल में कुछ ऐसी फिल्में बनी हैं, जिन्हें बच्चों के लिए अच्छी कहा जा सकता है। इन फिल्मों के केंद्र में बच्चा है। हालांकि इनमें से कुछ ऐसी हैं, जिसमें बड़े स्टार के कारण बच्चे का किरदार दब जाता है। या फिर बच्चों के माध्यम से निर्देशक जो संदेश देना चाहते हैं वो कहीं बिखर जाता है। इसके बावजूद ये फिल्में बच्चों के लिए है। इनमें एक है, ‘तारे जमीं पर’। ये एक ऐसी फिल्म है जिसे हर मां-बाप को अपने बच्चे के साथ बैठकर देखना चाहिए। न केवल देखना चाहिए बल्कि मां-बाप को बच्चे को डिस्लेक्सिया के बारे में बताना भी चाहिए। खुद भी फिल्म के संदेश को आत्मसात करने की कोशिश करनी चाहिए। यह फिल्म डिस्लेक्सिया से ग्रस्त एक बच्चे की है। मगर पूरी फिल्म उस बच्चे के शिक्षक आमिर खान के इर्द-गिर्द घूमती है। उस फिल्म में बच्चे नहीं बल्कि शिक्षक को आदर्श बनाया गया है।

दूसरी फिल्म है, ‘चिल्लर पार्टी’। इस फिल्म से यह समझ में आ जाता है कि बच्चे किसी से कम नहीं होते। अगर आपको अपने बच्चे को ये साबित करना है तो इस फिल्म से बेहतर कोई फिल्म हो ही नहीं सकती। फिल्म में बच्चों का एक समूह अपने एक पालतू कुत्ते को बचाने के लिए बड़े-बड़ों से भिड़ जाता है। ये फिल्म आपके बच्चे में जीवों के प्रति प्रेम के भाव को बढ़ावा देती है। चिल्लर पार्टी को बच्चों का सिनेमा कह सकते हैं।

तीसरी मूवी है, ‘स्टेनले का डिब्बा’। यह फिल्म आपको सिनेमा हॉल में रूलाती है। कभी अपने स्कूली दिनों में ले जाती है। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे की कहानी पर बनी फिल्म दर्शक को रोने पर मजबूर कर देती। स्कूल की मस्ती भर जिन्दगी, टीचर्स और यारों की यारी सब कुछ इस फिल्म में है। आपका बच्चा जहां खुद को इस फिल्म से जोड़ पाएगा, वहीं आपको अपने पुराने दिनों की याद आ जाएगी। एलियंस पर बनी फिल्म ‘कोई मिल गया’ भी बच्चों के देखने लायक है। ये एक हैप्पी फैमिली मूवी है। फिल्म में एक ऐसे बच्चे की कहानी है जो मानसिक रूप से असामान्य है। बच्चे को ये फिल्म बहुत पसंद आएगी। एक असामान्य बच्चा दूसरे ग्रह से आए एलियन को बचाने के लिए क्या-क्या नहीं करता है। लेकिन इस फिल्म में भी वही किया गया है। निर्देशक दर्शकों का मनोरजंन कराने के लिए फिल्म को बालमन से निकालकर बड़ों के बीच ले आता है। हालांकि बच्चों को एलियन का रोमांच उसे पिक्चर के बीच में से उठने नहीं देगा।

कुछ साल पूर्व एक और फिल्म आई थी, जिसका नाम था ‘आई एम कलाम’ इस फिल्म को हर बच्चे और उसके मां-बाप को देखना चाहिए। एक ऐसी कहानी जो आपके बच्चे को हर परिस्थिति से जूझना तो सिखाएगी ही साथ ही ईमानदारी की कीमत भी समझने में मदद करेगी। ये कुछ गिनी-चुनी बॉलीवुड की फिल्में हैं, जिन्हें बच्चों का सिनेमा कह सकते हैं। यह संख्या बहुत ही कम है क्योंकि एक शताब्दी के बाद भी यदि बच्चों का सिनेमा अंगुली पर गिना जा सकता है तो इससे समझ में आता है कि निर्माता-निर्देशकों की रणनीति में बच्चे कहां हैं।

विशाल भारद्वाज ने ‘मकड़ी’ बनाकर बाल सिनेमा की सख्त जमीन तोड़ने की कोशिश की। किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं कि इसके कुछ एक वर्षों बाद उन्होंने फिर बच्चों के लिए ‘ब्लू अम्ब्रेला’ भी बनाई। निश्चित रूप से व्यावसायिक कुशलता के साथ बच्चों पर केंद्रित फिल्म बनाने की वह एक सराहनीय शुरुआत थी। इसी तरह की एक कोशिश सौमित्र रानाडे ने ‘जजंतरम ममंतरम’ के रूप में की थी। इन फिल्मों को कुछ दर्शक भी मिले और आलोचकों की प्रशंसा भी लेकिन इन फिल्मों को ईरान की फिल्म ‘चिल्ड्रेन ऑफ हेवन’ की तुलना में रखकर देखने से इनका खोखलापन स्पष्ट हो जाता है।

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