Editorial

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत

रघुवीर सहाय को इस संसार से विदा लिए 29 बरस हो चुके हैं। सहाय साहब एक नामचीन पत्रकार तो थे ही, वे कवि भी उत्कृष्ट स्तर के थे। उनकी कविताओं में से एक मुझे बेहद प्रिय है। इस कविता ‘अधिनायक’ में रघुवीर सहाय कहते हैं ‘राष्ट्रीय गीत में भला कौन वह भारत-भाग्य विधाता है। फटा सुथन्ना पहने जिसका गुन हरचना गाता है। बहुत मार्मिक कविता है जिसके जरिए सहाय साहब देश के गरीब-गुरबा संग देश के भाग्यविधाता यानी हमारे जनप्रतिनिधियों के छल को सामने लाते हैं। इस कविता का रचना काल मुझे विदित नहीं, फिर भी लगभग पचास-साल बरस पहले रघुवीर सहाय ने यह लिखी होगी। आज इसका स्मरण सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस) की 2019 के आम चुनावों में खर्च के अनुमान को लेकर जारी रिपोर्ट के चलते हो आया। अभी-अभी इस रिपोर्ट को पढ़कर आपसे मुखातिब हो रहा हूं। चकित हूं, खिन्न हूं, भयभीत भी हूं कि किस दिशा में हमारा राष्ट्र जा रहा है। चकित इस बात पर हूं कि हम आगे चलकर कैसा राष्ट्र बनेंगे इसका इतना सटीक अनुमान राम मनोहर लोहिया ने आजादी उपरांत ही कैसे लगा लिया था? खिन्न अपनी और अपने जैसों की निर्जीविता को लेकर हूं। सब कुछ समझते हुए भी मात्र कलम घिसने के हम कुछ खास कर नहीं पा रहे। बस देख भर रहे हैं लोकतंत्र की गाड़ी को गहरी खाई में गिरते हुए। भयभीत हूं हर उस हरचरना को लेकर जिसने वर्तमान मोदी सरकार को दोबारा सत्ता के शिखर पर बैठाया है इस आस के साथ कि ये नए भारत भाग्य विधाता कुछ ना कुछ ऐसा जरूर करेंगे जिससे फटा सुथन्ना पहनने की त्रासदी से उसे मुक्ति मिले। इससे पहले कि लोहिया जी के कथन को आपके सामने रखूं चलिए पहले सीएमएस की ताजा रिपोर्ट पर कुछ चर्चा की जाए। निजी थिंक टैंक सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज ने 2019 के आम चुनाव पर हुए कुल खर्च को साठ हजार करोड़ के करीब आंका है। बकौल सीएमएस देश छोड़िए पूरे विश्व में इतने महंगे चुनाव आज तक नहीं हुए हैं। रिपोर्ट कहती है औसतन प्रत्येक लोकसभा सीट पर सौ करोड़ का खर्चा हुआ है यानी कुल पड़े वोटों को यदि आधार बनाएं तो प्रति वोट 700 रुपए खर्च किए गए। रिपोर्ट बहुत मेहनत का नतीजा है जिसके लिए सीएमएस साधुवाद की पात्र है। इस रिपोर्ट की मानें तो सीधे वोटरों को एक तरह से घूस देने में 12-15 हजार करोड़ खर्च किए गए। चुनाव प्रचार में बीस से पच्चीस हजार करोड़ फूंका गया। रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि बड़ी तादात में मतदाताओं ने सीधे राजनीतिक दलों अथवा प्रत्याशियों द्वारा नकदी देने की बात स्वीकारी है। 1998 के लोकसभा चुनावों में कुल खर्च नौ हजार करोड़ रहा था जो इन चुनावों में बढ़कर 60 हजार करोड़ पहुंच गया है। सीएमएस के अनुसार हर आम चुनाव में एक बात स्पष्ट तौर पर उभर कर आती है कि केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी सबसे ज्यादा पैसा खर्च करती है। लेकिन 2014 के आम चुनाव में कुल खर्च 30 हजार करोड़ के करीब था जिसका 32 प्रतिशत कांग्रेस ने तो 45 प्रतिशत भाजपा ने खर्च किया था। 2019 में यह खर्च 55 से साठ हजार के करीब जा पहुंचा जिसमें भाजपा ने 55 प्रतिशत तो कांग्रेस ने 20 प्रतिशत खर्च किया है। यहां यह गौरतलब है कि चुनाव आयोग द्वारा राजनीतिक दलों के लिए तय की गई खर्च की सीमा 12 करोड़ अधिकतम थी। इन चुनावों में लगभग 3500 करोड़ मूल्य का सामन चुनाव आयोग ने जब्त किया जिसमें 987 करोड़ रुपया नकद, 1200 करोड़ की ड्रग्स, 987 करोड का सोना आदि शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार लगभग 27000 करोड़ अकेले भाजपा ने इस चुनाव में खर्च किए। तो जिसे हम ‘वेब मोदी’ मान रहे हैं, वह दअरसल पैसों का खेल निकला। कितना भयावह  है यह। सोचिए ‘कहां तो तय था चिरागा हरेक घर के लिए, कहां रोशनी मय्यसर नहीं शहर के लिए।’ यानी पीएम ने फोकस तो काले धन की रोकथाम का रखा था, हुआ लेकिन ठीक उल्टा। स्वयं उनके अपने दल ने 27 हजार करोड़ इन चुनावों में खर्च कर डाले तो भई इतना पैसा आया कहां से? यानी कालेधन पर प्रहार मात्र एक स्टंट भर था जो देश की जनता को भ्रमित कर सत्ता पाने के लिए खेला गया। अब देखिए कहीं चर्चा नहीं है, है लेकिन उतनी नहीं जितनी होनी चाहिए, कि मध्य प्रदेश की गद्दी संभालते ही कमलनाथ कहां से बीस करोड़ पा गए जो उन्होंने बकौल जांच एजेंसियां कांग्रेस मुख्यालय भेजे हैं। जाहिर है यह भी कालाधन ही है, वहीं कालाधन जिसे रोकने की नीयत से मोदी जी ने नोटबंदी कर पूरे देश को सांसत में डालने का काम किया था। लोहिया पूरे खेल को दशकों पहले ही भांप गए थे। साठ के आस-पास उन्होंने लिखा। ‘हिन्दुस्तान की गाड़ी बेतहासा बढ़ती जा रही है, किसी गड्ढे की तरफ या किसी चट्टान से चकनाचूर होने। इस गाड़ी को चलाने की जिन पर जिम्मेवारी है उन्होंने इसे चलाना छोड़ दिया है। गाड़ी अपने आप बढ़ती जा रही है। मैं भी इस गाड़ी में बैठा हूं। यह बेतहाशा बढ़ती जा रही है। इसके बारे में मैं सिर्फ एक ही काम कर सकता हूं कि चिल्लाऊं और कहूं कि रोको। अगर मेरी आवाज और ज्यादा तेज नहीं होती तो कम से कम माननीय सदस्य इस बात को, मेरे दिल की, मेरी आत्मा की पुकार को समझें कि मैं चिल्लाना चाहता हूं कि इस गाड़ी को रोको, यह चकनाचूर होने जा रही है।’ एक अन्य अपने भाषण में वे कहते हैं।’ समूचा हिंदुस्तान कीचड़ का तालाब है जिसमें कहीं-कहीं कमल उग आए हैं। कुछ जगहों पर अय्याशी के आधुनिकतम तरीकों के सचिवालय, हवाई अड्डे, होटल, सिनेमाघर और महल बनाए गए हैं और उनका इस्तेमाल उसी तरह के बने-ठने लोग-लुगाई करते हैं। लेकिन कुल आबादी के एक हजारवें हिस्से से भी इन सबका कोई सरोकार नहीं है। बाकी तो करीब, उदास, दुखी, नंगे और भूखे हैं। ‘पूरा हिंदुस्तान…।’ भारतीय संसद जिसके वे स्वयं सदस्य थे, पर उनकी टिप्पणी भी बेहद प्रासंगिक है। लोहिया ने कहा- ‘संसद को स्वांग, पाखंड और रस्म अदायगी का अड्डा बना दिया गया है। सरकार और सदस्य जानवरां की तरह जुगाली करते रहते हैं।’ तो मित्रों सोचिए कैसा लोकतंत्र यह हमारा मुल्क जहां सोचने की, अपनी भड़ास निकालने की, बकौती करने की तो पूरी आजादी हाल फिलहाल तक तो हमें है, लेकिन हम चाहे जितना चिल्लाएं, जितना कैंडिल मार्च करें, स्थितियां दिनोंदिन खराब होती जा रही हैं। अब तो मुझे लगने लगा है कि हमें लोकतंत्र से थोड़ा ब्रेक लेकर किसी तानाशाह को मौका देना चाहिए ताकि वह हमें, हमारे मुल्क के सिस्टम को, बुरी तरह सड़ चुके, गल चुके, दुर्गंध मार रहे सिस्टम को दुरूस्त कर सके। दरअसल हम सभी पथभ्रष्ट हो चले हैं। हमारा खून मिलावटी है। हम धर्म के नाम पर बवाल काटते हैं, देशभक्ति के नाम पर दहाड़ते हैं, सेना की शूरवीरता को अपनी शूरवीरता मानने का प्रपंच रचते हैं, सही में हम सभी भ्रष्ट हैं, नैतिक रूप से भी, आर्थिक रूप से भी। सभी, चाहे वह सुथन्ना पहने हरचरना हो या फिर शीर्ष संवैधानिक संस्थाओं में बैठे हमारे जनप्रतिनिधि, पूरी तरह मिलावटी डीएनए वाले हैं। तब मुल्क का क्या होगा? वह बचेगा या फिर एक पूरी तरह फेल स्टेट बनकर रह जाएगा? ईश्वर, यदि कहीं है तो, शायद उसे पता हो। मैं तो जितनी समझ रखता हूं उसकी बिना पर बगैर झिझके कह रहा हूं कि हम पथभ्रष्ट, लक्ष्यविहीन, दोहरे मापदंड वाले पाखंडियों का मुल्क हैं जो भले ही राष्ट्रवादी होने का दावा करें, कथित प्राचीन संस्कृति के वाहक होने का भ्रम पाले हैं हम सभी इस दशा और दिशा के वे अपराधी जिन्हें आने वाली नस्लें कोसेंगी। अब तो कोई दिव्य शक्ति ही यदि अवतरित हो तब शायद कुछ कल्याण इस भारत का संभव है। कुछ तो हम सभी नपुंसक हो चुके हैं। इसलिए और खुद नहीं तो कृष्ण को तो पुकारना शुरू कर दें, याद दिलाएं उन्हें उन्हीं के कथन की ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मान सृजाम्यहम।।’
(हे भारत। जब-जब धर्म की हानि और अर्धम की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूं अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूं।।)

You may also like