Editorial

किसके मन की बात

डेवलपमेंट यानी विकास आखिर बला क्या है। किस को सही मायने में विकास कहा जा सकता है। इस विकास शब्द ने इन दिनों मुझे बड़ा परेशान कर  रखा है। चुनावों के समय तो इस शब्द का इतना कोलाहल है कि सुन-सुनकर कान पक गए हैं, दिमाग भन्ना गया है। एक तरफ मुल्क की बड़ी आर्थिक शक्ति बनने के आंकड़े हैं, जीडीपी की न समझ आ पाने वाली कहानी है, देश के प्रधान सेवक के ऐसे तमाम दावे हैं जो 2014 के बाद से लगातार देश की खुशहाली और अमन चैन के एक्सप्रेस वे पर निकल पड़ने की बात करते हैं। एक तरफ हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रम की सफलता का मंजर है, महानगरों में मेट्रो का फैलता नेटवर्क है, बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल्स हैं, हवाई सेवाओं का लगातार हो रहा विस्तार है, बुलेट ट्रेन के सपने हैं, सरदार पटेल की विशाल प्रतिमा है, पूरे तीन हजार करोड़ की लागत वाली, अयोध्या में भगवान राम की ऐसी ही भव्य प्रतिमा बनाए जाने की बातें हैं तो दूसरी तरफ भूख से बिलखते बच्चे, बूढे, नौजवानों का हुजूम है, रोटी के लिए तन बेचने को विवश बालिकाएं हैं, बेरोजगारी की मार से त्रस्त युवा भारतीयों की फौज है। अपनी ही जमीन से भगा दिए गए हजारों-लाखों आदिवासी हैं जिनकी सुध लेने वाला कहीं कोई रहनुमा नजर नहीं आता। जब देश की तीन चौथाई से ज्यादा आबादी इस विकास का हिस्सा नहीं तो भला किस काम का है यह विकास? इससे भी कहीं ज्यादा महत्व का प्रश्न यह कि आखिर है किस चिड़िया का नाम यह विकास? यूं तो यह प्रश्न मुझ जैसे लाखों भारतीयों को लंबे अर्से से परेशान करते आया है, प्रधान सेवक नरेंद्र मोदी के ‘मन की बात’ के पचासवें एपिसोड के बाद मैं ज्यादा हैरान-परेशान हूं। अक्टूबर 28 को प्रसारित इस ‘मन की बात’ में प्रधानमंत्री उर्फ  प्रधान सेवक ने देश के आदिवासियों की खासी सराहना की। उन्होंने देश की आजादी में इन आदिवासियों के महत्वपूर्ण योगदान को याद करते हुए बिरसा मुंडा का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ‘हमारे सबसे पहले स्वतंत्रता सेनानी आदिवासी समुदाय के ही लोग थे। भगवान बिरसा मुंडा को कौन भूल सकता है।’ प्रधनमंत्री उर्फ प्रधान सेवक के इस कथन के बाद मेरी हैरानी-परेशानी में ज्यादा इजाफा हो गया है, कारण एक नहीं कई हैं। एक तरफ देश के प्रधान सेवक का आदिवासी प्रेम है जो बजरिए उनकी मन की बात सामने आया है तो दूसरी तरफ उनके ही मन की बात से साकार रूप ले चुकी सरदार वल्लभ भाई पटेल की वह प्रतिमा है जिसके चलते आदिवासियों की जमीन का जबरन अधिग्रहण किया गया और उनकी आजीविका के अधिकार का क्षरण हुआ। सरदार की प्रतिमा नर्मदा नदी के एक टापू पर स्थापित की गई है। इसके निकट ही सरदार सरोवर डैम का निर्माण हुआ है। यह वही डैम है जिसके चलते हजारों आदिवासियों को अपनी जमीन से विस्थापित होना पड़ा है। ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ देश का सबसे लंबे समय से चल रहा ऐसा आंदोलन है जिसे लगातार सभी सरकारों ने दबाने का काम किया। 1989 में शुरू हुए इस आंदोलन की मुख्य आवाज सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटेकर ने सरदार पटेल के नाम एक खुला खत ठीक उसी दिन जारी किया जिस दिन, 31 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पटेल की प्रतिमा का अनावरण किया था। मेधा पाटेकर ने अपने इस पत्र में सरदार पटेल को याद कराया है कि 1961 में आदिवासियों की जो जमीन मात्र अस्सी से दो सौ रुपए एकड़ मुआवजा देकर सरकार ने अधिग्रहित कर ली थी, आज उसी जमीन पर आपकी प्रतिमा स्थापित कर एक पर्यटन स्थल बनाया जा रहा है, जहां शॉपिंग मॉल, पांच सितारा होटल आदि स्थापित किए जाएंगे। उन्होंने लिखा है कि इस पर्यटन केंद्र को बनाने के लिए 6 लेन का हाइवे बनाया जा रहा है जिसके चलते हजारों वृक्षों को काट डाला गया है। मेधा पाटेकर ने सरदार पटेल को याद दिलाया है कि आपकी भव्य प्रतिमा का अनावरण जिनकी जमीन पर किया जा रहा है, वे दुखी हैं, आपकी जय-जय नहीं कर रहे हैं। वे शोक मना रहे हैं, प्रदर्शन कर रहे हैं, क्योंकि उनकी संस्कøति, उनका जीवन खेतों में हैं। मेधा लिखती हैं:-
“I feel shaken to share with you what is being planned and publicised in your name… Shopping malls, five or seven star hotels, luxurious guest houses, helipads, state wise bhavans on the river bank with all its paraphernalia the shops, markets, massive food plaza, food courts, walk ways, travelators and what not. All this when not less than 35,000 families, affected by the Dam in your name since years, are still awaiting full, fair and just rehabilitation. They never marketised Narmada, nor its water. They are damned by the Dam but are most awed and anguished to see their sacrifice being taken as a capital for the tourism industry and as everyone knows, political tourism too. They are sad that the farmers of Gujarat, the progeny of your movements are left high and dry. while the corporates reap huge benefits.” मेधा पाटेकर ने वृक्षों के कटान का जिक्र किया है जो पर्यावरण संतुलन के खिलाफ जाता है। यह कैसा विकास है जिसके चलते देश की राजधानी की हवा इतनी प्रदूषित हो चली है कि एक अध्ययन के अनुसार प्रतिदिन दिल्ली वाले 23 से 30 सिगरेट का धुआं अपने भीतर लेने को अभिशप्त हैं। यदि इसे विकास माना जाए तो फिर विनाश की परिभाषा क्या है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं को प्रधान सेवक कहते हैं। अधिकांश मोदी प्रेमी अभिभूत हैं उनकी इस शालीनता से। प्रधान सेवक शब्द दरअसल, पहली बार देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू स्वयं के लिए प्रयोग में लाए थे। नेहरू वास्कट की तरह मोदी जी ने इस शब्द का हरण तो कर लिया लेकिन वे सच्चे अर्थों में प्रधान सेवक बन नहीं पाए। वे ‘अपने मन की बात’ में गरीब-गुरबा, आदिवासी, वंचित-शोषित की लच्छेदार बातें तो खूब करते हैं लेकिन खुलकर चुनिंदा पूंजीपतियों के लिए बैटिंग करते नजर आते हैं। पिछले सत्तर बरस के विकास का कमाल देखिए कि देश की कुल संपदा के मालिक देश की जनसंख्या के एक प्रतिशत लोग हैं। इन एक प्रतिशत धन्ना सेठों की संपत्ति 2017 में 20.9 लाख करोड़ यानी देश के बजट के बराबर बढ़ी है। दूसरी तरफ अकेले नोटबंदी के चलते लगभग पैंतीस लाख लोग बेरोजगार हुए हैं। किसानों की आत्महत्या बदस्तूर जारी है। कैसा अद्भुत विकास है कि एक तरफ सरदार पटेल की प्रतिमा बनाने के लिए सरकार तीन हजार करोड़ खर्च कर देती है तो दूसरी तरफ देश का अन्नदाता अपनी पैदावार को लागत से कम पर बेचने को विवश है। किसानों के लगातर धरना-प्रदर्शन इस बात की पुष्टि करते हैं कि इस विकास का एक प्रतिशत भी उन तक नहीं पहुंचा है। प्रधान सेवक उर्फ प्रधानमंत्री अपने मन की बात में लोकतांत्रिक मूल्यों पर आस्था प्रकट करते हैं तो दूसरी तरफ लोकतंत्र के इन्हीं मूल्यों की बात करने वाली आवाजों को दबाने का लगातार काम चल रहा है। अभी कुछ अर्सा पहले मई महीने में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का एक फरमान सामने आया जिसमें उसने सरकारी अनुदान पाने वाली शिक्षण संस्थाओं में कार्यरत सभी पर पाबंदी लगा दी कि वे सरकार की नीतियों की आलोचना नहीं कर सकते क्योंकि वे सरकारी सेवाओं की नियमावली के अधीन हैं। लोकतंत्र में लोकशक्ति की आवाज सबसे बड़ा हथियार है। यदि इस हथियार को भोथरा करने का प्रयास होगा तो लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रधान सेवक की आस्था पर प्रश्न-चिन्ह लगना स्वाभाविक है।
हिंदी के विख्यात कवि, पत्रकार, कहानीकार रघुवीर सहाय की कविता इस विकास के सच को सामने लाती है। सत्तर या शायद उससे पूर्व लिखी गई उनकी यह कविता ‘राष्ट्रगीत’ आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। कितना भयावह है, कैसी विडंबना है कि लोकतंत्र जिस जनता को शक्ति देता है, अधिकार देता है अपने ‘प्रधान सेवक’ को चुनने का, वह जनता आजादी के दशकों बाद भी पीड़ित है, शोषित है, वंचित है लेकिन कभी राम के नाम पर तो कभी बुलेट ट्रेन, महापुरुषों की प्रतिमा, करोड़ों को रोजगार आदि के नाम पर छली जाने को तैयार रहती है। मैं न तो प्रधानमत्री उर्फ प्रधान सेवक के मन की बात से सुर मिला पाता हूं, न ही सरदार पटेल की प्रतिमा, बुलेट ट्रेन, शॉपिंग मॉल्स, मेट्रो, राम मंदिर, गौ रक्षा आदि के बरक्स विकास को समझ पाता हूं। मेरे सामने यह यक्ष प्रश्न अनुत्तरित खड़ा है, मुझे उद्वेलित करता है, भ्रमित करता है, कभी आक्रोशित तो कभी गहरे निराशा का बोध कराता है। बहुत संभव है कि मेरी दृष्टि बाधित हो, शायद इसे ही विकास कहते हों। मुझे लेकिन ऐसे विकास से सख्त ऐतराज है। मेरे सामने रघुवीर सहाय खड़े हैं अपनी कविता लिए, वे भी प्रश्न कर रहे हैं, मेरा जवाब उनकी कविता के पास भी नहीं है। बांचिए उन्हें और सोचिए जरूर, प्रश्न न केवल लोकतंत्र का है, बल्कि उस लोक का भी है, जो लगातार छला जा रहा है। आप-हम उसी लोक का हिस्सा हैं।
राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत-भाग्य-विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है।
मखमल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चंवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय-जय कौन कराता है।
पूरब-पश्चिम से आते हैं
नंगे-बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा,
उनके
तमगे कौन लगाता है।
कौन-कौन है वह जन-गण-मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है।
4 Comments
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