[gtranslate]
Editorial

ये कहां आ गए हम . . .

वर्ष 1957 में गुरुदत्त अभिनीत एवं निर्देशित एक फिल्म ‘प्यासा’ रिलीज हुई थी। इस फिल्म के संगीतकार एसडी बर्मन और गीतकार थे मोहम्मद रफी। रफी साहब का इस फिल्म में गाया एक गीत आज ‘वर्ल्ड हंगर इंडेक्स’ की ताजातरीन रिपोर्ट पढ़ते मुझे याद हो आया। गीत के बोल हैं ‘ये महलों ये तख्तों ये ताजों की दुनिया/ये इंसा के दुश्मन समाजों की दुनिया/ये दौलत के भूकेे रिवाजों की दुनिया/ ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ़ ़ ़। यह गीत आज से 64 बरस पहले के भारत की स्थितियों को रेखांकित करते लिखा गया था। 64 बरस बाद हालात कितने सुधरे हैं इसे ‘वर्ल्ड हंगर इंडेक्स’ की इस रिपोर्ट को पढ़ समझने का प्रयास करिए। यह प्रयास हर भारतीय को करना चाहिए। खासकर उन्हें जो भारत को ‘विश्व गुरु’ बनता देखना चाहते हैं, ‘आत्मनिर्भर’ होते देखना चाहते हैं, ‘उदित’ और ‘मुदित’ होते देखना चाहते हैं। विशेषकर उन भारतीयों के लिए यह प्रयास करना नितांत आवश्यक है जिन्हें ऐसा प्रतीत होने लगा है कि हम सही में एक विकसित, शक्तिशाली और विश्व गुरु बनने की राह पर चल पड़े मुल्क के वासी हैं।

‘वर्ल्ड हंगर इंडेक्स’ आयरलैंड और हंगरी के दो ख्याति प्राप्त संगठनों द्वारा विश्व भर में भुखमरी का आकलन करने वाली रैटिंग है जिसे व्यापक मान्यता प्राप्त है। इस वर्ष का इंडेक्स हमारे लिए खासा शर्मनाक और चिंताजनक है। 116 देशों के इस ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ में हम 101वें स्थान पर हैं यानी गत् वर्ष से दो पायदान नीचे। हालात इतने विकट हैं कि हम अपने पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से भी पिछड़ गए हैं। रिपोर्ट में इसका एक बड़ा कारण कोविड-19 के बाद बिगड़ी अर्थव्यवस्था को बताया गया है। आयरिश एंजनी ‘कंसर्न वर्ल्डवाइड’ तथा जर्मन संस्था ‘वेस्ट हंगर हिल्फ’ की इस संयुक्त रिपोर्ट में भारत में भुखमरी को खासी
चिंताजनक कहा गया है। हमारे पड़ोसी देश नेपाल को इस रिपोर्ट में 74वां स्थान, बांग्लादेश को 76वां, म्यांमार को 71वां और पाकिस्तान को 92वां स्थान मिला है। चीन, ब्राजील, कुवैत समेत 18 देशों में हालात बेहद अच्छे बताए गए हैं। इन 18 देशों का ग्लोबल हंगर इंडेक्स पांच से कम है। दूसरी तरफ भारत का यही इंडेक्स 27 ़5 है। इस इंडेक्स को वैज्ञानिक आधार पर तैयार किए जाने के चार पैमाने हैं। इनमें कम खाना यानी अंडर नरिशमेंट, बच्चों के उम्र के हिसाब से उनकी लंबाई जिसे ‘चाइल्ड वेस्टिंग’ कहा जाता है, बच्चों की मृत्यु दर यानी चाइल्ड मार्टेलिटी एवं बच्चों की लंबाई एवं वजन जिसे ‘चाइल्ड स्टंटिंग’ कहा जाता है, को आधार बना देशों की तुलना की जाती है। 2014 यानी मोदी युग की शुरुआत के बाद से ही यह माहौल बनाया जाने लगा था कि अब मुल्क सुपर-डुपर स्पीड से विकास की यात्रा पर निकल पड़ा है। एक के बाद एक जुमले उछाले गए। इन जुमलों का भारी प्रचार किया गया। जनता जनार्दन ने भी बगैर परखे इस जुमलेबाजी पर आंख मूंद कर यकीं कर लिया। प्रधानमंत्री मोदी का करिश्माई व्यक्तित्व भले ही गोदी मीडिया और वाट्सअप विश्वविद्यालय के चलते चौतरफा चमका हो, भारत ही चमक ग्लोबल हंगर इंडेक्स ही नहीं, कई अन्य पैमानों में भी गिरी है। ‘सस्टेनेबल डेवलमेंट रैकिंग’ में भारत इस वर्ष दो पायदान नीचे आया है। 2015 में संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों द्वारा ‘एजेंडा 2030’ के अंतर्गत तय किए गए 17 सतत् विकास लक्ष्यों में भारत का स्थान 117वें नंबर पर आ पहुंचा है। गत् वर्ष भी यह रैंकिंग 115वीं थी जो सुधरने के बजाए और कमतर हो गई है। यहां भी हम नेपाल, भूटान, श्रीलंका और बांग्लादेश से नीचे हैं। इतना ही मानो कम नहीं था कि अन्य अंतरराष्ट्रीय पैमानों पर हम गिरते जा रहे हैं। हमारे पासपोर्ट की रैंकिंग घटी है।

मानवाधिकार के मामले में भी हम उन देशों की जमात में शामिल हो चले हैं जहां इस शब्द का कोई महत्व नहीं है। भ्रष्टाचार में जरूर हमारी रैंकिंग बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल के अनुसार एशियाई मुल्कों में भारत भ्रष्टतम देश बन चुका है। हालांकि भारत सरकार हमेशा से ही इन रेटिंग एजेंसियों के मंतव्य पर प्रश्न चिन्ह लगाती रही है लेकिन इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि वैश्विक स्तर पर भारत और भारतीय प्रधानमंत्री की साख में कमतरी हुई है। आर्थिक स्थिति पर नजर रखने और उस पर आधारित रेटिंग देने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसी डीबीआरएस ने भी कुछ अर्सा पहले भारत की रेटिंग को ‘बीबीबी’ से घटा कर ‘बीबीबी माइनस’ कर दिया है। किसी भी देश को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं द्वारा दिए जाने वाले ऋण पर इस रैटिंग का असर पड़ता है। एजेंसी के अनुसार रेटिंग की कमतरी का कारण भारतीय वित्तीय स्थिति का कमजोर होना है। इसके लिए एजेंसी ने कोविड-19 महामारी को मुख्य कारण बताया है। 2014 में सत्तासीन हुए प्रधानमंत्री मोदी की छवि विदेशों में खासी तेजी के साथ कमजोर हुई है। विदेशी मीडिया में मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा और केंद्र सरकार की हिंदुत्ववादी नीति के चलते टारगेट में लिया जाने लगा है। प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन ‘वोल्फ’ में प्रकाशित एक आलेख में आशंका व्यक्त की गई है कि आर्थिक संकट की तरफ बढ़ रहे भारत की केंद्र सरकार आने वाले समय में ‘डिनायल’, ‘फियर’ एवं ‘क्रेक डाउन’ यानी सत्य से मुकरना, ‘डर’ पैदा करना और अपने विरोधियों के खिलाफ ‘दमन’ की कार्यवाही को अंजाम दे सकती है। देखा जाए तो ठीक ऐसा ही होता नजर भी आने लगा है। विपक्षी दलों का सबसे बड़ा आरोप यही ‘फियर’ एंड ‘क्रेक डाउन’ ही तो इन दिनों चौतरफा सुनाई दे रहा है। एक नहीं अनेक उदाहरण इस ‘फियर’ एंड ‘क्रेक डाउन’ के देखे-खोजे जा सकते हैं। महाराष्ट्र हो या फिर उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, तमिलनाडु, हरियाणा, पश्चिम बंगाल कह सकते हैं। पूरे भारत वर्ष में केंद्रीय जांच एजेंसियां हरेक ऐसे को अपने टारगेट में लेते देर नहीं लगाती हैं जिनका तौर-तरीका, हाव-भाव, आचार-विचार, केंद्र सरकार अथवा भाजपा की पसंद के न हों। सरकार लोकतांत्रिक व्यवस्था के जरिए चुन कर सत्ता में आई है लेकिन लोकतांत्रिक मुल्कों पर इस सरकार की आस्था आश्चर्यजनक रूप से बेहद कम है। पिछले ग्यारह महीनों से देश के किसानों का एक बड़ा वर्ग तीन कृषि कानूनों में इस सरकार द्वारा किए गए बदलावों को रद्द करने की मांग कर रहा है लेकिन सरकार है कि अपनी जिद्द पर टस से मस नहीं हो रही है। लखीमपुर, उत्तर प्रदेश में हुई हिंसक घटना के बाद बेहतर होेता केंद्र सरकार राजनीतिक शिष्टाचार दिखाते हुए अपने सांसद अजय मिश्रा को केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने को कह देती अथवा उन्हें स्वयं हटा देती। यह वक्त की नजाकत और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति सम्मान कहलाता। लेकिन अपनी हठधर्मिता के चलते वह ऐसा करने को तैयार नहीं। राफेल विमान सौदे में जब भारी गड़बड़ी का आरोप लगा तब भी सरकार लोकतांत्रिक तरीके से उसका सामना करने से बचती रही। विपक्ष ने एक संयुक्त संसदीय समिति बनाने का सुझाव दिया। दशकों पहले राजीव गांधी शासनकाल में बोफोर्स तोप सौदे में भारी भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वालों में शामिल भाजपा भी थी। तब तत्कालीन सरकार ने संयुक्त संसदीय समिति बनाने के लिए अपनी सहमति दी थी। लोकतंत्र में सबसे बड़ी जरूरत अल्पसंख्यक आवाज का सम्मान करना है। आज संसद में भाजपा प्रचंड बहुमत के साथ काबिज है। ऐसे में उसका दोगुना दायित्व है कि वह कमजोर विपक्ष की आवाज को अपनी ब्रूट मेजॉरिटी से दबाने का प्रयास न करे। लेकिन वह ऐसा करती स्पष्ट नजर आती है।

बहरहाल, इन रेटिंग इत्यादि के गिरने से भले ही देश की साख अंतरराष्ट्रीय पटल पर गिरती रहे, अंधभक्तों का भक्ति भाव यथावत है। इस अंधभक्ति भाव का ताजातरीन नमूना इस अंक में हम उत्तराखण्ड राज्य में होने जा रहे विधानसभा चुनाव सर्वेक्षण के जरिए सामने रख रहे हैं। उत्तराखण्ड की जनता भाजपा के पांच बरस को कुशासन तो मानती है लेकिन पीएम के प्रति उसका भक्तिभाव बना हुआ है। यह विरोधाभाष अजब-गजब है। 2017 में हुए राज्य विधानसभा चुनावों में उत्तराखण्ड की जनता ने भाजपा को 70 सीटों में से 57 सीटें दे इतिहास रचने का काम किया था। यह केवल और केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जनता के भरोसे का नतीजा था। पीएम ने तब अपनी चुनावी रैलियों में देवभूमि की जनता का आह्नान किया था कि प्रदेश में भाजपा की सरकार बनवाने का अर्थ होगा डबल इंजन वाली सरकार। डबल इंजन से उनका तात्पर्य केंद्र और प्रदेश में एक ही दल की सरकार होने से था। जनता मान गई। इस डबल इंजन की सरकार ने ऐसा एक काम भी नहीं किया जिसे मॉडल मान इन चुनावों में भाजपा जनता से दोबारा डबल इंजन की सरकार बनाने की अपील कर सकती हो। जनता हैरान, परेशान और खासी नाराज है। सर्वेक्षण के नतीजे तो कम से कम ऐसा ही इशारा करते दिख रहे हैं। लेकिन प्रदेश भाजपा नेताओं से खिन्न जनता जनार्दन का मोह पीएम के प्रति यथावत हे। उनके कामकाज को वह सराह रही है। यह अंधभक्ति भाव इस मुल्क को कहा, किस रसातल तक ले जाएगा यह समझ पाना ज्यादा कठिन नहीं।

You may also like

MERA DDDD DDD DD