Editorial

…जब चिड़िया चुग गई खेत

हम अपने देश को एक स्थापित लोकतंत्र, सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते गर्व से फूले नहीं समाते। यह निश्चित ही गर्व, अभिमान करने की बात भी है। हमारे साथ ही आजाद हुआ पाकिस्तान आज पूरी तरह विफल मुल्क बन चुका है जहां न बोलने की आजादी है, न ही वहां का मीडिया, वहां की न्यायपालिका स्वतंत्र है और न ही वहां लोकतंत्र अपनी जड़ें मजबूत कर पाया है। पाकिस्तान की तुलना में हम लगातार मजबूत और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनने की दिशा में प्रगति करते गए। आज भले ही देश की हर व्याधि के लिए प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराने का फैशन चल पड़ा है, जिसने इस देश का इतिहास पढ़ा है वह चाहे कितना भी मुस्लिम विरोधी या अंध मोदी भक्त क्यों न हो, इससे इंकार नहीं कर सकता कि यदि आज हम एक मजबूत लोकतंत्र हैं, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं, हमारे यहां विश्व स्तरीय वैज्ञानिक और शिक्षण संस्थान हैं, यदि हम चन्द्रयान भेज पाने की स्थिति में हैं, तो इसके पीछे नेहरू का विजन है। कल्पना कीजिए यदि देश के प्रथम प्रधानमंत्री ‘इसरो’, ‘आईआईटी’, ‘आईआईएम’, ‘भाभा एटाॅमिक रिसर्च सेंटर’, ‘नेशनल डिफेंस एकेडमी’, ‘देश के सभी स्टील प्लांट’, ‘भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लि ़’, ‘इंडियन आॅयल
काॅरपोरेशन,’ ‘ओएनजीसी’, जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की नींव न डाल राम मंदिर निर्माण के लिए पहले बजट में धन का प्रावधान करते तो आज हम कहां खड़े होते? स्मरण रहे आजाद भारत एक बेहद गरीब मुल्क था जिसके सामने अखण्डता को अक्षुण्ण रखने, आय के साधन जुटाने-बढ़ाने, अन्न की पैदावार बढ़ाने, बंटवारे के घावों पर मरहम लगाने, अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाने आदि असंख्य ऐसे मुद्दे थे जिनको यदि जवाहरलाल नेहरू ने सही तरीके से संभाला न होता तो आज हमारा भी हश्र पाकिस्तान सरीखा होता। भाषा के नाम पर ही देश कई टुकड़ों में बंट जाता। नेहरू को लेकिन आज कोसना, गाली देना एक फैशन बन चुका है। इसके पीछे दो कारण हैं। पहला वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान के पास आजादी की लड़ाई लड़ने वाले जननायकों का सर्वथा अभाव है। और दूसरा हमारी जनता जनार्दन का अशिक्षित होना।
साक्षरता दर पर मत जाइए। एमए, डबल एमए शिक्षित लाखों की तादात में ऐसे मौजूद हैं जिन्हें अपने विषय तक का कोई ज्ञान नहीं तो फिर कैसे उनसे अपेक्षा की जाए कि वे नेहरू के विकास माॅडल या फिर उनके योगदान को समझते होंगे। यदि ऐसा नहीं तो फिर कबीर- गोरखनाथ और गुरुनानक की एक साथ बैठकी के ‘रहस्योद्घाटन’ पर जनता मुदित हो प्रधानमंत्री मोदी के लिए तालियां नहीं बजाती। क्योंकि भाजपा के पास अपने नायक नहीं इसलिए गांधी, पटेल, शास्त्री आदि को स्वीकारने और उन्हें युगपुरुष मानने के सिवा भाजपा के पास कोई चारा नहीं। यही कारण है कि सरदार पटेल की विशाल प्रतिमा स्वयं प्रधानमंत्री ने गुजरात में स्थापित की। शास्त्री जी के पुत्रों को पार्टी में लिया, गांधी जी के लिए अपने सांसदों को पदयात्रा निकालने के निर्देश दिए। सोचिए कैसा दृश्य होगा जब मोदीजी की बात मान प्रज्ञा ठाकुर गांधी का गुणगान करने पदयात्रा पर निकलेंगी। नेहरू को हर कीमत पर अक्षम साबित करना लेकिन भाजपा की मजबूरी है क्योंकि नेहरू के वंशज कांग्रेस के सर्वोच्च नेता हैं। भाजपा और संघ इस बात को भलिभांति समझता है कि जब कभी भी जनता का उनसे मोहभंग होगा, पूरे देश में कांग्रेस ही एकमात्र विकल्प के तौर पर उभरेगी। इसलिए अमित शाह कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते हैं।
बहरहाल मैं बात अपने मुल्क के एक मजबूत लोकतंत्र होने की कर रहा था तो उसी पर वापस लौटता हूं। हम यदि आज एक लोकतांत्रिक समाज और राष्ट्र हैं तो इसका श्रेय हमारा संविधान निर्माताओं को जाता है जिन्होंने धर्म आधारित राष्ट्र के सिद्धांत को संविधान में इंच मात्र भी जगह नहीं दी। हमारा संविधान विश्व के सर्वश्रेष्ठ लिखित संविधानों में यूं ही नहीं गिना जाता। तीन बरस की कड़ी मेहनत के बाद विविधता से भरे इस राष्ट्र का संविधान तैयार किया। इसमें सबसे महत्वपूर्ण और रेखांकित करने योग्य बात हमारे को मिले वे अधिकार हैं जिनकी बिना पर ही हम सही अर्थों में लोकतांत्रिक देश बन पाये हैं। इन अधिकारों में सबसे महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। हमारे संविधान के अनुच्छेद 67,45,87 एवं 92 में स्पष्ट तौर पर इस अधिकार की व्याख्या है। निश्चित ही यह उन संविधान प्रदत्त अधिकारों में से एक है जो हमें अपने विचार रखने की पूरी स्वतंत्रता देता है। यदि हम अपने द्वारा चुनी गई सरकार के कामकाज से नाराज हैं तो हमें यह अधिकार है कि हम खुलकर उसका विरोध करें। यही लोकतंत्र है, लोकतंत्र की खूबसूरती और ताकत है। आज इसी अधिकार का क्षरण होते हम स्पष्ट देख रहे हैं। देश के 49 नामचीन हस्तियों ने माॅब लिंचिंग और दलितों पर बढ़ रहे अत्याचार पर प्रधानमंत्री को एक पत्र क्या लिख दिया कि उनकी ही करेक्टर लिंचिंग शुरू कर दी गई है। हैरत या विषाद का विषय यह कि इसमें मुख्यधारा का इलेक्ट्राॅनिक मीडिया सबसे आगे है। टीवी चैनलों के चारण-भाट एंकर बगैर मामले को समझे-बूझे इन 49 हस्तियों को देशद्रोही तक करार देने से नहीं चूक रहे। हालांकि मैं अर्नब गोस्वामी और अंजना ओम कश्यप या फिर ‘जी टीवी’ को देखना अर्सा पहले बंद कर चुका हूं क्योंकि इनकी भाषा, इनके क्रांतिकारी तेवर मुझे भयभीत कर डालते हैं, अन्य चैनलों का रुख भी धीरे-धीरे ‘अरनबिया’ सा होता जा रहा है। भला ऐसा क्या लिख डाला इन 49 लोगों ने जिससे पूरे देश में इन्हें देशद्रोही मानने की मुहिम चला दी गई है। अधिकांश सोशल मीडिया में लिखने वालों ने इस पत्र को पढ़ा तक नहीं है लेकिन चूंकि भक्ति दर्शन जरूरी है इसलिए गलियाने में कोई पीछे नहीं। तो जरा पहले पत्र को वांचा जाए। प्रधानमंत्री मोदी को संबोधित इस पत्र में लिखा गया है कि नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो की रिपोर्ट अनुसार एक जनवरी 2009 से लेकर 28 अक्टूबर 2018 तक 254 धर्म आधारित जघन्य अपराध हुए हैं जिनमें 91 की हत्या और 579 घायल हुए हैं। इन अपराधों की जद में 62 प्रतिशत मुस्लिम रहे हैं। पत्र में जो समयकाल बताया गया है उसमें से 6 बरस केंद्र में कांग्रेस गठबंधन की सरकार थी। इसलिए ऐसा कहा जाना कि मोदी सरकार को ही निशाने पर लिया जा रहा है, पूर्णतः गलत है। हां इसमें यह जरूर प्रधानमंत्री के ध्यानार्थ लिखा गया था कि 90 प्रतिशत से अधिक मामले 2014 के बाद हुए हैं। इन 49 व्यक्तियों ने प्रधानमंत्री को स्मरण कराया है कि माॅब लिंचिंग पर स्वयं पीएम देश की संसद में अपनी तीव्र प्रतिक्रिया दे चुके हैं। ऐसे में उनसे मात्र आग्रह किया गया है कि माॅब लिंचिंग के मामलों को गैरजमानती बना दिया जाए और त्वरित गति से ऐसे मामलों का निपटारा हो सके ताकि देश के नागरिक भय के वातावरण से मुक्ति पा सकें।
दरअसल भक्तों को इस पत्र से एक बड़ी नाराजगी ‘जय श्री राम’ के नारे पर की गई टिप्पणी से है। पत्र में लिखा गया है कि इस नारे का उद्घोष अब उन्माद पैदा करने के लिए किया जाने लगा है। क्योंकि राम का नाम लेकर माॅब लिंचिंग की घटनाएं देखने को मिल रही हैं। इसलिए इस पत्र में इसका उल्लेख किया गया है। पत्र में यह भी लिखा गया है कि सरकार विरोधी तर्क को देश विरोधी नहीं माना जा सकता है। भला ऐसा क्या इस पत्र में देश के ही कुछ नामचीन व्यक्तियों ने लिख मारा जो उनके देशद्रोही होने का शोर मचाया जाने लगा है। यह सही में असहिष्णुता है, Intolerance  है, जो हमारे समाज में दिनों दिन बढ़ती जा रही है। सरकार, उसका तंत्र कुछ नहीं कह रहा, लोकतंत्र का चैथा स्तंभ कहलाए जाने वाला मीडिया यह सब कर रहा है। निश्चित ही ऐसा करने के लिए उस पर उन शक्तियों का दबाव है जो मीडिया तंत्र की मालिक हैं। आपातकाल के दौरान ऐसा नहीं था। तब सीधे-सीधे सरकारी तंत्र दमन पर उतर आया था। प्रेस पर पूरी पाबंदी लगा दी गई थी। हालात इतने खराब थे कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी बगैर किसी संवैधानिक अधिकार के सत्ता सिरमौर बन गए थे। आज दूसरे किस्म का आपातकाल है। हर उस शक्ति को धन-बल के सहारे खरीदा अथवा लुंज-पुंज कर दिया जा रहा है जो वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान के विचारों से असहमत है। चूंकि सौ में नब्बे प्रतिशत जनता निरक्षर है, मूढ़ है, इसलिए उसे बरगलाने के लिए ‘अरनबिया’ नुमा एंकर काफी हैं जो चीख-चीख का उन्मादी माहौल रखने में पारंगत हैं। यह प्रवृत्ति देश और लोकतंत्र के लिए बेहद घातक है। इस मुल्क को पाकिस्तान न बनने दें। बहुत श्रम, बहुत तपस्या और पीढ़ियों के बलिदान बाद आज हम इस मुकाम पर पहुंचे हैं कि जब हमारे प्रधानमंत्री अमेरिका या अन्य विकसित देशों की यात्रा पर जाते हैं तो वहां का दंभी मीडिया, महादंभी शासक इग्नौर नहीं कर पाता, बल्कि उनके सम्मान में तैयार खड़ा मिलता है। यह अकेले मोदी जी का कमाल नहीं। इसकी नींव में नेहरू, शास्त्री, इंदिरा, मोरारजी, राजीव, नरसिम्हा राव, अटल बिहारी और मनमोहन सिंह का विजन, उनका परिश्रम और करोड़ों देशवासियों का श्रम शामिल है। तो मित्रों, भक्तों भाई कुछ तो अपनी समझ को विकसित करो। ‘अरनबिया’ फेम के ये एंकर इन सब कामों के लिए करोड़ों कमाते हैं, सत्ता पक्ष से नाना प्रकार के फायदे भी पाते हैं। आपको बरगलाने के ही इन्हें दाम मिलते हैं। कल कांग्रेस सत्ता में आएगी तो इनके सुर कांग्रेसी हो जाएंगे और आप खुद को ठगा महसूसने के सिवा कुछ ना कर पाएंगे।
लोकतंत्र का सम्मान करिए, प्रधानमंत्री की प्रशंसा अवश्य करें, उनके हर उस काम के लिए जो वे देशहित में कर रहे हैं, लेकिन चारण भक्ति भाव से मुक्ति पाइये। नहीं तो कल पछताना पड़ेगा। फिर समझ आएगा क्यों बचपन से पढ़ाया गया ‘जब चिड़िया चुग गई खेत तो पछताए होत क्या’

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