द हिंदू’ जैसे प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक ने गत माह, फरवरी 13, को एक बड़ा खुलासा राफेल डील की बाबत कर डाला। ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के बाद कम से कम इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार चाहे लाख दावा करे, यह पूरा मामला कतई, पुनः जोर देकर कहना चाहता हूं, कतई भी पारदर्शी नहीं है।
राफेल लड़ाकू विमान सौदे को बहुत अर्से से समझने का प्रयास कर रहा था। मामला चूंकि खासा पेचीदा है इसलिए कलम थामी तो कई बार, लेकिन चल न सकी। फिर 13 फरवरी के दिन वरिष्ठ पत्रकार के.  विक्रम राव साहब की एक फेसबुक पोस्ट पढ़ी जिसमें वे लिखते हैं- ‘…मुलायम सिंह के भाषण के कुछ देर पूर्व कैग (महालेखाधिकारी) की रपट भी पटल पर रखी गई थी। उसमें भूकंप लाने वाली पंक्ति थी कि ‘राफेल जहाज मोदी सरकार ने फ्रांस से सस्ते में खरीदे।’ रिश्वत मिलती अगर दाम ज्यादा होते। याद रहे कि मनमोहन सरकार महंगे दरों पर सौदा तय कर रही थी। अर्थात प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री राहुल गांधी का झूठ पूरी तौर पर सिद्ध हो गया। टायर पंच्चर नहीं हुआ, बल्कि ब्रस्ट हो गया। उनके बाप पर बोफोर्स दगा था। मगर मोदी को राफेल से उड़ा।’ राव साहब की इन पंक्तियों ने कुछ आश्चर्य को जन्मा कि कैसे इतने विश्वास के साथ उन सरीखा पत्रकार पूरे प्रकरण पर वर्तमान सरकार को क्लीन चिट् दे सकता है, कुछ दुख भी हुआ उनकी भाषा पर कि ‘बाप पर बोफोर्स दगा था।’ शायद वे भूल गए अंततः बोफोर्स पर न्यायालयों का निर्णय क्या रहा। बहरहाल तब तय किया कि अब कलम इस मुद्दे पर चलानी ही पड़ेगी।
राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच घमासान चल रहा है। बाकी राजनीतिक दल एक्स्ट्रा की भूमिका में नजर आ रहे हैं। चूंकि मामला कथित तौर पर रक्षा सौदे में भारी भ्रष्टाचार से जुड़ा है इसलिए इस पूरे मुद्दे को समझना हर जागरूक भारतीय के लिए बेहद आवश्यक है। समझा लेकिन वही बेहतर हो सकता है जो भाजपा और कांग्रेस की राजनीतिक पैतरेबाजियों से इत्तर निरपेक्ष भाव से ऐसा कर पाने में समर्थ हो, समझ भी केवल वही सकता है जो दलगत विचारधारा से ऊपर उठकर इसे समझने की मंशा रखता हो। तो चलिए थोड़ा ऐसा प्रयास मैं करता हूं और कुछ कोशिश आप करें, ताकि आरोप- प्रत्यारोप के राजनीतिक खेल में स्वयं को न शामिल करते हुए, तटस्थ भाव से इस पर विचार कर सकें।
‘दसॉल्ट राफेल’ हथियार बनाने वाली कंपनी है। 1970 के दशक में फ्रांस की नौ सेना और वायुसेना जब अपने सैन्य विमानों के बेड़े का नवीनीकरण करने में जुटी थी तब इंग्लैंड, जर्मनी और स्पेन की सरकारों संग फ्रांस ने अलग-अलग करार कर एक महत्वाकांक्षी योजना तैयार की जिसके चलते फ्रांस की नौ सेना एवं वायुसेना इन देशों की तकनीकी मदद से अत्याधुनिक सैन्य विमानों का निर्माण करने जा रही थी। यह परियोजना लेकिन इन देशों के मध्य आपसी मतभेदों के चलते खटाई में पड़ गई। फ्रांस सरकार ने इसके बाद अत्याधुनिक विमान स्वयं ही बनाने का निर्णय लिया। आज यह कंपनी विश्व के सबसे अत्याधुनिक युद्ध विमान बनाने वाली कंपनियों में अग्रणी बन चुकी है। फ्रांस के साथ-साथ कई देश इस कंपनी के युद्ध विमानों को अपनी सेनाओं के लिए ले चुके हैं। भारतीय वायुसेना ने अपने पुराने पड़ते जंगी हवाई बेड़े के स्थान पर नई तकनीकी के विमानों की खरीद का अंतरराष्ट्रीय टेंडर मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में जारी किया था। विश्व की छह विमान निर्माण कंपनियों ने इसमें भाग लिया था। 31 जनवरी, 2012 को मंत्रालय ने 126 एयरक्राफ्ट खरीद के लिए ‘दसॉल्ट राफेल’ को चुने जाने की घोषणा की। इस करार के अनुसार 18 विमान पूरी तरह फ्रांस में तैयार हो भारत को मिलने थे जबकि 108 विमानों को भारत में सरकार के प्रतिष्ठान हिंदुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड (एचएएल) संग टेक्नोलॉजी ट्रांसफर एग्रीमेंट के अंतर्गत तैयार किया जाना था। इस घोषणा के बाद केंद्र सरकार और राफेल के मध्य इस बात को लेकर विवाद हो गया कि भारत में एचएएल के साथ मिलकर तैयार होने वाले विमानों की गुणवत्ता को राफेल गारंटी दे। राफेल केवल 18 फ्रांस में पूरी तरह निर्मित विमानों की गारंटी पर अड़ा रहा। इस बीच आम चुनावों से ठीक पहले मार्च, 2014 में एचएएल और राफेल के मध्य इन विमानों को भारत में बनाने संबंधी करार हो गया। चुनाव बाद केंद्र में कांग्रेस के स्थान पर भाजपा गठबंधन सत्ता में आ गया। राफेल और रक्षा मंत्रालय इस बीच भारत में निर्मित होने वाले विमानों की गुणवत्ता गारंटी मसले पर अपने-अपने स्टैंड पर कायम रहे। देश के नए रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर ने राफेल के रवैये और भारतीय वायुसेना की युद्ध विमानों की तत्काल आवश्यकता को देखते हुए वायुसेना को राफेल के बजाए सुखोई एसयू30एमकेआई, रूसी लड़ाकू जहाज खरीदने का मशविरा दिया जिसे तत्कालीन वायुसेना अध्यक्ष ने यह कहकर खारिज कर डाला कि राफेल और सुखोई में उनकी मारक क्षमता को लेकर भारी अंतर है। फरवरी, 2015 तक यह तय सा लगने लगा था कि राफेल संग युद्ध विमानों का करार रद्द होने जा रहा है। इसके बाद कुछ ऐसा हुआ जो स्थापित परिपाटी से हटकर था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अप्रैल, 2015 में फ्रांस की यात्रा पर थे। वहां उन्होंने राफेल से 36 पूरी तरह तैयार विमान खरीदने का ऐलान कर डाला। सारा झगड़ा यहीं से शुरू होता है। यूपीए सरकार के समय 126 लड़ाकू विमान खरीदने का सौदा हुआ था जिसे यकायक ही 36 विमानों में तब्दील कर दिया गया। आजाद भारत में कभी भी प्रधानमंत्री का रक्षा सौदे को लेकर इस प्रकार का सीधा हस्तक्षेप होते नहीं देखा गया। रक्षा सौदों की प्रक्रिया बेहद जटिल होती है और केंद्र सरकार की उच्च स्तरीय कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी को ही इस विषय पर निर्णय लेने का अधिकार है। इस दृष्टि से देखा जाए तो नरेंद्र मोदी ने एक विदेशी मुल्क की धरती से खरबों की खरीद का ऐलान कर स्थापित परिपाटी को त्याग कर संदेह को जन्म देने का काम किया। बहरहाल प्रधानमंत्री की घोषणा के डेढ़ साल बाद सितंबर, 2016 में कैबिनेट की सुरक्षा कमेटी ने इस सौदे को हरी झंडी दिखाई और दोनों देशों के बीच करार पर दस्खत हो गए। यूपीए सरकार के समय हुए करार और नए करार में बदलाव इस सौदे को संदिग्ध और बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार के आरोपों का कारण बन गया है। विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार ने इस सौदे में प्रति विमान लगभग सात सौ करोड़ अधिक दिए हैं। साथ ही सरकार ने अपने संस्थान एचएएल की जगह भारत में तैयार होने वाले विमानों के लिए अनिल अंबानी समूह का राफेल संग समझौता कराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है जिससे लगभग पचास हजार करोड़ का काम दिलाकर घनघोर आर्थिक संकट का सामना कर रहे और रक्षा क्षेत्र में कोई भी अनुभव न रखने वाले अंबानी समूह को भारी फायदा पहुंचाया गया है। विपक्ष के इन आरोपों के बाद सरकार की तरफ से लगातार तथ्य जनता के समक्ष रखे गए हैं। कहा गया कि अंबानी को यह करार दिलवाने में भारत सरकार का कोई हाथ नहीं। यह दो निजी कंपनियों के मध्य हुआ करार है। सरकार के इस बयान की विश्वसनीयता तब संदेह में आ गई जब फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रैंकोइस हौलेंडे ने सितंबर, 2018 में फ्रांस के मीडिया समक्ष बयान दिया कि उनकी सरकार के पास कोई चारा न था क्योंकि उन्हें ऐसा करने के लिए विमानों की खरीदार यानी भारत सरकार ने कहा था ‘We did not have a say in this….the Indian government proposed this service group and Rafale negotiated with Ambani group. We did not have a choice. We took the partner who was given to us’ जब यह रक्षा सौदा तय हो रहा था तब हौलेंडे ही फ्रांस के राष्ट्रपति थे। उनका बयान भारत सरकार के स्टैंड को पूरी तरह खारिज कर देता है। वरिष्ठ वकील और एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण, आप नेता संजय सिंह और वकील मनोहर लाल शर्मा इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचे। सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार को भारी राहत देते हुए तीनों याचिकाओं को यह कह खारिज कर डाला कि अंबानी समूह को काम दिए जाने में प्रथम दृष्टया भ्रष्टाचार का मामला नहीं बनता। विमानों की कीमत के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र के न होने की बात कह डाली। सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा यानी अपना पक्ष केंद्र सरकार ने रखा उसमें कैग की एक रिपोर्ट का जिक्र था। वास्तव में कैग द्वारा ऐसी किसी रिपोर्ट के अस्तित्व पर जब हो हल्ला हुआ तो केंद्र सरकार को एक दूसरा हलफनामा दाखिल करना पड़ा जिसमें उसने अपनी त्रुटि स्वीकारी है। सुप्रीम कोर्ट अब दोबारा इस मामले को सुनने जा रहा है। बहरहाल सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत पाई केंद्र सरकार पर संकट कम होने के बजाए बढ़ रहा हैं। सरकार की तरफ से लगातार इस डील के पारदर्शी होने के दावे दम तोड़ते नजर आ रहे हैं। ‘द हिंदू’ जैसे प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक ने गत माह, फरवरी 13, को एक बड़ा खुलासा राफेल डील की बाबत कर डाला। ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के बाद कम से कम इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार चाहे लाख दावा करे, यह पूरा मामला कतई, पुनः जोर देकर कहना चाहता हूं, कतई भी पारदर्शी नहीं है। ‘द हिंदू’ ने रक्षा मंत्रालय के तीन वरिष्ठ अफसरों, जो इस पूरी प्रक्रिया का हिस्सा थे, के हवाले से सनसनीखेज खुलासा कर डाला। इस जानकारी के सार्वजनिक होने के बाद यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा की गई 36 विमानों की राफेल डील मनमोहन सरकार के समय की 126 राफेल विमानों की डील से बेहतर नहीं है। मोदी सरकार के दावे कि इस डील के चलते राफेल विमान पिछली डील की बनिस्पत जल्द ही वायु सेना को मिल जाएंगे, भी पूरी तरह गलत साबित होते हैं। इस खुलासे से सरकार के इस दावे की भी हवा निकल जाती है कि डील महंगी न होकर सस्ती है। भारत की तरफ से इस डील को करने वाली इंडियन निगोशिएटिंग टीम (आईएनटी) के तीन सदस्यों-एम.पी. सिंह (सलाहकार मूल्य) जो केंद्र सरकार में संयुक्त सचिव स्तर के इंडियन कास्ट एकाउंट्स सर्विस के आला अफसर हैं, ए.आर. सुल, जो वित्त प्रबंधक (वायुसेना) और राजीव वर्मा, संयुक्त सचिव तथा खरीद प्रबंधक (वायु) ने इस डील पर गंभीर प्रश्न-चिन्ह अपनी रिपोर्ट में लगाए थे जिन्हें सरकार ने संज्ञान में नहीं लिया। यह भी स्पष्ट नहीं है कि सरकार ने इनकी आपत्तियों संबंधी दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया था या नहीं। तो मेरे अग्रज के. विक्रम राव साहब जब कहते हैं कि इस डील में ‘ऑल इज वेल’ तो मेरा आश्चर्य मिश्रित दर्द दूना हो जाता है। इस आठ पृष्ठ की रिपोर्ट में जो सितंबर 23, 2016 को दोनों देशों के मध्य राफेल करार से तीन महीने पहले रक्षा मंत्री को भेजी गई है, इन वरिष्ठ अधिकारियों ने लिखा है- ‘The reasonability of  price offered by the French government is not established. Even the final price offered by the French government cannot be considered as ‘better terms’ compared to to the mmaca  (Medium multirole combat aircraft) offer’ यानी इन विमानों की कीमतों में बढ़ोतरी जायज नहीं है और यह डील पिछली डील से बेहतर नहीं है। इन तीन अधिकारियों की रिपोर्ट जिसे ‘डिसेंट नोट’ यानी ‘असहमति पत्र’ कहा गया है, स्पष्ट करती है कि इस डील में विमानों की कीमत को लेकर एक बेहद चिंताजनक बदलाव ‘बैंचमार्क प्राइज’ की शर्तों को बदला जाना है। यूपीए सरकार के समय तय सौदे में कीमतें एक ही बार में तय मानी गई यानी जितने भी समय में सौदा पूरा हो, कीमतें बढ़नी नहीं थी। नए सौदे में इसको बदला गया है अर्थात यदि डील पूरी होने के दौरान यानी लगभग पांच बरसों के दौरान जब तक पूरे 36 विमान वायु सेना को नहीं सौंप दिए जाते, इन विमानों की कीमत बदल भी सकती है।
इन वरिष्ठ अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट में  राफेल कंपनी द्वारा स्थापित मापदंडों के अनुसार दी जानी वाली अंतरराष्ट्रीय बैंक गारंटी न दिए जाने की बात पर भी आपत्ति दर्ज कराई। इतना ही नहीं विमानों की कीमत को बढ़ाने के पीछे कंपनी का तर्क है कि ऐसा भारतीय वायु सेना की जरूरत अनुसार विमान में बदलाव के चलते हुआ है। इस रिपोर्ट में इसे खारिज करते हुए कहा गया है ‘It was particularly noted by INT that the additional commercial proposal of 1400 million Euros towards design and development was exorbitant and unrealistic’  यानी चौदह सौ मिलनियन यूरो, लगभग एक खरब, 12 अरब रुपया जो विमानों को भारतीय वायु सेना अनुसार बदला जाएगा, उसकी यह कीमत पूरी तरह अतिश्वसनीय और बेहद अधिक है। इस पूरे प्रकरण पर रक्षा मंत्रालय के पूर्व वित्त सलाहकार सुधांशु मोहंती जो इस डील के समय मंत्रालय में तैनात थे और जो इससे पूर्व रक्षा मंत्रालय के लेखा महानिदेशक भी रह चुके हैं, का कथन बेहद महत्वपूर्ण है। उनका कहना है- ‘It has been brought out that the negotiationg team came up with a benchmark price that was overruled by the ministry. It wouldn’t be fair on my part to comment on the benchmark price. The more relevant question that needs to be asked is: On what grounds was this overruled? What logic and justifications were adduced on file to overrule the points made by senior ministry officials who negotiated the contract? Further, as per the information available in public domain, the Defence Acquisition Council headed by the defence minister and consisting of all top MoD honchos didn’t recommend the case, and instead left it to the Cabinet Committee on Security to take a call. Why? This needs to be looked into. For, not in my fallible memory of defence capital acquisition can I recall such a thing-because it is strange, even queer.’ यानी बकौल मोहंती दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है क्योंकि जिस बैंचमार्क कीमत को इंडियन निगोशिएटिंग टीम ने तय किया था उसे रक्षा मंत्रालय ने सही स्वीकारा। वे कहते हैं सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक, अजीबो-गरीब यह है कि रक्षा मंत्रालय ने इस पूरे मुद्दे पर कुछ भी अपनी तरह से न कहते हुए मामले को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी के लिए छोड़ दिया जो स्थापित नियमों के खिलाफ है। इस कमेटी में पीएम के अतिरिक्त वित्त मंत्री अरुण जेटली, तत्कालीन रक्षा मंत्री पर्रिकर, गृहमंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज थी जिन्होंने इस पूरे मामले की तकनीकी जानकारी न होने के बावजूद और बगैर मंत्रालय की रिपोर्ट के निर्णय ले लिया। और भी कई मसले हैं, जैसे पिछली डील में विवाद होने की अवस्था पर न्यायालय का अधिकार क्षेत्र भारत था यानी भारत में ही राफेल मुकदमा इत्यादि कर सकता था। नई डील में इसे किसी न्यूट्रल देश यानी भारत और फ्रांस से इत्तर किसी देश में करने का प्रावधान है। ऐसा फ्रांस सरकार के दबाव में किया गया है। प्रति विमान कीमत क्यों बढ़ी इसे बताने को सरकार तैयार नहीं। अनिल अंबानी जिनका पूरा साम्राज्य कई हजार करोड़ के कर्ज में दबा है, सरकारी बैंकों के ऋण नहीं चुका पा रहा है और हर क्षेत्र में पूरी तरह विफल साबित हो रहा है, को कैसे, किस आधार पर रक्षा जैसे अति सामरिक महत्व का काम सौंप दिया गया। इसमें तुर्रा यह कि श्री अनिल अंबानी को रक्षा क्षेत्र की कोई जानकारी, अनुभव नहीं। और उनकी इस कंपनी को प्रधानमंत्री मोदी की फ्रांस यात्रा से ठीक पहले पंजीकृत किया गया। यहां एक दिलचस्प बात यह भी है कि जूनियर अंबानी इस डील से ठीक पहले फ्रांस के वर्तमान राष्ट्रपति के एक मित्र संग फिल्म बनाने का करार कर चुके हैं। यानी कहीं न कहीं उच्च स्तर पर कुछ ऐसा हुआ है जिसके चलते अंबानी की लॉटरी खुल गई। इस पूरे कोलाहल में एक धमाका सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय से इस डील में हस्तक्षेप करने का भी हैं। ‘द हिंदू’ के अनुसार 24 नवंबर, 2015 को  रक्षा मंत्रालय ने तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर को भेजे अपने पत्र में पीएमओ के इस मामले पर फ्रांस सरकार और राफेल कंपनी संग समानंतर बातचीत करने पर कड़ी आपत्ति जताई। तत्कालीन रक्षा सचिव जी. मोहन कुमार ने रक्षा मंत्री को भेजे अपने पत्र में लिखा ‘We may advise PMO that any officers who are not part of Indian negotiating team. may refrain from having parallel parleys with the officers of French government….In case PMO is not confident about the outcome of negotiations being carried out by the MOD, revised modality of negotiations to be held by PMO at appropriate level may be adopted in the case’यानी पीएमओ या तो हस्तक्षेप बंद करे या नई टीम जो पीएमओ कार्यालय से हो, इस मामले में फ्रांस सरकार से बात कर ले। एक रक्षा सचिव का इतना कड़े शब्दों में लिखा गया पत्र क्या सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखा गया? शायद नहीं क्योंकि देश का विधान पीएमओ को ऐसा कुछ करने की इजाजत नहीं देता। तो मित्रों इस पूरे प्रकरण में इतना कुछ ऐसा है जो इस आशंका को बल देता है कि मामला गड़बड़ है। सुप्रीम कोर्ट में ताजा सुनवाई के दौरान सरकार का यह कहना कि राफेल संबंधी सीक्रेट दस्तावेज चोरी हो गए हैं खासा दिलचस्प है। भला यह कैसे संभव है कि टॉप सीक्रेट दस्तावेज चोरी हो जाएं। साथ ही सरकार का ‘द हिंदू’ के खिलाफ ऑफिसियल सीक्रेट एक्ट के तहत कार्यवाही की बात करना भी उसकी बौखलाहट को दर्शाता है। अब इतनी विसंगतियों बाद भी यदि नमो भक्त ‘चौकीदार शेर है’ कह, पुलवामा के बाद पाकिस्तानी इलाके में वायु सेना के हमले की आड़ लेकर पूरे राफेल प्रकरण को दबाने की राजनीति का अनुसरण करते हैं तो अपन के पास ज्यादा कहने को कुछ बचता नहीं। हां, के. विक्रम राव साहब जैसे वरिष्ठ पत्रकार इस पूरी डील के पक्ष में नजर आते हैं तो अफसोस जरूर होता है। इन दिनों जैसा माहौल अंध राष्ट्रवाद की आंधी चलते मुल्क में बन चुका है, कई शुभेच्छु सलाह दे रहे हैं कि संभलकर, सोच विचार कर लिखा करो। ऐसे सभी मित्रों को मैं कवि हरिओम की चंद पंक्तियां समर्पित करता हूं-
मैं ताजों के लिए समर्पण-वंदन गीत नहीं गाता
मैं दरबारों के लिए कभी अभिनंदन गीत नहीं गाता
कलम सिपाही बन कर जिंदा रहता हूं
भूखे बच्चों से शर्मिंदा रहता हूं
लेकिन दरबारों में कवि का शीष नहीं झुकने दूंगा
कविता का सत्ता से संग्राम नहीं रुकने दूंगा।
जिंदा कौम कभी झूठ की जय-जयकार नहीं करती
मैं चारण हूं पर चौराहों पर आंख लाल कर पूछूंगा
सिंहासन के गिरेवान में हाथ डालकर पूछूंगा और
जिस दिन मेरी आग बुझेगी उस दिन मैं मर जाऊंगा।
1 Comment
  1. Devendra 2 weeks ago
    Reply

    All bakwas posts.not even commentable..

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