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Editorial

क्या बहरा हुआ खुदाय

कबीर दास ने कहा ‘कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई बनाय, ता ऊपर मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय, कबीर दास 15वीं सदी में हुए थे। हम आज 21वीं सदी में हैं। जो प्रश्न अपने इस दोहे में उन्होंने उठाया, आज भी खासा प्रासंगिक होने के साथ-साथ वर्तमान समय में सार्वजनिक सदाचार को तार-तार करने वाली प्रवृत्ति के खतरनाक उभार को रेखांकित करता है। भगवान, अल्लाह, गॉड इत्यादि सभी निजी आस्था के प्रश्न हैं। किसी भी सहिष्णु समाज में हरेक को अपनी आस्था अनुसार अपने आराध्य को पूजने का पूरा अधिकार है। हमारे यहां तो इसे संवैधानिक संरक्षण तक मिला हुआ है। हमारे संविधान का अनुच्छेद 25 हमें धर्म की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देता है। लेकिन इस अधिकार के साथ- साथ मौलिक कर्तव्य की बात भी संविधान करता है।

मौलिक कर्तव्यों में एक कर्तव्य सामाजिक समरसता बनाए रखने में सहयोग करना है। अधिकार हमें याद रहते हैं, कर्त्तव्य हम भुला देने में मास्टर हैं। संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों में एक अनुच्छेद 19(1)(अ)  में  दिया गया ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार, (Right to Freedom of Speech and Expression) है। इस अधिकार का अर्थ कतई यह नहीं है कि आप अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग करते हुए किसी दूसरे की स्वतंत्रता में खलल डालने का काम करें। हो लेकिन कुछ ऐसा ही रहा है। जैसे-जैसे धार्मिक असहिष्णुता बढ़ रही है, इस अभिव्यक्ति का अधिकार धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार संग जुड़ कर एक नया ही रंग लेता जा रहा है। इन दोनों अधिकारों के साथ अब राष्ट्रवाद का कॉकटेल भी बनने लगा है। ऐसा कॉकटेल जिसका नशा बहुसंख्यक हिंदू को उग्र बना एक ऐसे खतरनाक रास्ते पर देश को धकेलता नजर आने लगा है जो रास्ता अंततः भारी खून-खराबे का कारक आज नहीं तो कल अवश्य बन, इस मुल्क को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। ऐसा नहीं कि बहुसंख्यक हिंदू ही इस राह पर चल रहा हो। अल्पसंख्यक समाज भी कुछ कम नहीं है। धर्म का नशा हरेक पर दिनों दिन हावी होता जा रहा है। उदाहरण के लिए पिछले कुछ अर्से से हरियाणा के गुरुग्राम में सार्वजनिक स्थल पर नमाज अदा करने का मसला है। मुस्लिम पिछले कुछ अर्से से यहां शुक्रवार की नमाज अदा करने के लिए भारी तदाद में एकत्रित होने लगे है। पहले आस्था की यह ‘नुमाइश’ कुछेक जगहों में होती थी। बढ़ते-बढ़ते अब अकेले गुरुग्राम में ऐसे बीस सार्वजनिक स्थान हैं जहां शुक्रवार के दिन भारी संख्या में यह ‘नुमाइश’ शुरू हो चली है। इसका तगड़ा विरोध अतिवादी हिंदू कर रहे हैं। मामला सड़क की लड़ाई से उठकर पहले सरकार के दरवाजे और फिर कचहरी तक जा पहुंचा है। नमाज आखिर है क्या? कुरान शरीफ का जितना अध्ययन मैंने किया है उसके अनुसार अल्लाह को सर्वशक्तिमान मानते हुए उसकी इबादत करने का तरीका नमाज कहलाता है। कबीर ने इसी पर तो व्यंग्य करते हुए लिखा कि क्या खुदा बहरा हो चला है जो उसकी इबादत करने के लिए मौलवी को जोर-शोर से चिल्लाना पड़ता है। अल्लाह, ईश्वर, ईसा मसीह आदि तो सृष्टि के, इस कायनात के जनक हैं, वे तो इसके कण-कण में विद्यमान हैं। तब उन्हें याद करने या उनकी पूजा करने के लिए किसी स्थान विशेष में एकत्रित होने या हुजुम में किसी सार्वजनिक स्थान का अतिक्रमण करने की क्या जरूरत है? जरा ठंडे दिमाग से सोचिए कि क्या मस्जिद की ऊंची मीनार से लाऊडस्पीकर के जरिए पढ़ी जानी वाली नमाज अथवा किसी मंदिर में जोर-जोर से गायी जाने वाली आरती ईश्वर या अल्लाह तक नहीं पहुंचेगी, यदि उसे एकांत में, जोर-जोर से बोले बगैर पढ़ा जाए?
कोरोना के प्रथम चरण में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ और हाथरस जिले के प्रशासन ने रमजान महीने में मस्जिदों में लाउडस्पीकर के जरिए अजान पर रोक लगाई थी। गाजीपुर संसदीय सीट से सांसद अफजल अंसारी ने इस रोक को इलाहाबाद हाईकोट में चैलेंज करते हुए एक जनहित याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए एक महत्वपूर्ण बात कही। बकौल हाईकोर्ट लाउडस्पीकरों का धार्मिक कारणों से प्रयोग आम नागरिकों के संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन करता है, क्योंकि आप किसी को भी जबरन अपने विचार सुनने के लिए बाध्य नहीं कर सकते हैं। उच्च न्यायालय ने इस संदर्भ में संविधान के आर्टिकल 19(1)(अ) का जिक्र किया। 2015 में ठीक इसी प्रकार की एक याचिका मुंबई उच्च न्यायालय में दायर की गई थी। नवी मुंबई के एक नागरिक ने मस्जिदों में लाउडस्पीकर के जरिए अजान दिए जाने पर प्रतिबंध लगाने की गुहार अपनी इस याचिका में लगाई थी।
मुंबई उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने तब अपने निर्णय में महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा था कि ‘ऐसे लाउडस्पीकरों को प्रशासन तत्काल अपने कब्जे में ले चाहे फिर वह मस्जिद में इस्तेमाल हो रहे हों या फिर गणेशोत्सव अथवा नवरात्रि के कार्यक्रमों में 1996 में कोलकाता उच्च न्यायालय के सामने भी इसी प्रकार की एक याचिका दायर की गई थी। ‘ओम बिरनगाना धार्मिक संस्थान बनाम राज्य सरकार’ मामले में कोर्ट ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा था ”…Using an amplifier in a temple or for a hindu religious ceremony else where is not an essential practice of Hindu faith and can lawfully be stopped by a competent Authority’ (लाउडस्पीकर का प्रयोग किसी मंदिर अथवा हिंदू धार्मिक समारोह इत्यादि में किया जाना हिंदू धर्म के अनुसार कोई स्थापित पद्वति नहीं है इसलिए संबंधित प्रशासनिक इकाई को इसे रोकने का अधिकार है)। सुप्रीम कोर्ट भी इस प्रकार के मामलों में अपना स्पष्ट निर्णय दे चुकी है। पेन्टीकोस्टल चर्च द्वारा मद्रास हाई कोर्ट के एक निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। मद्रास हाईकोर्ट ने चर्च द्वारा माइक्रोफोन एवं लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर रोक लगाने का आदेश दिया था। ‘चर्च ऑफ गॉड इन इंडिया बनाम केके आर मेजिस्टक सोसाइटी’ मामले में 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने अपना निर्णय देते हुए कहा कि ‘ …No religion prescribes that prayers should be performed by disturbing the peace of others, nor does it preach that they should be through voice or amplifiers beating of drumps… In our view in a civilised society in the name of religion, activities which disturb old or inform persons, students or children having their sleep in the early hours or during the day time or other persons carrying on their activities cannot be permitted'(कोई भी धर्म यह नहीं कहता है कि दूसरे की शांति भंग कर प्रार्थना की जाए। न ही कोई भी धर्म यह कहता है कि लाउडस्पीकर इत्यादि के जरिए प्रार्थना की जाए। हमारे विचार से एक सभ्य समाज में धर्म के नाम पर ऐसी किसी भी गतिविधि की इजाजत नहीं दी जा सकती जिसके कारण वृद्धों, बच्चों, विद्यार्थियों अथवा किसी भी कार्य  में  लगे लोगों को सुबह-सुबह अथवा दिन में ऐसी पूजा, प्रार्थना इत्यादि के नाम पर परेशानी होती हो)।
देश की सबसे बड़ी अदालत के आदेश के बावजूद भी ध्वनि प्रदूषण को बढ़ाने वाली ऐसी धार्मिक गतिविधियों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। खासकर वर्तमान समय में धर्म को हथियार बना अपना राजनीतिक उद्देश्य साधने वालों की सत्ता बहुसंख्यकों को ऐसा करने के लिए प्रेरित कर रही है। स्वयं प्रधानमंत्री डुबकी लगाने वाली अपनी तस्वीरों का सार्वजनिक प्रदर्शन कर आखिर क्या संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं? प्रधानमंत्री क्योंकर अपनी निजी आस्था का विज्ञापन करते देश भर में घूमते नजर आते हैं? क्या यह सार्वजनिक जीवन में आया नैतिक क्षरण नहीं है? दूरदर्शन का मुखिया पूरी बेशर्मी से ट्वीट करता है कि बनारस में पीएम के डुबकी लगाने का लाइव प्रसारण 55 कैमरों, ड्रोन, ओबी वैन इत्यादि के जरिए किया गया। सोचिए आखिर क्योंकर सरकारी धन का ऐसा दुरुपयोग किया जा रहा है? इसलिए क्योंकि धर्म रूपी अफीम चाट आम जनता अपने असली सवालों को सत्ता से पूछना भूल जाए और सत्ता सुरक्षित रहे।
फिर कहता हूं, धर्म निजी आस्था का विषय है। ईश्वर यदि है तो उसे अपने भक्त की पुकार सुनने के लिए लाउडस्पीकर अथवा मंदिर, मस्जिद, चर्च इत्यादि की जरूरत नहीं। वह तो कण-कण में मौजूद है। वह प्रकृति के रूप में हमारे साथ, हमारे आस-पास हर क्षण मौजूद है। वह न तो अंधा है, न ही बहरा है। अपनी-अपनी आस्था अनुसार उसकी पूजा करना हमें संविधान से मिला अधिकार है। इस अधिकार के सम्मान की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। लोकतंत्र को जिलाए रखने के लिए धर्म को निजी आस्था तक ही सीमित रखना होगा अन्यथा मजहब की, धर्म की गलत सवारी एक दिन उसके सवार के काल का कारण बन जाएगी।

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