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Editorial

अडानी-अंबानी के हवाले वतन-2

रिलायंस समूह की एक बड़ी विशेषता उसके संस्थापक स्व ़धीरुभाई अंबानी के समय से ही सत्ता संग हर कीमत पर गठजोड़ कर अपने व्यापार को आगे बढ़ाने की रही है। धीरुभाई ने इस व्यापारिक साम्राज्य की नींव सत्ता संग ‘सैटिंग एंड गैटिंग’ के ‘महान आदर्श’ के साथ रखी। 1966 में धीरुभाई ने इस समूह की शुरुआत पोलिस्टर धागे की कंपनी बना कर की जिसे 1973 में ‘रिलायंस इंड्रस्ट्रीज’ का नाम दिया गया। उस दौर में पूरे देश पर कांग्रेस की हुकूमत थी। केंद्र के साथ-साथ अधिकांश राज्यों में भी कांग्रेस की सरकारें थीं। सीनियर अंबानी ने कांग्रेस के बड़े नेताओं संग ‘मधुर’ रिश्ते बनाए। इन रिश्तों का लाभ उन्हें अपने मन माफिक कानून और नीतियों को बनाने में मिला। निश्चित तौर पर धीरुभाई ने जो कुछ अपने जीवनकाल में पाया वह अविश्वसनीय है। उन्होंने संघर्ष किया, अद्भुत संघर्ष। चौखाड़, गुजरात के एक गरीब शिक्षक की दूसरी संतान धीरुभाई ने अदन के एक गैस स्टेशन में नौकरी से शुरूआत कर मात्र पच्चीस बरस के भीतर विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी तेल शोधन कंपनी खड़ी कर डाली। उनकी मृत्यु के समय (जुलाई 6,2002) रिलायंस समूह का कारोबार पिछहत्तर हजार करोड़ रुपया था। धीरुभाई गर्व से कहा करते थे कि अपना काम निकलवाने के लिए वे सरकार के बड़े अधिकारियों से लेकर मंत्रालयों के चपरासी तक को साध कर रखते थे। धीरुभाई के इस सैटिंग-गैटिंग नीति के चलते एक मजाक खासा चर्चित रहा है। पूछा जाता है भारत में सबसे ताकतवर राजनीतिक दल कौन-सा है? उत्तर है ‘आरपीआई’ यानी ‘रिलायंस पार्टी ऑफ इंडिया’। यह स्थापित सत्य है कि रिलायंस के ‘पे रोल’ में भारतीय जनता, नौकरशाह और पत्रकार आदि सभी शामिल हैं। 1980 में जब इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुई थी तब धीरुभाई ने सार्वजनिक रूप से एक विजय रैली में इंदिरा जी के साथ शिरकत की थी। तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी एवं इंदिरा गांधी के विश्वस्त सहयोगी आरके धवन संग धीरुभाई की दोस्ती जगजाहिर रही। इस दोस्ती का उन्होंने जमकर लाभ उठाया। व्यापारिक घरानों के मध्य व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा में हमेशा सरकार का साथ धीरुभाई को मिला। इसे रिलायंस और बॉबे डाईंग के मध्य चली कॉरपोरेट वार से समझा जा सकता है। विश्वनाथ प्रताप सिंह शायद अकेले ऐसे राजनेता और प्रधानमंत्री रहे जिन्हें धीरुभाई कभी भी अपने प्रभाव में न ले सके। धीरुभाई के स्वर्गवास बाद भी रिलायंस समूह का जलवा निरंतर बढ़ता गया है। वर्तमान में देश के सबसे अमीर व्यक्ति कहलाए जाने वाले मुकेश अंबानी का वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान संग अद्भुत रिश्ता है। अडानी और अंबानी गुजरात से आते हैं। गुजरात प्रधानमंत्री मोदी का गृह प्रदेश भी है। इन दोनों उद्योगपतियों का मोदी से रिश्ता दो दशक पुराना है। जब मोदी प्रधानमंत्री बने थे तब अहमदाबाद से नई दिल्ली की यात्रा उन्होंने गौतम अडानी के निजी जेट से ही की थी। मोदी की चुनावी रैलियों के दौरान उनका हवाई रथ अडानी का ही निजी विमान हुआ करता था। अंबानी संग भी बतौर गुजरात मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की करीबियत ओपन सीक्रेट है। 2014 के बाद से अंबानी समूह ने ‘चहुंमुखी’ तरक्की का रिकॉर्ड बनाया है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार भारत में विदेशी पूंजी निवेश वर्ष 2020 में 13 प्रतिशत बढ़ा है। लगभग 57 बिलियन डालर का विदेशी पूंजी निवेश इस वर्ष भारत में हुआ जिसका आधा लगभग 27 बिलियन अमेरिकी डालर का निवेश रिलायंस के खाते में है। इन दोनों उद्योगपतियों का व्यापार ऐसे समय में अभूतपूर्व गति से बढ़ रहा है जब विश्वभर की अर्थव्यवस्था कोविड-19 संक्रमण के चलते बुरी तरह प्रभावित है, सिकुड़ रही है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार वर्ष 2020 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद 8 प्रतिशत घटा है जिसके कारण भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे खराब अर्थव्यवस्था बन चुकी है। इसके बावजूद गुजरात के ये दो ‘लाल’ लगातार आर्थिक ऊंचाइयों की तरफ बढ़ते जा रहे हैं तब यह सोचना तो बनता है कि इनके पास ऐसा कौन-सा पारस का पत्थर है जिसके चलते जहां कहीं ये दोनों हाथ डालते हैं, वह सोना बन जाता है? थोड़ी-सी मेहनत आदि कोई आम नागरिक भी यदि करे तो इसका राज सामने आ जाएगा। निश्चित तौर पर खुली अर्थव्यवस्था वाले दौर में इन दोनों की तरक्की के पीछे केवल इनकी व्यापारिक समझ और नीतियों का होना भर नहीं है बल्कि सरकार संग इनकी नजदीकियों के चलते यह संभव हो पाया है। उदाहरण के लिए फेसबुक और गूगल का अपने भारतीय पार्टनर के बतौर रिलायंस संग समझौता है। विश्व के इस बड़े पूंजी निवेशक को पता है कि अंबानी संग समझौता उसे भारत में कई प्रकार की दिक्कतों से दूर रखेगा क्योंकि अंबानी के साथ भारत की सत्ता का बल जुड़ा है।

भाजपा को 2014 में मिली सफलता के पीछे केवल नरेंद्र मोदी की करिशमाई छवि और बतौर गुजरात मुख्यमंत्री उनके द्वारा किए गए विकास कार्यों का होना भर नहीं था। इस सफलता की सबसे बड़ी एक वजह तत्कालीन यूपीए सरकार के कार्यकाल में चौतरफा पसरा भ्रष्टाचार था जिसके खिलाफ अन्ना हजारे ने अपना आंदोलन और लोकपाल कानून की मांग देश के सामने रखी थी। मैं बार-बार कहता हूं कि हम जल्द भूलने की बीमारी से ग्रस्त हैं। जरा याद कीजिए उन दिनों को।
मनमोहन सिंह सरकार के दूसरे टर्म में सरकार के मंत्रियों और बड़े उद्योगपतियों के मध्य दुरभिसंधि की कितनी चर्चा हुआ करती थी। टू-जी स्कैम, कोयला आवंटन घोटाला, वायुसेना हेलीकॉप्टर खरीद घोटाला, कॉमनवेल्थ खेल घोटाला, बैंक लोन घोटाला इत्यादि ने देश में कांग्रेस के खिलाफ जनता जनार्दन को खासा आक्रोशित कर डाला था। अन्ना आंदोलन ने इस आक्रोश को आवाज दी। जिसका बड़ा फायदा भाजपा को मिला। आज क्या हालात हैं? क्या राजसत्ता और उद्योगपतियों के मध्य चली आ रही ‘दुरभिसंधि’ समाप्त हो गई है? यदि ऐसा होता तो राफेल डील में ऑफशूट पार्टनर सरकारी कंपनी एचएएल होती न कि दिवालिया घोषित अनिल अंबानी की कंपनी। यदि ऐसा होता तो केंद्र सरकार पर आरोप न लग रहे होते कि देश के बड़े हवाई अड्डों को निजीकरण नीति के तहत अडानी समूह के हवाले किया जा रहा है। सरकार की नीयत पर सवाल नहीं उठते कि कोविड संक्रमण के दौरान रिलायंस समूह को बाजार से पैसा उठाने के लिए कई रियायतें दी गईं जिसके कारण रिलायंस समूह अपना ‘राइट्स शेयर इश्यू’ लेकर आ सका। गौरतलब है, यदि जनता जनार्दन गौर करे, समझने का प्रयास करे कि जून 3, 2020 को लाया गया रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड का पब्लिक इश्यू जिसके चलते इस समूह को 53,124 करोड़ की पूंजी बाजार से मिली, उसके पीछे भारत सरकार द्वारा संबंधित कानूनों को लचीला बनाया जाना शामिल है। रिलायंस को इस पब्लिक इश्यू के बाद एक के बाद एक एफडीआई मिलती चली गईं जिनमें फेसबुक द्वारा 22,620 करोड़ का पूंजी निवेश शामिल है। 17, मई 2017 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक प्रेस कांफ्रेंस कर यह जानकारी दी थी कि भारत सरकार ने भारतीय कंपनियों को अपना शेयर विदेशी स्टॉक एक्सचेंजों में लिस्ट करने की इजाजत दे दी है। इस निर्णय से कुछ अर्सा पहले ही खबरें आने लगी थीं कि रिलायंस समूह अपने शेयर विदेशी स्टॉक एक्सचेंजों में लिस्ट कराना चाहता है। हो सकता है यह इत्तेफाक हो या फिर यह दुरभिसंधि की परिधि में आता हो। बड़ा ‘खेला’ है भाइयों, बड़ा ‘खेला’। इसे समझ पाना बेहद कठिन है यदि अंधभक्ति का चश्मा पहने हों। अन्यथा थोड़ी-सी जागरूकता इस ‘खेला’ की पोल खोल देती है। देश भर के किसान तीन कृषि कानूनों में किए गए संशोधन का विरोध कर रहे हैं। 10 माह से अधिक समय होने को आया है लेकिन केंद्र सरकार अपने निर्णय में अडिग है। कथित तौर पर ये तीनों कानून किसानों की उन्नति के लिए बनाए गए हैं। किसान इससे सहमत नहीं हैं। उन्हें लगता है इसकी आड़ में सरकार का एजेंडा निजी क्षेत्र की इंट्री कराना है जिसके चलते बड़ी पूंजी का निवेश कृषि में होगा। पूंजी का दबदबा छोटे और मझोले किसानों को समाप्त कर देगा। सरकार लेकिन कुछ सुनने को तैयार नहीं। किसानों की आशंका जायज है। सरकार के बेहद करीबी कहलाए जाने वाले गुजरात के दोनों ‘लाल’ कृषि क्षेत्र में इंट्री कर चुके हैं। ये कानून लागू हो गए तो इन दोनों की चांदी ही चांदी है। सरकार नेशनल मोनेटाइजेशन नीति लेकर आई है। इसका सीधा लाभ इन दोनों को मिलना तय है। अगले कुछ वर्षों में कई सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां इनकी हो जाएगी। एलपीजी पर सब्सिडी खत्म हो रही है। सोचिए किसे इसका लाभ मिलेगा? रिलायंस को जनाब। रिलायंस समेत तीन कंपनियों एलपीजी सिलेंडर को सप्लाई करती हैं। सब्सिडी समाप्त होते ही एलपीजी के दाम आसमान छूने लगेंगे। ठीक वेैसे ही जैसे पेट्रोल और डीजल के दाम अब बाजार नियंत्रित करता है। सब्सिडी का लाभ सरकार की तेल कंपनियों को मिलता है। जैसे ही यह बाजार के अधीन हो जाएगा लगभग दो करोड़ टन घरेलू गैस का कारोबार पर कब्जे का काम रिलायंस शुरू कर देगी। यह हजारों करोड़ का बाजार अंततः अंबानी का हो जाएगा।

है न गजब का ‘खेला’। टेलीकॉम इनका, हवाई अड्डे इनके, तेल इनका, कपड़ा इनका और अब रसोई गैस से लेकर अनाज, सब्जियां भी इनकी। लगे रहो भक्ति में। कमी न होेने पाए। अभी चेतना जरूरी नहीं। बाद में रोने का बहुत समय मिलेगा।

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