Editorial

अति सर्वत्र वर्जयेत!

अभी कुछ दिन हुए एक वीडियो बजरिए सोशल मीडिया देखने को मिला। सभवतः वीडियो उत्तराखण्ड के हल्द्वानी शहर का है। इसमें एक निजी अस्पताल में भर्ती मरीज के परिजन उसकी मृत्यु के बाद शोर मचाते नजर आ रहे हैं। यदि वीडियो पर यकीन करें तो अस्पताल मरीज की मृत्यु के बाद भी इलाज जारी रखे हुए था। इतना ही नहीं परिजन आरोप लगा रहे हैं कि उसका ऑपरेशन कर किडनी भी निकाल ली थी। डॉक्टरी पेशे को एक समय बहुत सम्मान दिया जाता था। यहां तक कि डाक्टर को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है। मुझे याद नहीं कि बचपन में कभी हमने मरीज की स्थिति में सुधार न हो पाने या इलाज के दौरान उसकी मृत्यु हो जाने पर उसके रिश्तेदारों द्वारा डॉक्टर को गालियां देते या फिर मारपीट करते देखा हो। आज लेकिन डॉक्टरों के साथ मारपीट आम बात हो चली है। हालात इतने खराब हैं कि सरकार को डॉक्टरों की रक्षा के लिए कानून बनाना पड़ा है। जाहिर है डॉक्टरों के प्रति समाज में आदर भाव में भारी कमी आई है। अब वे ईश्वर के प्रतिनिधि नहीं रहे। दृष्टिकोण में आए इस बदलाव के लिए मेरी समझ से स्वयं डॉक्टर जिम्मेदार हैं जिनके लिए आज के दौर में यह मात्र धन कमाने का व्यवसाय बन चुका है। चिकित्सा क्षेत्र का निजी हाथों में चले जाना और सरकारी अस्पतालों की बदहाली ने इस पवित्र पेशे को एक घिनौने व्यवसाय में बदल डाला है। इसलिए जब एक पत्रकार मित्र द्वारा भेजे गए हल्द्वानी के एक निजी अस्पताल का वीडियो मैंने देखा तो तत्काल यकीन हो गया कि मरीज के परिजनों का आरोप सही ही होगा। जीवन मूल्यों में आए क्षरण का यह सबसे दुखद और मानवीय सरोकारों से जुड़ा विषय है। डॉक्टर के लिए मरीज आज एक कमोडिटी है जिसके जरिए वह धन उपार्जन करने के विविध तरीके तलाशता है। इसकी शुरूआत होती है नाना प्रकार के टेस्ट करवाने से। पहले डॉक्टर मरीज की जांच कर भांप लेते थे कि मर्ज क्या है। आज लेकिन फोकस होता है टेस्ट कराने पर। आपको कमर में दर्द है या फिर घुटने के जोड़ दुख रहे हैं, सिर में लगातार दर्द रहता है या फिर नींद कम आती है। शुरूआत खून की जांच, एक्सरे, एमआरआई से होते हुए सीटी स्कैन तक पहुंच जाती है। अधिकांश डॉक्टर इन जांचों को या तो खुद अपने क्लीनिक में कराते हैं या फिर आपको ऐसी किसी लैब का पता बता डालते हैं। इसके पीछे सीधे-सीधे मार्केर्टिंग टेक्नीक का होना है। लैब में जब आप जांच के लिए पहुंचते हैं तो आपसे डॉ. का नाम पूछा जाता है। आप नाम इस उम्मीद से बताते हैं कि डॉक्टर के चलते आपको डिस्काउंट मिलेगा। होता लेकिन यह है कि डॉक्टर को मरीज भेजने (मुर्गे भेजने) का कमीशन लैब से मिलता है। इसके बाद दवाइयों के जरिए मरीज को लूटने की कवायद शुरू होती है। डॉक्टर को चाहिए कि वह मरीज को दवा का जैनेरिक नाम लिखे ताकि मरीज किसी भी दवा कंपनी की दवा खरीद सके। होता लेकिन उल्ट है। डॉक्टर जो दवा लिखता है वह दरअसल कंपनी विशेष की दवा का नाम होता है। इसे सरल भाषा में समझने का प्रयास करते हैं। समान्य बुखार या बदन दर्द में डॉक्टर या केमिस्ट हमें करोसिन, मेटासिन, मेफ्टाल आदि नाम की दवाई लेने की सलाह देते हैं। यह दरअसल कंपनी विशेष की दवाइयों के ब्रांड नेम है।

जैनेरिक नाम इनका पेरासिटामोल या ऐस्टेमिनोफिन हैं। जैनेरिक नाम का सीधा मतलब उस दवा में प्रयोग लाए जाने वाले केमिकल्स से होता है। यदि डॉक्टर आपको जैनेरिक नाम से दवा लिखता है तो आपके पास किसी भी कंपनी की दवाई खरीदने की छूट होती है। होता अंधिकांश यह है कि डॉक्टर जानबूझ कर ब्रांड नेम की दवा लिखते हैं जो ज्यादातर उनके ही अस्पताल के दवा घर में मिलती है। यानी मरीज की जेब खाली कराने का धंधा। मधुमेह यानी डायबिटीज हमारे देश में महामारी का रूप ले चुकी है। मैं स्वयं इसका मरीज हूं। अब कल्पना कीजिए दवा कंपनियों और डॉक्टरों के गोरखधंधे के जरिए प्रति वर्ष कितने खरब रुपयों की दवा ब्रांड नेम के जरिए बेची जाती है। मैं स्वयं जिस दवाई को लेता हूं उसका जैनेरिक नाम दो केमिकल्स से बनता है, गिलाइमपिराइड (Glimepiride) और मेटफोरमिन हाइड्रोक्लोराइड (Met formin hydrochloride)। डाइबिटीज में रक्त से चीनी की मात्रा कम करने के लिए इसका इस्तेमाल होता है। इन दो रसायनों से मिलकर बनाने वाली डायबिटीज की दवाइयों के ब्रांड नाम ऐमेरिल फोर्ट (amaryl forte), विजलिम (Viglim), गिलाइमपिराइड (Glimepiride) आदि हैं। डॉक्टर को चाहिए की वह जैनेरिक नाम लिखे लेकिन नब्बे प्रतिशत डॉक्टर अपनी सेटिंग अनुसार इस दवा का ब्रांड नाम आपको लिखते हैं। कई बार कैमिस्ट की दुकान में जब ऐसी किसी दवा को खरीदने जाते हैं तो कैमिस्ट दूसरी दवा देने की बात करता है। हम यह सोचकर मना कर देते हैं कि डॉक्टर ने तो अलग नाम लिखा, ये कैमिस्ट गलत दवा दे रहा है।

कैमिस्ट गलत नहीं होता है, वह उन्हीं रसायनों से बनी दूसरी ब्रांड की दवा दे रहा होता है लेकिन अज्ञानतावश हम मना कर देते हैं। 2017 के आंकड़ों अनुसार हमारे यहां दवा व्यापार कुल 33 बिलियन अमेरिकी डालर यानी 23 खरब रुपये का रहा। सोचिए इतनी भारी-भरकम रकम के सामने मानवीय सरोकारों की क्या बिसात। गूगल बाबा को सर्च करिए। गारंटी है आपके रोंगटे खड़े हो जायेंगे यह जानकर कि पांच सितारा अस्पतालों में काम कर रहे डॉक्टर, जिन्हें हम ईश्वर का रूप या प्रतिनिधि माना करते थे, तय बिजनेस टारगेट पर काम करते हैं। यानी उन्हें हर महिने का टारगेट अस्पताल देता है कि कितने एक्सरे, एमआरआई, सीटी स्कैन, ब्लड टेस्ट, अल्ट्रासाउंड, यहां तक कि ऑपरेशन उन्हें करने ही होंगे। जाहिर है टारगेट हासिल करने के लिए बगैर जरूरत मरीजों को टेस्ट लिखे जाते हैं ताकि उनकी जेब से जितना हो सके उतना पैसा निकाला जा सके। दवा कंपिनयां एमआर रखती हैं। एक समय में एमआर यानी मेडिकल रिप्रजेंटेटिव का बड़ा टशन होता था। ये एमआर दरअसल दवा कंपनियों के दलाल होते हैं जो डॉक्टर्स को अपनी कंपनी की ब्रांड नेम वाली दवा मरीजों को देने के लिए सेट करते हैं। बदले में पहले समय में डॉक्टरों को गिफ्ट, विदेश यात्राएं आदि मय परिवार ये दवा कंपनियां कराती थी, अब सीधे कमीशन देने लगी हैं। यही कारण है डॉक्टर धन पिपासु हो चले हैं। हृदयहीन, इमोशन लैस हो चले हैं। केवल और केवल पैसा कमाना उनका लक्ष्य रह गया है। यही कारण है वे दवाइयों का जैनेरिक नाम नहीं लिखते, नाना प्रकार के टेस्ट मरीजों के करवाते हैं ताकि मोटी रकम कमीशन के तौर पर उन तक पहुंचती रही। दवा का बेहद महंगा होना इसी सबके चलते है। जैनेरिक दवा और ब्रांडेड दवा की कीमतों में कई गुना से ज्यादा का फर्क इसके चलते ही होता है। मेरे एक मित्र इस दवा व्यवसाय में हैं। मैंने उनसे इस बाबत बात करी तो स्वयं मैं आश्चर्यचकित रह गया। उन्होंने मुझे बताया कि सामान्य सिर दर्द की दवाई की कीमत बाजार तक पहुंचते-पहुंचते तीन सौ गुना और डायबिटीज जैसी बीमारी की दवाइयों की कीमत पांच सौ गुना तक हो जाती है। इतना ही नहीं बकौल मेरे मित्र हर लैब डॉक्टर को मरीज भेजने की एवज में 30 से 50 प्रतिशत तक कमीशन देती है। यानी पूरा लूट-खसोट का गोरखधंधा है यह। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने मौहल्ला क्लीनिक की शुरूआत कर जो वाहवाही लूटी है उसके पीछे एक कारण इन सभी जगहों पर जैनेरिक नाम से दवाइयों का मिलना भी है। सोचिए क्योंकर हमारी सरकारें, विशेषकर केंद्र सरकार इस पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं करती? वर्तमान सरकार ने तो जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने तक का साहस कर दिखाया तो फिर क्यों नहीं आम आदमी को राहत पहुंचाने के सबसे सरल रास्ते यानी डॉक्टरों द्वारा जैनेरिक मेडिसन को कानूनन लिखना अनिवार्य और न मानने वालों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज करने का प्रावधान कानून में नहीं करती? क्या इसलिए क्योंकि खरबों की लूट इससे जुड़ी है जिसका हिस्सा पूरे सिस्टम की जेब गर्म करता है? एक तर्क दवा कंपनियां और डॉक्टर यह देते हैं कि ब्रांडेड दवा में सही मात्रा में रसायन का मिश्रण किया जाता है। यानी जो नान ब्रांड दवा कंपनी हैं वे दवा में गलत मात्रा में केमिकल मिला सकती हैं। जिससे मरीज का नुकसान होना तय है। यदि इस तर्क को मान लिया जाए तो सरकार को चाहिए कि दवा कंपनियों पर सही नियंत्रण की कठोर प्रक्रिया बनाए। यह भी तर्क दिया जाता है कि जैनेरिक दवा लिखने पर कैमिस्ट दुकानों की चांदी हो जाएगी। वे उन्हीं दवा कंपनियों की दवा रखेंगे जो ज्यादा कमीशन उन्हें देंगी। इस पर भी कठोर कानून के जरिए काबू पाया जा सकता है। अब वापस लौटता हूं हल्द्वानी के उस अस्पताल के वीडियो पर जो सोशल मीडिया में जमकर वायरल हो रहा है। मैं नहीं जानता राज्य सरकार ने इस वीडियो के आधार पर कोई कार्यवाही की या नहीं इतना अवश्य कह सकता हूं कि देश भर के अस्पतालों और डॉक्टरों का यही हाल है। ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ को डॉक्टरों संग मरीजों या उनके परिजनों द्वारा की जा रही हिंसा से समझा जा सकता है। असम के एक 72 वर्षीय डॉ की भीड़ ने गत् 31 अगस्त के दिन पीट-पीट कर हत्या कर दी। जोरहाट जिले में घटी इस हृदय विदारक घटना से समझा जा सकता है कि जनता के सब्र का पैमाना अब किस स्तर तक जा पहुंचा है। डॉ. देबेन दत्ता को जोरहाट की एक टी स्टेट के वरकर्स ने केवल इसलिए मार डाला क्योंकि उनकी देखरेख में एक मरीज सोमरा मांझी की मृत्यु हो गई थी। डॉक्टर कोई भगवान नहीं कि वे हरेक मरीज को स्वस्थ कर दें। वे केवल प्रयास कर सकते हैं, बेहतर से बेहतर उपचार उपलब्ध करा सकते हैं। इसके बावजूद यदि कभी उन्हें ईश्वर का प्रतिनिधि मानने वाली जनता अब हिंसक हो उन्हें ही मारने पर उतारू है तो इसके पीछे उसकी बेबसी, आर्थिक बदहाली, महंगा इलाज और डॉक्टरों का इतना पेशेवर हो जाना है कि उनके मानवीय सरोकार लगभग खत्म हो चले हैं। यह हमारे समाज का ऐसा कड़वा सच है जिसका समय रहते निराकरण के उपाय नहीं किए गए तो यह हिंसा आने वाले समय में विकराल रूप ले लेगी।

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