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Editorial

संदेह के घेरे में त्रिवेंद्र सरकार और नौकरशाही

अंग्रेजी भाषा का एक शब्द है MALAFIDE कैम्ब्रिज शब्दकोष में इसका अर्थ बताया गया है- Illegal or Dishonest. Dictionary.com में बताया गया है- In bad faith, not genuine.

उत्तराखण्ड के यशस्वी मुख्यमंत्री श्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ राज्य के कुछ पत्रकारों ने भ्रष्टाचार के जो आरोप लगाए, आरोप लगाने के बाद इन पत्रकारों के खिलाफ देवभूमि की मित्र पुलिस ने जिस प्रकार मुकदमे दर्ज किए, गिरफ्तारी की, उन पर अपना फैसला सुनाते हुए राज्य की उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, न्यायमूर्ति रविन्द्र मैथानी ने सरकारी मशीनरी की पूरी प्रक्रिया को ‘Malafide’ करार देते हुए ऐसी समस्त एफआईआर को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता पत्रकारों द्वारा लगाए गए आरोपों की सीबीआई जांच का आदेश दिया है। एक सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री के खिलाफ सीबीआई जांच का आदेश बड़ी खबर है। सुशांत सिंह राजपूत नाम के अभिनेता की आत्महत्या या एक अनाम अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती के ड्रग्स व्यापार का हिस्सा होने से कहीं ज्यादा महत्व कि इस खबर पर राष्ट्रीय, मुख्यधारा का मीडिया लेकिन ब्रेकिंग न्यूज बनाता नहीं दिखा। न ही कोई राष्ट्रभक्त एंकर पागलों की माफिक चिल्लाते नजर नहीं आया। एक सामान्य-सी खबर बना इतिश्री कर ली गई है। जिस प्रकार से पूरे मामले की व्याख्या हाईकोर्ट ने अपने फैसले में की है, जिसे Indepth analysis कहा जा सकता है और राज्य सरकार के इरादों को Bad in faith, illegal or diohonest कहा, उससे राज्य सरकार के बदनीयत होने, संविधान प्रदत्त शपथ के खिलाफ काम करने और राज्य की नौकरशाही के चाल-चलन पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। तो चलिए समझते हैं पूरे प्रकरण को, जानते हैं कि न्यायमूर्ति रविन्द्र मैथानी ने क्योंकर अपने निर्णय में दो गढ़वाली गानों का जिक्र किया।

उत्तराखण्ड में एक न्यूज चैनल हुआ करता था ‘समाचार प्लस’। इस चैनल के मुख्य संपादक जे. उमेश कुमार खासे चर्चित पत्रकार हैं, इस पूरे विवाद के मुख्य किरदार भी उमेश कुमार हैं। सत्ता के साथ नजदीकियों के लिए जाने जाते रहे उमेश कुमार तब चर्चा आए थे जब राज्य के तत्कालीन सीएम डाॅ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की सरकार ले उन पर ताबड़तोड़ मुकदमे दर्ज कर डाले थे। उमेश कुमार इन मुकदमों से पहले डाॅ. निशंक के करीबी समझे जाते थे। बाद में विजय बहुगुणा सरकार में एक बार फिर से उनकी धमक, हनक के चर्चे हमने सुने। हरीश रावत संग उनकी पटरी नहीं खाई। फिर आया उमेश कुमार का किया गया वह स्टिंग जिसके चलते रावत सरकार गिरी, स्वयं रावत पर सीबीआई ने मुकदमा दर्ज किया, उमेश कुमार भाजपा के हीरो बन उभरे, उन्हें केंद्र सरकार की सुरक्षा इत्यादि मिल गई। 2017 में लेकिन समय का पहिया फिर से घूमा और भाजपा नेतृत्व की चुनाव बाद बनी सरकार, विशेषकर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत संग उमेश कुमार के रिश्ते जम नहीं पाए। इसके बाद आया 2018 का स्टिंग आॅपरेशन प्रकरण जिसमें उमेश कुमार के एक सहयोगी आयूष गौड़ ने उमेश कुमार पर आरोप लगाया कि उमेश कुमार उनके जरिए येन-केन-प्रकारेण सीएम और उनके रिश्तेदारों को भ्रष्टाचार के मामले में फंसाने का स्टिंग आॅपरेशन जबरन करवा रहे हैं। आरोप लगाया कि स्टिंग का उद्देश्य सच को सामने लाने की पत्रकारिता नहीं, बल्कि सीएम रावत को ब्लैकमेल करना है। लंबी कहानी है, सीएम के करीबियों का स्टिंग है, फिर आयूष गौर की शिकायत पर एक एफआईआर  (नं. 100/2018) का फिरौती मांगना, षड्यंत्र रचना आदि संगीन धाराओं में उमेश कुमार पर दर्ज किया जाना है। इस एफआईआर के दर्ज होेते ही देहरादून की पुलिस एक्शन मोड में आ गई। एफआईआर 10/08/2018 को दर्ज हुई। आनन-फानन में 14/08/2018 यानी चार दिन बाद ही आईओ ने उमेश कुमार की गिरफ्तारी करने, उनके ठिकानों पर सर्च करने का वारंट कोर्ट से मंगा डाला। कोर्ट लेकिन संतुष्ट नहीं थी इसलिए पुलिस की मांग कोर्ट ने खारिज कर दी। 18/08/2018, चार दिन बाद फिर पुलिस कोर्ट पहुंची। इस बार भी उसे सफलता हाथ नहीं लगी। 24/08/2018, छह दिन बाद फिर से यही हुआ। इस बार पुलिस ने मजिस्ट्रेट के फैसले के खिलाफ डिस्ट्रिक्ट जज की अदालत की शरण ली। 12/10/2018 को कोर्ट ने पुलिस की याचिका स्वीकार कर ली। 28/10/2018 को इस एफआईआर नं. 100/2018 के अंतर्गत उमेश कुमार गिरफ्तार कर लिए गए। बहुत नाटकीय तरीके से उत्तराखण्ड की पुलिस ने गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश की पुलिस के साथ मिलकर गाजियाबाद स्थित जे. उमेश कुमार के आवास पर छापेमारी कर उन्हें गिरफ्तार किया। 18 दिन बाद यानी 16 नवंबर, 2018 को इस मामले में उमेश कुमार को बेल मिली लेकिन वे छूटे नहीं, उन्हें एक अन्य एफआईआर के चलते झारखंड की पुलिस उठा ले गई। माह के अंत में जाकर जे. उमेश कुमार बाहर आ पाए। 27-28 जनवरी, 2019 को जे. उमेश कुमार ने दिल्ली में एक प्रेस काॅन्फ्रेंस बुलाकर आयूष गौड़ द्वारा किए गए स्टिंग आॅपरेशन के वीडियो/आॅडियो जारी कर डाले। आरोप लगाया कि सीएम के निकटवर्ती, उनके ओएसडी एवं राज्य सरकार के तत्कालीन अपर मुख्य सचिव श्री ओमप्रकाश आदि गहरे भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। जिस दौरान जे. उमेश कुमार जेल में बंद थे, उन पर कई अन्य मामलों में भी एफआईआर दर्ज की गई थी। ये मामले फर्जी तरीकों से संपत्ति हड़पने आदि के थे। एक एफआईआर 2/11/2018 को रांची में अमरतेश सिंह चैहान नाम के व्यक्ति द्वारा दर्ज कराई गई थी जिसमें उमेश कुमार पर जान से मारने की धमकी देने और उत्तराखण्ड सरकार के खिलाफ षड्यंत्र रचने का आरोप लगाया गया था। इसी एफआईआर के चलते 16 नवंबर को बेल मिलने के बावजूद उमेश कुमार देहरादून जेल से बाहर तो निकले लेकिन पहुंच गए रांची जेल।

फिर आया 24/06/2020, इस दिन खता खाए जे. उमेश कुमार ने एक वीडियो सोशल मीडिया में अपलोड किया जिसमें उन्होंने सीधे सीएम त्रिवेंद्र पर आरोप डाला कि 2016 में नोटबंदी के दौरान त्रिवेंद्र सिंह रावत ने, जो उस दौरान झारखंड में भाजपा के केंद्रीय प्रभारी थे, एक व्यापारी अमतरेश चैहान से 25 लाख की रिश्वत ली। यह रिश्वत चैहान को झारखंड के गौसेवा आयोग का अध्यक्ष बनाने के नाम पर ली। उमेश कुमार ने 17 बैंक एकाउंट नंबर भी जारी किए जिनमें बकौल उमेश कुमार 25 लाख की रकम कैश जमा की गई। इन बैंक एकाउंट में 6 एकाउंट नंबर, अलग-अलग बैंकों में एक व्यक्ति हरेंद्र सिंह रावत और उनकी पत्नी सविता रावत के थे। उमेश कुमार ने आरोप लगाया कि सविता रावत त्रिवेंद्र रावत की सगी साली हैं। इस आरोप के चलते भारी बवाल मच गया। आरोप सीधे सीएम पर था। 09/07/2020, वीडियो जारी होने के 13 दिन बाद हरेंद्र सिंह रावत ने देहरादून पुलिस को एक शिकायत उमेश कुमार के खिलाफ सौंपी जिसमें उन्होंने सारे आरोपों को तथ्यहीन बताया। यह भी बताया कि उनका या उनकी पत्नी की कोई रिश्तेदारी सीएम से नहीं है। न ही नोटबंदी के दौरान कोई पैसा उनके खातों में रांची से जमा हुआ है। अपनी बात के प्रमाण बतौर उन्होंने अपने बैंकों का सर्टिफिकेट भी पुलिस को सौंपा। जे. उमेश कुमार ने अपने वीडियो में त्रिवेंद्र सिंह रावत और अमतरेश चैहान के मध्य इस लेन-देन की बाबत हुई वाट्सअप चैट भी जारी की थी। हरेंद्र सिंह रावत की शिकायत मिलते ही देहरादून पुलिस सक्रिय हो उठी। इस शिकायत पत्र की एक प्रति सीएम कार्यालय को भेजी गई। 15/07/2020 को हरेंद्र सिंह रावत ने मांग की कि उनकी शिकायत को राजपत्रित अधिकारी से जांच कराई जाए। पुलिस इतनी भली कि तुरंत मान गई। डीआईजी देहरादून ने तुरंत उसी दिन एक डिप्टी एस.पी. को जांच का काम सौंप दिया। डिस्पी एस.पी. ने 30/07/2020 को अपनी रिपोर्ट फाइनल कर डाली। 30/07/2020 को ही हरेंद्र सिंह रावत ने बगैर आरटीआई फीस लगाए एक आरटीआई इस जांच रिपोर्ट की बाबत डाली। इतनी भली पुलिस उसने तुरंत ही अगले ही दिन 31/07/2020 को उनकी आरटीआई का उत्तर दे डाला जिसे आधारा बना तत्काल ही हरेंद्र सिंह रावत ने एफआईअर दर्ज करा दी, उसी दिन एफआईआर दर्ज भी कद दी गई। उसी रात 11 बजे पुलिस ने इस एफआईआर के आधार पर जे. उमेश कुमार को गिरफ्तार भी कर लिया। बाद में ‘पर्वतजन’ पोर्टल के श्री शिवप्रसाद सेमवाल व एक अन्य पत्रकार राजेश शर्मा भी गिरफ्तार कर किए गए।

कोर्ट का फैसला
गिरफ्तार पत्रकार कोर्ट गए। अलग-अलग Writ petition के जरिए। कोर्ट का फैसला न केवल ऐतिहासिक है, बल्कि त्रिवेंद्र सरकार के कामकाज के तरीके, राज्य की पुलिस प्रणाली पर बड़ा प्रश्न-चिन्ह खड़ा करने वाला हैः-

1. न्यायमूर्ति रविन्द्र मैथानी ने हरेंद्र सिंह रावत की एफआईआर को खारिज करते हुए उमेश कुमार, शिवप्रसाद सेमवाल एवं अन्य पर कोई मुकदमा नहीं होने की बात की।

2. उन्होंने हरेंद्र सिंह रावत के शिकायती पत्र पर पुलिस कार्यवाही, जांच अधिकारी शिकायतकर्ता के कहने पर नियुक्त करन, बगैर फीस के RTI Application पर एक ही दिन कार्यवाही करते हुए जांच रिपोर्ट शिकायतकर्ता हरेंद्र सिंह रावत को उपलब्ध कराना और उसी दिन उमेश कुमार एवं अन्य पर एफआईआर दर्ज करने को MALAFIDE  करार दिया।

3. कोर्ट ने पुलिस जांच पर गंभीर प्रश्न-चिन्ह लगाते हुए कहा कि भले ही हरेंद्र सिंह रावत त्रिवेंद्र सिंह रावत के रिश्तेदार हैं, का आरोप उमेश कुमार ने असत्य लगाया, भले ही हरेंद्र सिंह रावत के बैंक खाते में पैसे नहीं जमा हुए, अमतरेश चैहान से पूछताछ न करना, अन्य जो खाते उमेश कुमार ने बताए उनकी जांच न करना आदि स्पष्ट करता है कि उमेश कुमार के सीएम पर लगाए गए आरोपों की कोई जांच नहीं की गई। विद्वान न्यायाधीश न्यायमूर्ति रविन्द्र मैथानी जी ने हमारे समाज में गहरे पसर चुके भ्रष्टाचार पर टिप्पणी करते हुए उत्तराखण्ड के लोक गीतकार नरेंद्र सिंह नेगी के दो गानों के छन्द अपने निर्णय में कोट किए हैंःµ

1. माछु पाणी पेंदू नी दिखे,
पंछी डाली सेंदी नी देखै
लेंदू छै च भैजी घूस सभी जाणदन…
लेंदू छै च भैजी घूस सभी जाणदन…
पर केकु लेंदू नी दीखैंद।।

अर्थात् मच्छी पानी पीते हुए नहीं दिखती, पक्षी डाल पर सोते हुएनहीं दिखते। सब जानते हैं कि अफसर भाई घूस लेता है, पर कभी लेते हुए नहीं दीखता। कहने का मतलब कि आजकल सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार इतना ज्यादा हो चुका है कि सभी भ्रष्ट हो चुके हैं।

2. कमीशन कि मीट भात, रिश्वत को रेलो
कमीशन कि शिकार भात, रिश्वत को रेलो
रिश्वते को रेलो रे…
बस कर बे! भिंडी ना सपोड़ अब कथगा खैल्यौ…
कथगा जि खैलो रे…

यानी कमीशनखोरी और रिश्वतखोरी की इंतेहा है। बड़े मजे में मीट और भात (चावल) डकार रहे हो। अरे भई इतना भी मत डकार कि पचा न सको। समझ नहीं आता कि कितना खाते जा रहा है? आखिर कितना ठूंसेगा, अब और कितना खाएगा…

इन गानों का स्मरण करते हुए उन्होंने प्रश्न किया है कि क्या इस अदालत को उमेश कुमार द्वारा मुख्यमंत्री पर लगाए आरोपों पर कोर्ट निर्णय नहीं लेते हुए जनता की स्मृति में इन आरोपों को बने रहने देना चाहिए या फिर स्वयं (Suo Moto) कार्यवाही करते हुए पूरे प्रकरण की जांच के आदेश देते हुए सच को सामने लाने का प्रयास करना चाहिए।
अपने निर्णय में इस प्रश्न का उत्तर न्यायाधीश महोदय ने खुद ही दे दिया है। उन्होंने एक सिरे से उमेश कुमार, शिवप्रसाद सेमवाल एवं अन्य के खिलाफ तमाम एफआईआर रद्द कर डाली है तो सीबीआई को सीएम पर लगे आरोपों की जांच करने का आदेश भी दे डाला है।

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