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Country Editorial

बर्बाद गुलिस्तां करने को…

उत्तर प्रदेश के शहर अयोध्या में जन्में मशहूर शायर रियासत हुसैन रिजवी का एक शेर खासा मशहूर है- ‘बर्बाद गुलिस्तां करने को एक ही उल्लू काफी है, हर शाख पर उल्लू बैठे हैं अजांम ए गुलिस्तां क्या होगा।’ रियासत हुसैन अयोध्या से निकल बहराइच में जा बसे थे। शायरी की दुनिया में उन्हें शौक बहराइची के नाम से पहचाना जाता है। उनके इस शेर की याद उत्तराखण्ड में कोविड सक्रंमण काल के दौरान स्वास्थ सेवाओं की बाबत दायर चार जनहित याचिकाओं के चलते हो आई। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय में इन दिनों लगातार इन याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है। 10 मई को न्यायालय का आदेश राज्य की हर शाख पर उल्लू बैठे होने की पुष्टि तो करता ही है, ऐसे उल्लुओं के शिकंजे में फंसे राज्य की बदहाली और उसका भविष्य भी इससे बचाया जा सकता है। इन उल्लुओं से ज्यादा घातक, ज्यादा शर्मनाक स्थिति में वे हैं जो धर्म, जाति और अंधभक्ति के दलदल में इतना धंसे हुए हैं कि सूरज पूरब से उगता है, पश्चिम में ढलता है तक को अपने भक्तिभाव चलते यदि उनका ईश्वर कहे तो गलत मानने को तत्पर नजर आते हैं। कभी-कभी लगता है ऐसे माहौल में उन जुगनुओं के प्रयास भला कुछ सार्थक कर भी पायेंगे जो अपने प्रयासों, ऐसी जनहित याचिकाओं के जरिए, सच को आयना दिखाने का काम करने में दिन-रात लगे हुए हैं? शायद हां, शायद नहीं। फिर भी एक उम्मीद की किरण इन जुगनुओं के चलते नजर तो आती है, हौसला देने का काम करती है कि ताली-थाली बजाने वाले मुल्क में बहुत से ऐसे भी हैं जिनकी दृष्टि बाधित नहीं है। ऐसे हैं तभी अधंकार की गहरी खाई में जा पड़े इस मुल्क के बाहर निकल आने का विश्वास बना रहता है।

आजादी के मात्रा एक दशक बाद ही समाजवादी विचारक राम मनोहर लोहिया ने भांप लिया था कि इस देश का क्या हश्र होने किया जा रहा है। 1963 में लोकसभा सदस्य बने लोहिया ने संसद में कहा था कि ‘हिंदुस्तान की गाड़ी बेतहाशा बढ़ती जा रही है, किसी गड्ढ़े की तरफ या किसी चट्टान से चकनाचूर होने। इस गाड़ी को चलाने की जिन पर जिम्मेवारी है उन्होंने इसे चलाना छोड़ दिया है। गाड़ी अपने आप बढ़ती जा रही है। मैं भी इस गाड़ी में बैठा हूं। यह बेहताशा बढ़ती जा रही है। इसके बारे में मैं सिर्फ एक ही काम कर सकता हूं कि चिल्लाऊं और कहूं कि रोको। अगर मेरी आवाज और ज्यादा तेज नहीं होती तो कम से कम माननीय सदस्य इस बात को, मेरे दिल को, मेरी आत्मा की पुकार को समझें कि मैं चिल्लाना चाहता हूं कि इस गाड़ी को रोको, यह चकनाचूर होने जा रही है। उन्होंने संसद में ही यह भी कहा था ‘समूचा हिंदुस्तान कीचड़ का तालाब है जिसमें कहीं-कहीं कमल उग आए हैं। कुछ जगहों पर ऐय्याशी के आधुनिकतम तरीकों के सचिवालय, हवाई अड्डे, होटल, सिनेमाघर और महल बनाए गए हैं और उनका इस्तेमाल उसी तरह के बने-ठने लोग-लुगाई करते हैं। लेकिन कुल आबादी के एक हजारवें हिस्से भी इन सबका कोई सरोकार नहीं है। बाकी तो गरीब, उदास, दुखी, नंगे और भूखे हैं।’

लोहिया कितना सही थे, शौक बहराइची का शेर आज कोविड सक्रंमण काल के दौरान कितना मौजू है इसे नैनिताल हाईकोर्ट के इस निर्णय से समझा जा सकता है। माननीय न्यायालय ने इन जनहित याचिकाओं की सुनवाई करते हुए राज्य के स्वास्थ सचिव अमित नेगी को निर्देश दिया था कि वे कोविड से संबंधित स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर सरकार की तरफ से एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करें। अमित नेगी ने 7 मई, 2021 को यह हलफनामा कोर्ट में दाखिल किया। 10 मई को कोर्ट ने इसे पढ़ने के बाद अपना निर्णय सुनाया। स्वास्थ्य सचिव का हलफनामा राज्य की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था का सच सामने ला देता है। कोर्ट ने उनके इस हलफनामें को ‘अस्पष्ट’ कहा है। ऐसा हलफनामा जिसे चालाकीपूर्वक बनाया गया ताकि जिन मुद्दों पर हाईकोर्ट स्पष्टता चाहती है, उन्हें छिपाया जा सके। कोर्ट ने कहा है कि न्यून्तम सत्य तक को इसमें नहीं रखा गया है। अंदाज इससे आप लगा सकते हैं कि हमारी नौकरशाही कितनी बेलगाम हो चली है। जब प्रदेश की शीर्ष न्यायपालिका तक को सही जानकारी नहीं मिल रही तो आमजन की बदहाली का अंदाज लगाना कठिन नहीं। उच्च न्यायालय को दिए अपने जवाब में स्वास्थ्य सचिव ने पूरे प्रदेश में 26 प्रायवेट लैब होने की बात कही है लेकिन इन लैबों का कोई विवरण नहीं दिया है। स्वास्थ्य सचिव ने राज्य में दस सरकारी लैब होने की बात कही। कोर्ट ने आश्र्चय जताया कि एक भी लैब हरिद्वार जिले में नहीं हैं जहां सबसे ज्यादा संक्रमण फैला हुआ है। 20 अप्रैल को न्यायालय ने राज्य सरकार को सुझाव दिया था कि ज्यादा से ज्यादा मोबाइल टेस्टिंग वैन खरीदी जाएं ताकि टेस्टिंग का दायरा बढ़ सके। स्वास्थ्य सचिव ने 8 मई को जानकारी दी है कि इसके लिए टेंडर जारी किए जा चुके हैं। लेकिन इसमें तीन माह का समय लगेगा। करोड़ो रुपए कुंभ मेले में स्वाह करने वाली राज्य सरकार को क्या जरा सी शर्म भी बाकी नहीं कि कुंभनगरी में एक टेस्टिंग लैब लगा सके। कैसी सरकारें हैं? कैसे नौकारशाह हैं? समय रहते फैसला लेते तो मोबाइल वैन भी इस आपद काल में होती और हर जनपद में सरकारी लैब भी। उड़नयान से कंुभ स्नान करने वालों पर फूल बरसाने के लिए पैसा है, जीवन बचाने के लिए नहीं। नतीजा कोर्ट में 8 मई की सुनवाई के स्टे्टस से जान लीजिए। जो थोड़ी बहुत टेस्टिंग हो भी रही है उसके नतीजे नहीं आ रहे हैं। 8 तारीख को बकौल हाईकोर्ट देहरादून 4367 कोविड रिपोर्ट, हरिद्वार में 2456 और नैनिताल में 3280 रिपोर्ट का नतीजा नहीं आया था।

जनता जर्नादन आपने डबल इंजन के नाम पर वोट दिया था ना? तो जानिए डबल इंजन का क्या जबरदस्त लाभ मिल रहा है। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को बताया है कि पूरे प्रदेश में तीन ऑक्सीजन उत्पादन इकाईयां हैं। वर्तमान में इनसे बननी वाली ऑक्सीजन का उपयोग केंद्र सरकार के निर्देशानुसार हो रहा है। जानते हैं पहाड़ का पानी और जवानी की तर्ज पर यह ऑक्सीजन भी हमें नहीं मिल रही। केंद्र का अजीबों-गरिब निर्णय इन तीनों ईकाइयों में बन रही ऑक्सीजन को अन्य राज्यों में भेजने का है। उत्तराखण्ड सरकार से कहा गया है कि वह अपने लिए ऑक्सीजन झारखंड और पश्चिम बंगाल से मंगवाए।

डबल इंजन की सरकार के प्रादेशिक इंजन यानी राज्य सरकार ने स्वयं हाईकोर्ट को कहा है कि यह अजीबों-गरीब आदेश हैं केंद्र सरकार का। यह भी कहा कि लोकल इंजन सेंट्रल इंजन से गुहार लगा रहा है कि उसे राज्य में बनाई जा रही ऑक्सीजन का इस्तेमाल करने दिया जाए लेकिन सेंट्रल इंजन नहीं मान रहा है। यह है महाराज डबल इंजन की सच्चाई। पूरे प्रदेश में मात्रा पांच सीटी स्कैन की मशीनें हैं। मात्रा पांच। स्वास्थ्य सचिव के अनुसार अब वे जाग चुके हैं इसलिए तीन मशीने और खरीद रहे हैं जिन्हें रूद्रपुर, पिथौरागढ़ और देहरादून में लगाया जाएगा। इसमें भी तीन महीने अभी लगेंगे। सरकार की नींद अब जाकर टूटी है। अब वह सभी जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों से संपर्क कर उनसे जानकारी मंगवा रही है कि कहां-कहां और कितनी सीटी स्कैन मशीने चाहिए। यह भी कोर्ट को स्वास्थ्य सचिव ने बताया है कि मशीने बहुत महंगी है, एक मशीन दस करोड़ की है। कुंभ में बर्बाद करने के लिए करोड़ों हैं, सीटी स्कैन मशीनें लेकिन महंगी लग रही हैं।

डाॅक्टरों का कमी को रोना भी सरकार ने रोया है। त्रिवेंद्र रावत का बजट भाषणा पढ़िए। क्या कसीदे पढ़े थे उन्होंने स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर। अब कह रहे है डाॅक्टर, टेक्निशियन हैं ही नहीं। बदहाली का आलम देखिए। एमबीबीएस फाइनल इयर के विद्यार्थियों को कोविड ड्यूटी में लगाने का निणर्य लिया गया है लेकिन सरकार हाईकोर्ट को यह तक बता नहीं पा रही है क्या इन प्रशिक्षु डाॅक्टरों के लिए पीपीई किट है या नहीं। और जानिए बदइंतजामी की इतेंहा को। स्वास्थ्य सचिव के अनुसार कोविड में इस्तेमाल की जा रही एक दवा केमिडेशिवर के 74,000 इजेक्शन केंद्र ने राज्य को एलाट किए जरूर लेकिन केवल 33,321 की अभी तक मिल पाए हैं। कोर्ट ने जब राज्य के कोविड नोडल अफसर उद्योग सचिव सचिन कुर्बे से जानना चाहा कि जिन दवा कंपनियों से ये इन्जेक्शन आना था उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही राज्य कर सकता है तो कुर्बे साहब के पास इतनी भर भी जानकारी नहीं थी। उन्होंने ‘ईमानदारी’ से कोर्ट को बताया कि उन्हें पता ही नहीं कि राज्य सरकार कार्यवाही कर सकती है या फिर इसका अधिकार केंद्र के पास है? स्वास्थ्य सचिव अमित नेगी ने कोर्ट को बताया कि शवों के अंतिम संस्कार के लिए कई अस्थाई शवदाह केंद्र बनाए गए है। माननीय न्यायालय ने पूछा कि कहां-कहां बनाए गए है तो स्वास्थ्य सचिव ने आंकड़ा न होने की बात कह डाली। राज्य सरकार और नौकरशाही के पास कोई संतोषजनक उत्तर दरअसल है ही नहीं। सामान्य जानकारियां तक नहीं है।

जनहित याचिकाकत्ताओं के वकील दुष्यंत मैनाली और शिव भट्ट को बताना पड़ा कि जनाब टेंडर प्रक्रिया को छोड़ सीधे खरीद करने का अधिकार आपके पास है। ‘आपदा कानून-2005’ के अंर्तगत विपत्ति काल में तमाम नियमों को, सारी प्रक्रियाओं को दरकिनार कर सरकार सीधे मोबाइल वैन, टेस्टिंग किट, सीटी स्कैन मशीन इत्यादि खरीद सकती है। इन वकीलों ने अदालत से गुहार लगाई कि इन कानून का इस्तेमाल कर राज्य सरकार सभी जरूरी चीजों को खरीदें। हरेक क्षण, हरेक घंटा, हरेक दिन जीवन बचाने के लिए जरूरी है। दुष्यंत मैनाली को गुहार लगानी पड़ी कि भवाली स्थित टीवी सैनिटोरियम को सरकार कोविड अस्पताल बनाए। कोई आश्चर्य नहीं कि इन नौकरशाहों को पता भी न हो कि इस राज्य में ऐसा कोई सैनिटोरियम है।

तो भाइयों-बहिनों नींद से जागो, मंदिर-मस्जिद, ठाकुर-बाह्मण, ऊंच-नीच की गोलबंदी से बाहर निकलो। अन्यथा सब कुछ गवां बैठोगे। शोक बहराइची कह गए दशकों पहले ‘बर्बाद गुलिस्तां करने को एक ही उल्लू काफी है, हर शाख पर उल्लू बैठे हैं अजांम ए गुलिस्तां क्या होगा।’ इन उल्लुओं से खुद को, राज्य को समाज को बचा लो। बाद में पछताने से कुछ होने वाला है नहीं। चिड़िया खेत को खासा चुग चुकी है, बचे-खुचे को संभाल लो। जाग जाओ।

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