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Editorial

संपादकीय ┃ चेतने का समय आ गया

संपादकीय ┃ चेतने का समय आ गया

दशकों पहले एक कवितानुमा कुछ पढ़ा था, तंज था उन बुद्धिजीवियों पर जो महंगी शराब, वातानुकूलित कमरों और अन्य सभी प्रकार की विलासिता का संपूर्ण भोग करते हुए किसानों की दुर्दशा, भूख से बिलखते-मरते बच्चों, आम आदमी के दो वक्त की रोटी की जद्दोजहद समेत ऐसे तमाम संवेदनशील मुद्दों पर लगातार अपनी ‘पीड़ा’, अपनी ‘व्यथा’ व्यक्त करते रहते हैं जो समाज में उनकी सरोकारी छवि को चमकाए रखे।

कविता की एक पंक्ति मुझे आज याद हो आई-‘वे आमलेट खाकर जनवादी कविता रचते हैं’ जिस दौर में यह कविता लिखी गई आमलेट एलीट वर्ग का भोजन रहा होगा। आज के समय पर इसे कुछ यूं कहा जा सकता है-‘वे हाई-फाई क्लबों में मुर्गा और स्कॉच का कॉकटेल बना जनवादी साहित्य रचते हैं’। दशकों पहले पढ़ी यह पंक्ति दो कारणों के चलते मेरे मानस पटल में उभरी।

पहली घटना अंग्रेजी दैनिक ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ के तीन मार्च अंक में प्रकाशित एक खबर है। अपने प्रथम पृष्ठ में ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ ने इसे प्रकाशित किया है। खबर का शीर्षक है ‘In a Jharkhand corner, Deputy Commissioner opts for a government hospital to deliver baby’ इस खबर को पढ़ते समय मुझे खुद के निजी जीवन से संबंधित कुछ वाक्ये याद आ गए, तो यह खबर और मेरा आत्म चिंतन का निचोड़ आपको परोस रहा हूं ताकि जीवन की आपाधापी के बीच जब कभी समय मिले तो प्रयास करिएगा खुद को टटोलने का, समझने का कि हम कितना दोहरा जीवन जी रहे हैं, कैसे हमारे मापदंड स्वयं के लिए बिकुल अलग और समाज के लिए, देश के लिए बिल्कुल अलग बन चुके हैं। यह भी विचारिएगा कि ये दोहरे मापदंड हमें भीतर से कितना खोखला, कितना संवेदनहीन कर चुके हैं। तो पहला कारण है एक खबर और उस खबर को पढ़ने के बाद मेरा आत्मचिंतन, दूसरा कारण जिसने मुझे बरसों पहले पढ़ी कविता का स्मरण करा डाला, मेरे संपादन में प्रकाशित होने वाली हिंदी साहित्यिक पत्रिका ‘पाखी’ के मार्च अंक का आवरण पृष्ठ है।

इस आवरण पृष्ठ में इस बार स्व. अजमल सुल्तानपुरी की कविता ‘कहां है मेरा हिन्दुस्तान’ के साथ-साथ पिछले दिनों राष्ट्रीय नागरिकता कानून में हुए संशोधन का विरोध करने वालों के खिलाफ राजधानी दिल्ली में भारी पुलिस बलों की उपस्थिति में गोली चलाने वाले रामभक्त गोपाल और जाफराबाद (दिल्ली) में ही इन प्रदर्शनों के पक्ष में पुलिस पर बंदूक तानने की जुर्रत करने वाले शाहरूख की तस्वीरें लगाई गई हैं। इस आवरण पृष्ठ को ‘फेसबुक’ में चस्पा करने के साथ ही नाना प्रकार के कमेंट्स आने लगे।

एक प्रतिक्रिया ने मेरा ध्यान आकर्षित किया, मुझे व्यथित किया और कुछ हद तक प्रेरित किया कि मैं समाज को आयना दिखाने की जिम्मेदारी संभाले बुद्धिजीवि वर्ग के दोगलेपन पर खुलकर लिखूं। प्रतिक्रिया साहित्यकार भगवानदास मोरवाल जी की है। उन्होंने इस प्रकार के आवरणों से बचने की सलाह दी। जब मैंने प्रति उत्तर में लिखा कि तटस्थ रहना भी अपराध है, तो मोरवाल जी ने अपना कमेंट डिलीट कर डाला। मोरवाल जी कई चर्चित उपन्यासों के रचयिता हैं। सामाजिक भेदभाव पर उनकी पैनी नजर रहती है। कई सम्मान वे अपने सरोकारी तेवरों और लेखनी के चलते पा चुके हैं। केंद्र सरकार में उच्च पद पर आसीन मोरवाल जी को ‘पाखी’ का शब्द साधक सम्मान भी मिल चुका है। तो चलिए समझा जाए हमारे जीवन में, हमारे खुद के व्यक्तित्व में गहरी जड़ें जमा चुके छद्म को, अपनी कथनी और करनी के अंतर को।

पहले बात झारखण्ड कॉडर की आईएएस अधिकारी और वर्तमान में जिला गोद्दा की जिला अधिकारी किरण पासी की। किरण पासी 2013 बैच की आईएएस अफसर हैं। मूल रूप से पश्चिम बंगाल की निवासी किरण पासी जिस जिले में तैनात हैं उसकी गिनती अति पिछड़ा क्षेत्र में की जाती है। ऐसे इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं न के बराबर होती हैं। कल्याणकारी राज्य होने के चलते सरकारी अस्पताल जरूर पूरे देश भर में हैं, लेकिन उनकी बदहाल व्यवस्था किसी से छिपी नहीं। निजी अस्पतालों को यहां से ‘धन्धा’ मिलता नहीं है इसलिए फाइव स्टार सुविधाओं से युक्त अस्पताल यहां नहीं पाए जाते। जो सुविधा संपन्न लोग होते हैं, वे अपना इलाज करवाने बड़े शहरों में जाते हैं।

गरीब-गुरबा के पास कोई विकल्प होता नहीं। सरकारी डॉक्टर को ही भगवान मान वे जैसा इलाज उपलब्ध होता है उसी सहारे अपनी जिंदगी काटने को विवश रहते हैं। किरण पासी ने आईएएस होने के बावजूद प्रदेश की राजधानी रांची अथवा अन्य किसी बड़े शहर के बड़े अस्पताल में बच्चे की डिलीवरी न करवाने का निर्णय लिया। वे अपने जिले के सरकारी अस्पताल में भर्ती हुईं और एक स्वस्थ बच्चे को जन्मा। उनका यह कदम बेहद सराहनीय और प्रेरणादायक है। इससे सरकारी अस्पतालों की बाबत जो अविश्वास का भाव हर आर्थिक रूप से समर्थ व्यक्ति में रहता है, उसे किरण पासी ने अपने इस निजी फैसले के जरिए न केवल गलत साबित कर दिया, बल्कि वे प्रेरणा का कारण भी बन चुकी हैं, उन सबके लिए जो सरकारी अस्पतालों में अपना इलाज कराने को लेकर आशंकित रहते हैं।

अब थोड़ा चिंतन करिए कि यदि आप किरण पासी के स्थान पर होते तो यह फैसला ले पाते? सरकार को, सरकारी प्रतिष्ठानों को, कोसना हमारी आदत में शुमार हो चुका है। ‘अधिकार हमारे-कर्तव्य तुम्हारे’ को हमने अपना मूलमंत्र बना डाला है। सरकारी अस्पतालों की अव्यवस्था पर जमकर सवाल उठाना, सरकारी तंत्र के हर निर्णय को, हर प्रयास को शंका की नजर से देखना हमारी फितरत बन चुकी है। लेकिन हम ऐसा कुछ भी करने से परहेज करते हैं जो हमारी सुख-सुविधाओं में खलल बन सकता हो। हम महंगे से महंगे निजी अस्पतालों में इलाज कराते हैं, अपने बच्चों को महंगे स्कूलों में पढ़ाते हैं, महंगी से महंगी शराब पीते हैं, लक्जरी गाड़ी में चलते हैं।

मैं स्वयं की बात करूं तो मेरी 12वीं तक की पढ़ाई सरकारी स्कूल में हुई। ‘मुझे आज भी अपने स्कूल केंद्रीय विद्यालय, रानीखेत पर फख्र है। हमारे शिक्षक हमारे आदर्श तब भी थे, आज भी हैं। मेरी पत्नी भी सरकारी स्कूल से पढ़ी। आज बड़ी उद्योगपति हैं। उन्हें भी अपने शिक्षण संस्थान पर गर्व है। लेकिन जब बात मेरी बेटी की आई तो मैंने उसका दाखिला केंद्रीय विद्यालय में न करा एक महंगे निजी स्कूल में कराया। मैं खांटी हिंदी का आदमी हूं। अपनी भाषा पर मुझे नाज है। त्रासदी यह कि मेरी बेटी हिंदी में फेल हो जाती है। वह सोचती, बोलती और लिखती, सब अंग्रेजी में है। वह भारत की नहीं इंडिया की नागरिक है।

जाहिर है उसकी सोच भी भारत की नहीं, इंडिया वाली है। ‘नशा नहीं रोजगार दो’ जैसे जन आंदोलन में मात्र 13- 14 बरस का मैं न केवल सक्रिय था, बल्कि पूरे दमखम से उसका समर्थक था। वक्त के साथ ऐसा बदला कि अब ‘इंडिया’ के ‘इंटर नेशनल सेंटरों’ में बैठ महंगी शराब की चुस्की लेता जनवाद पर चल रही बहस करने वालों में शुमार हो चुका हूं। मैं किरण पासी का प्रसंशक भले ही हूं, लेकिन सरकारी अस्पताल में इलाज कराने से मैं कतराता हूं। मुझे पांचसितारा अस्पतालों में ही सुकून महसूस होता है। मुझे कहने से गुरेज नहीं कि मैं स्वयं दोहरेपन का शिकार हो चुका हूं। शायद यही कारण है कि अब अपने को ‘चूका’ हुआ मानने लगा हूं। ग्लानि होती है जब आत्मचिंतन करने बैठता हूं। फिर उस ग्लानि से भागने के लिए कलम पकड़ हर उस पर लिख अपनी भड़ास मिटाता हूं जो मेरी समझ से अनुचित है। इसके चलते मेरे मित्र मुझसे नाराज हो जाते हैं।

हरीश रावत जब उत्तराखण्ड के सीएम बने तो मैं दिल से प्रसन्न हुआ। फिर उनकी ही सरकार के खिलाफ लिखने लगा। ऐसा ही कुछ आम आदमी पार्टी के अपने मित्रों संग मैंने किया। जाहिर है मेरी ग्लानि, मेरा खुद का विचलन मुझे जब धिक्कारता है तो उससे बचने के लिए मैं एक नकाब ओढ़ लेता हूं। अब देखिए, आज के दौर में जब निजाम पूरी तरह अलोकतांत्रिक साबित होता जा रहा है, मैं सरकार का कटु आलोचक बनने का खतरा उठा रहा हूं तो शायद इसके पीछे एक बड़ा कारण मेरे यही दोहरे मापदंड हैं जिनसे बचने की मेरी छटपटाहट शायद थोड़ी-बहुत ईमानदारी मेरे अंदर जिंदा रखे है।

अब भगवान दास मोरवाल जी को ले लीजिए, वे अकेले नहीं हैं जो क्रांति ज्वार के मोती बिखेरने, असमानता के खिलाफ जेहाद छेड़ने आदि का काम अपनी कविताओं, उपन्यासों में तो करते हैं, लेकिन भगत सिंह उनके घर में न जन्में, इसकी पूरी तैयारी भी रखते हैं। हम सब दरअसल बेहद कमीने, घटिया और चालाक लोगों की ऐसी जमात में बदल चुके हैं जिनसे लाख गुना भले तो वे हैं जो भले ही डकैत हों, भ्रष्ट हों, बदचलन हों, जो भी हैं, जैसे भी हैं, खुलकर हैं।

बचपन में रूसी साहित्य जमकर पढ़ता था। निकोलाई आस्त्रोस्की के उपन्यास ‘How the steel was tempered’ में लिखा एक वाक्य मुझे याद आ रहा है- ‘Life is given to us but only once and we must live it so as to feel no torturing regrets for the wasted years. Never know the burning shame of mean and pity past.’  तो दोस्तों थोड़ा आत्मचिंतन करें, खुद को परखें, परखें भी, समझें भी अपने को, अपनी असलियत को ताकि वक्त रहते चेत जाएं। अन्यथा जब वक्त निकल जाएगा, ऊर्जा क्षीण होने लगेगी तब सिवाए पछताने के कुछ बाकी नहीं रहेगा।

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