Editorial

यह मेरा इंडिया

मुंबई फिल्म जगत यानी बाॅलीवुड के जाने-माने निर्देशक एन चन्द्रा की फिल्म ‘यह मेरा इंडिया’ जो 2009 में रिलीज हुई थी, मैंने दस साल बाद कल देखी, ‘नेटफिलिक्स’ के चलते। इस फिल्म की रिलीज से पहले चन्द्रा साहब, जो मेरे घनिष्ठ मित्र भी हैं, ने मुझे इसकी सीडी भेजी थी, मेरी राय जानने के लिए। मैं आलस के चलते न तो फिल्म देख पाया, न ही चन्द्रा साहब को अपनी राय से अवगत करा पाया। फिल्म जैसी सोची थी उतनी असरदार लगी नहीं। एन चन्द्रा ‘अंकुश’, ‘प्रतिघात’, ‘तेजाब’ और ‘नरसिम्हा’ जैसी फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। उनका निर्देशन बेहद सधा हुआ और फिल्म कसी हुई होती है। ‘यह मेरा इंडिया’ में लेकिन चंद्रा साहब की छाप नजर नहीं आई। फिल्म का सब्जेक्ट हालांकि बेहद मौजू है। अनुपम खेर, राजपाल यादव, पेरिजाद जोराबियन, सारिका और सीमा विश्वास जैसे मंझे हुए कलाकारों के बावजूद कहीं कुछ ऐसा है जो फिल्म से दर्शक को बांध नहीं पाया। बहरहाल फिल्म का रिव्यू करना मेरी मंशा नहीं है। मैं फिल्म के सब्जेक्ट पर कुछ लिखने बैठा हूं। 17 सितंबर की रात फिल्म देखी। 18 सितंबर का अखबार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘द टाइम्स आॅफ इडिया’ मेरे सामने हैं और उनमें तलाश रहा हूं अपने भारत को। आइए आप भी शामिल होइए इस तलाश में।
(1) पहली खबर, पहले पृष्ठ पर एक दलित युवक की हत्या: नजर जा अटकती है, चाय का स्वाद कसैला लग रहा है। बाबा साहब के देश में आजादी के बहत्तर बरस बाद भी समाज जाति, वर्ण, धर्म में बंटा है। अभिशांक, मात्र 23 बरस की उम्र में इसलिए मार डाला जाता है क्योंकि उसने दुस्साहस किया अपने गांव की एक सवर्ण लड़की से प्यार करने का। हरदोई (उत्तर प्रदेश) की इस घटना से राज्य के यशस्वी मुख्यमंत्री कितने दुखी हुए होंगे, मुझे नहीं पता। हां उनका ‘भयमुक्त समाज’ का वायदा और उनका दबंग चेहरा जरूर मेरे सामने बार-बार आ रहा है।
(2) दूसरी खबर, पहले पृष्ठ पर जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद गिफ्तार लोगों की बाबत: खबर के अनुसार पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) के अंतर्गत गिरफ्तार लोगों की सुनवाई के लिए गठित पीएसए एडवाजरी बोर्ड आंख मूंद कर राज्य सरकार के निर्णय पर मुहर लगा रहा है। यानी जो इस एक्ट के तहत पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए हैं, उन गिरफ्तारियों की बगैर सही तरीके से जांच किए, यह बोर्ड मात्र रबरस्टैम्प का काम कर रहा है। कैसा लोकतंत्र है हमारे देश में।
(3) तीसरी खबर, बारह बरस के बालक ने की टीचर की हत्या: मुंबई की यह खबर दिल दहलाने वाली है। टीचर द्वारा डांटे जाने से नाराज एक बच्चे ने अपनी टीचर के घर जाकर उसे चाकुओं से गोद-गोद कर मार डाला। वाह क्या संस्कार है।
(4) चैथी खबर, गुवाहाटी में तीन युवतियों का चीरहरण: यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते तत्र रमयन्ते देवता वाले देश में असम पुलिस का काला कारनामा। तीन युवतियों को न केवल लाठियों से पीटा बल्कि उनके कपड़े भी फाड़ डाले। आदर्श…।
(5) पांचवीं खबर, योगी राज में लड़की की आत्महत्याः बरेली जिले में एक सोलह बरस की लड़की ने खुद की जान ले ली। कारण था दो व्यक्तियों द्वारा उसके साथ लगातार छेड़छाड़ करना। इस छेड़छाड़ की रिपोर्ट पुलिस में कराई गई थी, लेकिन ‘भय मुक्त समाज’ वाले प्रदेश की पुलिस ने एफआईआर दर्जन नहीं की। दुराचारियों का इससे ‘उत्साह’ बढ़ गया और वे लड़की संग ज्यादा बदतमीजी करने लगे। नतीजा बालिका ने खुदखुशी कर ली। वाह!
(6) छठी खबर, सांसद को गांव में घुसने से रोका गयाः  बाबा साहेब के देश में एक दलित सांसद की मात्र इसलिए अपने संसदीय क्षेत्र के एक गांव में इंट्री नहीं हो सकी क्योंकि वह दलित हैं। आदर्श शासन व्यवस्था दोनों अखबार निगेटिव खबरों से पटे पड़े हैं। अस्पतालों की कहानी है कि कैसे सरकारी योजनाओं में फर्जीवाड़ा कर प्राइवेट अस्पताल नकली बिलों के सहारे पैसा बना रहे हैं। नेताओं के भ्रष्टाचार  के समाचार, बलात्कार के समाचार, इनामी बदमाशों के सोशल मीडिया में दबंगई से डाले जाने वाले स्टेट्स  के समाचार। सोचिए कैसा मुल्क है हमारा? क्या ऐसे देश की कल्पना हमारे राष्ट्रपिता ने की थी? ताउम्र अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले महात्मा के हत्यारे को ‘यह मेरा इंडिया’ में जब महिमामंडित किया जाता है तब गंभीर चिंतन करना जरूरी है कि हम इन बहत्तर बरसों में कहां आ खड़े हुए हैं।
एन चंद्रा की फिल्म इन मुद्दों को उठाने का एक अच्छा प्रयास है। फिल्म में मुंबई का एक दिन है जिसमें बिहार से रोजी-रोटी की तलाश में आए एक युवक, कभी क्रांति के जरिए देश की तस्वीर बदने का ख्वाब देखने वाले एक शार्प शूटर बन चुके युवक, पुलिस के एनकाउंटर एक्सपर्ट का मराठावाद, कौमी दंगों में अपना परिवार खो चुके एक मुसलमान की हिन्दुओं से घृणा, एक अय्याश बिजनेसमैन, उसकी पत्नी और बेटी के जरिए कथित उच्च समाज की काली दुनिया, एक आदर्शवादी मुस्लिम युवक का देश प्रेम, एक बड़े नेता का अपने बेटे की दलित युवती संग प्रेम कहानी पर खलनायक बनना, फिर इसके सहारे दलित वोट की राजनीति को साधने का जुगाड़ करना, यह सब कुछ मुंबई के एक दिन की कहानी के जरिए निर्देशक ने जिन मुद्दों को छुआ है, वे बेहद गंभीर मुद्दे हैं जिन पर समाज खामोश है या खामोश रहने में ही अपनी भलाई समझने वाले कायरों का समाज बन चुका है।
प्रधानमंत्री भारतीय अर्थव्यवस्था के तीन ट्रिलियन डालर बनने का स्वप्न दिखाते हैं। रक्षा मंत्री पाकिस्तान अधिककृत कश्मीर को वापस लेने का इशारा करते हैं। गृह मंत्री पूरे देश में एनआरसी लागू कराने की बात कह रहे हैं। वित्त मंत्री बड़े आर्थिक सुधारों का भरोसा दिला रही हैं। अयोध्या में भव्य राम मंदिर की चर्चा है। खरबों रुपयों का बजट कुंभ आयोजन के लिए तय किया गया है। सरदार पटेल की मूर्ति पर तीन हजार करोड़ खर्च किए जाने से जश्न का माहौल बनते भी ‘यह मेरा इंडिया’ देख चुका है। लेकिन असल मुद्दों पर चर्चा तक नहीं। मेधा पाटकर बरसों से नर्मदा नदी के विस्थापितों के पुनर्वास की लड़ाई लड़ रही हैं तो झारखण्ड, छत्तीसगढ़ में आदिवासी अपने हकों के लिए युद्धरत हैं। हरिद्वार में गंगा मां की रक्षा के लिए एक संत की शहादत हो चुकी है, उसके गुरु लगातार अनशन पर बैठ जाते हैं, मीडिया, समाज सब मौन है। भविष्य का भारत कितनी ट्रिलियन वाला होगा इस पर न्यूज चैनलों के सजे-धजे ‘लोग-लुगाई’ (राममनोहर लोहिया के शब्दों में) चीख-चीख कर सरकार के पक्ष में ज्ञान बखारते नजर आते हैं। बेहूदी-बेतुकी बातों पर स्पेशल स्टोरी की जाती हैं। सदी के महानायक का दर्जा पाए बाॅलीवुड स्टार अमिताभ बच्चन बीमार हो अस्पताल में भर्ती होते हैं तो ‘इंडिया टीवी’ में ‘अमिताभ के पुनर्जन्म का सच’ नाम से उनके पिछले जन्म की कहानी दिखाई जाती है। बाॅलीवुड की ही एक अभिनेत्री प्रीति जिंटा को लेकर एक समाचार इसी चैनल में चलता है, ‘प्रीति जिंटा ने की नसबंदी’। सबसे तेज चैनल में खबर चलती है ‘आज तक पे होगा लाइव बलात्कार।’ एक चैनल रावण की लंका खोजने निकल पड़ता है। जनता अभिभूत है। चटखारे लेकर इन खबरों को वह आत्मसात करती है। वह भूल जाती है कि व्यापार खत्म हो रहा है। भूल जाती है कि उसके बेटे-बेटी को रोजगार नहीं मिल रहा है। भूल जाती है किसान आत्महत्या कर रहे हैं। आरबीआई की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह लग रहा है। देश का मुख्य न्यायाधीश लोकतंत्र खतरे में है कहने को विवश है। आर्थिक नीतियों पर अर्थशास्त्री प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। जनता लेकिन मुग्ध है कि अब राम राज्य आने लगा है। उसे मुग्ध रखने में लोकतंत्र का चैथा स्तंभ जी-जान से जुटा है। करता रहे कोई रविश कुमार बकवास, नहीं सुनने को तैयार है देश का निजाम और देश की जनता। उसे गर्व हो रहा है कि अब उसका देश विश्व के ताकतवर देशों में शुमार है। इतना ताकतवर कि सबसे बलशाली राष्ट्र का राष्ट्रपति तक भारत के पीएम से दबता है। वह मुग्ध है यह देखकर कि कैसे उसका पीएम बड़े-बड़े मुल्कों के नेताओं से गले मिलता है, उनके हाथ पर हाथ मारकर हंसता है। यह दृश्य लोकतंत्र का चैथा खंबा बार-बार उसके मन-मष्तिक में डालने का काम बखूबी कर रहा है। इस सबके बीच महत्वपूर्ण मुद्दे, महत्वपूर्ण प्रश्न गौण होते जा रहे हैं। नारी की पूजा करने वाले देश में भगवत वस्त्रधारी नेता बलात्कार करे, कहीं कोई दलित मारा जाए, माॅब लीचिंग होते रहे, अपराधी कह पुलिस किसी का भी एनकाऊंटर कर डाले, न्यायपालिका का प्रमुख लोकतंत्र की दुहाई देता रहे, कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला। मार्केटिंग स्किल्स यानी बेचने की कला का दौर है। जमीन पैरों तले खिसक रही हो, क्या फर्क पड़ता है, अब तो पैर टिकाने के लिए चांद है ही। यही मेरा इंडिया है। ठीक कहते थे डाॅ. राम मनोहर लोहिया। गजब के भविष्य वक्त को थे। उन्होंने भविष्य के भारत की बाबत सटीक टिप्पणी की थी कि
‘‘समूचा हिंदुस्तान कीचड़ का तालाब है जिसमें कहीं- कहीं कमल उग आए हैं। कुछ जगहों पर ऐय्याशी के आधुनिकतम तरीकों के सचिवालय, हवाई हड्डे, होटल, सिनेमाघर और महल बनाए गए हैं और उनका इस्तेमाल उसी तरह के बने-ठने लोग-लुगाई करते हैं। लेकिन कुल आबादी के एक हजारवें हिस्से से भी इन सबका कोई सरोकार नहीं है। बाकी तो करीब, उदास, दुखी, नंगे और भूखे हैं।’’
यही मेरा इंडिया है। विचार करें जरूर!

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