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Editorial

क्षमा मांगना कोई अपराध तो नहीं

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पार्टी अध्यक्ष बनने से ठीक पहले सितंबर 2017 में अमेरिका की यात्रा पर गए थे। वहां उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में दिए अपने भाषण में नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा पर आक्रामक प्रहार किए। भाजपा नेतृत्व राहुल की इस आक्रामक शैली पर खासा चौंका था। कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने संबोधन में भाजपा की विभाजनकारी राजनीति से लेकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के उग्र हिंदुत्व के एजेंडे, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर केंद्र सरकार की दोमुंही नीति आदि का जिक्र किया गया था। तब से लेकर आज तक राहुल गांधी लगातार अप्रवासी भारतीयों के बीच समय-समय पर पहुंच भाजपा को घेरने का काम करने में जुटे हैं। उनकी ये यात्रा देश में बड़ी चर्चा का कारण बनती आई है। भारतीय जनता पार्टी विशेषकर राहुल की समझ को बजरिए उनके भाषण, उपहास का मुद्दा बनाने का प्रयास करती है। इस बार राहुल बर्सिन, हैमवर्ग और लंदन के अप्रवासी भारतीयों के बीच पहुंचे। वहां उन्होंने बेहद आक्रामक अंदाज में मोदी सरकार को फ्रांस संग हुए राफेल रक्षा सौदे पर घेरा। सरकार पर सीधे-सीधे गंभीर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए उन्होंने जानना चाहा कि आखिर क्यों मोदी इस विमान सौदे की सही जानकारी देने से बच रहे हैं। राहुल गांधी की यह विदेश यात्रा कांग्रेस की योजना और अपेक्षा अनुसार ठीक-ठाक जा रही थी। यहां तक कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की मुस्लिम ब्रदरहुड से तुलना करना भी संघ विरोधी एक बड़े वर्ग को खासा सुहाया। प्रतिष्ठित लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में दिए अपने वक्तव्य में उन्होंने अरब देशों के कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन और संघ के बीच समानता की तरफ इशारा करते हुए कहा कि संघ का लक्ष्य भारतीय समाज की मूल प्रवृत्ति को बदलना है। उन्होंने कहा कि अपने इस लक्ष्य को पाने के लिए संघ अपनी विचारधारा को जबरन थोपने का प्रयास केंद्र सरकार की मदद से कर रहा है। उन्होंने राफेल सौदे पर भारी हेर-फेर की तरफ इशारा करते हुए मोदी सरकार पर भारी-कर्ज में डूबे हुए एक उद्योगपति को इस सौदे के जरिए लाभ पहुंचाने की बात कही। बेरोजगारी के मुद्दे पर बोलते हुए राहुल ने मोदी सरकार को पूरी तरह विफल करार दिया। बकौल कांग्रेस अध्यक्ष देश इस समय बेरोजगारी के सबसे बड़े संकट का सामना कर रहा है। चीन की तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि चीन में प्रतिदिन पचास हजार नौकरियां पैदा हो रही हैं, जबकि भारत में चार सौ पचास। उन्होंने आक्रामक तेवरों के साथ केंद्र सरकार की विदेश नीति पर भी जमकर प्रहार किया। डोकलाम विवाद और पाकिस्तान संग दिनों-दिन खराब होते रिश्तों पर उनके तेवरों से अप्रवासी भारतीयों का एक बड़ा वर्ग सहमत होते दिखा। लेकिन अपनी यात्रा के अंतिम चरण में राहुल गांधी ने ब्रिटेन के संसद सदस्यों और स्थानीय राजनेताओं से संवाद के दौरान अपनी इस सफल यात्रा को विवादित बना डाला। 1984 के हिंदू-सिख दंगों पर उन्होंने कांग्रेस के शामिल न होने की बात कह डाली। हालांकि उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे किसी भी प्रकार की हिंसा के सख्त खिलाफ हैं लेकिन ये भी जोड़ दिया कि वे नहीं मानते कि इन दंगों के पीछे कांग्रेस के लोग थे। जाहिर है राहुल के इस बयान पर देश में तीखी प्रतिक्रियाएं आईं। भाजपा को बैठे-बैठाए राहुल गांधी को उनकी समझ और परिपक्वता पर प्रश्न करने का मौका मिल गया। बहरहाल, राहुल गांधी की समझ और परिपक्वता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है यह समझ जाना कि क्योंकर हमारे राजनेता अपनी ऐतिहासिक गलतियों को स्वीकारने से परहेज करते हैं। 1977 में जब कांग्रेस आपातकाल के बाद हुए चुनावों में बुरी तरह पराजित हो केंद्र की सत्ता से बाहर हुई, उसी दौर में संत जरनैल सिंह भिंडरवाला पंजाब की सियासत में उभरा। कहा जाता है कि अकाली दल के खिलाफ भिंडरवाला को कांग्रेस ने आगे बढ़ाया था। पंजाब के बड़े कांग्रेसी नेता ज्ञानी जैल सिंह संग भिंडरवाला के करीबी संबंध बताए जाते थे। मुझे जहां तक याद पड़ता है ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने इस पर लिखा था कि 77 की हार के बाद भिंडरवाला को संजय गांधी ने पंजाब की राजनीति में संरक्षण देने का काम किया था। 1980 के आम चुनावों तक भिंडरवाला का कांग्रेस संग संबंध रहा। यहां तक कि उसने कांग्रेस के लिए इन चुनावों में प्रचार भी किया था। इंदिरा गांधी की सत्ता में पुनः वापसी के साथ ही पंजाब में अलगाववाद में तेजी आई। भिंडरवाला तेजी से भारत विरोधी सिख संगठनों का सिरमौर बन उभरा।
1981 में ‘पंजाब केसरी’ समाचार पत्र के मालिक लाला जगत नारायण की सिख आतंकियों ने निर्मम हत्या कर डाली। इस हत्या के पीछे भिंडरवाला ही था। उसकी गिरफ्तारी के बाद लगातार पंजाब में आतंकी घटनाएं हुई। 1982 के आस-पास पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी खुलकर भिंडरवाला के अलगाववादी खलिस्तान आंदोलन को समर्थन देने लगी। पंजाब के हालात दिनों-दिन बिगड़ते गए। मई 1984 में लाला जगत नारायण के पुत्र रमेश चंद्र की निर्मम हत्या आतंकियों ने कर डाली। रमेश चंद्र पंजाब केसरी समूह के मालिक एवं संपादक थे। इसी दौरान भिंडरवाला ने सिखों के सबसे पवित्र धर्म स्थल स्वर्ण मंदिर पर अपना कब्जा जमा लिया था। इंदिरा गांधी  के आदेश पर एक जून 1984 के दिन भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर में प्रवेश किया। आठ दिन तक चली कार्यवाही के दौरान भिंडरवाला समेत सभी आतंकियों को मार डाला गया। स्वर्ण मंदिर को इस कार्यवाही के दौरान भारी हानि पहुंची जिससे सिख समुदाय बेहद आहत हुआ। इंदिरा गांधी के भी दो सिख सुरक्षाकर्मियों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री की निशंस हत्या 31 अक्टूबर 1984 को उनके ही निवास स्थल पर कर डाली। इसके बाद पूरे देश, विशेषकर दिल्ली में सिख विरोधी दंगे हुए। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2800 लोग इसमें मारे गए जिसमें अकेले दिल्ली में 2100 की हत्या हुई। अपनी मां की हत्या पश्चात प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने इन दंगों पर टिप्पणी करते हुए तब कहा था ‘जब एक बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती कांपती ही कांपती है।’ कांग्रेस के कई बड़े नेताओं जिनमें सज्जन कुमार, एचकेएल भगत, जगदीश टाइटलर आदि का नाम शामिल हैं, इन दंगों का नेतृत्व करते पाए गए थे। एक देश भक्त कौम के साथ हुई दरिंदगी के दौरान केंद्र की सरकार मूकदर्शक बनी रही। दिल्ली पुलिस ने दंगाइयों को खुकर खून की होली खेलने दी। सबसे ज्यादा त्रासदी यह कि आज तक इन दंगाइयों, विशेषकर कांग्रेस के बड़े नेताओं को अपने इस जुर्म के लिए सजा नहीं दी जा सकी है। आयोग पर आयोग इन दंगों की जांच के लिए बने लेकिन नतीजा सिफर रहा है। कांग्रेस ने दशकों तक अपने इस अक्षम्य अपराध के लिए सिख समुदाय से क्षमा याचना नहीं की।
12 अगस्त 2005 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दंगों के बीस बरस बाद संसद में पहली बार कांग्रेस पार्टी की तरफ से सिख समाज और देश से माफी मांगी। उन्होंने कहा “I have no hesitation in apologising to the Sikh community. I apologise not only to the Sikh community, but to the whole Indian nation because what took place in 1984 is the negation of the concept of nationhood enshrined in our Constitution” मनमोहन सिंह का यह माफीनामा नानावटी जांच आयोग की उस रिपोर्ट के बाद आया जिसमें कांग्रेसी नेता जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को इन दंगों का दोषी ठहराया गया था। टाइटलर ने इस आयोग की रिपोर्ट आने के साथ ही मनमोहन मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। ऐसे में जायज प्रश्न उठता है कि राहुल गांधी क्योंकर अपनी पार्टी के कुछ नेताओं की इस जघन्य कृत्य में संलिप्तता से बचने का प्रयास कर रहे हैं। मेरी समझ से राहुल ने विदेशी भूमि पर यह बयान दे कांग्रेस पार्टी के अहित का काम किया है। बेहतर होता वे साहसपूर्वक कांग्रेस के इस अपराध को स्वीकारते और एक बार फिर क्षमायाचना करते। राहुल गांधी के बचाव में पूर्व गृहमंत्री चिदंबरम का बयान भी बेहद बचकाना है कि इन दंगों के दौरान राहुल मात्र तेरह-चौदह बरस के बालक थे। अतः उनको दंगों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। चिदंबरम साहब जान लें कि राहुल गांधी को कोई उन दंगों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहरा रहा, बल्कि कांग्रेस की उन दंगों में भूमिका पर प्रश्न पूछे जाते रहे, जाते रहेंगे। राहुल गांधी का उत्तर निश्चित ही अपेक्षानुसार नहीं था। काफी हद तक गैरजिम्मेदाराना। स्पष्ट नजर आ रहा है कि उन्होंने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अनुसरण करना ठीक समझा। मोदी ने 2002 में गोधरा कांड के बाद हुए हिंदू-मुस्लिम दंगों के दौरान अपनी सरकार की उन दंगों को न रोक पाने, यहां तक कि उदासीन हो तमाशा देखने वाली भूमिका पर आज तक गुजरात की जनता, विशेषकर मुस्लिम समाज से माफी मांगना उचित नहीं समझा है। जुलाई 2013 में भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित होने के बाद अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी ट्यूटर्स को दिए एक साक्षात्कार में तो उन्होंने संवेदनहीनता की इंतेहा कर डाली। जब उनसे पूछा गया कि क्या वे गुजरात दंगों के लिए खेद महसूस करते हैं तो उनका जवाब था-  If “someone else is driving a car and we’re sitting behind, even then if a puppy comes under the wheel, will it be painful or not? Of course it is. If I’m a chief minister or not, I’m a human being. If something bad happens anywhere, it is natural to be sad.” यानी उन्होंने सीधे-सीधे दंगों के लिए माफी न मांगते हुए यह कह डाला कि यदि एक कुत्ते का पिल्ला भी गाड़ी के नीचे आ जाता है तो मनुष्य होने के नाते दुख तो होता ही है। भले ही नरेंद्र मोदी भारी जनादेश पा देश के प्रधानमंत्री बन गए हैं, इतिहास में उनकी उपलब्धियों, उनकी लोकप्रियता, उनके नेतृत्व में भाजपा का देशभर में विस्तार, बतौर प्रधानमंत्री उनके कामकाज का आकलन तो दर्ज होगा ही, गुजरात दंगों के दौरान उनकी सरकार की भूमिका पर स्वयं उनके राजधर्म न निभा पाने का भी निष्पक्ष आकलन अवश्य होगा। लहू के दाग बहुत गहरे होते हैं, वे कभी नहीं धुलते। राहुल गांधी को चाहिए था कि वे विदेशी भूमि पर जब भारत की चर्चा कर रहे थे तब 1984 के दंगों में उनकी पार्टी और तत्कालीन केंद्र सरकार की नकारात्मक भूमिका को स्वीकारते और देश के अल्पसंख्यकों को यह संदेश दे पाते कि कांग्रेस अपनी गलतियों को स्वीकारने और भविष्य में उनकी पुनरावृत्ति न होने देने के लिए कृतसंकल्प है, अफसोस न तो सबसे बड़े विपक्षी दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष ऐसा कर पाने का साहस कर पाए, न ही देश के प्रधानमंत्री गुजरात दंगों पर क्षमायाचना। स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की एक कविता है ‘ऊंचाई’ जिसमें वे कहते हैं-‘धरती को बौनों की नहीं/ऊंचे कद के इंसानों की जरूरत है/इतने ऊतने ऊंचे कि आसमान छू लें/नए नक्षत्रों में प्रतिभा के बीज बो लें/किंतु इतने ऊंचे भी नहीं/कि पांव तले धूल ही न जमे। यह वर्तमान समय की राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना है कि ऊंचे कद के नेता कहीं नजर नहीं आते। ऐसे में लोकतंत्र का क्या होगा, लोकतांत्रिक मूल्यों का क्या होगा, इसे सुधा भारद्वाज और गौतम नौलखा जैसों कि महाराष्ट्र पुलिस द्वारा गिरफ्तारी से समझा जा सकता है।

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