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Editorial

फिर संविधान का आया ध्यान

मेरी बात

मैं भारत का संविधान हूं,
लालकिले से बोल रहा हूं
मेरा अंतर्मन घायल है,
दुःख की गांठें खोल रहा हूं…
मेरे वादे समता के हैं
दीन दुखी से ममता के हैं
कोई भूखा नहीं रहेगा
कोई आंसू नहीं बहेगा
मेरा मन क्रन्दन करता है
जब कोई भूखा मरता है
मैं जब से आजाद हुआ हूं
और अधिक बर्बाद हुआ हूं
मैं ऊपर से हरा-भरा हूं
संसद में सौ बार मरा हूं


-हरिओम पंवार

वर्ष 2024 भारतीय लोकतंत्र की यात्रा में मील का पत्थर बन उभर रहा है, ठीक वैसे ही जैसे वर्ष 1977 आपातकाल के काले काल बाद उभरा था। 2014 से 2024 भले ही भारतीय जनता पार्टी की दृष्टि में ‘अमृतकाल’ हो, भले ही इन बीते दस सालों में भाजपा का डंका बजरिए प्रधानमंत्री मोदी तेजी से गूंजा हो और भले ही जनता ने 2014 से 2024 तक के दस बरसों के दौरान तमाम विसंगतियों के बावजूद मोदी पर दोबारा भरोसा जता उन्हें शानदार जनादेश दिया हो, हर उस शख्स ने जिसकी चेतना को धर्म के नाम पर, मुफ्त राशन के नाम पर और नाना प्रकार की गारंटियों के नाम पर हराया न जा सका हो, इस दौरान संवैधानिक व्यवस्थाओं, मान्यताओं, परम्पराओं का क्षरण महसूसा। 2019 के आम चुनाव के नतीजे ऐसे हर शख्स के लिए स्तब्धकारी और निराशाजनक रहे जिसे उम्मीद थी कि बढ़ती महंगाई, घटते रोजगार, नोटबंदी और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों का कथन कि ‘लोकतंत्र खतरे में है’, आदि का असर चुनाव नतीजों पर देखने को मिलेगा। जनता जनार्दन ने इन सभी जमीनी और महत्वपूर्ण मुद्दों को सिरे से नकार प्रधानमंत्री मोदी को, गौर कीजिएगाा, भाजपा को नहीं, भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन एनडीए को नहीं, बल्कि मोदी की करिश्माई छवि और उनकी बातों पर अपना विश्वास जता एक बार फिर से, ज्यादा बहुमत के साथ सत्ता सौंप दी। फिर आया कोरोनाकाल। पूरा विश्व इस बीमारी की चपेट में आ गया। दुनियाभर में दुनिया थम-सी गई। इस महामारी ने हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था का सच सामने लाने का काम कर दिखाया था। ऑक्सीजन की कमी, अस्पतालों में बेड की कमी, डॉक्टरों का टोटा, गंगा में बहते शव, सब कुछ सभी के सामने है। फिर भी कोरोनाकाल के बाद हुए राज्य विधानसभाओं के चुनावों में भाजपा ही विजेता बन उभरी। इससे न केवल विपक्षी दल वरन् हर वह नागरिक हताश हो चला जिसे लोकतंत्र पर खतरा मंडराता नजर आने लगा था। दोबारा सत्ता में आसीन होने के बाद केंद्रीय जांच एजेंसियों का जिस प्रकार और जिस अंदाज में दुरुपयोग शुरू हुआ उसने देश में अघोषित आपातकाल का माहौल बनाने का काम किया। दिल्ली दंगों, किसानों का आंदोलन, एनआरसी और सीएए के खिलाफ प्रदर्शन, सभी हालिया इतिहास हैं। 2024 के आम चुनाव ऐसे माहौल में हुए जब विपक्षी दल पूरी तरह कमजोर और थके-हारे नजर आ रहे थे। मुझे यह स्वीकारने में कतई गुरेज नहीं कि मैं यह मान बैठा था कि मोदीजी का जुमला ‘अबकी बार चार सौ पार’ सही साबित होगा और भाजपा अपने दम पर कम से कम 370 और एनडीए 400 से 405 सीटें जीत लेगा। ऐसा लेकिन हुआ नहीं। जनता ने मोदी जी को नकारा नहीं लेकिन उनकी एरोगेंस को आईना जरूर दिखा डाला। अयोध्या तक भाजपा हार गई। इसे इत्तेफाक माना जा सकता है या फिर दैवीय हस्तक्षेप कि जिस उत्तर प्रदेश में भाजपा का नारा था ‘जो राम को लाए हैं, हम उनको लाएंगे, वहीं भगवान राम का आशीर्वाद भाजपा को मिला नहीं और उनकी जन्मभूमि अयोध्या और उनकी तपोभूमि बांदा-चित्रकूट भी भाजपा हार गई।2024 का जनादेश लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाए रखने, जिलाए रखने की नीयत से दिया गया जनादेश है। इसकी बानगी 18वीं लोकसभा के प्रथम सत्र में देखने को तब मिली जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी बोलने के लिए खड़े हुए। उनके बोलने से पहले ही सत्तापक्ष के सदस्यों ने पहले ‘भारत माता की जय’, ‘जय श्री राम’ के नारे लगाने शुरू किए और फिर ‘जय संविधान’ का उद्घोष सत्तापक्ष की तरफ से सुनने को मिला। राहुल ने इसका जवाब मुस्कुराते हुए ‘जय संविधान’ कह दिया और संविधान की प्रति सदन में दिखाई। यह अद्भुत और अच्छा संकेत लोकतंत्र के लिए माना जा सकता है कि सत्तापक्ष अब संविधान को याद करने लगा है। इससे पहले 30 जून 2024 को मोदी ने भी अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में ‘संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में अटूट विश्वास’ जताने के लिए आभार व्यक्त किया था। इससे भी पहले मनमाफिक नतीजे न हासिल हो पाने के बाद जब 7 जून को एनडीए संसदीय दल की बैठक आयोजित की गई तब भी प्रधानमंत्री ने संविधान की प्रति को सिर नवाने का काम किया था। यह संविधान प्रेम अकस्मात लेकिन अकारण नहीं उपजा है। इन चुनावों में संविधान एक बड़ा मुद्दा बन उभरा था। ‘इंडिया गठबंधन’ आमजन, विशेषकर ओबीसी, एससी, एसटी और अल्पसंख्यकों को यह समझा पाने में सफल रहा था कि यदि भाजपा चार सौ पार का आंकड़ा पा लेती है तो वह पहला काम संविधान बदलने का करेगी। विपक्ष की यह रणनीति कारगर रही। इन तबकों को लगा कि यदि संविधान बदल दिया जाएगा तो उसका सबसे बड़ा नुकसान उन्हें होगा क्योंकि उन्हें मिलने वाले समता के अधिकार, आरक्षण और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की अवधारणा इत्यादि को समाप्त कर दिया जाएगा। जब भाजपा के कुछ नेताओं ने चुनाव प्रचार के दौरान यह कहना शुरू किया कि 400 सीटें पाते ही हम संविधान बदल देंगे तो शहरों और ग्रामीण भारत में रह रहे वंचितों और अल्पसंख्यकों में भारी असुरक्षा का भाव पैदा हो गया। नतीजा दलितों के एक बड़े वर्ग का कांग्रेस की तरफ वापस लौटना रहा। भाजपा को इन चुनाव नतीजों ने चेताने का काम कर दिखाया है कि यदि उसे सत्ता में बने रहना है तो न केवल आमजन की बुनियादी जरूरतों से जुड़े मुद्दों पर काम करना होगा, बल्कि भारतीय संविधान के संग छेड़छाड़ की अपनी नीयत भी बदलनी होगी। इसलिए चुनाव नतीजों बाद सकते में आए प्रधानमंत्री मोदी अब संविधान को याद कर रहे हैं और उसके प्रति अपनी निष्ठा को प्रदर्शित करने का कोई अवसर नहीं छोड़ रहे हैं। इन नतीजों बाद संसद भीतर का माहौल भी ज्यादा लोकतांत्रिक होता स्पष्ट दिखने लगा है। नेता विपक्ष राहुल गांधी के भाषण के दौरान स्वयं प्रधानमंत्री? गृहमंत्री अमित शाह, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का हस्तक्षेप दर्शाता है कि अब सत्ता पक्ष संसद की गरिमा को समझने के लिए मजबूर हो चला है। हालांकि राहुल गांधी के सदन में बतौर नेता विपक्ष पहले भाषण के गलत अर्थ निकालने और उनके कथन को तोड़-मरोड़ कर सामने रखने का ‘खेला’ अभी भी जारी है। उदाहरण के लिए जब राहुल ने भगवान शिव का नाम लेकर कहा कि हिंदुत्व का दर्शन ‘डरो मत, डराओ मत’’ है और इस दृष्टि से भाजपाई हिंदू नहीं कहलाए जा सकते तो सत्तापक्ष ने उनके इस कथन को ही हिंदू विरोधी मानसिकता करार देने में देर नहीं लगाई। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर अपना मत रखते समय प्रधानमंत्री का पूरा फोकस भी उन बुनियादी मुद्दांे पर केंद्रित नहीं रहा जिनके चलते उन्हें उनकी अपेक्षानुसार जनादेश नहीं मिला, बल्कि वे विपक्ष, विशेषकर राहुल गांधी पर ही निशाना साधते रहे और अपनी सरकार की आलोचना को उन्होंने ‘देश विरोधी षड्यंत्र’ करार दे डाला। उनका यह कहना कि ‘मोदी अभी भी मजबूत है, उसकी आवाज अभी भी मजबूत है और उसका निश्चय भी अभी मजबूत है। मैं सभी भारतीयों को यकीं दिलाना चाहता हूं मोदी डरने वाला नहीं है और न ही उसकी सरकार डरने वाली है’ इस आशंका को बलवती करती है कि भले ही सत्तापक्ष अब संविधान को याद करने लगा हो, उनके तेवर वही पुराने हैं जो संवैधानिक व्यवहार और व्यवस्था के खिलाफ जाते हैं। सच तो यह कि 18वीं लोकसभा के पहले सत्र में भाजपा पूर्व की अपेक्षा कहीं अधिक आक्रामक नजर आ रही है। सदन के अध्यक्ष ओम बिड़ला के तेवर भी बता रहे हैं कि वह कितने निष्पक्ष रहने वाले हैं। बतौर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के भाषण के कुछ अंशों को उन्होंने सदन के रिकॉर्ड से हटाकर यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना को वह स्वीकारने वाले नहीं हैं। फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत सरीखे सांसद भी अब संसद की ‘शोभा’ बन रहे हैं। कंगना का देश की बाबत ज्ञान और उनके सामाजिक सरोकारों पर मैं टिप्पणी करना नहीं चाहता लेकिन उन सरीखों को लोकसभा का प्रत्याशी बनाना भाजपा नेतृत्व की समझ पर सवाल खड़ा करता है और उनका जीत हासिल करना जनता की समझ का सच सामने लाता है। पर चलिए कम से कम संविधान को याद तो किया जाने लगा है, जो हालात इन चुनावों से पहले थे, उनके दृष्टिगत् यह बदलाव कुछ तो राहत देता है।

जय संविधान!

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