Editorial

कट्टरपंथी सोच के खतरे

अभिनेत्री जायरा वसीम ने अपने धर्म का हवाला देते हुए फिल्मी दुनिया को अलविदा कह दिया है। अट्ठारह बरस की जायरा जम्मू-कश्मीर के शहर श्रीनगर से हैं। वही श्रीनगर जो दशकों से जल रहा है। वही श्रीनगर जहां आतंक अपने चरम पर वर्तमान में है और जहां से जुड़ी हर छोटी- बड़ी बात पर सियासत सरहद के दोनों तरफ जमकर होती है। ऐसे में जाहिर है, स्वाभाविक है कि एक अदाकारा का अपने प्रोफेशन को अलविदा कहना सुर्खियों में आ चुका है। प्रसिद्ध सिने अभिनेता और निर्देशक आमिर खान की दो फिल्मों में अपने शानदार अभिनय के जरिए शोहरत बटोरने वाली जायरा ने जब सोशल मीडिया के जरिए अपने इस निर्णय को इस्लाम से जोड़ा तो मामला ज्यादा दिलचस्प पर दुखद भी होता नजर आ रहा है। उन्होंने लिखा “…This field indeed brought a lot of love, support, and applause my way, but what it also did was to lead me to a path of ignorance, as I silently and unconsciously transitioned out of ‘Imaan’ (a Muslim’s steadfast path in Allah’s devotion) my relationship with my religion was threatened”  यानी फिल्मों में काम करने के चलते वे ‘ईमान’ की राह से भटक गई हैं और उनका अपने धर्म संग रिश्ता खराब हो गया है। यह बयान यदि सही में बगैर किसी सामाजिक दबाव के खुद जायरा ने जारी किया है तो मैं उनके फैसले का इस हद तक सम्मान करता हूं कि काम करना या न करना व्यक्तिगत मसला है। हर एक को यह स्वतंत्रता है कि वह अपनी सोच अनुसार अपने जीवन पथ को तैयार करे। लेकिन उनका फिल्मों में काम करने को ईमान से और अपने धर्म इस्लाम से जोड़ना और यह कहना कि फिल्म इंडस्ट्री में काम करके वे ईमान और इस्लाम से दूर जा रही थीं, बेहद बचकाना, बेहूदा, काफी हद तक कट्टरपंथी सोच से प्रभावित है। कोई भी पेशा भला किसी के ईमान के खिलाफ या धर्म के खिलाफ भला कैसे हो सकता है? यही वह सोच है जो अन्य धर्मों के कट्टरपंथियों को इस्लाम पर हमला करने का मौका देती है। ऐसी एक नहीं असंख्य अदाकारा हैं जिन्होंने फिल्मी दुनिया को अलविदा कहा है। लेकिन किसी ने भी इसे अपने धर्म से या ईमान से नहीं जोड़ा। स्पष्ट है कि जायरा वसीम पर बेहद सामाजिक दबाव है। कट्टरपंथी मुस्लिम उन पर लगातार कीचड़ उछाल रहे थे। कितना दुखद है कि पढ़े-लिखे मुस्लिम भी फिल्मों में काम करने को ईमान विरुद्ध मान रहे हैं।

पिछले दिनों एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ था जिसमें एक नामाकूल मुस्लिम उलेमा जायरा वसीम और कश्मीर की ही एक अन्य बालिका तजामुल पर लानत-मलानत बरसाते नजर आ रहे हैं। तजामुल किक बॉक्सिंग चैंपियनशिप जीतने के बाद से ऐसे कट्टरपंथियों के निशाने पर आ चुकी हैं। मैं दोहराता हूं कि ऐसी विकøत सोच वाले मौलानाओं के चलते ही इस्लाम को आतंक का पर्याय माने जाने लगा है और हिंदू कट्टरपंथी इसका फायदा उठाने से चूक नहीं रहे हैं। गुजरे जमाने की एक अदाकारा पायल रोहतगी का वीडियो जायरा वसीम प्रसंग पर खासा देखा जा रहा है। यह मोहतरमा इस्लाम को पुरातनपंथी करार देते हुए अपने धर्म यानी हिंदुत्व की रोटी सेकती इसमें नजर आ रही हैं। बता रही हैं कि सती प्रथा कभी हिंदू धर्म में थी ही नहीं, दावा कर रही हैं कि हिंदुओं में नारी को देवी का दर्जा प्राप्त है। बहुत कुछ अनर्गल बातें करती नजर आ रही हैं। उन्हें और उन जैसे हिंदुवादियों को यह कहने का मौका जायरा वसीम ने अनजाने में ही दे डाला है। इस्लाम में यदि नारी को दोयम दर्जा प्राप्त है, मैं यदि कह रहा हूं क्योंकि मैंने कुरान शरीफ का अध्ययन नहीं किया है, तब उसमें सुधार लाने की बड़ी जरूरत है।

हिंदू धर्म हमेशा से ही सुधारवादी रहा है। पायल रोहतगी टाइप्स को भले ही पता न हो, सती जैसी कुप्रथा हमारे धर्म में थी। राजा राममोहन राय के सुधारों के चलते हमने इस प्रथा का त्याग किया। ऐसे सैकड़ों अन्य उदाहरण हैं जहां कुरीतियों और प्रथाओं को हिंदू धर्म ने त्यागा है। इसीलिए इसे सनातन धर्म कह पुकारा जाता है। जायरा वसीम बेहतर होता अपने निर्णय को धर्म से न जोड़तीं। ऐसा करके उन्होंने उन सभी का अपमान किया है जो इस्लाम धर्म से संबंध रखती हैं और फिल्मी दुनिया में काम कर रही हैं। जायरा वसीम की बातों से जो इत्तेफाक रखते हैं उनसे मैं पूछना चाहता हूं कि क्या वे सायरा बानो, वहिदा रहमान और मुमताज जैसी ख्याति प्राप्त अदाकाराओं को अपने ईमान से समझौता करने वाली और अल्लाह से दूर चली जाने वाली मानते हैं? कैसे-कैसे बेफिजूल के तर्क गढ़े जा रहे हैं। मेरे साथ काम कर चुके एक प्रतिभावान पत्रकार की पोस्ट पढ़ मुझे बेहद क्षोभ हुआ। इनका मानना है कि फिल्मी दुनिया एक आदर्श सोसायटी नहीं है क्योंकि वहां आर्थिक, शारीरिक और मानसिक शोषण होता है। भले इंसान एक जगह ऐसी बता दो इस संसार में जहां यह सब नहीं होता? जनाब मीडिया से हैं तो जरा ‘ईमान’ से बताएं कि मीडिया में क्या यह सब नहीं होता? एक नहीं दर्जनों उदाहरण हैं जहां पत्रकारिता जैसे मिशन सरीखे पेशे में इन सबसे स्त्रियों को गुजरना पड़ा है। मैं सही में बहुत हैरान हूं कि यदि इस नौजवान जैसे जहीन, पढ़े-लिखे मुसलमान ऐसी सोच रखते हैं तो निश्चित ही जिसे यह महाशय ‘इस्लामो फोबिया’ का नाम दे रहे हैं, इस फोबिया का प्रसार ऐसी संकुचित सोच के चलते ही हो रहा है। यदि स्त्री को मात्र इसलिए फिल्मों में काम नहीं करना चाहिए, क्योंकि वहां शरीर का प्रदर्शन करना होता है तो मुस्लिम पुरुषों पर भी पाबंदी लगाओ भाई। उन्हें कैसे इस्लाम अंग प्रदर्शन की इजाजत दे सकता है? विज्ञान के युग में स्त्री-पुरुष में भेदभाव करने की इस सोच पर मुझे तरस आता है। ऐसे दौर में जब धर्म के आधार पर समाज और देश को बांटने का काम जोरों पर चल रहा है। पहली बार देश में सत्ता काम के आधार पर नहीं, बल्कि धर्म के आधार पर, उग्र राष्ट्रवाद के आधार पर किसी दल को दोबारा हासिल हुई हो, ऐसे विभाजनकारी समय में जायरा वसीम का अपने धर्म और ईमान को किसी कार्य क्षेत्र विशेष से जोड़ना बेहद त्रासद है। कम से कम पढ़े-लिखे नौजवान मुसलमानों को तो इस षड्यंत्र को समझना चाहिए कि कश्मीर घाटी में सक्रिय आतंकी ताकतें धर्म के नाम पर पड़ोसी मुल्क के नापाक इरादों को हवा देने में जुटी हैं। ऐसी ताकतों का कोई धर्म, कोई मजहब नहीं होता। वे दहशतगर्द हैं, उनका यह पेशा है। गलतफहमी में न रहिए कि कश्मीर का मुसलमान अपनी आजादी के लिए कुर्बानी दे रहा है। बहुत संभव है कि आम कश्मीरी खुद के लिए एक स्वतंत्र देश की चाह रखता है। संभव इसलिए कि आजादी के तुरंत बाद ही वहां के शासक राजा हरिसिंह ऐसी इच्छा जता चुके थे। लेकिन तब से अब तक देश की नदियों में खासा पानी बह चुका। हालात पूरी तरह बदल गए हैं। अब कश्मीर का मसला वहां के वाशिंदों की चाह का नहीं, दो देशों के परस्पर वैमनस्य से कहीं आगे बढ़कर एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र का हिस्सा बन चुका है जिसमें हथियारों के सौदागर देशों से लेकर धर्म के नाम पर अपना धंधा चकमाने वाली आतंकी ताकतें शामिल हैं। ऐसे खौफनाक समय में यदि आप जायरा वसीम के फैसले को धर्म के नाम पर जायज ठहराते हैं तो इसका खामियाजा पूरी कौम को भुगतना पड़ेगा। जो भी ताकतें समाज के विभाजन में जुटी हैं, चाहे वे किसी भी धर्म की हों, उन्हें आप खाद- पानी उपलब्ध कराने का काम कर रहे हैं। आपकी संकुचित सोच आधी दुनिया कहलाई जाने वाली महिलाओं को तो हेय दृष्टि से देखने का अपराध कर रही है, स्वयं अपने लिए आप ऐसा गड्ढ़ा खोद रहे हैं जिसमें आज नहीं तो कल आप ही गिराए जाएंगे। हालांकि हमारी गंगा-जमुनी संस्कøति का खासा क्षरण हो चुका है, किंतु अभी भी इसे बचाया जा सकता है, कम से कम बचाए जाने के प्रयास तो किए ही जा सकते हैं। सवाल लेकिन यह है कि यदि पढ़ा-लिखा अल्पसंख्यक तबका भी कट्टरपंथ की राह पर चलने लगेगा तो कौन संस्कøति के इस क्षरण को रोक पाएगा? रही बात पायल रोहतगी सरीखों की तो उनकी बाबत मैं आश्वस्त हूं कि उन सरीखों की हिंदुत्व की समझ इतनी छिछली और कम है कि उन्हें कुछ समझा पाना लगभग असंभव है। इन दिनों ऐसों की बन आई है, बरसाती मेढ़कों की भांति ये समय इनके टर्र-टर्राने का है। न तो हिंदू धर्म और न ही हमारा मुल्क इनकी सोच अनुसार है, न ही होगा।

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