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Editorial

जो जीता वही सिकंदर

नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी एक बार फिर प्रचंड बहुमत के साथ भाजपा को केंद्र की सत्ता में काबिज करा पाने में ना केवल सफल हुए हैं, बल्कि एक बेहतरीन चुनावी रणनीतिकार के तौर पर उभरे हैं। हालांकि उनके मार्केटिंग स्किल्स 2014 में ही प्रमाणित हो चुके थे लेकिन तब यूपीए सरकार से जनमानस की गहरी नाराजगी और विकल्प के तौर पर भाजपा छोड़ किसी अन्य का उपलब्ध ना होना भी एक बड़ा कारण था। इस बार लेकिन भाजपा की इस जीत का पूरा श्रेय मोदी-शाह की चमत्कारी रणनीति को ही जाता है। भले ही लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी ने भाजपा को पालने से लेकर युवा अवस्था तक लाने में अपना पूरा जीवन लगा दिया, इतिहास में भाजपा का स्वर्णिम काल मोदी-शाह के नाम ही लिखा जाएगा। मैं इस प्रकार की प्रचंड जीत की कल्पना तक नहीं करने वालों की जमात का हिस्सा रहा हूं। मेरी दृष्टि बाधित थी इसे स्वीकारने से मुझे जरा भी गुरेज नहीं। प्रश्न मुझे जो उद्वेलित कर रहा है वह यह कि दो दशक से ज्यादा पत्रकारीय जीवन, कई चुनाव देख लेने के बावजूद, ऐसा कैसे कि मैं और मुझ सरीखे कई मित्र देश की जनता का मन समझ पाने में इतने असफल हो जाएं? क्या यह हम जैसों का घोर मोदी विरोध था या फिर वाकई मोदी सरकार ने देश का कायाकल्प पिछले पांच सालों में कर डाला था जिसे हम देख पाने में विफल रहे। तो चलिए पहले पिछले पांच बरस की मोदी सरकार पर मेरी समझ, मेरा आकलन। मोदी जनअपेक्षाओं के एक हिमालय समान पहाड़ पर चढ़ प्रधानमंत्री बने थे। जाहिर है जहां इतनी अपेक्षाएं होंगी, वहां उन अपेक्षाओं को पूरा कर पाने का दबाव भी होगा। मोदी मेरी समझ से ऐसे किसी दबाव में कभी रहे नहीं। उन्होंने कुछ अभिनव प्रयोग जरूर किए जिससे कुछ अर्से के लिए लगा कि केंद्र सरकार सही दिशा में आगे बढ़ रही है। नतीजे लेकिन इन प्रयासों के सिफर रहे हैं। उदाहरण के लिए नोटबंदी का तुगलकी फरमान हमने देखा-भोगा। जिस कालेधन पर मार करने की घोषित नीयत से मोदी सरकार ने यह कदम उठाया, महीनों आम जनता को परेशानियों के दलदल में धकेला, उसका नतीजा पूरी तरह नकारात्मक रहा है। कालाधन सफेद में बदल गया और फिर कुछ समय बाद उसने काले धन का रूप ले लिया। यानी यह प्रयोग फेल हो गया। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि स्वयं मोदी अपने इस तुगलकी फैसले की असफलता को भांप इससे कन्नी काटने लगे। उन्होंने इन चुनावों में नोटबंदी का जिक्र करने तक से परहेज किया। दूसरा प्रयोग जिसे हालांकि अभिनव नहीं कहा जा सकता, वह था यूपीए सरकार की महत्वाकांक्षी ‘वन कंट्री वन टैक्स’ यानी जीएसटी को लागू करवाना। इसे बेहद जल्दबाजी में लागू किया गया। बार-बार बदलाव किए गए जिससे पूरा उद्योग जगत चरमरा गया। इन चुनावों में जीएसटी भी गायब रहा। अन्य लोकलुभावन वादों पर भी भाजपा ने बोलना उचित नहीं समझा। यहां तक कि 2014 का घोषणा पत्र 2019 आते-आते पूरी तरह बदल दिया गया। नए घोषणा पत्र में बेरोजगारी निराकरण, बुलेट ट्रेनों का जाल, स्मार्ट सिटी आदि कहीं खो गए। यह केवल मोदी विरोधियों का दुष्प्रचार नहीं बल्कि हकीकत है कि पिछले सालों में बेरोजगारी बढ़ी, उद्योग धंधों की कमर टूटी और स्मार्ट सिटी, बुलेट ट्रेन आदि धरातल में नहीं उतरी सकीं। हां भ्रष्टाचार में जरूर ऊपरी तौर पर कमी आई। मोदी सरकार के मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के कोई आरोप नहीं लगे। हालांकि राफेल डील में पारदर्शिता का गहरा अभाव स्पष्ट झलकता है किंतु भ्रष्टाचार का आरोप अभी आरोप ही है, प्रमाणित नहीं। तो निश्चित ही यह कहा जा सकता है कि कम से कम प्रधानमंत्री ने एक वादा तो अवश्य निभाया। यदि प्रतिशत में बात करें तो 98 प्रतिशत मोदी जी के वादे पूरे नहीं हुए, 2 प्रतिशत जरूर कुछ सफल नजर आए। इसके बावजूद जनता ने यदि उन्हें प्रचंड जनादेश दे देश की कमान दोबारा सौंपी तो इस पर मेरी तरह बाधित दृष्टि वाले को हर किसी आत्ममंथन करना चाहिए। मेरी समझ कहती है कि राहुल गांधी बहुत दमखम के साथ मोदी के खिलाफ एक माहौल बना पाने में सफल हो रहे थे। ‘चौकीदार चोर है’ का नारा धीरे-धीरे जनमानस के जेहन में दस्तक देने लगा था। लेकिन तभी पुलवामा में बड़ी आतंकी घटना हो गई। मोदी सरकार ने सेना को खुली छूट देकर जहां एक तरफ पाकिस्तान को आतंकी गतिविधियों पर अंकुश लगाने को मजबूर किया, अजहर मसूद को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करवाने के लिए चीन संग कूटनीतिक सफलता को अंजाम दिया वहीं राष्ट्रवाद की आंधी को भी पहले हवा दी फिर सुनामी में बदल डाला। ‘चौकीदार चोर है’ से कहीं ज्यादा चौकीदार शेर है’ जनमानस को भा गया। विपक्षी गठबंधन और मुझ सरीखे मोदी-शाह विरोधी इसको पकड़ पाने में पूरी तरह विफल हो गए। यदि प्रधानमंत्री मोदी समेत भाजपा नेताओं के चुनावी भाषणों का विश्लेषण किया जाए तो एक बात स्पष्ट हो उभरती है। भाजपा के रणनीतिकारों ने इस बार ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी’ जैसे नारों से परहेज किया। सारा फोकस पुलवामा के बाद पाकिस्तान पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक के आस-पास घूमता रहा। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भारतीय सेना को मोदी की सेना कह डाला। स्वयं मोदी ने सर्जिकल स्ट्राइक की टाइमिंग को लेकर एक चैनल में कहा कि उनके सुझाव पर वायुसेना ने खराब मौसम में भी स्ट्राइक करने का फैसला लिया। मोदी जनता की नब्ज पहचानते हैं इसलिए वे कह गए कि बादलों के चलते भारतीय लड़ाकू विमानों का पाकिस्तानी रडारों की पकड़ में ना आना उनकी रणनीति थी। जो थोड़ा भी इस विषय के जानकार हैं उन्हें पता है कि रडार सूक्ष्म तरंगों के आधार पर किसी विमान के मूवमेंट पर सक्रिय होते हैं, बादलों का इससे कोई लेना-देना नहीं। मोदी लेकिन बखूबी समझते हैं कि जनता पर उनके बयान का जबरदस्त असर पड़ेगा तो विज्ञान को परे रखकर उन्होंने अपनी बात कह डाली। इससे पूर्व भी गोरखपुर में एक जनसभा को संबोधित करते समय पीएम ने नाथ संप्रदाय के संस्थापक गुरू गोरखनाथ का नमन करते हुए कह डाला था ‘समाज को सदियों से दिशा दे रहे मार्ग दर्शक, संभाव और समरसता के प्रतिबिम्ब महात्मा कबीर को उनकी ही निर्वाण भूमि से एक बार फिर मैं उन्हें कोटि-कोटि नमन करता हूं। ऐसा कहते हैं कि यहीं पर (मगहर, कबीर का समाधि स्थल) संत कबीर, गुरु नानकदेव और बाबा गोरखनाथ ने एक साथ बैठकर आध्यात्मिक चर्चा की थी।’ गोरखनाथ का जन्म ग्यारवीं शताब्दी, कबीर का चौंदहवीं शताब्दी तो नानकदेव का पंद्रहवीं शताब्दी में हुआ था। लेकिन पीएम के भाषण पर जबरदस्त तालियां बजी। पीएम ने इससे पहले भी सिकंदर महल को बिहार तक पहुंचा दिया था। बहरहाल इन बातों का अर्थ इसलिए कुछ नहीं क्योंकि ‘जो जीता वही सिकंदर।’

 

यहां यह बात रेखांकित करने योग्य है कि राष्ट्रवाद की आंधी जातीय और धार्मिक समीकरणों पर भारी पड़ी। ऐसे में ना केवल कांग्रेस को अपनी सोच पर दोबारा सोचना होगा, बल्कि मायावती सरीखी नेताओं को भी समझना होगा कि जातीय और धर्म आधारित उनकी राजनीति से अब जनता ऊब चुकी है। जनता ने विपक्षी दलों के महागठबंधन की नैसर्गिक कमजोरी समझते हुए, उनके मध्य वैचारिक स्तर पर भारी असमानता को समझते हुए, भाजपा को चुना तो इससे एक बात स्पष्ट हो उभरती है कि कहीं ना कहीं अब जनता जर्नादन जात-पात की राजनीति से, वंशवाद की राजनीति से उकता चुकी है। हालांकि उत्तर प्रदेश में बसपा-को सपा संग गठबंधन का कुछ लाभ अवश्य मिला लेकिन जैसी अपेक्षा थी, वैसा ना होना भविष्य की राजनीति के स्पष्ट संकेत दे रहा है। बसपा के टिकट बंटवारे को लेकर नाना प्रकार की अफवाहें फिजा में तैर रही थी। बताया जा रहा था कि टिकट के नाम पर भारी-भरकम रकम पार्टी फंड में प्रत्याशी जमा कर रहे हैं, बगैरह-बगैरह। इन मुद्दों पर विस्तार से अगली बार। अभी केवल इतना ही कि हर जागरूक भारतीय को अंधभक्ति से बाहर निकल मोदी सरकार के दूसरे शासनकाल में पूरी तरह जागरूक होना होगा ताकि मोदी के वादे धरातल में उतर सकें और प्रचंड बहुमत कहीं अहंकार में परिवर्तित हो लोकतंत्र के लिए खतरा ना बन जाए।

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