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Editorial

नीतीश पर भारी पड़ रहे हैं तेजस्वी

बिहार में राज्य विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार चरम पर पहुंच चुका है। राज्य में तीन चरणों में चुनाव होने जा रहे हैं। सभी राजनीतिक दलों ने इस दंगल को जीतने के लिए अपनी सारी ताकत झौंक दी है। इन चुनावों में जनता के पास कहने को तो बहुत सारे विकल्प हैं, लड़ाई असल में भाजपा, गैर भाजपा के बीच है। इससे पहले की दो चुनावों में लड़ाई नीतीश कुमार बनाम लालू, नीतीश बनाम मोदी की थी। इस बार नीतीश कुमार और भाजपा भले ही बराबर की सीटों पर चुनाव लड़ रहे हों, लड़ाई मोदी बनाम विपक्ष गठबंधन के बीच हो रही है। रोचक बात यह कि विपक्षी दलों के निशाने पर भी नीतीश कुमार हैं, भाजपा या मोदी नहीं। चलिए थोड़ा विस्तार से इस अजीबो-गरीब चुनावों को समझते हैं। जानने का प्रयास करते हैं कि क्यों कर भाजपा ने नेतृत्व चुनाव बाद अधिक सीटें आने पर भी नीतीश ही सीएम होंगे का ऐलान भी कर रहा है और नीतीश को कमजोर करने के सारे हथकंड़े भी आजमा रहा है। विपक्षी दल भी सारा जोर नीतीश कुमार की ‘सुशासन बाबू’ की छवि को ध्वस्त करने, उन्हें अवसर वादी करार देने में लगा रहा है। मोदी पर सीधा हमला करने से महागठबंधन के सभी दिग्गज बच रहे हैं।

बिहार की राजनीति में सबसे बड़ा फैक्टर जात का है। यहां चुनाव विकास के नाम पर भले ही लड़े जाते हों, वोट जात और धर्म के नाम पर पड़ते है। इन दोनों में भी जात ज्यादा महत्वपूर्ण है। जात भी चार वर्णो ब्राह्मण, श्रत्रिय, वैश्य, शूद्र में नहीं बटी है। इसमें इतने सब डिविजन हैं कि कई पीएचडी इन पर हो सकती है। सवर्णों में भी यही स्थिति है। लालू यादव ने अपने राजनीतिक भविष्य की जमीन ‘माई’ यानी मुस्लिम-यादव समीकरण बना शुरु की थी। कांग्रेस का मुख्य आधार सवर्ण जातियां थीं तब से आज तक गंगा में खासा पानी बह चुका है। सारे समीकरण बदल चुके है। कांग्रेस 1990 के बाद से बिहार में लगातार हाशिए पर है, उसका कोर वोट बैंक भाजपा ने झटक लिया है तो लालू के ‘माई’ समीकरण पर भी डाका पड़ चुका है। दलित वोट बैंक अति दलित, महादलित, मुस्लिम वोट अति पिछड़ा मुस्लिम, पसमंदा मुस्लिम आदि खेमे में बंट चुका है। लालू यादव की सत्ता से त्रस्त लोगों को नीतीश में ऐसा विकल्प नजर आया जो उन्हें जंगलराज से मुक्ति दिला सकता था। नीतीश न केवल दलितों को अपनी तरफ रिझा पाने में सफल रहे थे, बल्कि अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि के चलते मुसलमानों के भी नेता बनने में सफल रहे थे। यही कारण है कि लंबे अर्से से बिहार की सत्ता पाने को छटपटा रही भाजपा को मन मारकर ही सही नीतीश के सहारे की जरूरत थी। नीतीश कुमार को भाजपा ने कभी भी विश्वसनीय साथी नहीं समझा। भाजपा नेतृत्व, विशेषकर वर्तमान भाजपा नेतृत्व भलीभांति नीतीश कुमार के अवसरवादी चरित्र से वाकिफ है। वह जानता है कि नीतीश अपनी सुविधानुसार कभी भी पलटी मार सकते हैं। इसके बावजूद राज्य में सवर्ण मतदाताओं से इत्तर अपनी पकड़ बनाने के लिए उसे नीतीश की जरूरत थी। इन चुनावों में वह वक्त भाजपा को आ गया प्रतीत हो रहा है। इस बार नीतीश के खिलाफ ।दजप.पदबनउइमदबल फैक्टर है। बिहार में विकास एक बार फिर से विलुप्त प्रजाति बन चुका है तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार की तमाम नाकामियों के बावजूद मोदी मैजिक अभी बरकरार है। ऐसे में भाजपा ने लोकजनशक्ति पार्टी और वीआईपी पार्टी को आगे कर नीतीश के वोट बैंक में सेंध लगाने का पूरा इंतजाम कर डाला है। यदि भाजपा की रणनीति सफल रही तो राज्य में अगला सीएम उसका बनना संभव है। भाजपा की रणनीति गठबंधन में रहते हुए नीतीश कुमार को कमजोर करने की है। जिस प्रकार चुनावों से ठीक चार महीने पहले लोक जनशक्ति पार्टी ने एनडीए गठबंधन छोड़ ‘नीतीश तेरी खैर नहीं, मोदी तुझसे बैर नहीं’ के साथ चुनाव मैदान में उतरी है, उसमें भाजपा की रणनीति साफ झलक रही है। बिहार चुनावों से ठीक पहले अब तक छह ओपिनियन पोल आ चुके हैं। इन चुनावी सर्वेक्षणों से एक बात साफ झलक रही है, सरकार भले ही एनडीए की बनें, वोटरों का रूझान आरजेडी के नेतृत्व वाले गठबंधन की तरफ खिसका है। उदाहरण के लिए 3600 Crowd wishdom के सर्वेक्षण को देखें तो लोकसभा चुनावों के दौरान बीजेपी+जद(यू) गुगल सर्च में 61 प्रतिशत था तो आरजेडी गठबंधन 38 प्रतिशत 1 अक्टूबर 2020 में यहीं आंकड़ा एनडीए 46 प्रतिशत (-15 प्रतिशत) तो आरजेडी+45 प्रतिशत (+7 प्रतिशत) पर है। यदि एलजेपी को इसमें जोड़ा जाए तो यह जद(यू) की मुखालफत कर रहे दलों को 55 प्रतिशत तक पहुंचा रहा है। ‘CSDS+Lokniti+India Today’ का सर्वे सरकार तो एनडीए की बता रहा है लेकिन नीतीश कुमार के खिलाफ स्पष्ट जनाक्रोश भी दर्शा रहा है। केवल 29 प्रतिशत नीतीश के कार्य से संतुष्ट हैं 55 प्रतिशत सरकार में बदलाव की बात कर रहे हैं। टेक्नालॉजी एक्सपर्ट राजेश जैन अपनी सर्वे में कह रहे हैं कि 35 प्रतिशत, तेजस्वी तो 31 प्रतिशत नीतीश के पक्ष में है।

‘टीवी भारतवर्ष’ की सर्वे नीतीश को 39 प्रतिशत लोगों की पसंद, तेजस्वी को 21 प्रतिशत की पसंद बता रहा है लेकिन साथ ही 29 प्रतिशत के अभी Undecided होने की बात भी कह रहा है। जातिगत् समीकरणों पर ‘टीवी भारतवर्ष’ की सर्वे स्पष्ट रूप से आरजेडी की परफॉरमेंस बेहतर होने की बात कर रही है। सवर्ण जातियों की पहली पसंद अभी भी एनडीए है लेकिन आरजेडी ने पिछले चुनावों की बनिस्पत 8 प्रतिशत सवर्ण मतदाता अपनी तरफ खींच लिए हैं। अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) के भी 8 प्रतिशत वोट आरजेडी की तरफ जाते नजर आ रहे हैं तो अनुसूचित जातियों के 24 प्रतिशत वोटर जो एनडीए के साथ थे, इस बार विपक्षी महागठबंधन की तरफ जा रहे है। एनडीए का हर जाति का वोट बैंक खिसका है, केवल मुस्लिम मतदाताओं में उसकी पैठ पांच प्रतिशत बढ़ी है। इसका एक बड़ा कारण मुसलमानों में नीतीश के प्रति विश्वास के साथ ही राज्य में All India Majlis A Ittehadul (AIMIM) का बढ़ता प्रभाव भी है जिसका नुकसान आरजेडी को सीधे हो रहा है। नीतीश के घटते प्रभामंडल के पीछे एक बड़ा कारण उनके शासनकाल के पंद्रह बरस बीतने पर भी राज्य की बेहद बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं हैं। कोरोना काल में इनका भयावह सच सामने आ चुका है जिसकी कीमत नीतीश को चुकानी पड़ सकती है। अप्रवासी बिहारी मजदूर जो राज्य की जीडीपी में 35 प्रतिशत का योगदान मनीआर्डर अर्थव्यवस्था के चलते देते हैं, इस बार बेरोजगार हैं। उनका गुस्सा नीतीश पर हैं, जिन्होंने कोरोना के समय अन्य राज्यों की तरह उन्हें लुभाने की कोई व्यवस्था नहीं की थी। आरजेडी नेता तेजस्वी इस मुद्दे को जमकर अपनी रैलियों में उठा रहे हैं। जिस प्रकार उनकी चुनावी रैलियों में जन सैलाब उमड़ रहा है और प्रति वर्ष उनकी सरकार आने पर 10 लाख नौकरियों के वायदे को लपक रहा है, उससे एक बात साफतौर पर नजर आ रही है कि नीतीश भले ही तेजस्वी की राजनीतिक समझ को हिकारत से देखें, उन्हें नौसिखिया कहें, जनता लालू के बेटे को सराहने लगी है। नीतीश को एक दूसरे नौजवान ने भी सांसत में डाल रखा है। यह नौजवान चिराग पासवान हैं जिन्होंने अपनी चुनावी रैलियों में नीतीश का विरोध मुख्य आधार बनाया है। वे दलित वोटरों को याद दिला रहे हैं कि किस तरह उनके सबसे बड़े नेता दिवंगत राम विलास पासवान का किस प्रकार अपमान किया करते थे। चिराग जनता को यह भी याद दिलाने से नहीं चूक रहे कि नीतीश ने उनमें फूट डालने की नीयत से ही महादलित केटेगरी बनाई ताकि दलित वोट बैंक टूट जाए। नीतीश के ‘सात निश्चय’ कार्यक्रम का माखौल उड़ाते हुए चिराग कहते घूम रहे हैं कि एक तरफ पूरा देश तरक्की की राह में कहां से कहा पहुंच गया है, नीतीश कुमार आज भी घर-घर पानी का नल लगाने और पक्की सड़कें बनाने के निश्चय से आगे नहीं बढ़ सके हैं।

नीतीश कुमार की ‘सुशासन बाबू’ की छवि भी इन चुनावों में काम करती नजर नहीं आ रही। लालू यादव के कथित ‘जंगल राज’, ‘गुंड राज’ का खात्मा करने की बात करने वाले नीतीश कुछ और ही तस्वीर सामने रख रहे हैं। विपक्षी दलों ने ‘बिगड़ती कानून व्यवस्था’ को इन चुनावों में पहली बार एक बड़े मुद्दे के तौर उठाया है। National Crime Records Bureau (NCRB) के द्वारा बताते हैं कि 2009 से 2019 के बीच हत्या के मामलों में 5 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। हत्या के प्रयासों (Attempt to murder) के मामलों में तो भारी बढ़ोतरी, 148 प्रतिशत की बात सामने आई है। अपहरण के मामले भी नीतीश राज में बढ़े हैं। NCRB के डाटा से पता चलता है कि लालू यादव के 2004 के कार्यकाल से लेकर नीतीश के पंद्रह बरस के कार्यकाल में अपहरण के मामलों में 214 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी है। गत् वर्ष 2019 में ही 43 अपहरण फिरौती के लिए किए गए। हालांकि नीतीश राज में फिरौती के लिए किए गए अपहरण लालू राज से कम है लेकिन सुशासन का दावा नीतीश कुमार करते रहे हैं। आरजेडी उनकी पोल खोल रहे हैं। हालांकि लालू राज के मुकाबिल कानून व्यवस्था कहीं बेहतर है इस सच से कोई इंकार नहीं कर सकता।

कुल मिलाकर बिहार के चुनावों में सबसे मजबूत स्थिति में भाजपा नजर आ रही है। भाजपा की रणनीति मोदी के नाम पर वोट मांगने, सारी विफलताओं का ठीकरा नीतीश पर फोड़ने और पोस्ट इलेक्शन एनडीए गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी बन, एलजेपी और वीआईपी जैसे छोटी घटक दलों के सहारे स्वयं के लिए सीएम की कुर्सी हासिल करना है।

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