Editorial

दाग बड़े गहरे, बेनकाब चेहरे?

भाजपा के पहले नेता जो प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे, वे किसी भी प्रकार की कट्टरपंथी सोच से दूर एक बेहद संवेदनशील व्यक्ति थे। कवि थे इसलिए मानवीय सरोकारों से उनका गहरा जुड़ाव था। वे व्यापारिक बुद्धि या मार्केटिंग स्किल्स की समझ भी नहीं रखते थे। इसलिए कहा जा सकता है कि उनकी लोकप्रियता अप्राकृतिक नहीं थी, मीडिया और पब्लिक रिलेशन कंपनियों को करोड़ों रुपए देकर क्रिएट नहीं की गई थी। अटल बिहारी वाजपेयी हर दिल अजीज थे, अजातशत्रु थे। चूंकि राजनीतिक व्यक्ति थे इसलिए राजनीतिक चालों के माहिर भी थे। साम-दाम, दण्ड-भेद का इस्तेमाल भी उन्होंने अपनी पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए जमकर किया। भाजपा के भीतर ही उनके कई कटु आलोचक थे। इसके बावजूद उन्हें सही मायनों में अजातशत्रु कहा जा सकता है क्योंकि वे प्रतिशोध की राजनीति नहीं करते थे। बहरहाल उनकी एक कविता मुझे बहुत भाती है- ‘बेनकाब चेहरे हैं, दाग बड़े गहरे हैं/टूटता तिलिस्म, आज सच से भय खाता हूं/ गीत नहीं गाता हूं/ लगी कुछ ऐसी नजर, बिखरा शीशे का शहर/अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं/ गीत नहीं गाता हूं। पीठ में छूरी सा चांद, राहू गया रेखा फांद/मुक्ति के क्षणों में बार-बार बंध जाता हूं/गीत नहीं गाता हूं।’

पूर्व गृह एवं वित्त मंत्री पी. चिदंबरम की फरारी के समाचार देखते-सुनते मुझे अटल जी की इस कविता का स्मरण हो आया-‘बेनकाब चेहरे हैं, दाग बड़े गहरे हैं। साथ ही याद आ गया 1965 में बनी फिल्म ‘वक्त’ का एक गीत जिसे लिखा साहिर लुधियानवी ने था और गाया मोहम्मद रफी ने था। गीत के बोल हैं-(वक्त से दिन और रात वक्त से कल और आज) पी. चिदंबरम पर गंभीर, भ्रष्टाचार के, यहां तक कि हवाला कारोबार तक से जुड़े होने, बड़े पैमाने पर ‘मनी लाउंड्रिग’ करने के आरोप हैं। सिहरन नहीं होती आपको यह सोचकर कि जिस व्यक्ति का संवैधानिक दायित्व आर्थिक भ्रष्टाचार पर बतौर वित्त मंत्री अंकुश लगाना था, वह खुद इस दलदल में धंसा पाया गया है। कांग्रेस कह रही है कि भाजपा प्रतिशोध की राजनीति के चलते विपक्षी नेताओं को फंसा रही है। निश्चित ही ईडी और सीबीआई पी. चिदंबरम के मामले में जितनी तेजी से काम करती नजर आ रही है उसके पीछे कहीं न कहीं वर्तमान गृहमंत्री अमित शाह का प्रतिशोध हो सकता है।

चिदंबरम के गृह मंत्री रहते हुए सीबीआई ने गुजरात के तत्कालीन गृह राज्य मंत्री अमित शाह को सोहराबउद्दीन इंकाउंटर केस में संदिग्ध मान गिरफ्तार किया था। बाद में लगभग ग्यारह महीने उन्हें गुजरात राज्य के तड़ीपार कर दिया गया था। ऐसे में इस बात की पूरी गुंजाइश है कि अब देश के गृहमंत्री बन चुके अमित शाह इस मामले में अतिरिक्त दिलचस्पी ले रहे हों, लेकिन इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता कि चिदंबरम के दामन में भ्रष्ट आचरण के दाग गहरे हैं। इसलिए उनका चेहरा बेनकाब हो चुका है। जिस कथित भ्रष्टाचार के प्रकरण चलते पी. चिदंबरम आज फरार अपराधी का दर्जा पा चुके हैं, उस मसले को यदि बगैर भाजपा विरोध अथवा बगैर पूर्वाग्रह के समझने का प्रयास करें तो एक बात स्पष्ट नजर आती है कि पूर्व गृह एवं वित्त मंत्री की कहीं न कहीं इस पूरे मामले में भूमिका संदिग्ध है। मामले को सीधे शब्दों में समझने का चलिए प्रयास करते हैं। पी. चिदंबरम जब 2007 में देश के वित्त मंत्री थे तब उनके मंत्रालय में विदेशी पूंजी निवेश संबंधी एक अर्जी आईएनएक्स मीडिया प्रा.लि. नामक कंपनी ने डाली। वित्त मंत्रालय के अंतर्गत एक फाॅरेन इन्वेस्टमेंट प्रमोशन बोर्ड होता है जो विदेश से निवेश की जाने वाली पूंजी के बाबत फैसला लेता है। इस बोर्ड के सामने आईएनएक्स कंपनी ने माॅरीशस की तीन कंपनियों द्वारा उनकी कंपनी में 305 करोड़ रुपया लगाने की बात कही। जनवरी, 2008 में वित्त मंत्रालय के अधीन ही काम करने वाली खुफिया एजेंसी ‘फायनेनसियल इन्टेलिजेन्स यूनिट’ ने पाया कि बगैर इजाजत पाए ही आईएनएक्स कंपनी ने 305 करोड़ रुपया माॅरीशस से अपने बैंक खाते में मंगा लिया है। इस मामले को वर्ष 2010 यानी दो बरस बाद इन्फोर्समेंट डायरेक्ट्रेट के हवाले कर दिया गया। ईडी मुख्यतः बेनामी संपत्ति और हवाला के जरिए रुपयों का आदान-प्रदान जैसे मामलेां की जांच करती है। इसके बाद सभी जांच एजेंसियां शांत हो बैठ गईं। स्मरण रहे तब वित्त मंत्रालय के माई-बाप पी. चिदंबरम थे। सालों बाद जब केंद्र में भाजपा सरकार बनी तब सीबीआई जागी। जागी भी किसी अन्य मामले में जांच के दौरान लगे कुछ सबूतों के बाद। दरअसल चिदंबरम के बेटे कार्ति के दफ्तर से सीबीआई को कुछ दस्तावेज हाथ लगे जिनमें इस बात के प्रमाण थे कि वित्त मंत्रालय में आईएनएक्स मिडिया प्रा. लिमिटेड की विदेशी पूंजी निवेश संबंधी अर्जी पर जब स्वीकृति दी गई, उसी दौरान कार्ति चिदंबरम के खातों में आईएनएक्स ने कुछ रुपया ट्रांसफर किया था। यानी जब कार्ति को रिश्वत दी गई तभी आईएनएक्स मीडिया को विदेशी पूंजी लाने की मंजूरी वित्त मंत्रालय ने दी। आप थोड़ा भ्रमित हो सकते हैं क्योंकि जनवरी 2008 में, जैसा मैंने ऊपर लिखा वित्त मंत्रालय की खुफिया एजेंसी ने पाया था कि बगैर इजाजत ही इस कंपनी ने विदेश से रुपया मंगा लिया। हुआ दरअसल यह कि 30 मई 2007 को आईएनएक्स कंपनी को विदेशी पूंजी निवेश जिसे एफडीआई कहा जाता है, कि मंजूरी तो मिली लेकिन मात्र 4.62 करोड़ रुपयों की। कंपनी ने इसके बजाए 305 करोड़ रुपए एफडीआई के नाम पर मंगा डाला। जब वित्तीय खुफिया इकाई ने इसे पकड़ा तो असली खेल शुरू हुआ। कंपनी पर कार्यवाही के बजाए वित्त मंत्रालय ने आईएनएक्स मीडिया को दोबारा से बढ़ी हुई एफडीआई के लिए आवेदन करने को कह दिया। इस बीच इस कंपनी ने तत्कालीन वित्त मंत्री चिदंबरम के बेटे कार्ति को अपना सलाहकार बना डाला। यानी वित्त मंत्री को प्रभावित करने के लिए बेटे को सलाहकार के रूप में बिचैलिया नियुक्त किया। कायदे से बगैर इजाजत एफडीआई के 305 करोड़ रुपए लाने की जांच होनी चाहिए थी। सेटिंग-गेटिंग के आधार पर जांच के बजाए इस कंपनी को एफडीआई आने के बाद उसकी इजाजत दे दी गई। सीबीआई ने 2017 में यानी केंद्र से कांग्रेस की विदाई और मोदी की आमद के बाद इस प्रकरण में मई, 15 को एक एफआईआर कीर्ति चिदंबरम के खिलाफ दर्ज की। इसी महीने इन्फोर्समेंट डायरेक्टेªट ने भी हवाला के आरोप में कार्ति पर मुकदमा दर्ज किया। मार्च, 2018 में सीबीआई ने कीर्ति को गिरफ्तार कर लिया। इस बीच पूर्व वित्त मंत्री ने मई 30, 2018 को दिल्ली उच्च न्यायालय से इस मामले में अग्रिम जमानत हासिल कर ली। ईडी द्वारा दर्ज हवाला मामले में भी चिदंबरम को अग्रिम जमानत मिल गई। इसके बाद लेकिन हालात तेजी से चिदंबरम के खिलाफ होते चले गए। आईएनएक्स मीडिया की एक निदेशक चिदंबरम के खिलाफ सरकारी गवाह बन गई। जुलाई 11, 2019 को यह हुआ। इस निदेशक के सरकारी गवाह बनने के पीछे भी बड़ा झोल है। दरअसल आईएनएक्स मीडिया प्रा.लि. के दोनों डायरेक्टर इस समय एक संगीन अपराध के जुर्म में जेल में हैं। जुर्म है अपनी ही बेटी की निर्मम हत्या करना। आईएनएक्स मीडिया के मालिक पीटर और इन्द्राणी मुखर्जी खासा जाना-पहचाना नाम हैं। इनमें से इन्द्राणी मुखर्जी जुलाई, 2019 में सरकारी गवाह बन जाती हैं। इन्द्राणी राज खोलती हैं कि कैसे वित्त मंत्रालय को साधा गया बजरिए कार्ति चिदंबरम। दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुनील गौड़ ने 20 अगस्त के दिन पी. चिदंबरम को मिली अग्रिम जमानत को खारिज करते हुए विस्तार से अपने आदेश में रिश्वत के रुपयों को सोशल कंपनियों के जरिए जायज मनी में बदलने की जानकारी दी है। न्यायाधीश ने चिदंबरम पर खासी तल्ख टिप्पणी करते हुए अपने आदेश में लिखा “Fact of instant case prima facie reveals that petitioner is the kingpin i.e the key conspirator in this case” यानी सोशल कंपनियों के जरिए कालेधन को सफेद करने से लेकर आईएनएक्स मीडिया को एफडीआई की गलत तरीके से इजातत देना आदि के पीछे सारा खेल तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम का था। केंद्रीय जांच एजेंसियों का दावा है कि एफडीआई की परमिशन पाने के लिए चिदंबरम जूनियर को 3 करोड़ दिए गए, साथ ही एजेंसियां बाप-बेटे की इस शानदार- दिमागदार जोड़ी की बेनामी संपत्तियों को खरबों की बता रही हैं।

चिदंबरम एक समय में देश के सबसे ताकतवर मंत्रियों में एक थे। वे एक बड़े वकील भी हैं। उनके पास सत्ता के जरिए समाज में आदर्श स्थापित करने का सुनहरा अवसर भी था। लेकिन उन्होंने उल्टी राह पकड़ ली। नतीजा आज जेल की सलाखों के पीछे हैं। इसमें मुझे कोई शक नहीं कि वर्तमान गृहमंत्री का भी कुछ न कुछ दबाव केंद्रीय जांच एजंेसियों पर इस मामले में रहा होगा। सवाल लेकिन यह कि क्या अमित शाह के प्रतिशोध के चलते मात्र चिदंबरम को झूठे मामले में फंसाया जा रहा है? जितना मैंने समझा, ऐसा नहीं है। चिदंबरम की भूमिका खासी संदिग्ध पूरे प्रकरण में है। अमित शाह के चलते इतना अवश्य है चिदंबरम सेटिंग-गेटिंग का खेल न खेल सके। ‘वक्त’ का गीत इसलिए हरेक को हमेशा याद रखना चाहिए- ‘आदमी को चाहिए वक्त से डर कर रहे। कौन जाने किस बहाने वक्त का बदले मिजाज।’

You may also like