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Editorial

कुछ चर्चा एक आत्मकथा के बहाने

देश के ख्याति प्राप्त, प्रतिष्ठित उद्योगपति विजयपत सिंघानिया की आत्मकथा ‘एन इन्कम्पलीट लाइफ’ (An Incomplete Life) हमारी शासन प्रणाली और हमारे समाज में गहरे पसर चुके भ्रष्टाचार पर खुलकर प्रहार करती ऐसी आत्मकथा है जो न केवल हमारे लोकतंत्र पर बुनियादी सवाल खड़े करती है बल्कि हमारी सामाजिक संरचना को भी कठघरे में लाने का दुस्साहस करती है। विजयपत सिंघानिया प्रतिष्ठित ‘रेमंड’ (Raymond) कंपनी के मालिक हुआ करते थे। अब वे अपने ही पुत्र के हाथों छले जाने बाद किराए के एक घर में गुजर-बसर कर रहे हैं। अपनी इस आत्मकथा में उन्होंने सरकारी तंत्र के महाभ्रष्ट होने के सच को बड़ी साफगोई से स्वीकारा है। उनकी इस पुस्तक को पढ़ने के पश्चात् मेरा यह मत और मजबूत हुआ है कि हम भारतीयों के डीएनए में ही करप्शन समाया हुआ है। क्या राजनेता, क्या अधिकारी, क्या न्यायाधीश, क्या पत्रकार और क्या आम भारतीय, सभी की रगों में भ्रष्टाचार दौड़ रहा है। इस भ्रष्ट आचरण ने न केवल लोकतंत्र को, लोकतांत्रिक मूल्यों को वरन हमारी पूरी सामाजिक व्यवस्था को खोखला कर डाला है। इन दिनों भारत की सरकार ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ बड़ी धूमधाम से मना रही है। अगले बरस 15 अगस्त के दिन हमें आजाद हुए पूरे 75 बरस हो जाएंगे। ऐसे में एक नजर तो इस भ्रष्टाचार पर डालनी बनती है, ताकि समझ सकें, समझा सकें, कि कैसे गांधी के देश में इतना भारी विचलन आया और इस कदर पसर गया कि अब डीएनए का हिस्सा बन स्थायी रूप से हमारी, इस मुल्क की रगों में दौड़ने लगा है।

अमूमन भ्रष्टाचार को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ कर समझा जाता है। हम आर्थिक भ्रष्टाचार के साथ-साथ सामाजिक, नैतिक और मानसिक भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे समाज का हिस्सा हैं। क्यों, कैसे और कब हमारे डीएनए में यह भ्रष्टाचार समाया, समझने के लिए व्यापक इतिहास बोध की जरूरत है। अनादिकाल से ही यह भ्रष्ट आचरण हमारी जीवन शैली का अभिन्न अंग रहा है। हिंदू काल गणना पद्धति के अनुसार वर्तमान समय कलियुग है। ऐसी मान्यता है कि इससे पहले के तीन युग-सतयुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग थे जिन्हें कलियुग की बनिस्पत बेहतर माना जाता है। कलियुग सृष्टि के सृजन बाद का सबसे खराब युग बताया गया है। भ्रष्ट आचरण लेकिन पहले के तीन युगों में भी जमकर देखने को मिलता है। हमारे धर्म ग्रंथों, किंवदतियों, पुराणों, लोक-कथाओं आदि में जो कुछ इन तीन युगों की बाबत कहा गया है उसे पढ़कर तो कुछ ऐसा ही समझ में आता है कि यह भ्रष्टाचार सृष्टिकाल से ही था जो कलियुग आते-आते अपने चरम पर पहुंच चुका है। बहरहाल यह बेहद जटिल, बहुत व्याख्याओं, बहुत तर्क-वितर्क वाला विषय है। मैं अपना फोकस आजादी बाद के भारत में रख यह समझने और समझाने पर केंद्रित रखता हूं कि मात्र 75 बरस की यात्रा में हम किस तेजी से पथभ्रष्ट होते चले गए।

आजादी मिलने के साथ ही आर्थिक भ्रष्टाचार ने अपनी जड़ें जमानी शुरू कर डाली थी। आजादी की लड़ाई को उसके वाजिब अंजाम तक पहुंचाने का सबसे बड़ा श्रेय कांग्रेस को जाता है। वर्तमान समय में, जब देश भर में, मोदी मैजिक अपने चरम पर है, बहुतों को यह पढ़ना नागवार गुजरेगा कि आजादी की लड़ाई में न तो कहीं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ नजर आता है, न ही वामपंथी सोच इस पूरे संग्राम में कोई सार्थक भूमिका में खड़ी दिखाई देती है। यह ऐतिहासिक सत्य है। यही कारण है कि भाजपा अपने नायक कांग्रेस से आयात करने के लिए मजबूर होती है। फिर चाहे वह सरदार बल्लभ भाई पटेल हों, गांधी हों या कोई अन्य। इतिहास का चाहे जितना पुनर्पाठ करने का प्रयास भाजपा अथवा संघ कर ले, इस सत्य को वह बदल नहीं सकते कि आजादी हमें कांग्रेस के नेतृत्व में चले लंबे आंदोलन बाद मिली। लेकिन इस सच के साथ एक अन्य सच भी है जिसे कांग्रेसी भी लाख प्रयास करने के बावजूद नकार नहीं सकते। नाना प्रकार के जो विचलन इस मुल्क में देखने को मिलते हैं, उनकी जननी भी कांग्रेस ही है। उदाहरण के लिए आर्थिक भ्रष्टाचार है। आजाद भारत की पहली सरकार में ही इसने अपनी जड़ें  जमानी शुरू कर डाली थी। 1957 का हरिदास मुद्रा स्कैम, सेना के लिए खरीदी गई जीप गाड़ी का स्कैम (1948) से लेकर मनमोहन सिंह के शासनकाल तक हुए असंख्य भ्रष्टाचार के मामलों की तह में कांग्रेस का आर्थिक भ्रष्टाचार के प्रति ‘उदारवादी’ दृष्टिकोण स्पष्ट नजर आता है। नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री के शासनकाल तक यह भ्रष्टाचार सीमित होने के साथ-साथ सरकार के निचले स्तर में पसरा हुआ था। इंदिरा गांधी के हाथों में सत्ता की कमान आने बाद इसने दिन-दूनी, रात चौगुनी तरक्की करनी शुरू की। इसमें कोई शक नहीं कि इंदिरा एक मजबूत नेता और दमदार प्रशासक थीं। उन्होंने कई ऐसे बड़े सुधारवादी कदम उठाने का दुस्साहस किया जिनका सीधा असर आम आदमी की तरक्की से जुड़ा। राजा- महाराजाओं को मिलने वाली सुविधाओं ‘प्रिवीपर्स’ को समाप्त करना, निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना, कृषि क्षेत्र में हरित क्रांति की शुरुआत आदि ऐतिहासिक कदम उठाने का माद्दा केवल इंदिरा गांधी में ही था। 1971 में पाकिस्तान के दो टुकड़े कर पूर्वी पाकिस्तान के नागरिकों की मुक्ति का मार्ग भी इंदिरा गांधी ने ही तैयार किया। भारत की विदेश नीति को मजबूती देने के लिए उन्होंने कठोर कदम उठाए। इतिहास बोध वाला भला कौन भूल सकता है कि तीसरी दुनिया की एक महिला नेता से सर्वशक्तिमान होने का दंभ भरने वाले अमेरिका का राष्ट्रपति तक घबराता था। इंदिरा लेकिन आर्थिक भ्रष्टाचार से अछूती नहीं रह पाईं। ‘नागरवाला केस’, ‘मारुति कार घोटाला’, तत्कालीन रेल मंत्री ‘ललित नारायण मिश्र मर्डर केस’ इत्यादि उनकी सरकार में पनपे आर्थिक भ्रष्टाचार की बानगी भर हैं। स्मरण रहे यह वह समय था जब इस विचलन ने सत्ता के शीर्ष पर अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी थी। इसके बाद यह रूका नहीं, चाहे किसी की भी सरकार बनी, राज्यों में बनी या केंद्र में काबिज हुई, भ्रष्टाचार ने शिष्टाचार का रूप धारण करते देर नहीं लगाई। ‘संपूर्ण क्रांति’ के आह्नान से जन्मी जनता सरकार में इसका बोलबाला रहा तो ‘मिस्टर क्लीन’ की छवि वाले राजीव गांधी की सरकार में भी इसने अपनी पकड़-जकड़ को बनाए रखा। ‘राजा नहीं फकीर है, भारत की तकदीर है’ के दौर में भले ही विश्वनाथ प्रताप सिंह इससे अछूते रहे, उनकी सरकार में इससे मोहब्बत करने वालों की कमी नहीं थी। आर्थिक उदारीकरण के पितामह नरसिम्हा राव ने तो इसे पूरी तरह अपनी सरकार का आचरण बना डाला था। हर्षद मेहता का नोटों से भरे बैग लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक जा पहुंचना, तांत्रिक चन्द्रास्वामी की बादशाही, सांसदों की खुली खरीद- फरोख्त इत्यादि आर्थिक उदारीकरण की आंधी का भी दौर रहा। अटल बिहारी वाजपेयी का प्रधानमंत्रित्वकाल भी नाना प्रकार के आरोपों से लबरेज रहा। ‘ताबूत घोटाले’ से लेकर बंगारू लक्ष्मण का रंगें हाथों नोट लेते खुफिया कैमरों में कैद होना, सेना की खरीद में भारी धांधली के स्टिंग ऑपरेशन इत्यादि इस काल में सुर्खियों में रहे। यूपीए गठबंधन के दस बरस इसी आर्थिक भ्रष्टाचार की जकड़ में रहे। मोदी सत्ता में आए तो बहुत सारे वायदों को लेकर, इस आर्थिक भ्रष्ट आचरण से लेकिन वे भी न बच सके। आज भले ही उनके व्यक्तित्व का तिलिस्म बहुसंख्यक की दृष्टि बाधित करने में सफल होता नजर आ रहा है, जब यह तिलिस्म टूटेगा तब राफेल का सच सामने आ ही जाएगा। तब अडानी-अंबानी संग वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान की ‘दुरभि संधि’ भी सार्वजनिक हो जाएगाी।

विजयपत सिंघानिया ने अपनी आत्मकथा ‘एन इन्कम्पलीट लाइफ’ पर इस आर्थिक भ्रष्टाचार पर बड़ी साफगोई से प्रकाश डाला है। उन्होंने पूरी ईमानदारी के साथ स्वीकारा है कि अपने विशाल औद्योगिक साम्राज्य को चलाने के लिए उन्होंने भी इसी भ्रष्ट आचरण का सहारा लिया। उनकी आत्मकथा एक दूसरे भ्रष्टाचार पर भी खुलकर बोलती है। वह है नैतिक भ्रष्टाचार। अपने ही पुत्र गौतम सिंघानिया के हाथों छले गए विजयपत ने कुछ ऐसे निर्णय ले डाले जिनके चलते वे आज सड़क पर आ चुके हैं। शायद उन्होंने हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों, लोककथाओं इत्यादि का ठीक से अध्ययन किया होता तो आज वे पछता नहीं रहे होते। आर्थिक भ्रष्टाचार की जननी नैतिक भ्रष्ट आचरण है। यह भी कलियुग की देन नहीं, सृष्टि की उत्पत्ति के समय से ही इसका
बोलबाला रहा है। ‘महाभारत का ईमानदार विश्लेषण, ‘रामायण’ का गहन अध्ययन स्पष्ट करता है कि हमारी नैतिकता में भारी विचलन इस समय-काल में भी उतना ही था जितना कलियुग में हम देख रहे हैं। इस पर चर्चा फिर कभी।

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