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Editorial

 तो किरण को किसने मारा-2!

मेरी बात

सोशल मीडिया के दौर में सूचनाओं का तत्काल आदान-प्रदान कर नाना प्रकार के भ्रम पैदा करने और गलत धारणाओं को आमजन के मन-मस्तिष्क में गहरे चस्पा करने का चलन अपने चरम पर है। वाट्सअप यूनिवर्सिटी के जरिए किसी भी विषय में बगैर तथ्यों की सही पड़ताल किए फतवा जारी करने का दुष्प्रभाव झूठ के साम्राज्य के तेजी से विस्तार का मुख्य कारक बन चुका है। कुछ अर्सा पहले सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय पश्चात् कुछ ऐसा ही सोशल मीडिया में देखने को मिला था। फरवरी 2012 में एक नवयुवती किरण नेगी के बलात्कार और नृशंस हत्या ने दिल्ली को, समस्त देश को दहला कर रख दिया था। किरण के संग सामूहिक बलात्कार बाद मानसिक रूप से विक्षप्त बलात्कारियों ने उसके गुप्तांगों को जलाने, उसके सिर पर भारी हथियार से लगातार वार करने और उसके निजी अंगों में बीयर की टूटी हुई बोतल को घुसाने का दिल दहला देने वाले कृत्य को अंजाम दिया था। किरण का पोस्टमार्टम करने वाला चिकित्सक उसके शरीर की हालत देख बेहोश हो गया था। दिल्ली पुलिस पर इस हत्याकांड को सुलझाने का भारी जन दबाव था। पुलिस ने इस कांड को सुलझाने का दावा करते हुए तीन स्थानीय युवकों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। जिला एवं सत्र न्यायालय और उसके बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने पुलिस की चार्जशीट को सही मानते हुए इन तीनों को मौत की सजा सुनाई थी। मामला 2021 में उच्चतम न्यायालय पहुंचा जहां से ये तीनों कथित हत्यारे संदेह का लाभ पा गत् माह बरी कर दिए गए। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आते ही कोहराम मच गया। कोर्ट की, देश के सर्वोच्च न्यायालय की विश्वसनीयता पर, न्यायाधीशों के विवेक पर, उनके चरित्र पर नाना प्रकार के सवाल खड़े किए जाने लगे हैं। किसी ने भी न्यायालय के फैसले का अध्ययन करना, उन कारणों की पड़ताल करना जरूरी नहीं समझा जिनके चलते तीनों कथित अभियुक्तों को ‘संदेह का लाभ’ देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बरी करा है। इसी संपादकीय पृष्ठ पर 26 नवंबर के दिन मैंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अध्ययन कर संपादकीय लिखा ‘तो किरण को किसने मारा’। इस संपादकीय के जरिए मैंने उन कारणों और उन तथ्यों को सामने लाने का प्रयास किया जिनकी बिना पर उच्चतम न्यायालय ने तीनों कथित अपराधियों को रिहा किए जाने का फैसला सुनाया था। अपने विस्तृत आदेश में उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली पुलिस द्वारा इस कांड की सही तरीके से जांच न किए जाने, पर्याप्त सबूतों के न होने, डीएनए परीक्षण की सही विधि न अपनाए जाने आदि को अपने निर्णय का आधार बनाया। सुप्रीम कोर्ट ने सेशन कोर्ट में चले मुकदमें पर भी अपने आदेश में कठोर टिप्पणी करते हुए ट्रायल कोर्ट की भूमिका को एक उदासीन निर्णायक (Passive Umpire) समान करार दिया जिस चलते अभियुक्तों को उनके न्याय के अधिकार से वंचित रहना पड़ा और ट्रायल कोर्ट सच को सामने नहीं ला पाई। इस संपादकीय पर भी अधिकतर टिप्पणियां तात्कालिकता के दबाव का शिकार नजर आती हैं। फेसबुक में पोस्ट किए गए इस संपादकीय की पहुंच 36 हजार के करीब रही जिनमें से 12,188 ने बकौल फेसबुक इसे पढ़ा। 501 ने इसे शेयर भी किया। चार हजार के करीब ने इसे पसंद किया। बहुत से पाठकों तक मेरी बात सही रूप में पहुंची तो कइयों ने संभवत पूरा पढ़े बगैर ही टिप्पणी कर डाली। अधिकतर कमेंट्स न्यायपालिका के प्रति अविश्वास का भाव लिए हैं।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय क्योंकर मेरी दृष्टि में सही है, इसे एक ताजातरीन मामले के जरिए समझा जा सकता है। 8 दिसंबर के दिन अंग्रेजी दैनिक ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने अपने प्रथम पृष्ठ में एक समाचार ‘स्टोरी टेलर क्रेक्स् सेवन इयर ओल्ड यूपी केसः ‘मर्डरर्ड गर्ल’ इज मदर ऑफ टू, एकयूस्ड इन जेल’ (कथावाचक ने सुलझाया सात बरस पूरा मामलाः हत्या की गई लड़की है दो बच्चों की मां, हत्यारोपी जेल में) शीर्षक से प्रकाशित किया है। पहले इस समाचार को विस्तार से समझा जाए ताकि किरण नेगी मामले में क्योंकर कथित हत्यारों को सुप्रीम कोर्ट ने बरी किया, को समझा जा सके। 2015 में एक 14 बरस की नाबालिग लड़की यकायक लापता हो गई। लड़की के परिजनों ने उसे बहुत तलाशा लेकिन वह नहीं मिली। अलीगढ़ पुलिस ने इसे लेकर गुमशुदगी का मामला दर्ज किया था। कुछ दिनों पश्चात् एक नाबालिग लड़की का शव अलीगढ़ से नब्बे किलो मीटर दूर आगरा हाईवे में पुलिस को मिला। इस शव का चेहरा कुचला हुआ था। अलीगढ़ पुलिस ने इस शव को लापता हुई लड़की के मां-बाप को दिखाया जिन्होंने शव के कपड़ों को देख यह मान लिया कि शव उनकी लापता बेटी का ही है। अलीगढ़ पुलिस ने भी बगैर फॉरेंसिक सबूत और बगैर डीएनए रिपोर्ट इस शव को लापता लड़की का बताने में देर नहीं लगाई। अब गुमशुदगी का मामला हत्या में तब्दील हो गया। लड़की के माता-पिता ने इस हत्या का शक पड़ोस में रहने वाले एक 18 वर्षीय पर किया तो अलीगढ़ पुलिस ने तत्काल इस नवयवुक को हत्यारोपी घोषित कर जेल में डाल दिया। लड़का बीते सात सालों से जेल में कैद है। लड़के की मां इस दौरान अपने बेटे के बेगुनाह होने की गुहार लगाती रही लेकिन किसी ने भी उसकी नहीं सुनी। उल्टा अलीगढ़ पुलिस ने लड़के को दो अन्य मामलों में भी हत्या का आरोपी बना डाला। वर्तमान में लड़के पर कुल दस आपराधिक मामले दर्ज हैं। लड़के की मां ने अपने बेटे की बेगुनाही का जिक्र एक कथावाचक गुरु पंडित उदय कृष्ण शास्त्री से भी किया और लड़की की तस्वीर भी उन्हें सौंपी। बकौल पंडित उदय कृष्ण शास्त्री कुछ दिनों पूर्व जब वह हाथरस में कथावाचन कर रहे थे तब उन्हें एक महिला दिखी जिसकी शक्ल उस लड़की से मिलती थी जिसकी हत्या के आरोप में अलीगढ़ पुलिस ने लड़के को जेल में डाल दिया था। कथावाचक ने संदेह चलते लड़की की बाबत जानकारी जुटाई और जब उनका संदेह विश्वास में बदल गया तब उन्होंने लड़के की मां के साथ मिलकर पुलिस से संपर्क साधा। पुलिस जांच में अब यह प्रमाणित हो गया कि लड़की का मर्डर नहीं हुआ था और वह स्वयं घर से भागी थी जिसमें आरोपित किए गए लड़के का कोई हाथ नहीं है। लड़के को कोर्ट ने इस मामले में जमानत तो दे दी है लेकिन अन्य मामलों में भी आरोपित होने के कारण वह रिहा नहीं हो पाया है। पुलिस की घोर लापरवाही चलते यह सब कुछ हुआ। जिस शव को पुलिस ने बरामद किया था उसके डीएनए जांच का नतीजा 7 बरस बीत जाने के बाद भी अलीगढ़ के अस्पताल ने जारी नहीं किया। इससे भी अलीगढ़ पुलिस की लचर कार्यशैली स्पष्ट झलकती है। उसने बीते सात बरसों के दौरान संभवत इस डीएनए रिपोर्ट की बाबत कोई प्रयास किया ही नहीं। मामले को जल्दबाजी में सुलझा लेने का दावा किया गया और एक फिर एक निर्दोष को अपराधी घोषित कर जेल में डाल अपने कर्त्तव्य की इतिश्री अलीगढ़ पुलिस ने कर डाली। बहुत संभव है कि अन्य मामलों में भी उस लड़के को जबरन आरोपी बना दिया गया हो। इस प्रकरण के बरअक्स अब चलिए एक बार फिर किरण नेगी हत्याकांड में गत् दिनों आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को परखने का प्रयास करते हैं। पुलिस की चार्जशीट में कई झोल पाऐ। इनमें डीएनए परिक्षण सही तरीके से न कराए जाने, गवाहों के बयानों में अंतर होने, पुलिस द्वारा आरोपियों की गिरफ्तारी को लेकर दिए गए दावों की विश्वसनीयता साबित न होने, घटनास्थल से जब्त सामान की प्रामाणिक पुष्टि का न करा पाने आदि का विस्तार से जिक्र सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में किया है। विश्वभर की न्याय व्यवस्था में एक स्थापित मान्यता है कि भले ही सौ कसूरवार छूट जाएं, एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए। इसी मान्यता को आधार बनाते हुए असंख्य मामलों में आरोपित व्यक्ति केवल इसलिए अदालतों द्वारा बरी कर दिए जाते हैं क्योंकि पुलिस ने सही तरीके से अपनी जांच को नहीं किया होता है जिस चलते न्यायालय को पुलिस के कथन पर संदेह पैदा हो जाता है। किरण नेगी के मामले में भी ठीक ऐसा ही हुआ जिस चलते इन नृशंस हत्याकांड में आरोपितों को कोर्ट ने ‘बाइज्जत’ बरी न करते हुए ‘संदेह का लाभ’ देते हुए रिहा किए जाने का फैसला सुनाया है। बहुत संभव है कि यदि इस मामले की दोबारा जांच होती है और यदि जांच एजेंसी सही तरीके से जांच करती है तो असल अपराधी पकड़े जाएं। यह भी संभव है कि बरी किए जा चुके आरोपी ही दोषी निकलें। लेकिन मात्र संभावनाओं के आधार पर उन्हें सजा नहीं दी जा सकती। पुलिस जांच का संदेह से परे होना नितांत जरूरी है। अन्यथा जैसा अलीगढ़ से लापता हुई युवती के मामले में सामने आया है, यदि किरण कांड में आरोपी बनाए गए लड़के भविष्य में निर्दोष साबित होते तो सोचिए क्या होता? तब तक उन्हें फांसी दे दी गई होती और आज जो सुप्रीम कोर्ट की मंशा और निष्ठा पर प्रश्न खड़े कर रहे हैं, वे ही तब भी ऐसा ही हो-हल्ला काट रहे होते। जरूरत है इस पूरे मामले की किसी निष्पक्ष एजेंसी से दोबारा जांच कराए जाने की।
अमेरिकी विचारक, लेखक और दार्शनिक बैन्जामिक फ्रैंकलिन का कहना था “Justice will not be served until those who are unaffected are as outraged as those who are.” (न्याय तब तक नहीं मिलेगा जब तक कि वे जो अप्रभावित हैं, वे भी उतने ही क्रोधित न हों जितने कि अन्याय का शिकार हुए लोग।) वर्तमान समय में ऐसे अनेकों उदाहरण हमारे सामने हैं जहां समाज में अन्याय के खिलाफ उठी आवाज का भारी असर रहा और पीड़ितों को न्याय और अपराधियों को सजा मिल पाई। जरूरत है सच को, तथ्यों को सही तरह से समझने की ताकि धारणाओं के चक्रव्यूह में फंसने से बचा जा सके।

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