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Editorial

हर तरफ धुआं है, हर तरफ कुहासा

देश इस पंद्रह अगस्त को इकहत्तर बरस का हो गया। इन इकहत्तर बरस की यात्रा में बहुत कुछ ऐसा रहा जिस पर हर भारतीय गर्व कर सकता है तो निश्चित ही ऐसा भी कम नहीं जिसने पूरे विश्व के समक्ष हमें शर्मसार किया। इकहत्तर बरसों की इस यात्रा का निष्पक्ष आकलन वर्तमान दौर में बेहद जरूरी हो गया है। कारण एक ऐसा माहौल तैयार किया जा रहा है, ऐसा छद्म रचा जा रहा है जो मात्र चार बरसों की मोदी सरकार का यशोगान कर बाकी सड़सठ वर्षों की उपलब्धियों को खारिज करने का काम कर रहा है। मुझे इस पर कुछ लिखने की प्रेरणा एक फेसबुक पोस्ट से मिली है। मेरे बचपन के मित्र संजीव देव की इस पोस्ट को पढ़ मुझे एहसास हुआ मानो मोदी सरकार से पहले के सड़सठ बरस हमने बगैर कुछ पाए, कुछ हासिल किए ही गवां दिए। संजीव और मैं केंद्रीय विद्यालय रानीखेत में सहपाठी थे। संजीव के पिता भारतीय फौज में अफसर थे। रानीखेत में अपनी तैनाती के समय वे मेजर पद पर थे। बाद में वे कर्नल पद से सेवानिवृत हुए। संजीव बेहद शरारती किंतु मेधावी छात्र था। अपने दोनों की खासी निभती थी। उसके पिता के ट्रांसफर बाद हमारा संपर्क समाप्त हो गया। फिर आभासी दुनिया यानी फेसबुक की कृपा से हम पुनः एक-दूसरे के संपर्क में आ गए। बहरहाल संजीव की बात करने बैठा तो अहसास नहीं था कि सुखद स्मृतियों का सागर सुनामी का रूप ले लेगा। बात उसकी एक फेसबुक पोस्ट से शुरू हुई जिसमें उसने रूस, अमेरिका, मीडिल ईस्ट आदि मुल्कों के भारत संग रक्षा सौंदों का जिक्र करते हुए टिप्पणी की कि ‘जिन लोगों ने पीएम की विदेश यात्राओं को कड़ी निंदा की थी वह इन खबरों को ध्यान से पढ़ें। देश को एक के बाद एक तोहफा मिलना शुरू हो गया है। देश की कमान बहुत ही मजबूत और सख्त एवं ईमानदार हाथों में है।’ इस पोस्ट पर संजीव के कई मित्रों के कमेंट्स, मेरे कमेंट पर उनका प्रतिवाद कुछ ऐसा इशारा करता मुझे प्रतीत हुआ कि मानो जो कुछ अच्छा इस देश में हो रहा है वह सब वर्तमान प्रधानमंत्री की देन है। तब लगा कि मौका भी है और दस्तूर भी। आजादी के इकहत्तर बरस की यात्रा का आकलन तो किया जाए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। आजादी मिलने के समय हम गंभीर खाद्यान्न संकट झेल रहे थे। साठ के दशक तक हम भारी मात्रा में अनाज का आयात करते थे। साथ ही अमेरिका एवं अन्य उन्नत राष्ट्रों की मदद पर निर्भर रहते थे। हरित क्रांति ने इसे पूरी तरह बदल डाला। आज हम ना केवल अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए सक्षम हैं बल्कि दूध, फल, दालें आदि के विश्व में सबसे बड़े उत्पादक बन चुके हैं। चावल, आटा, गन्ना, टममाटर, चाय और कपास जैसी वस्तुओं के उत्पादन में हम दूसरे स्थान पर हैं। आजादी के वक्त जीवन समय का औसत मात्र बत्तीस बरस था जो आज सत्तर बरस हो गया है। पोलियो, ट्यूबरक्लोसिस जैसी महामारियों पर इस दौरान पूरी तरह काबू पा लिया गया। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की दूरदृष्टि के चलते ‘इसरो’, ‘आईआईटी’, ‘आईआईएम, ‘एम्स’ जैसी संस्थाओं की नींव पड़ी। बहुतों को ज्ञात नहीं कि नेहरू के इस विजन पर उनके ही मंत्रिमंडलीय सदस्यों को बड़ी आपत्ति थी। कारण देश की खस्ता वित्तीय स्थिति का होना था। ऐसी तमाम आपत्तियों को दरकिनार कर नेहरू ने इन संस्थाओं की नींव रखी। पहला इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट कलकत्ता में 1961 में बना तो पहला इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्लॉनोजी 1951 में खड़कपुर में स्थापित किया गया। आज विश्वभर में ये संस्थान अपनी शैक्षणिक गुणवत्ता के लिए जाने जाते हैं। प्रख्यात वैज्ञानिक विक्रम साराभाई की सलाह पर नेहरू ने 1962 में ‘इंडियन नेशनल कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च’ की स्थापना की जो 1969 में ‘इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गेनाईजेशन’ में परिवर्तित किया गया। नेहरू के इस निर्णय की आलोचना करने वालों को डॉ. विक्रम साराभाई ने 1969 में करारा जवाब देते हुए कहा था ‘There are some who questions the relevance of space activities in a developing nation. To us, there is no ambiguity of purpose. We do not have the fantasy of competing with the advance nations but we must be second to none in the application of dvanced technologies to the real problems of the world.’ हमारा पहले सैटेलाइट ‘आर्य भट्ट’ 1975 में लॉन्च हुआ। तब से लेकर आज तक हमने स्पेस रिसर्च में अभूतपूर्व तरक्की की है। 15 फरवरी 2017 को वर्तमान प्रधानमंत्री ने इसरो के रॉकेट पीएसएसवी-सी37 को लॉन्च किया जो अपने साथ 104 सैटेलाइट्स को लेकर उड़ा था। पूरे विश्व ने भारत की इस ताकत का लोहा माना तो इसके पीछे उसी प्रधानमंत्री की दूरदृष्टि काम कर रही थी जिन्हें आज अनर्गल आरोपों के घेरे में लिया जा रहा है। भारत विश्व का एकमात्र ऐसा देश है जिसने अपनी आजादी के पहले दिन से ही हरेक नागरिक को मतदान का आधार दे एक मजबूत लोकतंत्र की नींव रखी। अमेरिका तक में यह अधिकार उसकी आजादी के डेढ़ सौ बरस बाद अश्वेत नागरिकों को दिया गया था। महिला सशक्तिकरण में भी हम विश्व के कई उन्नत राष्ट्रों की बनिस्पत अधिक प्रगतिशील हैं। जहां इंग्लैंड जैसे देशों में महिलाओं को मतदान करने का अधिकार पाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा, हमारे यहां आजादी के बाद से ही समानता का अधिकार लागू हो गया। आज भारत की गिनती यदि आधुनिक तकनीक के मामलों में विश्व के सबसे उन्नत राष्ट्रों में की जाती है, यदि आज भारतीयों ने इस क्षेत्र में अपना लोहा मनवा लिया है तो इसके पीछे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की दूरदृंष्टि है। स्मरण रहे जब राजीव ने देश के कम्प्यूटरीकरण की बात 1984 में प्रधानमंत्री बनने के बाद कही थी तो उनका माखौल तबके बड़े-बड़े राष्ट्रवादी नेताओं ने उड़ाया था। हमारी एक बड़ी सफलता भारत को एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बना पाने की रही है। हमारे साथ ही आजादी पाया पाकिस्तान आज असफल राष्ट्रों की श्रेणी में आ चुका है। हम लेकिन एक ऐसे राष्ट्र के रूप में उभरे हैं जहां तमाम विषमताओं के बावजूद, तमाम खामियों के बावजूद, लोकतंत्र ने अपनी जड़ें इतनी मजबूत कर ली हैं कि अब उसे उखाड़ पाना किसी भी निरंकुश सत्ता के लिए संभव नहीं। इन दिनों बड़ा शोर है कि भारत एक सैन्य ताकत के रूप में उभर रहा है। यदि आज भारत एक बड़ी परमाणु ताकत बन पाया है तो इसके पीछे भी हमारे प्रथम प्रधानमंत्री की दूरदृष्टि का होना है। 23 मार्च, 1948 को नेहरू ने संसद में एटॉमिक एनर्जी बिल पेश किया था। नेहरू के शासनकाल में ही पहला न्यूक्लियर प्लांट स्थापित हुआ था। पहला परमाणु विस्फोट 1974 में हुआ। सड़सठ बरस यानी मोदी शासनकाल से पहले के समय की उपलब्धियों में अटल बिहारी सरकार की स्वर्णिम चतुर्भुज योजना भी शामिल है जिसके जरिए इंफ्रास्क्ट्रचर के क्षेत्र में हमने बड़ी तरक्की की। जाहिर है जब यात्रा का कालखंड इतना लंबा है तो ऐसी अनेक घटनाएं होंगी जो इस कालखंड के अंधेरे पक्ष को सामने रखती हैं। उदाहरण के लिए भ्रष्टाचार है जो आज हमारी व्यवस्था में शिष्टाचार का रूप ले चुका है। चूंकि आजादी के बाद से सबसे अधिक शासन कांग्रेस का रहा तो निश्चित ही महामारी का रूप धारण कर चुके इस भ्रष्टाचार को संरक्षण देने, उसे सिंचित करने का पाप कांग्रेस पर सबसे ज्यादा है। 1975 से 1977 तक का आपातकाल दूसरी बड़ी घटना है जिसने हमारे लोकतंत्र की साख को कलुषित करने का काम किया। गंगा-जमुनी संस्कृति वाले मुल्क में आजादी के बाद से ही लगातार धर्म आधारित दंगों का होना, आधे से अधिक आबादी का रोटी, छत्त और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों से वंचित रहना, इस आजादी पर एक बड़ा बदनुमा दाग है जिसके लिए वही शासक वर्ग जवाबदेह है जिसने सबसे अधिक समय तक राज किया। रही बात वर्तमान सरकार के कार्यकाल की तो मोदी जी के नेतृत्व में भारी जनअपेक्षाओं के साथ भाजपा केंद्र की सत्ता में काबिज हुई। प्रधानमंत्री के शुरुआती तेवरों ने ऐसा आभास कराया था कि बहुत कुछ जो आजाद मुल्क की यात्रा के दौरान गलत हुआ। उसे अब सुधारा जाएगा। चार बरस से अधिक समय बीत चुका है। मोदी जी ने इस टर्म का अपना अंतिम भाषण भी लालकिले की  प्राचीर से दे दिया है। उनका यह शासनकाल मेरी दृष्टि में मात्र जुमलों और ऐसे स्वपनों के नाम रहा जिन्हें पूरा करने का ईमानदार प्रयास कतई नहीं हुआ है। बेरोजगारी बढ़ी है, कालाधन, भ्रष्टाचार, गरीबी, भुखमरी, किसानों की आत्महत्या आदि सभी अपनी जगह यथावत हैं। सबसे ज्यादा भयावह है लोकतंत्र की बुनियाद दरकने का संकट। वर्तमान व्यवस्था से मीडिया सहमा हुआ है।
न्यायपालिका संग सरकार का टकराव बढ़ा है। एक तरफ खबरें आती हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था पिछले चार सालों में मजबूत हुई है तो दूसरी तरफ इसका खंडन करते समाचार भी हैं। सामाजिक सौहार्द लगातार घट रहा है। ‘मॉब लिंचिंग’ अपने चरम पर है। अल्पसंख्यकों की असहजता लगातार बढ़ रही है। मोदी सरकार की अधिकांश महत्वाकांक्षी योजनाएं दम तोड़ती स्पष्ट नजर आ रही हैं। इतना सब कुछ होने के बावजूद सपनों को बेचे जाने का खेल युद्ध स्तर पर जारी है। सबसे ज्यादा खौफनाक यह कि इन सपनों के खरीददार अभी तक चेते नहीं हैं। वे लगातार भरमाए जा रहे हैं। चारों तरफ घनघोर कोहरा छाया हुआ है। ऐसे में धूमिल अपनी एक कविता के जरिए याद आ रहे हैं। संजीव इसे समझने का प्रयास करना। शायद जो मैं कहना चाहता हूं, वह समझ पाओगेः
हर तरफ धुंआ है/हर तरफ कुहासा है
जो दांतों और दलदलों का दलाल है/ वही देश भक्त है
अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है-तटस्थता
यह कायरता के चेहरे पर सबसे ज्यादा रक्त है।
जिसके पास थाली है, हर भूखा आदमी उसके लिए सबसे भद्दी गाली है
हर तरफ कुंआ है/हर तरफ खाई है
यहां, सिर्फ, वह आदमी, देश के करीब है
जो या तो मूर्ख है, या फिर गरीब है।

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