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Editorial

किसानों के प्रति समर्पित थे शास्त्री

पिचहत्तर बरस का भारत/भाग-60

घाटी पहुंचे शास्त्री ने सभी पक्षों संग सलाह-मशविरा कर मामले का हल निकालने का प्रयास अपनी समन्वयवादी नीति के अनुसार किया। आंदोलनकारियों की मांग थी कि पवित्र बाल की शिनाख्त के लिए एक समिति का गठन किया जाए जिसमें शामिल घाटी में मौजूद मुस्लिम धर्म के विद्वान सार्वजनिक रूप से इस बात की तस्दीक करें कि बाल असली है। केंद्रीय गृह सचिव और कश्मीर के प्रशासनिक अधिकारियों का मानना था कि ऐसा करने से कानून-व्यवस्था की स्थिती बिगड़ सकती है क्योंकि यदि इस कमेटी के सदस्यों में से किसी एक ने भी पवित्र बाल की विश्वसनीयता को लेकर संदेह जाहिर कर दिया तो हालात काबू से बाहर हो जाएंगे। गृह मंत्री शास्त्री ने पवित्र बाल के दर्शन कर पहले खुद को संतुष्ट किया और उसके बाद केंद्रीय गृह सचिव व कश्मीर प्रशासन की सलाह को दरकिनार कर फैसला लिया कि 3 फरवरी, 1964 को एक विशेष ‘सार्वजनिक दीदार’ के जरिए इस पवित्र बाल की बाबत मुस्लिम धर्मगुरु फैसला सुनाएंगे। ठीक ऐसा ही हुआ भी। भारी भीड़ के समक्ष पवित्र बाल का सार्वजनिक परीक्षण मुस्लिम धर्मगुरुओं ने किया और एकमत से फैसला सुनाया कि बाल असली है। उनके इस फैसले ने घाटी में राहत और खुशी का माहौल पैदा करने का काम किया और शास्त्री एक जननायक बतौर वापस दिल्ली लौटे।

लाल बहादुर शास्त्री का प्रधानमंत्रित्वकाल बेहद संक्षिप्त, मात्र 19 महीनों का ही रहा। इस 19 महीनों में उन्हें एक के बाद एक नाना प्रकार की चुनौतियों से दो-चार होना पड़ा। इनमें पूर्वोत्तर में सुलग रहा अलगाववाद, दक्षिण में भाषाई विवाद, अन्न का गहराता संकट, कश्मीर में लगातार व्याप्त अशांति और पड़ोसी देश पाकिस्तान द्वारा भारतीय सीमाओं पर सैन्य कार्रवाई के जरिए लगातार अतिक्रमण करना शामिल थी। बतौर प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इनमें से हर चुनौती का सामना दृढ़तापूर्वक किया।

शास्त्री ने अपने प्रधानमंत्रित्वकाल की शुरुआत अन्न संकट का स्थाई समाधान निकालने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल करने से की। आजादी पश्चात् पहली दो पंच वर्षीय योजनाओं में हालांकि कृषि क्षेत्र की तरफ विशेष ध्यान रखा गया था लेकिन नेहरू सरकार का जोर औद्योगिकीकरण के जरिए रोजगार और आम आदमी की आमदानी बढ़ाने पर केंद्रित रहा था। नेहरू के तमाम प्रयासों के बावजूद कृषि उत्पादन में अपेक्षित प्रगति नहीं हो पाई थी। कृषि प्रधान देश को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए अन्न के आयात पर निर्भर रहना पड़ रहा था। 1956 में भारत का कुल अन्न आयात 236, 358 टन था जो 1963 में बढ़कर 40 लाख टन जा पहुंचा था। अन्न की चौतरफा कमी के चलते बड़े पैमाने पर कालाबाजारी और जमाखोरी ने हालात ज्यादा बिगाड़ दिए थे। 1963 और 1964 में बारिश की कमी चलते सूखा पड़ गया। जिसने अन्न उत्पादन की क्षमता को खासा प्रभावित कर डाला। ऐसी विषम परिस्थितियों में शास्त्री देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने नेहरू सरकार के सबसे काबिल मंत्रियों में शुमार सी ़सुब्रह्मण्यम को अपनी सरकार में कृषि मंत्रालय का दायित्व सौंपा। शास्त्री और सुब्रह्मण्यम ने अन्न संकट का स्थाई समाधान निकालने की दिशा में कई महत्वपूर्ण और सार्थक पहल किए जिनसे ‘हरित क्रांति’ का जन्म हुआ और हम अन्न उत्पादन में आत्मनिर्भर राष्ट्र बन पाए। तात्कालिक जरूरत को पूरा करने के लिए शास्त्री सरकार ने अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया से अन्न आयात को बढ़ाने में सफलता पाई। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन बेन्स जॉनसन ने भारत को अधिक अन्न निर्यात के लिए एक जरूरी शर्त यह रख दी कि भारत सरकार इस संकट का स्थाई समाधान स्वयं निकाले और अपने संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र में लगाए। शास्त्री और सुब्रह्मण्यम स्वयं भी इसके प्रबल पक्षधर थे। नतीजा चौथी पंचवर्षीय योजना (जो इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्वकाल में लागू हुई) में देखने को मिलता है जिसमें कृषि क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया गया। बतौर कृषि मंत्री सी ़ सुब्रह्मण्यम ने किसानों को उनकी उपज का सही और आकर्षक मूल्य दिलाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) प्रणाली को लागू किया। किसानों को उनकी लागत के ऊपर 16 प्रतिशत अधिक मूल्य दिए जाने के लिए कृषि लागत और मूल्य आयोग (commission For Agricultural Costs and Prices) का गठन शास्त्री सरकार ने 1965 में किया। एक अन्य बड़ा कदम भारतीय खाद्य निगम (Indian Council of Agricultural Research) के गठन का रहा। इस निगम के जरिए किसानों से उनके उत्पादों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देकर खरीदा जाने लगा। इसका एक सकारात्मक परिणाम कृषि क्षेत्र के प्रति उदासीनता को कम कर अधिक उत्पादन के लिए किसानों को प्रेरित करने का रहा। शास्त्री सरकार ने 1929 में स्थापित की गई संस्था भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् (Indian Council of Agricultural Research) को पुनर्जीवित कर नए और उन्नत किस्म के बीज और खाद के लिए अनुसंधान को बढ़ावा देने का उल्लेखनीय काम किया। किसानों को वैज्ञानिक तरीके से खेती करने के लिए प्रोत्साहित करना और उन्हें खेती की नई तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित करना शास्त्री सरकार के समक्ष एक टेढ़ी खीर समान थी। किसान अपने परंपरागत तरीकों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। शास्त्री सरकार ने इसके लिए ‘जो दिखता है वही बिकता है’ के सिद्धांत का सहारा लिया। सरकार ने पांच-पांच एकड़ जमीन के हजार भूखण्डों पर नई तकनीक के जरिए खेती कर किसानों को समझा पाने में सफलता पाई कि वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल कर अधिक उत्पादन किया जा सकता है। इस प्रयास का खासा मनोवैज्ञानिक चुनाव किसानों पर पड़ा जिसका नतीजा अंततः ‘हरित क्रांति’ के रूप में सामने आया।

अन्न संकट से त्रस्त लाल बहादुर शास्त्री के समक्ष जल्द ही एक दूसरी समस्या विकराल रूप में सामने आई। इस समस्या के मूल में अलगाववाद का बीज था जिसे समय रहते यदि नष्ट नहीं किया जाता तो इसका कुप्रभाव नवगठित राष्ट्र की बुनियाद खोखली करने की सामर्थ्य रखता था। इस समस्या की जड़ भाषाई विवाद और केंद्र था दक्षिण भारत जहां हिंदी को राजकीय भाषा बनाए जाने की आशंका ने दक्षिण भारतीयों को आक्रोशित करने का काम आजादी पूर्व ही शुरू कर दिया था। आजादी के आंदोलन काल के शुरुआती दौर से ही हिंदी भाषा के प्रति दक्षिण भारतीयों की आशंका उभरने लगी थी। 1918 में महात्मा गांधी ने ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार समिति’ नामक संस्था का गठन कर दक्षिण में हिंदी के प्रचार-प्रसार का प्रयास शुरू किया। गांधी की मंशा अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ संघर्ष कर रहे अलग-अलग भाषाओं और बोलियों वालों के मध्य हिंदी को एक सूत्रीय भाषा के बतौर स्थापित करने की थी। 1925 में कांग्रेस ने अंग्रेजी के बजाय संगठन का कामकाज हिंदी में किए जाने का फैसला लिया था। दक्षिण भारत के कांग्रेसी नेताओं को इससे भय उत्पन्न हो गया। उन्हें लगा कि हिंदी को आगे बढ़ाने के पीछे उत्तर भारतीय नेताओं की मंशा दक्षिण भारतीय नेताओं को आगे बढ़ने से रोकने की है। हिंदी को आम भाषा बनाए जाने का तब पुरजोर विरोध दक्षिण भारत के कांग्रेसी नेता ई .पी . रामास्वामी पेरियार ने किया। पेरियार ने अंततः कई मुद्दों पर कांग्रेस नेतृत्व से मतभेद चलते 1925 में पार्टी से त्याग पत्र दे डाला था। 1937 में हुए प्रांतीय विधानसभा चुनावों बाद मद्रास प्रांत (अब तमिलनाडु) में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ। राजगोपालाचारी ने मुख्यमंत्री बनने के साथ ही विद्यालयी शिक्षा में हिंदी को पढ़ाया जाना अनिवार्य कर दिया। उनके इस फैसले का पेरियार ने भारी विरोध किया। पूरे प्रांत में हिंदी विरोधी आंदोलन तेजी से फैलता चला गया। इस आंदोलन को हवा देने का काम मुख्य रूप से पेरियार द्वारा शुरू किए गए ‘स्वाभिमान आंदोलन’ (Self Respect movement) और दक्षिण भारत में ब्राह्मणवाद के खिलाफ 1917 में शुरू की गई ‘जस्टिस पार्टी’ ने किया था। हिंदी विरोधी आंदोलन को मद्रास प्रांत में व्यापक जनसमर्थन मिलने के बावजूद चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने अपना आदेश वापस लेने से स्पष्ट इंकार कर दिया। उन्होंने आंदोलनकारियों के खिलाफ आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम को लागू कर हजारों की संख्या में गिरफ्तारियां कर डाली। मद्रास प्रांत के तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर लॉर्ड एरस्कीन ने तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो को भेजी अपनी रिपोर्ट में हिंदी को जबरन दक्षिण भारतीयों पर थोपे जाने का विरोध करते हुए लिखा था- ‘Compulsory Hindi has been the cause of great trouble in this province and is certainly contrary to the wishes of the bulk of the population.’ (हिंदी को जबरन थोपे जाने के चलते इस प्रांत में भारी गड़बड़ी फैल चुकी है। यह निश्चित ही जनभावनाओं के अनुरूप नहीं है।) अक्टूबर, 1939 में कांग्रेस शासित सभी प्रांतों की सरकारों ने द्वितीय विश्व युद्ध में भारत को शामिल किए जाने का विरोध करते हुए इस्तीफा दे डाला था। मद्रास प्रांत में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के इस्तीफे बाद गवर्नर लॉर्ड एरस्कीन ने हिंदी भाषा को पढ़ाए जाने संबंधी आदेश वापस ले लिया। इस हिंदी विरोधी आंदोलन ने दक्षिण भारत में कांग्रेस को कमजोर करने और क्षेत्रिय दलों को उभारने का काम किया। द्रविण कड़गम इसी काल में राज्य में उभरी जो कालांतर में द्रविण मुन्नेत्र कड़गम (डीएमके) बनी। दक्षिण भारत में शेष भारत से अलगाव की चिंगारी लंबे समय से सुलग रही थी जिसे चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के मुख्यमंत्रित्वकाल में हिंदी भाषा की पढ़ाई अनिवार्य किए जाने के आदेश ने आग में बदलने का काम किया था। 1938 में जस्टिस पार्टी ने अपने 14वें अधिवेशन में एक अलग राष्ट्र ‘द्रविणनाडु’ बनाए जाने का प्रस्ताव पारित कर डाला। इस अधिवेशन में दक्षिण भारत के लिए पूर्ण स्वराज्य की मांग को रखा गया और यह संकल्प लिया गया कि प्रस्तावित द्रविनाडु में ब्राह्मणों द्वारा दक्षिण भारत के मूल निवासियों संग किए गए अत्याचारों का अंत होगा और जाति, धर्म और वर्ण के भेदभाव को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा। इस अधिवेशन में एक पृथक राष्ट्र बनाने के लिए बकायदा एक प्रस्ताव पारित करते हुए जस्टिस पार्टी के नेता ई ़वी ़ रामास्वामी ‘पेरियार’ ने ‘द्रविणों के लिए द्रविणनाडु’ का नारा भी दे डाला था। 1941 में पृथक राष्ट्र की अपनी मांग को पेरियार को कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया गया। पेरियार ने ऐसा द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश सरकार को मदद पहुंचाने के उद्देश्य से किया था। मार्च, 1942 में जब ‘क्रिप्स मिशन’ भारत दौरे पर था तब द्रविनाडु की मांग को लेकर जस्टिस पार्टी के नेताओं ने इस मिशन के सामने अपना मांग पत्र भी रखा जिसे लॉर्ड क्रिप्स ने खारिज कर डाला था। 1944 में पेरियार ने जस्टिस पार्टी से अलग हो एक नए राजनीतिक दल की नींव रखीं इस संगठन का नाम रखा गया द्रविण कड़गम। इस राजनीतिक दल का उद्देश्य था गैर ब्राह्मणवादी द्रविण राष्ट्र की स्थापना करना। अतीत की यात्रा करते समय कई ऐसे तथ्य सामने आते हैं जिन्हें या तो जानबूझ कर मुख्यधारा के इतिहासकारों द्वारा नजरअंदाज कर दिया जाता है या फिर इस योग्य नहीं समझा जाता कि किसी व्यक्ति विशेष के ऐसे पहलुओं पर भी प्रकाश डाला जाए जो उनके चरित्र के विरोधाभाषों को सामने लाते हों।

 

 

क्रमशः

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