[gtranslate]
Editorial

समन्वयवाद के प्रबल पैरोकार थे शास्त्री

पिचहत्तर बरस का भारत/भाग-59

 

अगस्त, 1956 में उनके कार्यकाल के दौरान आंध्र प्रदेश के शहर महबूब नगर के निकट हुई एक बड़ी रेल दुर्घटना में 112 यात्रियों की मौत हो गई। सार्वजनिक जीवन में शुचिता और आदर्श को सर्वोपरि मानने वाले शास्त्री ने इस दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपना त्याग पत्र प्रधानमंत्री नेहरू को भेज दिया। नेहरू ने लेकिन उनके इस त्याग पत्र को स्वीकार नहीं किया। नवंबर, 1956 में एक अन्य बड़ी ट्रेन दुर्घटना घट गई। इस बार तमिलनाडु के शहर अरियासुर के निकट हुई दुर्घटना में 144 यात्री मारे गए। शास्त्री ने एक बार फिर से इस दुर्घटना की जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल से त्याग पत्र दे दिया। नेहरू अपने इस अति विश्वसनीय और योग्य सहयोगी का साथ बने रहना देना चाहते थे लेकिन साथ ही वह सार्वजनिक जीवन में संवैधानिक गरिमा बनाए रखने के भी प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने शास्त्री का त्याग पत्र स्वीकारने के बाद लोकसभा में जो वक्तव्य दिया उससे स्पष्ट होता है कि नेहरू अपने इस सहयोगी की कार्यक्षमता और ईमानदारी के किस कदर कायल थे। नेहरू ने कहा-‘इस पत्र त्याग पत्र, के पश्चात् मैंने उनसे बात की। कल रात भी मैंने उनकी मानसिक पीड़ा और उस भार को देखा जिसे वे ढो रहे हैं। तत्पश्चात् बहुत सोच-विचार के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि यह मेरे लिए बेहतर होगा कि मैं राष्ट्रपति से इस त्याग पत्र को स्वीकारने के लिए कहूं। इसलिए नहीं कि मैं रेल मंत्री को जिम्मेदार मानता हूं, कतई नहीं। मैं पहले ही उनके काम और हम दोनों द्वारा संयुक्त रूप से किए गए कार्यों की बाबत कह चुका हूं .. ़कोई भी व्यक्ति उनसे बेहतर सहयोगी की अपेक्षा नहीं कर सकता.. ़उच्च निष्ठा, सिद्धांतों के प्रति समर्पण, अंतरआत्मा की आवाज के प्रति सचेत एवं बेहद लगन शील व्यक्ति। उनसे बेहतर सहयोगी की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। यह उनकी अंतरआत्मा का प्रभाव है कि वे यदि किसी कार्य में सफल नहीं रहते हैं तो उन्हें गहन दुख होता है।’

केंद्रीय मंत्रिमंडल से त्याग पत्र बाद शास्त्री फिर से कांग्रेस संगठन की गतिविधियों में सक्रिय हो गए। 1957 में दूसरे आम चुनाव के दौरान उन्हें एक बार फिर से पार्टी प्रत्याशियों के चयन और चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंप दी गई। इस चुनाव में वे स्वयं भी इलाहाबाद संसदीय सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार बने। कांग्रेस इन चुनावों में भी भारी बहुमत के साथ विजयी रही। नेहरू के नए मंत्रिमंडल में शास्त्री को शामिल करते हुए उन्हें परिवहन एवं संचार मंत्रालय का मंत्री नियुक्त किया गया। इस मंत्रालय में शास्त्री का कार्यकाल बेहद संक्षिप्त रहा। 1958 में मुन्द्रा घोटाले के सामने आने बाद उद्योग और वाणिज्य मंत्री टीटी कृष्णामचारी को त्याग पत्र देना पड़ा था। नेहरू ने उनके स्थान पर शास्त्री को इन दो महत्वपूर्ण मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी। शास्त्री के निजी सचिव रहे सीपी श्रीवास्तव अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि शास्त्री को देर रात तक मंत्रालय में काम करने की आदत थी। उनकी इस आदत का एक बड़ा दुष्प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर पड़ने लगा था। अक्टूबर, 1958 में उन्हें पहली बार दिल का दौरा पड़ा। हालांकि वे जल्द ही स्वस्थ हो गए लेकिन उनका शरीर अब थकने लगा था। बतौर उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री शास्त्री को हैवी इंजिनियरिंग कॉरपोरेशन, हिन्दुस्तान मशीन टूल्स और हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के गठन का श्रेय जाता है। उनके कार्यकाल में औद्योगिक उत्पादन में 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। 1961 में तत्कालीन गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत गंभीर रूप से बीमार पड़ गए तो उनके मंत्रालय का अतिरिक्त दायित्व भी नेहरू ने शास्त्री को सौंप दिया। अप्रैल, 1961 में पंत की मृत्यु पश्चात् शास्त्री को देश का नया गृह मंत्री बनाया गया। बतौर गृह मंत्री लाल बहादुर के सामने कानून- व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं का अंबार था। पूर्वोत्तर के राज्य असम में भाषा संबंधी विवाद चलते समस्या दिनों दिन उग्र होती जा रही थी। इस विवाद के मूल में बहुसंख्यक असमी भाषा और अल्पसंख्यक बंगाली भाषा बोलने वालां के मध्य अलगाव का पनपना था। अक्टूबर, 1960 में असम सरकार ने असमी भाषा को सरकारी भाषा बनाने संबंधी कानून पारित कर इस अलगाव को भड़काने का काम कर दिया। बंग्ला भाषियों को लगा कि उन्हें बहुसंख्यक असमी जान-बूझकर हाशिए में डाल रहे हैं। जल्द ही इस विवाद ने उग्र हिंसा का रास्ता पकड़ लिया। पूरे प्रदेश में दंगों चलते कानून व्यवस्था चरमराने लगी। गृह मंत्री शास्त्री ने बहुत सूझ-बूझ के साथ इस समस्या का निस्तारण कर राज्य में शांति बहाली स्थापित करने में सफलता पाई। मई, 1961 में वे स्वयं असम दौरे पर गए जहां उन्होंने राज्य सरकार के साथ-साथ असमी और बंगाली भाषियों के प्रतिनिधियों संग वार्ता कर इस समस्या का निदान निकाला जिसे ‘शास्त्री फॉर्मूला’ कहा जाता है। इस फॉर्मूले के अनुसार बंगाली बाहुल्य कछार जिले में बंगाली भाषा को ही सरकारी भाषा बने रहने दिया गया। साथ ही यह भी तय किया गया कि राज्य सरकार के सभी कार्य असमी के साथ बंगाली भाषा में भी किए जा सकेंगे। अपनी ‘समन्वयवादी’ नीति और ‘यह भी ठीक है’ की कार्यशैली को आगे कर शास्त्री ने इस विवाद को शांत करने का काम कर दिखाया।
बतौर गृह मंत्री अब उनके समक्ष पंजाब प्रदेश में अलगाववाद की समस्या सामने थी। पंजाब में अकाली दल नाम के राजनीतिक संगठन का नेतृत्व मास्टर तारा सिंह के हाथों में था। ब्रिटिश भारत में पंजाब प्रांत के शहर रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में जन्मे मास्टर तारा सिंह सिख धर्म के बड़े नेता और प्रवर्तक थे। भारत विभाजन के घोर विरोधी रहे तारा सिंह आजादी पश्चात् सिखों के लिए एक अलग प्रदेश बनाए जाने के पक्षधर बन उभरे। 1961 में उन्होंने अपने इस उद्देश्य को पाने के लिए अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर में भूख हड़ताल करने का प्रण लेते हुए घोषणा कर दी कि जब तक प्रधानमंत्री नेहरू अलग सिख प्रांत की मांग को नहीं स्वीकारते हैं तब तक उनका आमरण-अनशन तक जारी रहेगा। शास्त्री ने इस समस्या का समाधान तलाशने के लिए भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एसआर दास की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया। दास आयोग ने अपनी रिपोर्ट में मास्टर तारा सिंह के उन आरोपों को तथ्यहीन पाया जिनके अनुसार पंजाब में सिखों के साथ भेदभाव किया जाता था। अंततः 48 दिन के अनशन बाद मास्टर तारा सिंह को अपनी हड़ताल वापस लेनी पड़ी। तात्कालिक तौर पर शास्त्री इस समस्या को दबा पाने में तो सफल रहे लेकिन अलगाववाद की आग बुझी नहीं। कालांतर में यह ‘खालिस्तान’ समस्या के रूप में प्रचंड हो धधकी लेकिन उसका जिक्र बाद में।
चीन के हाथों हुई पराजय के बाद नेहरू और कांग्रेस, दोनों की छवि खासी दरक गई थी और नेहरू की नेतृत्व क्षमता को लेकर कांग्रेस भीतर से ही विरोध के स्वर उभरने लगे थे। ऐसे में संगठन को दुरुस्त करने के उद्देश्य से मद्रास प्रांत (अब तमिलनाडु) के मुख्यमंत्री के कामराज ने नेहरू मंत्रिमंडल और विभिन्न प्रदेशों की कांग्रेस सरकारों में मौजूद महत्वपूर्ण नेताओं को संगठन के कार्य सौंपे जाने संबंधी योजना सामने रखी। इस योजना, जिसे ‘कामराज प्लान’ कहा जाता है, के अंतर्गत नेहरू मंत्रिमंडल के 6 सदस्यों और कांग्रेस शासित 6 राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इस्तीफा दे डाला। नेहरू मंत्रिमंडल के इन 6 मंत्रियों में लाल बहादुर शास्त्री भी शामिल थे। नियति को लेकिन कुछ और ही मंजूर था। 24 अगस्त, 1963 में केंद्रीय मंत्री परिषद से त्याग पत्र देने वाले शास्त्री मात्र पांच माह बाद ही दोबारा मंत्री बना दिए गए। 9-10 जनवरी, 1964 को भुवनेश्वर में कांग्रेस के दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन का आयोजन किया गया था। इस आयोजन में प्रधानमंत्री नेहरू को लोकतंत्र और समाजवाद पर महत्वपूर्ण प्रस्ताव पेश करना था लेकिन 6 जनवरी के दिन भुवनेश्वर पहुंचते ही नेहरू की तबियत बिगड़ गई। उन्हें हल्का हृदयघात हुआ था। नेहरू कार्य समिति की बैठक में शामिल नहीं हो सके। उनके स्थान पर लाल बहादुर शास्त्री ने लोकतंत्र और समाजवाद पर प्रस्ताव राष्ट्रीय अधिवेशन में पेश किया। इस आयोजन के दौरान ही नेहरू ने शास्त्री को वापस केंद्रीय मंत्रिमंडल में लिए जाने का निर्णय लिया। नेहरू के प्रस्ताव पर शास्त्री ने उनसे पूछा था- ‘मुझे क्या काम करना होगा? नेहरू का संक्षिप्त उत्तर था- ‘तुम्हें मेरा सब काम करना होगा।’ 22 जनवरी, 1964 को शास्त्री एक बार फिर से नेहरू मंत्रिमंडल का हिस्सा बना दिए गए। उन्हें ‘बगैर विभाग का मंत्री’ बनाते हुए प्रधानमंत्री ने अपने कई विभाग  सौंप दिए। बहुत से राजनीतिक विशेषज्ञों की नजर में यह नेहरू द्वारा शास्त्री को अपना राजनीतिक वारिस बनाए जाने का सबसे बड़ा संकेत था। बगैर विभाग का मंत्री रहते शास्त्री के समक्ष जल्द ही एक बड़ी समस्या के समाधान की जिम्मेदारी आन खड़ी हुई। समस्या की जड़ चूंकि कश्मीर में थी इसलिए उसकी गंभीरता को समझते हुए प्रधानमंत्री नेहरू ने शास्त्री को इसका हल तलाशने के लिए चुना। कश्मीर घाटी स्थित हजरतबल दरगाह में बीते 300 सालों से सहेज कर रखा गया पैगंबर मोहम्मद का पवित्र बाल यकायक ही 26 दिसंबर, 1963 के दिन गायब हो गया। यह पवित्र बाल शताब्दियों से मदीना स्थित पैंगबर की मस्जिद में सुरक्षित रखा गया था। 1634 में इस मस्जिद के मुख्य इमाम (मुतावली) सैय्यद अब्दुल्लाह इसे लेकर बीजापुर (भारत) आए थे। उनके परिजनों से इस पवित्र बाल को सम्राट औरंगजेब ने अपने कब्जे में सत्रहवीं शताब्दी के अंत में ले लिया था। तभी से इसे कश्मीर स्थित हजरत बल दरगाह में सुरक्षित रखा गया था। इस बाल के गायब होने का समाचार सार्वजनिक होते ही कश्मीर में भारी जनाक्रोश पैदा हो गया। नेहरू ने केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई को इस चोरी की तत्काल जांच का जिम्मा सौंपा। इससे पहले सीबीआई पूरे मामले की तह तक पहुंच पाती, आठ दिन पश्चात् 4 जनवरी, 1964 के दिन रहस्यमयी तरीके से यह पवित्र बाल वापस हजरतबल दरगाह में रखा पाया गया। जनभावनाएं लेकिन शांत नहीं हुईं। आम कश्मीरी के मन में संदेह पैदा हो गया कि पवित्र बाल के स्थान पर नकली बाल दरगाह में रख उन्हें गुमराह किया जा रहा है। मौके का लाभ उठाते हुए पाकिस्तान ने इसे बड़ा मुद्दा बनाने के हर संभव प्रयास शुरू कर ही दिए थे। ऐसे में मामले की नजाकत को समझते हुए नेहरू ने अपने सबसे विश्वस्त सहयोगी लाल बहादुर को कश्मीर भेजा। घाटी में शास्त्री के पहुंचने से पहले ही हालात खासा तनावपूर्ण हो चुके थे। वे 30 जनवरी के दिन कश्मीर पहुंचे। उनके पहुचने से पहले के हालात 27 जनवरी, 1964 के दिन ‘दि टाइम्स ऑफ लंदन’ में प्रकाशित समाचार से समझे जा सकते हैं ‘दि टाइम्स ऑफ लंदन’ ने लिखा- ‘कश्मीर में फिर से उपद्रव की शुरुआत हो चली है। इस पुलिस की गोलीबारी में चार की मृत्यु हो गई। इन प्रदर्शनों के चलते ऐसा प्रतीत होता है कि कश्मीर की जनता में संदेह का भाव है कि पैगंबर मोहम्मद का असली बाल नहीं खोजा जा सका है और जो बाल हजरतबल दरगाह में है वह चोरी चला गया पवित्र बाल नहीं है।’
क्रमशः

You may also like

MERA DDDD DDD DD