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Editorial

पाकिस्तान को हरा जननायक बने शास्त्री  

पिचहत्तर बरस का भारत/भाग-64
 

जनरल अयूब ने अमेरिका, चीन और इरान के समक्ष मदद की गुहार लगाने और संयुक्त राष्ट्र संघ से हस्तक्षेप की मांग की। चीन के प्रधानमंत्री चाऊ-उन-लाई ने भारत को आक्रमणकारी देश घोषित करने में देर नहीं लगाई। 9 सितंबर, 1965 को उन्होंने भारत को इस दुस्साहस के नतीजे भुगतने को तैयार रहने की धमकी तक दे डाली। संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्कालीन महासचिव यू.थांट दोनों देशों के मध्य युद्ध विराम का संकल्प प्रस्ताव लेकर 7 सितंबर, 1965 को रावलपिंडी पहुंचे थे जहां उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब और विदेश मंत्री जुल्फीकार अली भुट्टो संग तीन दिनों तक गहन विचार- विमर्श किया। जनरल अयूब और भुट्टो ने युद्ध विराम के लिए एक अनिवार्य शर्त थांट के समक्ष रखी। उनकी मांग थी कि युद्ध विराम के लिए प्रस्तावित समझौते में कश्मीर का मसला भी शामिल हो और भारत इस बात की गारंटी दे कि युद्ध विराम पश्चात कश्मीर में जनमत संग्रह कराया जाएगा ताकि यह तय हो सके कि कश्मीरी जनता किस राष्ट्र संग विलय करना चाहती है। पाकिस्तानी हुक्मरानों को बगैर शर्त युद्ध विराम के लिए राजी कर पाने में विफल रहे संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव 12 सितंबर को दिल्ली पहुंचे। उनके पाकिस्तान प्रवास के दौरान भारतीय सेना ने खेमकरण और सियालकोट इलाके में पाकिस्तानी सेना को भारी आघात पहुंचाने का काम कर दिया था। प्रधानमंत्री शास्त्री ने संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रस्तावित बगैर शर्त युद्ध विराम को स्वीकारने में देर नहीं लगाई लेकिन यह स्पष्ट कर दिया कि कश्मीर में किसी भी प्रकार का जनमत संग्रह कराने की कोई शर्त भारत को स्वीकार नहीं होगी। अपने दिल्ली प्रवास के दौरान यू. थांट ने दोनों देशों के नेतृत्व को एक बार फिर लिखित संदेश भेज तत्काल युद्ध विराम की अपील दोहराई। 14 सितंबर को इस अपील के जवाब में शास्त्री ने अपना उत्तर राष्ट्रपति भवन में रह रहे यू थांट को भेजा। शास्त्री का यह पत्र उनके दृढ़ इरादों और स्पष्ट नीति का परिचायक है। उन्होंने लिखा-‘…Whatever may be the context, Mr. Secretary- General, we greatly welcome your visit and we recognize the importance of your mission from the point of view of peace, not only in Indian continent, but indeed in the world as a whole. India has always believed in peace and her adherence to peaceful methods stands unshaken. In deference to the wishes of the security council and to the appeals which we have received from many friendly countries, we accept your propostal to order a ceasefire effective from 6.30 A.M. IST on Thrusday 16, September, 1965, provided you confirm to me by 9. AM tomorrow that Pakistan is also agreeable to do so… I would also like to state categorically that no pressures or attacks will deflect us from our firm resolve to maintain the sovereignty and territorial integrity of our country, of which the state of Jammu and Kashmir is am integral part.'(… महासचिव महोदय कारण चाहे जो भी रहे हों, हम आपकी इस यात्रा का स्वागत करते हैं और मानते हैं कि आपकी यह यात्रा न केवल भारतीय उप महाद्वीप, बल्कि समस्त विश्व में शांति बनाए रखने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। भारत हमेशा शांति का समर्थक रहा है और अहिंसक तरीकों पर उसका विश्वास अक्षुण्ण है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एवं समस्त मित्र राष्ट्रों की अपील का आदर करते हुए हम आपके युद्ध विराम समझौते को स्वीकारते हैं और 16 दिसंबर, 1965 की सुबह 6 ़30 बजे से युद्ध विराम के लिए अपनी सहमति देते हैं बशर्ते आप कल प्रातः 9 बजे तक इस बाबत पाकिस्तान की सहमति से हमें अवगत करा दें तो।… ़मैं यहां जोर देकर यह भी स्पष्ट करना चाहता हूं कि किसी भी प्रकार का दबाव अथवा आक्रमण हमें अपनी राष्ट्र की एकता और अखंडता की रक्षा करने से कोई नहीं रोक सकता। हम एक सम्प्रभु राष्ट्र हैं जिसका अटूट हिस्सा जम्मू और कश्मीर प्रदेश है)।

पाकिस्तान ने लेकिन संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव को एक सिरे से खारिज कर डाला। नतीजा रहा 16 सितंबर, 1965 को युद्ध विराम का न होना। चीन अब सीधे तौर पर पाकिस्तान के पक्ष में उतर आया। चीनी समाचार पत्रों में संयुक्त राष्ट्र संघ की कठोर-शब्दों में अमेरिकी एजेंट करार देते हुए आलोचना की जाने लगी। इतना ही नहीं चीन ने भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा युद्ध भी शुरू कर डाला ताकि भारतीय नेतृत्व को डराया जा सके कि चीन भारत पर हमला करने जा रहा है। अपने इस प्रोपेगेंडा के तहत चीन ने भारतीय सेनाओं पर चीनी इलाकों में घुसपैठ करने और सीमाओं पर अतिक्रमण करने के बेबुनियाद आरोप चस्पा करने शुरू कर दिए। चीन के इरादों को समझते हुए सोवियत संघ ने 13 सितंबर, 1965 को एक कड़ा संदेश दे दिया कि जो ताकतें भारत-पाक युद्ध को और भड़काना चाहती हैं उन्हें इससे होने वाली तबाही की जिम्मेदारी लेनी होगी। 16 सितंबर के दिन चीन ने भारत को एक लिखित अल्टीमेटम भी दिया जिसमें कहा गया था कि भारत सरकार तीन दिनों के भीतर तिब्बत-सिक्कम अंतराष्ट्रीय सीमा में चीनी इलाके के भीतर बनाए गए सैन्य कैंपों को खाली कर दे अन्यथा गंभीर नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहे। इस धमकी भरे पत्र मिलने के पश्चात प्रधानमंत्री शास्त्री ने 17 सितंबर को संसद में दिए अपने वक्तव्य में चीन के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा था कि ‘यह सदन आश्वस्त रहे कि हम पूरी तरह चौकन्ने हैं और यदि हम पर आक्रमण हुआ तो पूरी ताकत के साथ अपनी आजादी की रक्षा के लिए लड़ेंगे। चीन की ताकत हमें हमारी सीमाओं की रक्षा करने से नहीं रोक सकती है।’ शास्त्री के जवाब से तिलमिलाए चीन ने स्वघोषित तीन दिनों की मियाद पूरी होने से पूर्व ही 18 सितंबर, 1965 को सिक्किम और लद्दाख क्षेत्र में भारतीय सीमा पर भारी सैन्य बल तैनात करना शुरू कर दिया। शास्त्री ने संसद में इस बात की जानकारी देते हुए बेहद कठोर शब्दों में भारत का पक्ष रखा। उन्होंने कहा-विस्तारित समय सीमा समाप्त होने से पूर्व ही चीनी सेना ने, सिक्किम और लद्दाख, दोनों ही इलाकों पर, भारतीय सीमा चौकियों पर गोली बारी शुरू कर दी है। यदि चीन का रवैया आक्रामक बना रहता है तो हम हर तरीके से अपनी रक्षा करेंगे। सभी मतभेदों को शांति पूर्वक हल करने का हमारा प्रस्ताव अभी भी कायम है। लेकिन चीन का आक्रामक रुख उसके इरादों की पुष्टि करता है कि उसका उद्देश्य शिकायतों को, चाहे वे वास्तविक हों या काल्पनिक, सुलझाना नहीं चाहता, बल्कि किसी भी बहाने अपनी आक्रामक गतिविधियों को जारी रखना चाहता है, इस बार अपने सहयोगी पाकिस्तान के साथ मिलकर।’
चीन की मंशा भारत-पाक युद्ध को अधिक तेज करने की थी। उसके इरादों पर लेकिन तब पानी फिर गया जब भारतीय सैन्य बलों की ताकत से घबराए और पराजित होते जा रहे पाकिस्तान ने बगैर शर्त युद्ध विराम के लिए हामी कर दी। कश्मीर के मुद्दे पर भारत-पाक युद्ध में चीन के इरादों से सशंकित संयुक्त राष्ट्र संघ ने 20 सितंबर, 1965 को अपनी सुरक्षा परिषद् की आपात बैठक बुला एक प्रस्ताव पारित किया था जिसमें दोनों देशों को बगैर शर्त युद्ध विराम करने की अपील की गई थी। भारतीय सेनाओं के चौतरफा हमलों से घबराए जनरल अयूब ने इस प्रस्ताव के लिए पाकिस्तान की तत्काल सहमति दे दी। इस तरह 23 सितंबर, 1965 के दिन यह युद्ध समाप्त हो गया। पाकिस्तान ने लेकिन युद्ध विराम का उल्लंघन तत्काल ही श्ुरू कर डाला था। युद्ध विराम की आधिकारिक घोषणा से मात्र चार दिन पूर्व 19 सितंबर, 1965 को तमाम अंतरराष्ट्रीय युद्ध नियमों को धता बताते हुए पाकिस्तानी वायुसेना के जेट फाइटर विमान ने एक भारतीय नागरिक वायुयान को मार गिराया। इस वायुयान में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री बलवंत राय मेहता, उनकी पत्नी समेत 8 लोग सवार थे, सभी की इस दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। दशकों बाद पाकिस्तानी फाइटर जेट के पायलट कैश हुसैन ने 2011 में एक ईमेल लिखकर भारतीय वायुयान के पायलट की बेटी फरीदा सिंह से अपने कृत्य की माफी मांगी थी। शास्त्री आशंकित थे कि युद्ध विराम की शर्तों का पाकिस्तान पालन नहीं करेगा। उन्होंने भारतीय सेनाओं को सतर्क रहने और पाक सेना द्वारा युद्ध विराम तोड़ने की स्थिति में कठोर कार्यवाही के निर्देश दिए थे। भारत की इस युद्ध में जीत के बाद लाल बहादुर राष्ट्रीय नायक बन उभरे देशभर में उनके सम्मान में सभाओं का आयोजन किया जाने लगा। दिल्ली के रामलीला मैदान में विशाल जनसभा को 26 सितंबर, 1965 के दिन शास्त्री ने संबोधित किया। सभा में बोलते समय वे न केवल प्रसन्न मुद्रा में थे, बल्कि खासे आत्मबल से लबरेज भी थे। उन्होंने कहा ‘सरदार अयूब ने ऐलान किया था कि वह दिल्ली तक चहलकदमी करते हुए पहुंच जाएंगे। वे इतने बड़े आदमी हैं, लहीम-शहीम हैं। मैंने सोचा की उनको दिल्ली तक पैदल सफर करने की तकलीफ क्यों दी जाए। हमीं लाहौर की तरफ बढ़कर उनका इस्तकबाल करें।’ शास्त्री का यह तंज उनके आत्मविश्वास का परिचायक था। जल्दी ही शास्त्री की आशंका सही साबित होने लगी। पाकिस्तानी सेनाओं ने भारतीय सीमा पर गोलीबारी कर तनाव बढ़ाने की शुरुआत इस युद्ध विराम के चंद दिनों बाद ही करनी शुरू कर दी। इस दौर में सीमा पर तनाव के साथ-साथ देश भारी अन्न संकट का भी सामना कर रहा था। 10 अक्टूबर, 1965 को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में लाल बहादुर ने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा देते हुए किसानों से अन्न उत्पादन बढ़ाने, व्यापारियों से अन्न को सस्ते दामों में बेचने और नागरिकों से अन्न की हिफाजत करने का आह्नान किया। भारत-पाक युद्ध के दौरान सोवियत संघ के प्रधानमंत्री एलेक्सी कोसिगिन ने शास्त्री और जनरल अयूब को सोवियत संघ की मध्यस्था में शांति वार्ता करने का सुझाव दिया था। 4 सितंबर, 1965 को प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के लिए लिखे अपने पत्र में कोसिगिन ने भारत-पाक सीमा पर बढ़ते तनाव पर चिंता व्यक्ति करते हुए लिखा- ‘We should not be frank if we did not say that the military conflict in Kashmir arouses the concern of the soviet government also because it has occured in an area directly adjacent to the borders of the soviet Union. In our opinion, the first step offer the immediate cessation of hostilities could be withdrawl of troops to positions behind the ceasefive line established by agreement India and Pakisthan in July 1949.’ (हम ईमानदार नहीं रहेंगे यदि हम खुलकर यह नहीं कहते हैं कि कश्मीर में सैन्य संघर्ष हमारी चिंता का कारण बन चुका है क्योंकि यह संघर्ष हमारी सीमाओं के निकट चल रहा है … ़हमारी राय में भारत और पाकिस्तान को जुलाई, 1949 में हुए समझौते के अनुसार तत्काल युद्ध विराम रेखा के पीछे अपनी सेनाओं को वापस बुला लेना चाहिए।
क्रमशः

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