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Editorial

जुमला बनता ‘आत्मनिर्भर भारत’ भी

पिछले सात बरसों के दौरान केंद्र की सत्ता पर काबिज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश और देशवासियों को आर्थिक मंदी, बढ़ती बेरोजगारी, तेल से लेकर कुर्किंग गैस तक, प्याज से लेकर चावल, आटा, दाल इत्यादि की बढ़ती कीमतों के अतिरिक्त यदि कुछ दिया है तो वह है ‘जुमलों की बरसात’। एक से बढ़कर एक ऐसे जुमले इन सात बरसों के दौरान हमारी थाली में परोसे गए हैं कि पूरा देश बदहजमी का मरीज बन चुका है। शुरुआत 2014 के आम चुनावों से हुई। पहला जुमला इतना मनभावन था कि कांग्रेस का खूंटा ही दिल्ली समेत देश के लगभग सभी राज्यों से उखड़ गया। यह जुमला था ‘अच्छे दिन आऐंगे।’ चौतरफा इस जुमले की आंधी चली। इस आंधी ने दो काम किए। पहला मोदी की करिश्माई छवि को स्थापित करने में सफलता पाई जिसका नतीजा 2014 में केंद्र में एनडीए की सरकार और स्वयं मोदीजी का प्रधानमंत्री पद पर आसीन होना रहा तो दूसरा उनके जुमले ‘अच्छे दिन आएंगे’ पर आंख मूंद कर भरोसा करने वाली जनता की अपेक्षाओं में भारी वृद्धि हुई, एक हिमालय समान जनअपेक्षाओं का पहाड़ खड़ा हो गया। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इन जनअपेक्षाओं में से कितनी धरातल पर उतर साकार हो पाईं और कितनों के जीवन में ‘अच्छे दिनों’ ने दस्तक दी, यह बूझ पाना खासा सरल है। ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं, केवल अंधभक्ति का मकड़जाल तोड़ना भर है, हकीकत खुद-ब-खुद सामने आ जाएगी। प्रधानमंत्री बनने के साथ ही मोदी जी ने एक बड़ा निर्णय ‘जुमलों की बरसात’ देश भर में करवाने का लिया। नतीजा ‘मेक इन इंडिया’, ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’, ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’, ‘सबका साथ- सबका विकास’ आदि की झमाझम वर्षा से साकार हुआ। इसी क्रम में ताजा बारिश ‘वोकल फॉर लोकल’ एवं ‘आत्मनिर्भर भारत’ नामक जुमलों की हो रही है। एक तरफ विदेशी पूंजी का दबाव भारतीय व्यापारियों को हाशिए में डालता जा रहा है, ‘एमाजॉन’ सरीखी ई-कॉमर्स कंपनियों ने किराना दुकानदारों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल्स की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर डाला है तो दूसरी तरफ ‘आत्मनिर्भर भारत’ का जुमला उछाल अजब-गजब किस्म का राष्ट्रवाद जनता को बरगलाने का नया हथियार बनाने की कवायद बना परवान चढ़ाया जा रहा है।

‘आत्मनिर्भर भारत’ से प्रधानमंत्री का अर्थ ऐसा भारत है जो अपनी हर प्रकार की आवश्यकता को स्वयं पूरी करने में समर्थ हो। दूसरी शुरुआत भारत सरकार ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने से करनी चाही है। सरकार इसके लिए देश की 41 आयुद्ध निर्माण कारखानों (ऑर्डिंनेंस फैक्ट्री) को सरकारी क्षेत्र के निगमों में बदल कर करने का ऐलान कर चुकी है। इसका भारी विरोध इन 41 फैक्ट्रियों के कामगार कर रहे हैं। क्योंकि उन्हें आशंका है कि इन राष्ट्रीय संपदाओं को निगमों में बदलने के बाद सरकार इन्हें निजी क्षेत्र को बेच डालेगी। उनकी आशंका निर्मूल नहीं कही जा सकती। 2014 के बाद से लगातार केंद्र सरकार पिछले 65 बरसों के दौरान तैयार हुईं राष्ट्रीय कंपनियों का निजीकरण करने में जुटी है। ताजातरीन नई ‘मौद्रीकरण नीति’ (Monetisation Plan) इसी का विस्तार है। ऐसे में सरकारी कर्मचारियों के मन में गहरी पैठ बना चुकी यह आशंका गलत नहीं कि आत्मनिर्भरता के नाम पर उनकी नौकरियां छीन जायेगी। बहरहाल ‘आत्मनिर्भर भारत’ का जुमला केवल ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों के सरकारी निगमों में बदले जाने तक सीमित नहीं है। सरकार रक्षा के क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर होने की बात कर रही है। हकीकत में यह जुमलेबाजी से ज्यादा कुछ नजर नहीं आता है। उदाहरण से समझिए। गत् आठ सितंबर को रक्षा मामलों की मंत्री मंडलीय समिति (Cabinet Committee on Security) ने यूरोप की एयरबस इंडस्ट्रीज से छप्पन सी 295 फौजी मालवाहक विमान खरीदने के प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दी। इस खरीद का बजट 20 हजार करोड़ रुपया है। इन छप्पन विमानों में से 16 विमान सीधे यूरोप से आयात होंगे, बाकी चालीस विमान एयरबस कंपनी भारतीय कंपनी ‘टाटा एडवांस सिस्टमस् लिमिटेड’ के साथ मिलकर भारत में ही तैयार करेगी। इसे ‘आत्मनिर्भरता’ कहा जा रहा है। हकीकत में ऐसा है नहीं। भारत में एकमात्र एक कंपनी फौजी विमान तैयार करती है। यह कंपनी है एचएएल (हिन्दुस्तान एयरोनाटिक्स लिमिटेड)। यह सरकारी कंपनी है। यह वही कंपनी है जिसे फ्रांस से खरीदे गए राफेल लड़ाकू विमान भारत में तैयार करने का काम पहले मिलने वाला था फिर ‘चमत्कारिक’ तरीके से उसे राफेल डील छोड़नी पड़ी और उसके स्थान पर अनिल अंबानी की कंपनी को राफेल का भारतीय पार्टनर बनाया गया था। एयरबस जिन चालीस मालवाहक जहाजों को भारत में टाटा कंपनी के संग मिलकर तैयार करेगी उन्हें भारत का प्रोडक्ट नहीं माना जायेगा। केवल कल-पुर्जों को भारत में टाटा कंपनी के साथ मिलकर जोड़ा भर जाएगा। टाटा अथवा भारत को इस सी 295 मालवाहक जहाज पर किसी प्रकार का कोई अधिकार नहीं होगा। इसका प्रतिरूप तैयार कर उसे अन्य देशों को बेचने की इस करार में अनुमति नहीं है। तब भला कैसे इसे ‘आत्मनिभर्रता’ का नाम दिया जा सकता है? भारत विश्व का दूसरे सबसे ज्यादा हथियार आयात करने वाला देश है। 2016 से 2020 के मध्य विश्व के कुल शस्त्र व्यापार में हमारी हिस्सेदारी बतौर खरीददार 9 ़5 प्रतिशत रही। अगले दस बरसों में हम सौ बिलियन अमेरिकी डालर (लगभग सात लाख करोड़ रुपया) के शस्त्र अपनी सेनाओं के लिए आयात करेंगे। इनमें फाइटर जेट, हेलीकॉप्टर, टैंक, मिसाइल, पनडुब्बी इत्यादि शामिल हैं। मोदी सरकार ने 2017 में इन आयातित युद्ध सामग्री की कीमतों को कम करने एवं देश की रक्षा उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के उद्देश्य से एक नीति तैयार की जिसे ‘स्ट्रेटिजिक पार्टनरशीप’ ;ैजतंजमहपब च्ंतजदमतेीपचद्ध नाम दिया गया। इसके तहत निजी क्षेत्र की ऐसी कंपनियों का रक्षा मंत्रालय संग गठजोड़ बनाया जाना है जो सरकार के साथ मिलकर विदेशी कंपनियों संग ऐसा करार करें जिससे आयातित युद्ध सामग्री को भारत में तैयार करने के साथ-साथ उनकी तकनीक भी भारत को मिल सके। 2017 में रक्षा मंत्रालय ने भारतीय नौसेना के लिए छह पनडुब्बी, 123 हेलीकॉप्टर, थल सेना के लिए टी-72 टैंकों के स्थान पर 1700 नए युद्ध टैंक तथा वायुसेना के लिए 110 फाइटर जहाज खरीदने की प्रस्ताव तैयार किया था। इसका कुल बजट 2 ़2 लाख करोड़ है। पांच बरस बीतने के बाद भी यह प्रस्ताव लाल फीताशाही के चलते गति नहीं पकड़ पाया है। 8 सितंबर को जिन छप्पन सी 295 मालवाहक विमानों की खरीद को अंतिम मंजूरी दी गई वे 2017 के इसी प्लान का हिस्सा हैं। ‘आत्मनिर्भर’ बनने की इस पूरी स्कीम में एक बात बड़ी हैरतनाक है। इसमें सरकारी रक्षा कंपनियों की जगह निजी क्षेत्र की कंपनियों को तरजीह दी जा रही है। राफेल के भारतीय पार्टनर के रूप में अनिल अंबानी समूह का चयन पूरी प्रक्रिया के अपारदर्शी होने का ज्वलंत उदाहरण है। अंबानी के पास रक्षा मामलों का अनुभव ‘शून्य’ है। ऊपर से वह दिवालिया घोषित समूह है। इसके बावजूद उसे राफेल का पार्टनर बनाया जाना न केवल रक्षा सौदों में भारी भ्रष्टाचार की तरफ इशारा करता है, बल्कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ के भी जुमला मात्र होने की पुष्टि करता है।

सरकार की ‘स्ट्रेटिजिक पार्टनरशिप’ नीति कहीं से भी हमें रक्षा मामलों में आत्मनिर्भर बनाने में सक्षम नहीं हैं। इस नीति को रक्षा विशेषज्ञ पुरानी आयात नीति का नया रूप करार देते हैं। इसमें विदेशों से कल पुर्जों को आयात कर भारत में जोड़ा भर जाएगा। तकनीकी ट्रांफर इसमें शामिल न होने के चलते भारतीय कंपनियां कैसे ऐसे रक्षा उपकरणों को भारत में निर्मित कर पाने में सक्षम होंगी यह केवल नीति बनाने वाले जानते हैं। प्रथम दृष्टया ऐसा करके सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की एचएएल जैसी कंपनियों को बंद करने और प्राइवेट सेक्टर को बढ़ावा देने का काम करती नजर आती है। इसलिए ‘जुमलों की बारिश’ से टपका यह नया जुमला ‘आत्मनिर्भर भारत’ का हर्ष भी ‘अच्छे दिन’ और ‘सबका साथ-सबका विकास’ जैसा होता नजर आने लगा है।

एक बात की तारीफ लेकिन मैं दिल खोलकर करना चाहता हूं। भाजपा का वर्तमान नेतृत्व भले ही अपने बनाए ‘जुमलों’ को यथार्थ में परिवर्तित कर पाने में विफल नजर आता हो, उसे परशेप्शन मैनेजमेंट में कमाल की महारथ हासिल है। चौतरफा हाहाकार-चित्कार के बावजूद मोदीजी का जादू कम भले ही हुआ है, अब भी बहुत बड़ी तादाद में जनता जनार्दन का विश्वास उन पर बना हुआ है। बहुत संभव है कि जो कुछ पिछले सात बरसों में मोदी सरकार हासिल नहीं कर पाई, आने वाले समय में उसे धरातल पर ला पाने में सफल होगी। यदि ऐसा हुआ तो मोदीजी पर जताया भरोसा टूटेगा नहीं और देश भी तरक्की की राह पकड़ लेगा। यदि ऐसा नहीं होता है तो जनता अगले आम चुनाव तक स्वयं ही हकीकत समझ फैसला ले लेगी।

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