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Editorial

सृजन की सार्थक उड़ान के नाम

“All the World’s  a stage,and all the men and women mearly players :they have their exits and their entrances,and one man in his time plays many parts,his acts being seven ages”
William Shakespeare
“Why,how and when, I cannot say,but not with standing my leftist leanings I have come to believe that there  is power beyond; be it God or any other name you may choose to give it.I have oscillated  between faith and doubt for many years, but have come to accept that there is force which I feel with in but which I can not explain.”
Kuldip Nayar
‘पाखी’ का संपादन दोबारा संभालने का विचार सितंबर 2010 में संपादकीय दायित्यों से मुक्त होने के बाद कभी नहीं आया, यह तो कहना झूठ होगा, हां इतना अवश्य दावे के साथ कह सकता हूं कि जब कभी, किसी भी कारणवश, ऐसा विचार जन्मा, उसे तत्काल जेहन से निकाल भी दिया। इसलिए यह संपादकीय लिखते समय मुझे विलियम शेक्सपीयर और कुलदीप नय्यर याद आ गए। शेक्सपीयर का कथन कि ‘यह दुनिया एक रंगमंच है जिसमें सभी की भूमिका तय है, उनका आना और जाना तय है, एक समय में एक व्यक्ति कई भूमिकाओं को निभाता है।’ मैं कुलदीप नायर की जीवनी ‘बियोन्ड द लाइन्स्’ के इस कथन से जोड़कर देखता हूं कि ‘अपनी वामपंथी विचारधारा से इत्तर मुझे यह स्वीकारने में कोई गुरेज नहीं कि कहीं कोई शक्ति है जिसको मैं परिभाषित तो नहीं कर सकता, लेकिन महसूस कर सकता हूं। यह शक्ति हमारे जीवन को संचालित करती है।’ ‘पाखी’ का प्रकाशन कभी मेरी किसी योजना का हिस्सा ना था। सही तो यह कहना होगा कि
आधा जीवन जो मैं जी चुका उसमें कभी, कुछ भी, किसी आवेश, उमंग या अतिरेक उत्साह में कर डाला। साहित्य की दुनियां में कदम रखने का निर्णय ऐसे ही उमंग और अतिरेक उत्साह का नतीजा है। जब संपादन की जिम्मेदारियों से हटने का विचार जन्मा तो 2010, अक्टूबर का अंक प्रेम भारद्वाज के सपांदन का पहला अंक था। इससे पहले के अंको में भी उनका योगदान मुझसे कहीं ज्यादा था। अक्टूबर, 2010 से मार्च, 2019 तक मेरा योगदान शून्य रहा। प्रेम भारद्वाज के संपादकीय विवेक, उनके अधिकार और संपादक नाम की संख्या की गरिमा मैंने इन नौ सालों के दौरान हर कीमत में बनाए रखीं। इस दौरान कई मौके आए जब साहित्यिक दुनिया में अफवाहों का बाजार यकायक इस खबर से गर्माया कि ‘पाखी’ संपादक की छुट्टी होनी तय हो चुकी है। एक बार तो मुझे बांग्लादेश की राजधानी ढ़ाका से वक्त्व्य जारी करना पड़ा ताकि अफवाहों के बाजार से निकली आग से झुलस रहे प्रेम भारद्वाज को शीतलता का अहसास हो। बहरहाल इस सबका अब कोई अर्थ नहीं। प्रेम भारद्वाज को कार्यमुक्त कर मैंने पुनः ‘पाखी’ का संपादकीय दायित्व अपने हाथों में ले लिया है। ऐसा कभी होगा, वह भी इतना आकस्मिक ऐसा मैंने सोचा ना था पर हम सब तो रंगमंच  की कठपुतलियां मात्रा है जिसकी डोर कही और ही है। ‘पाखी’ के प्रथम अंक के लोकापर्ण कार्यक्रम में हिंदी साहित्य के दो शिखर पुरुषों का कथन मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है। राजेंद्र यादव का कहना था कि हिंदी साहित्य में जिस खेमेवाजी का जिक्र मैंने अपने संबोधन में किया वैसा दरअसल कुछ होता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘जो पत्रिका विवादास्पद नहीं है, वह बेकाम है। विवादास्पद होने का मतलब यथास्थितिवाद का विरोध् है, जहां यथास्थितिवाद का प्रतिपक्ष रखा गया हो।’’ नामवर जी ने, राजेंद्र जी ने सलाह दी है कि ‘‘पत्रिका चलाने के लिए जरूरी नहीं है कि वह विवादास्पद हो। अविवादास्पद ‘हंस’ को उन्होंने किस तरह विवादास्पद बनाना चाहा था, अगर उसी तरह पत्रिका चलती है तो ‘हंस’ जहां से चला था और उसकी जो गति हुई है, ‘पाखी’ उसी गति को प्राप्त होगी। पत्रिका जरूर हस्तक्षेप करें, लेकिन मूलतः उसका जोर रचना पर हो। ‘पाखी’ ‘हंस’ बनने की कोशिश ना करें तो उसके हक में है, यह मेरी राय है।’’ हिंदी साहित्य संसार के इन दो शिखर पुरुषों का कथन हालांकि पूरी तरह से एक-दूसरे का विरोधाभाषी है, लेकिन अपनी-अपनी जगह सच भी है। राजेंद्र जी ने बजरिए ‘हंस’ कई ऐसे मुद्दो को छुआ जिन्होंने बड़ी सहस, बड़े विर्मशों को जन्मा। कई बार उनके संपादकीय विवाद का कारण भी बने। ‘हंस’ की पहचान लेकिन इन्हीं मुद्दों और विवादों से बनी और खूब बनी। नामवर जी ने रचनाओं पर जोर दिए जाने की बात कहीं। किसी भी साहित्यिक पत्रिका की आत्मा उसमें प्रकाशित होनी वाली रचनाएं ही होती हैं। ऐसे में हमने पिछले ग्यारह सालों में इन दोनों शिखर पुरुषों  की सलाह मानते हुए मुद्दो और रचनाओं की स्तरीयता के मध्य संतुलन साधने का प्रयास किया। जाहिर है यथास्थितिवाद को जब-तब हमने छेड़ा तो उसके ठहरे पानी में हलचल हुई, कई बार लहरें तक उठी जिन्होंने विवादों को जन्मा। प्रयास लेकिन हमारा, चाहे मेरे संपादन कार्य के प्रथम दो वर्ष रहे हों, अथवा प्रेम भारद्वाज के आठ वर्ष विवादों को अनावश्यक पैदा नहीं करने और रचनाओं पर जोर देने का ही रहा। ‘पाखी’ के चलते उपजे या उपजाये गए विवादों पर इस समय कुछ लिखना मेरी समझ से एक अन्य किस्म के विवाद को जन्म देने का कारक बन सकता है, इसलिए उन पर चर्चा फिर कभी। हां एक प्रसंग पर मैं जरूर कुछ लिखना जरूरी समझता हूं। हालांकि मैं वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी के ‘पाखी’ में प्रकाशित लंबी बातचीत के बाद उठे साहित्यक बवंडर पर पहले ही अपनी बात कह चुका हूं, लेकिन दोबारा ‘पाखी’ का संपादन संभालने के बाद कई मित्रों से हुई बातचीत से मुझे एहसास हुआ कि इस प्रसंग के चलते बहुतों के मन में इस पत्रिका को लेकर संशय और बहुत आक्रोश है। ‘पाखी’ के अपने प्रथम संपादकीय में मैंने इस पत्रिका को ‘हर प्रकार के वैचारिक पूर्वाग्रहों और साहित्यिक मठों की घेराबंदी से मुक्त’ रखने की बात कही थी। यदि मैं अपने कहे पर कईयों की दृष्टि में खरा नहीं उतर पाया हूं तो जरूरी है कि अपनी स्थिति ऐसो के समक्ष स्पष्ट करूं।
विश्वनाथ त्रिपाठी देश के शीर्ष आलोचकों में से एक हैं। इस सत्य से ना तो कोई इंकार कर सकता है, ना ही ‘पाखी’ या अन्य किसी पत्रिका अथवा संपादक/लेखक के कहने भर से विश्वनाथ त्रिपाठी के हिंदी साहित्य में योगदान को कम किया जा सकता है। त्रिपाठी जी को ‘पाखी’ संग सवांद हेतु आमंत्रित करने का आग्रह मेरा था। मैं उनके संग साहित्य से इतर कुछेक मुद्दों पर चर्चा करना चाहता था। कुछ ऐसी मेरी जिज्ञासाओं पर मैं उनका मार्गदर्शन चाहता था जो मुझे परेशान करती हैं। तब यह आशंका अथवा आरोप तो पूरी तरह से बुनियाद है कि किसी षड्यंत्रा के तहत् विश्वनाथ त्रिपाठी की गरिमा को प्रभावित करने का काम किया गया। एक प्रश्न पर त्रिपाठी जी के उत्तर से जो विवाद उपजा, मैं उस पर अपने स्टैन्ड पर पूरी तरह कायम रहते हुए, मात्रा इतना जोड़ना चाहता हूं कि त्रिपाठी जी की मंशा कतई भी वह नहीं हो सकती जिसके लिए उन्हें टारगेट किया गया। अच्छा होता कि उस प्रश्न और उसके उत्तर को इस बातचीत से हटा दिया जाता। विश्वनाथ त्रिपाठी जी संग हमारा जुड़ाव इस पत्रिका के प्रथम अंक से रहा है। किसी भी परिस्थिति में हमारा उद्देश्य उनकी गरिमा से खिलवाड़ करना अथवा उनकी घेराबन्दी कर किसी व्यर्थ के विवाद सहारे ‘पाखी’ की टीआरपी बढ़ाना नहीं हो सकता। बात का लेकिन बतंगढ़ बन गया। विश्वनाथ त्रिपाठी को निश्चित ही इस सबके चलते दुख पहुंचा होगा जिसका मुझे बेहद अफसोस है। मैं पूरी ईमानदारी और सत्यनिष्ठा से यह दोहराना चाहता हूं कि हमारा उद्वेश्य कत्तई भी उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाना, उन्हें अपमानित करना नहीं था। वे हमारे आदरणीय है इसलिए बगैर किसी किन्तु-परन्तु मैं ‘पाखी’ की तरफ से, अपनी तरफ से उनसे क्षमा मांगता हूं। साथ ही इस प्रसंग के चलते जिस किसी भी मित्र को हमारी नीयत पर शंका हुई हो, उन्हें भी आश्वस्त करना चाहता हूं कि ‘पाखी’ सृजन के सार्थक मुकाम को हासिल करने के लिए जन्मी है, व्यर्थ के वाद-विवाद को जन्मने के लिए नहीं।
पत्रिका का नवीनतम अंक आपको इसी भावना के साथ समर्पित है। स्व, नामवर सिंह ने ‘पाखी’ की निर्बाध् उड़ान का जिक्र करते हुए रचनाओं पर जोर देने और स्व. राजेंद्र यादव ने यथास्थिति का विरोध् करने की जो अपेक्षा हमसे की थी, उस पर खरा उतरने का मेरा भरसक प्रयास रहेगा। आप सबका सहयोग इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। सपांदन संभालने के साथ ही मुझे रचनाकारों का जो स्नेह मिला उससे मैं अभिभूत हूं। विशेष रूप से मैं भालचंद्र जोशी, पंकज शर्मा और शैलेय को धन्यवाद देना चाहता हूं जिन्होंने मुझे कई नए रचनाकारों से जोड़ा। साथ ही उन लेखकों का भी हृदय से आभार जिन्होंने मेरे आग्रह का सम्मान रखा। आपका निष्पक्ष मूल्यांकन अपेक्षित है।

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