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Editorial

न्यायाधीशों को सलाम!

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 15 जून 2021 को जो ऐतिहासिक फैसला ‘पिंजरा तोड़’ संस्था से जुड़े छात्र नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की बेल पेटिशन पर सुनाया है वह दिल्ली के गालों पर करारे तमाचे सरीखा है। दिल्ली से मेरा तात्पर्य केंद्र की सत्ता से है। उस सत्ता से जिस पर जनता जनार्दन ने सात बरस पूर्व बहुत उम्मीदों के साथ नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी को बैठाया था। सत्ता निरंकुश होती है। लोकतंत्र लेकिन निरंकुश सत्ता को कभी नहीं सहन कर सकता। बीते सात बरस हमने धीरे-धीरे सत्ता को निरंकुश होते देखा है, देख रहे हैं। अगले वर्ष 75 बरस के होने जा रहे देश में यह निरंकुशता का चरम दौर है। आपातकाल से कहीं ज्यादा खौफनाक दौर। ऐसे समय में दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला बड़ी राहत, बहुत सारी उम्मीदों को जगाने वाला निर्णय है। ‘पिंजड़ा तोड़’ की कार्यकर्ताओं नताशा नरवाल, देवांगना कलिता और छात्र नेता आसिफ इकबाल तन्हा की रिहाई का आदेश देते हुए हाईकोर्ट दिल्ली के न्यायाधीश, न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल एवं न्यायमूर्ति अनूप जयराम भम्भानी ने दिल्ली पुलिस द्वारा इन सामाजिक कार्यकर्ताओं पर आतंक निरोधक कानून यूएपीए की धाराओं को लगाने पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा ‘It seems, that in its anxiety to suppress dissent, in the mind of state, the line between the constitutionally guaranteed right to protest and terrorist activity seems to be getting somewhat blurred. It this mind set agins traction, it would be a sad day for democracy’ (ऐसा प्रतीत होता है कि मतभेद को दबाने की उत्कंठा के चलते सरकार संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों और आतंकी गतिविधियों के मध्य का अंतर समझ पाने में असफल हो रही है। यदि ऐसी सोच बनी रही तो वह लोकतंत्र के लिए एक उदास दिन होगा।) इस निर्णय का सीधा तार जुड़ता है 13 जनवरी, 2018 की सुबह 10 बजे बुलाई गई उस प्रेस काॅन्फ्रेंस से जिसे सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने संबोधित करते हुए कहा था ‘लोकतंत्र खतरे में है।’ भारत के इतिहास में ऐसी प्रेस काॅन्फ्रेंस अनुठी थी। जिसमें न्याय की सबसे बड़ी पीठ के सबसे वरिष्ठ चार न्यायधीशों ने सिस्टम के बरस्क अपनी असहाय स्थिति को सार्वजनिक कर डाला था। जल्द भूल जाने की बिमारी से ग्रस्त हमारा समाज अब तक शायद इसे एक सामान्य घटना मान भूल बैठा होगा। इसी प्रेस काॅन्फ्रेंस में पत्रकारों के सवालों का जवाब देते समय न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने स्वीकारा था कि उनकी इस प्रेस काॅन्फ्रेंस के तार वरिष्ठ भाजपा नेता और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से जुड़े एक आपराधिक मामले की जांच कर रहे जज बृज गोपाल हरकिशन लोया की संदेहांस्पद मौत से जुड़े हैं। यह अलग बात है, अजब बात है कि इस क्रांतिकारी प्रेस काॅन्फ्रेंस को संबोधित करने वाले एक जज न्यायमूर्ति रंजन  गोगोई ने बाद में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते कई विवादास्पद निर्णय दिए, कई विवादों में वे घिरे और सेवानिवृति के पश्चात तमाम नैतिक मान्यताओं को परे धकेल वे सत्तारूढ़ भाजपा का कृपा पात्र बन अब राज्यसभा के सदस्य बन बैठे हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्णय मुझे याद दिला रहा है उन महान न्यायाधीशों की जिन्होंने भारी दबाव और प्रलोभनों को ठुकराते हुए सच का साथ दिया ताकि लोकतंत्र बचा रहे, देश बचा रहे हैं।

भारतीय न्यायपालिका, विशेषकर सुप्रीमकोर्ट के जिन निर्णयों ने लोकतंत्र को मजबूत दी उनमें सबसे महत्वपूर्ण केस ‘केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य’ है। 24 अप्रैल 1973 को दिए गए इस निर्णय ने संविधान प्रदत्त अधिकारों को सर्वोच्य मानते हुए न्यायपालिका को यह अधिकार दिया कि संसद द्वारा पारित किए गए हर संविधान संशोधन विधेयक को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है तथा संसद के पास यह अधिकार नहीं है कि वह संविधान की मूल भावना संग छेड़छाड़ कर सके। यही वह निर्णय था जिससे नाराज हो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर पहला प्रहार किया। इस निर्णय को देने वाली ग्यारह सदस्यीय पीठ के प्रमुख तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस.एम. सिकरी के सेवानिवृत होते ही इंदिरा गांधी ने तीन वरिष्ठम न्यायधीशों को किनारे लगा एक जूनियर न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए.एन. रे को नया मुख्य न्यायाधीश बना डाला। न्यायमूर्ति ए.एन. रे वे न्यायाधीश थे जिन्होंने सरकारी दलीलों को सही मानते हुए ‘केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य’ मामले में अपना निर्णय दिया था। नतीजा यह रहा कि सरकार के इस निर्णय का विरोध करते हुए दो वरिष्ठ न्यायधीशों ने सुप्रीमकोर्ट से इस्तीफा दे दिया।
इसके बाद लगातार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी न्यायपालिका पर प्रहार करती गईं। उन्होंने जनवरी 1977 में न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना को मुख्य न्यायाधीश बनाने से इंकार कर उनसे जूनियर न्यायाधीश न्यायमूर्ति एमएच बेग को मुख्य न्यायाधीश बनाया। विरोध स्वरूप हंसराज खन्ना ने इस्तीफा दे दिया। न्यायमूर्ति खन्ना उन न्यायधीशों में शामिल थे जिन्होंने सरकार के खिलाफ ‘केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य’ मामले में निर्णय दिया था। इंदिरा जी न्यायमूर्ति खन्ना से इसलिए भी खासी नाराज थीं कयोंकि उन्होंने एक अन्य ऐतिहासिक फैसला सरकार के खिलाफ ‘एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला’ मामले में दिया था। आपातकाल को अब तक की हमारी लोकतंत्रिक यात्रा का सबसे काला अध्याय कह पुकारा जाता है। ऐसे कठिन समय में न्यायमूर्ति खन्ना एक प्रकाश स्तंभ बन उभरे थे। आपातकाल के दौरान केंद्र एवं राज्य सरकारों ने विपक्षी दलों के नेताओं समेत हर उस आवाज को कुचलने का दमनचक्र शुरू कर डाला था जो आपातकाल का विरोध कर रही थी। ताबड़तोड़ गिरफ्तारियां उस दौर में हुईं। कई मामलों में ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण’ (Habeas corpus) याचिकाएं डाली गईं जिन पर कई राज्यों की हाईकोर्ट ने गिरफ्तार नागरिकों को छोड़े जाने का आदेश सुनाया था। ऐसा ही एक मामला ‘एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला’ था जिसमें बंदी प्रत्यक्षीकरण को लेकर केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट जा पहुंची थी। सरकार का तर्क था कि आपातकाल के दौरान संविधान प्रदत्त हर अधिकार स्थगित रहता है। बंदी प्रत्यक्षीकरण संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा जीवन का अधिकार के अंतर्गत आता है। सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने इस मामले की सुनवाई बाद सरकार के पक्ष में बहुमत का फैसला सुनाया। केवल न्यायमूर्ति खन्ना ने सरकार के खिलाफ अपना फैसला दिया। उन्होंने कठोर शब्दों में लिखा ‘The constitution and laws of India do not permit life and liberty be at the mercy of the absolute opinion of the executive… what is at stake is the rule of law. The question is whether the law speaking through the authority of court shall be absolutely silenced and redered mute..detention without trial is an anathema to all those who love personal liberty’ हंसराज खन्ना जानते थे यह निर्णय उन पर भारी पड़ेगा। इस निर्णय पश्चात उन्होंने अपनी बहन को कहा था अब उन्हें सरकार चीफ जस्टिस कतई नहीं बनने देगी। जस्टिस हंसराज खन्ना का यह निर्णय भारत ही नहीं विदेशा में  तक गूंजा। ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने तब इस पर लिखा था ‘यदि भारत में कभी लोकतंत्र वापस स्थापित हुआ तो निश्चित रूप से कोई न कोई सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश हंसराज खन्ना का एक स्मारक अवश्य बनाएगा। ‘एक स्वतंत्र न्यायपालिका का सरकार के समक्ष समर्पण करना लोकतांत्रिक समाज के विनाश का अंतिम चरम है और भारतीय न्यायपालिका इस समर्पण के निकट पहुंच चुकी है।’ ऐसा हुआ। संविधान विशेषज्ञ नानी पालिकावाला ने आपातकाल पर लिखी अपनी एक पुस्तक का पूरा अध्याय ‘Salute to Justice Khanna’ लिखा। 1978 में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की पहल पर न्यायमूर्ति खन्ना की आदमकद तस्वीर उनके कोर्ट रूम में लगाई गई। ऐसा पहली बार हुआ कि किसी न्यायधीश के जिंदा रहते उनकी तस्वीर सुप्रीम कोर्ट में लगाई गई हो। इसलिए मुझे न्यायमूर्ति सिद्वार्थ मुकुल एवं न्यायमूर्ति अनूप जयराम भम्भानी के इस निर्णय ने उन महान न्यायधीशों का स्मरण करा दिया जिन्होंने सत्ता की निरंकुशता के सामने समर्पण न करते हुए संविधान की रक्षा के लिए अपने भविष्य को दांव में लगाने का जोखिम उठाया। वर्तमान दौर में भी आपातकाल की तरह हर संवैधानिक संस्था का क्षरण होते हम देख रहे हैं। सरकारी जांच एजेेंसियों का दुरुपयोग चरम पर है। आपातकाल में इंदिरा सरकार के पास ‘मीसा’ कानून था तो वर्तमान सरकार के पास मौजूद ‘यूएपीए’ तांडव कर रहा है। हाईकोर्ट के आदेश को दिल्ली पुलिस ने सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी है। इसलिए पिक्चर अभी बाकी है। देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीमकोर्ट इस पर क्या निर्णय लेती है। उसका निर्णय लोकतंत्र को बचाए रखने अथवा उसको कमजोर करने की कसौटी वाला निर्णय होगा। सुप्रीमकोर्ट चाहे जो फैसला दे, अपना तो दोनों न्यायधीशों को सलाम देना बनता है। ‘Salute to both the Judges’

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