Editorial

प्रियंका की अग्नि परीक्षा

नेहरू की पर नवासी, इंदिरा की पोती, राजीव की बेटी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की बहन प्रियंका के राजनीति में आधिकारिक प्रवेश का ऐलान आगामी आम चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन के लिए बड़ी चुनौती बनता नजर आने लगा है। हालांकि उनके भाई और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने उन्हें पार्टी राष्ट्रीय महासचिव बनाते हुए उनकी जिम्मेदारी केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश तक सीमित कर डाली है, लेकिन तीन राज्यों में हालिया सत्ता में लौटी इस ग्रांड ओल्ड पार्टी में प्रियंका को लेकर भारी उत्साह उत्तर प्रदेश तक ही सीमित नजर नहीं आ रहा है। प्रियंका गांधी के नाम की औपचारिक घोषणा का असर इतना जबरदस्त रहा कि पार्टी से किनारा कर चुके कई नेता वापसी के लिए अकुलाते नजर आ रहे हैं। हालांकि एक बड़े वर्ग का, खासकर वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान की नीतियों और केंद्र सरकार के कामकाज से प्रभावित वर्ग का मानना है कि इस गांधी की राजनीति में एंट्री का कोई बड़ा असर नहीं पड़ने वाला, इतिहास लेकिन कुछ और ही तरफ इशारा कर रहा है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु पश्चात जब उनकी पुत्री इंदिरा गांधी लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में शामिल की गई थीं तब विपक्षी दलों के साथ-साथ नेहरू के कई साथियों ने भी उनकी क्षमताओं को कमतर करके आंका था। कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष एस निजलिंगप्पा तो इंदिरा को गूंगी गुड़िया कह पुकारते थे। बाद के वर्षों में उन्हीं इंदिरा को दुर्गा कहा जाने लगा। सोनिया गांधी के प्रति भी विपक्षी दलों के नेताओं और कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं की धारणा सकारात्मक नहीं रही। शुरुआती दौर में उनके विदेशी मूल को सामने रख उन पर निशाना साधा गया। हिंदी भाषा में उनकी कमजोर पकड़ को लंबे अर्से तक हास्य में लिया जाता रहा। भाजपा की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज और उमा भारती ने तो 2004 में उनके प्रधानमंत्री बनने की संभावना देखते हुए सिर मुंडवा लेने की हल्की बात तक कह डाली थी। तमाम विरोध बावजूद सोनिया गांधी को श्रेय जाता है कि उन्होंने नरसिम्हा राव के समय में कमजोर पड़ी पार्टी को वापस राष्ट्रीय राजनीति की मुख्यधारा में ला खड़ा किया। दरअसल महिलाओं के प्रति, उनकी नेतृत्व क्षमता के प्रति हमारे समाज का दृष्टिकोण हमेशा से ही संकुचित रहा है। पाकिस्तान के जन्मदाता मोहम्मद अली जिन्ना की बहन फातिमा जिन्ना ने जब राजनीति में उतरने का निर्णय लिया तो तत्कालीन फौजी शासक अय्यूब खान के समर्थकों ने उन पर नाना प्रकार के आरोप लगा डाले थे। कुछ ऐसा ही जुल्फिकार अली भुट्टो की पत्नी नुसरत भुट्टो के साथ किया गया था। मैं कहना यह चाहता हूं कि अब जबकि प्रियंका राजनीति के मैदान में उतर चुकी हैं, उन्हें भी तैयार रहना होगा ऐसे आरोपों के लिए। न केवल तैयार, बल्कि उनकी काट के लिए भी कांग्रेस पार्टी को चौकन्ना रहना पड़ेगा। प्रियंका गांधी ऐसे दौर में कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव बनाई गई हैं जब पार्टी का आजादी के बाद वर्तमान लोकसभा में सबसे कम प्रतिनिधित्व है। इतना ही नहीं मोदी की करिश्माई छवि के चलते भाजपा 2014 के बाद हुए लगभग सभी राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को परास्त कर चुकी है। हालांकि पिछले वर्ष के अंत में मध्य प्रदेश, राजस्थान, और छत्तीसगढ़ में मिली जीत के बाद कांग्रेस में कुछ जान वापस लौटी है। लेकिन देश की राजनीति का दिल कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश में पार्टी खस्ताहाल है। पिछले तीस बरसों से राज्य में कांग्रेस के सत्ता से बाहर रहने के चलते कभी पार्टी का कोर मतदाता रहा दलित, ओबीसी, मुस्लिम और ब्राह्मण मतदाता दूसरे दलों के पाले में जा चुका है। जाहिर है विपक्षी दल वंशवाद के नाम पर कांग्रेस को भले ही पानी पी-पीकर कोसें, प्रियंका गांधी के लिए राह कांटों भरी है। राहुल गांधी ने उन्हें जिस पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी है, वहां पार्टी के पास बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं का तक अभाव है। ऐसे में प्रियंका गांधी से आस संजोए कांग्रेसियों के लिए इससे सुनहरा अवसर पार्टी को प्रदेश में पुनर्जीवित करने का कोई और हो नहीं सकता। आम कांग्रेसी के उत्साह को देखते हुए मुझे प्रतीत होता है कि उनका आधिकारिक तौर पर राजनीति के मैदान में उतरना उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी कांग्रेस के लिए फायदेमंद होने जा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष ने ‘न्यूनतम आमदनी गारंटी’ योजना का जुमला उछाल पहले ही भाजपा समेत एनडीए गठबंधन के दलों में भारी बेचैनी पैदा कर डाली है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेसी सरकार बनने के तुरंत बाद ही किसानों की कर्ज माफी कर कांग्रेस ने इस लोकसभा चुनाव में भाजपा से बढ़त लेने की पहल सफलतापूर्वक कर डाली थी। हालांकि मोदी सरकार ने अपने अंतिम आम बजट को खासा लोक लुभावन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, जनता लेकिन उनके मंतव्य पर प्रश्न उठाती नजर आ रही है। पूछा जा रहा है कि पिछले चार बजटों के दौरान केंद्र सरकार के जनसरोकार कहां गायब रहे और क्यों गायब रहे। रोजगार के वादे का क्या हुआ, कालाधन कितना वापस आया और नोटबंदी के बाद देश की अर्थव्यवस्था में क्या और कितना सुधार हुआ। सवाल जनता के मन में बहुत हैं, बहुत टेढ़े हैं, जिनका संतोषजनक उत्तर किसी भाजपा नेता के पास है नहीं। ऐसे में प्रियंका गांधी की राजनीति में इंट्री मेरी समझ से कांग्रेस के लिए बड़ी फायदेमंद रहने वाली है। इसके साथ ही यह भी तय है कि अब राहुल गांधी के बजाए प्रियंका ही विपक्षी दलों, विशेषकर भाजपा के निशाने पर रहेंगी। उनकी चाल-ढाल, वेशभूषा, खान-पान, परिवार से लेकर उनके स्वास्थ, उनके आचार-व्यवहार पर प्रहार होने शुरू भी हो चुके हैं। जैसे-जैसे आम चुनाव नजदीक आते जाएंगे, प्रियंका के खिलाफ दुष्प्रचार तेज होना तय है।
कभी गांधी परिवार के मित्र रहे भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने प्रियंका को हिंसक प्रवृत्ति का कह इस दुष्प्रचार की शुरुआत कर डाली है। ‘फेसबुक’ के ‘हमलोग’ पेज में एक वीडियो प्रियंका गांधी के महासचिव बनने के साथ ही अपलोड किया गया है। इसमें लिखा है ‘शाम होते ही शराब के नशे में चूर हो जाने वाली से कांग्रेस को उम्मीद हो सकती है, मगर देश को नहीं।’ सोशल मीडिया में इस वीडियो को तेजी से वायरल किया गया। सच्चाई यह है कि यह वीडियो उस समय का है, जब अप्रैल 2018 में उत्तर प्रदेश के कथुआ और उन्नाव में हुए बलात्कार कांड के बाद कांग्रेस ने दिल्ली में एक कैंडल मार्च निकाला था जिसमें राहुल गांधी और प्रियंका गांधी भी शामिल हुए थे। चूंकि पार्टी के कार्यकर्ता और मीडिया प्रियंका के नजदीक जाने के लिए धक्का-मुक्की कर रहे थे इसलिए उन्होंने तीखे लहजे में सभी को शांतिपूर्वक कैंडल मार्च में रहने को कहा। आज की राजनीति झूठ को हथियार बना की जा रही है इसलिए इस वीडियो का इस्तेमाल प्रियंका गांधी की छवि धूल-धूसरित करने की नीयत से किया जा रहा है। उनके कांग्रेस महासचिव बनने के तुरंत बाद उनके पति रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ पिछले पौने पांच साल से कछुए की रफ्तार से चल रही विभिन्न जांचों में भी यकायक ही तेजी आ चुकी है।
ऐसे में यह केवल और केवल प्रियंका पर निर्भर करता है कि वे अपनी दादी समान ही आयरन लेडी साबित हो कांग्रेस के लिए संजीवनी का काम करने और जन सामान्य के समक्ष अपनी नेतृत्व क्षमता स्थापित करने के लिए कितनी तैयारी के साथ मैदान में उतर रही हैं। जिस अंदाज में वे अपने पति रॉबर्ट वाड्रा को प्रवर्तन निदेशालय के दफ्तर छोड़ने पहुंची हैं उससे ऐसा लग रहा है कि वे वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान संग सीधे भिड़ने का मन बना चुकी हैं। कांग्रेस कार्यकर्ताओं को अपनी नेता का यह अंदाज खासा सुहा रहा है। स्मरण रहे प्रियंका की दादी इंदिरा गांधी के यही तेवर उन्हें 1977 की करारी पराजय के बाद मात्र ढाई बरस में ही केंद्र की सत्ता में वापसी का कारण बने थे। तत्कालीन जनता सरकार ने भ्रष्टाचार के एक कथित मामले में उनकी गिरफ्तारी का प्रयास किया था। इंदिरा गांधी को पुलिस दिल्ली से बाहर कहीं ले जा रही थी। इंदिरा जी रास्ते में ही धरने पर बैठ गईं। उनके हठ की जीत हुई और जनता सरकार, विशेषकर तत्कालीन गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह के राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी भूल इस प्रसंग को माना गया। मैं प्रियंका गांधी का अपने पति संग इन्फोर्समेंट डायरेक्ट्रेट के दफ्तर पहुंचने को इस प्रसंग से जोड़कर देख रहा हूं। वाड्रा अंततः कानून की दृष्टि में दोषी साबित होंगे या नहीं, यह समय बताएगा। प्रियंका को अवश्य ही उनकी निडरता का राजनीतिक लाभ पहुंचेगा। चूंकि विपक्ष पूरी ताकत संग प्रियंका पर प्रहार करेगा। ऐसे में भविष्य के गर्भ में झांकने की हिमाकत मैं नहीं कर सकता, इतना अवश्य अपनी समझ से कह सकता हूं कि यह गांधी मोदी की करिश्माई छवि पर भारी भी पड़ सकती हैं।

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