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Editorial

कैद में रहने को विवश तोता

एफआईआर संख्या आरसीए1 2019 ए005ए दिनांक 23 अक्टूबर 2019 मेरे सामने है। देश की राजधानी नई दिल्ली के सीबीआई थाने में इस एफआईआर को शीर्ष जांच एजेंसी सीबीआई ने दर्ज कराया है। ये वही सीबीआई है जिसे देश की सर्वोच्च अदालत ने ष्कभी पिंजरे में बंद तोताष् कह पुकारा था। महीना था मई काए वर्ष था 2013ए केंद्र में सत्ता थी कांग्रेस की। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा ने न केवल सीबीआई को पिंजरे में बंद तोता कहाए बल्कि ष्अपने मालिक की आवाज (It’s master’s voice) भी कह डाला। एफआईआर संख्या आरसीए1ए 2019ए ए005 भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून की धारा 7ए 8ए 9ए 12 एवं भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी के तहत दर्ज की गई है। महीना है अक्टूबरए वर्ष है 2019ए केंद्र में काबिज है भाजपा। दर्ज एफआईआर में मुजरिम बनाए गए हैं कांग्रेस के वर्तमान राष्ट्रीय महासचिव एवं उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावतए उत्तराखण्ड की वर्तमान भाजपा में कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत और ष्समाचार प्लसष् टीवी चैनल के प्रबंध संपादक उमेश कुमार। एफआईआर में हरक सिंह रावत को उत्तराखण्ड का पूर्व मंत्री बताया गया है। यानी वर्तमान सरकार में वे मंत्री हैं इस बात का उल्लेख करने से ष्पिंजरे में बंद तोतेष् ने परहेज किया है। इस एफआईआर को दर्ज करने से पहले सीबीआई ने 25 अप्रैल 2016 को एक पीई दर्ज की थी। पीई यानी प्रिलिमनरी इन्क्वायरी (Preliminary Enquiry) को दर्ज करने के बाद देश की सबसे तेज.तर्रार कही जाने वाली सीबीआई को पूरे साढ़े चार साल केवल इस बात को तय करने में लग गए कि जिस कथित अपराध को लेकर उसे जांच करने को कहा गया हैए वह अपराध वाकई में बनता भी है या नहीं। पूरे साढ़े चार साल तोता पिंजरे में बंद फड़फड़ता रहा कि कब उसे इशारा मिले और वह या तो मुकदमा दर्ज करे या फिर कथित षड्यंत्रकारियों को बेदाग बरी कर दे। इन साढ़े चार सालों में देश में बहुत कुछ बदल गया। ग्रैंड ओल्ड पार्टी कांग्रेस के गुनाहए उसके तौर.तरीकेए केंद्रीय जांच एजेंसियों के जरिए अपने विरोधियों को डरानेए धमकाने का उसका तरीका उसी पर वर्तमान सत्ता.प्रतिष्ठान पर काबिज भाजपा ने अपनाना शुरू कर दिया। सीबीआई कांग्रेस के राज में यदि ष्पिंजरे में बंद तोता थीष्ए अपने मालिक की आवाज थी तो वर्तमान दौर में वह पिंजरे में बंद ऐसा तोता बन चुकी है जो पंख फड़फड़ा भी नहीं सकता क्योंकि उसके पर कतर दिए गए हैं। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई के शब्दों को याद कीजिए कि ष्लोकतंत्र खतरे में हैष्। सीबीआई के जांच अधिकारी साढ़े चार बरस बाद साढ़े तीन पन्नों की अपनी रिपोर्ट में कह रहे हैं कि उत्तराखण्ड के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावतए तत्कालीन कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत और पत्रकार उमेश कुमार भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून 1988 के अंतर्गत आपराधिक षड्यंत्र करने और संवैधानिक पद पर रहते हुए भ्रष्टाचार करने के दोषी हैं। अब बेचारे हरक सिंह रावत बुरे फंस गए हैं। उन्हें जरा भी इल्हाम नहीं रहा होगा कि जो गड्ढ़ा वह अपने अजीज उमेश कुमार के साथ मिलकर हरीश रावत के लिए खोद रहे हैंए उसमें वे दोनों ही जा गिरेंगे। बहुतों को जानकारी नहीं है इसलिए उन सभी तक बात पहुंचे कि हरक सिंह रावत की शिकायत पर ही उत्तराखण्ड सरकार ने राष्ट्रपति शासन के दौरान यह मामला सीबीआई को सौंपा था। दिन था 25 मार्च 2016ए जब हरक सिंह रावत ने तत्कालीन राज्यपाल उत्तराखण्ड को एक शिकायती पत्र और एक वीडियो रिकाॅर्डिंग सौंपी थी जिसमें उन्होंने हरीश रावत पर विधायकों की खरीद.फरोख्त करनेए उन्हें धमकानेए पैसा आॅफर करने आदि का आरोप लगाया था। राज्य में तब जबर्दस्त राजनीतिक उठापटक चल रही थी। 18 मार्च 2016 को राज्य विधानसभा में बजट बिल पास होने के साथ ही कांग्रेस दो फाड़ हो गई थी। कांग्रेसी नेता विजय बहुगुणा के नेतृत्व में दस विधायक बागी हो चुके थे। सीबीआई की जांच रिपोर्ट कहती है कि इन बागियों को भाजपा के कुछ नेता एक विशेष विमान द्वारा उठा ले गए थे। उमेश कुमार बकौल सीबीआई गुरुग्राम ;हरियाणाद्ध जाकर हरक सिंह रावत से मिले। इस मुलाकात के दौरान ही एक आपराधिक षड्यंत्र की रूपरेखा तैयार हुई। हरक सिंह ने कांगे्रस में वापसी के लिए तीन शर्तें रखी। पहली उन्हें डिप्टी सीएम बनाया जाएए दूसरा मोटी नकदी और तीसरा दो महत्वपूर्ण मंत्रालय। उमेश कुमार इस पूरे प्रसंग में खासे एक्टिव रहे। तुरंत बेचारे देहरादून भागे।
तत्कालीन सीएम को एयरपोर्ट में जा घेरा। हरीश रावत की हरक सिंह से बात कराईए लेनदेन का जिक्र हुआ। राजनीति के घाघ हरीश रावत सरकार बचाने के चक्कर में और पल.पल बदल रहे समीकरणों के चलते इतने उलझावए दबाव में थे कि उमेश कुमार द्वारा बिछाए गए जाल में जा फंसे। निश्चित ही यह उनकी भारी चूक के साथ.साथ नैतिक पराजय का क्षण था। उमेश कुमार इतने भलेए इतने कांग्रेस प्रेमी कि स्वयं करोड़ों की धनराशि हरीश रावत को मुहैया कराने के लिए तैयार हो गए। रावत इतने व्याकुल कि उन्होंने उमेश कुमार के प्रस्ताव को स्वीकारा ही नहींए बल्कि हरक सिंह को मनमाफिक मंत्रालय देने और उन मंत्रालयों को खुलकर लूटने की छूट देना तक स्वीकार लिया। अब प्रश्न यह उठता है कि यदि सही में उमेश कुमार अपनी पत्रकारीय नैतिकता को लांध बिचैलिया बन हरीश रावत की सरकार को बचाने का काम कर रहे थे तो फिर उन्होंने सारी बातचीत रिकाॅर्ड क्यों कीघ् जाहिर है या तो उमेश कुमार भाजपा के लिएए भाजपा के किसी बड़े नेता के कहने पर यह सब कर रहे थे जिसके चलते उन्होंने दो खांटी पहाड़ी ठाकुरों को अपने चंगुल में लेकर यह सब खेल खेला या फिर वे डबल क्राॅस की नीयत लिये थे। यानी उनकी मंशा इस पूरे खेल में स्वयं के लिए कुछ मोटा माल कमाने की रही थी। मेरी जानकारी अनुसार सब कुछ भाजपा नेताओं की रजामंदी से हुआ। उमेश कुमार ष्हर दिल अजीजष् मिजाज के पत्रकार हैं। वर्तमान केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री डाॅ रमेश पोखरियाल ष्निशंकष् के भी एक समय में वे खासे करीब थे। बाद में दोनों के बीच ष्अज्ञातष् कारणों के चलते अलगाव हो गया था। उस दौर में जब निशंक उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री थे उमेश कुमार देहरादून से यहां तक कि राज्य से तड़ीपार कर दिए गए थे।
उल्लेखनीय यह है कि एक तरफ उत्तराखण्ड की पुलिस उन्हें तलाशने के लिए जी जान से जुटी थीए दूसरी तरफ राज्य भाजपा के एक बड़े दिग्गज ने उन्हें अपने दिल्ली स्थित घर में शरण दे रखी थी। राज्य में जब कांग्रेस की सरकार बनी तो उमेश कुमार तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के खास बन बैठे। हरीश रावत के समय में जरूर उनकी हनक और धमक में कमी आई जिसके चलते उनका ष्बाल सुलभ मनष् एक बार फिर उनको भगवा खेमे में ले गया। बहरहाल हरीश रावतए हरक सिंह रावत और उमेश कुमार पर दर्ज एफआईआर और सीबीआई की कार्यप्रणाली पर वापस लौटा जाए। यह स्पष्ट है कि सीबीआई साढ़े चार साल तक शुरुआती जांच यानी पीई में ही अटकी रही क्योंकि मामला कुछ बनता नहीं था। नैतिक रूप से हरीश रावत अवश्य दोषी कहे जा सकते हैंए लेकिन संज्ञेय अपराध के दोषी नहीं। इसलिए सीबीआई उनके खिलाफ मामला दर्ज करने से बचती रही। फिर यकायक ही तोते को आदेश कहीं से मिलाए वर्तमान मालिकों सेए तो एफआईआर बनाने की कवायद शुरू हुई। संकट यह था कि हरीश रावत पर षड्यंत्र करनेए खरीद.फरोख्त करने का आरोप लगाने वाले हरक सिंह रावत भाजपा में शामिल होकर वर्तमान उत्तराखण्ड सरकार में मंत्री बन चुके थे। उन्हें पूरे खेल का हिस्सा बनाए बगैर हरीश रावत को घेरा नहीं जा सकता था। उमेश कुमार जरूर इस दौरान भाजपा नेतृत्व की नजरों में गिर चुके थे। त्रिवेंद्र सिंह रावत का स्टिंग करने के चलते उनकी विश्वसनीयता भी पूरी तरह भाजपा की निगाहों में खत्म हो चुकी थी और उमेश कुमार जेल यात्रा कर चुके थे। चूंकि हरीश रावत की घेराबंदी जरूरी थी इसलिए शिकायतकर्ता हरक सिंह को भी आरोपी बना एफआईआर अंततः दर्ज कर ली गई। अब प्रश्न उठता है कि हरक सिंह का क्या होगाघ् नैतिकता कहती है कि उन्हें मंत्री परिषद् से इस्तीफा दे देना चाहिए। लेकिन नैतिकता का हरक सिंह अथवा आज के हमारे राजनेताओं से क्या लेना.देना। बहुत संभव है कि हरक सिंह को आगे चलकर सरकारी गवाह बना दिया जाए और मुख्य षड्यंत्रकारी हरीश रावत और उमेश कुमार को बना आगे की कार्यवाही हो। काूनन के जानकार मान रहे हैं कि यह केस अदालत में टिकने वाला नहीं। जाहिर है तोता और उसके मालिक भी यह जानते हैं। उद्देश्य कांग्रेस के दिग्गजों को घेरे में रखने का है इसलिए तात्कालिक तौर पर उनका उद्देश्य सध रहा है।
हरीश रावत इस मामले में दोषी हैं अथवा नहींए यह प्रश्न लेकिन गौण है। असल प्रश्न न्यायमूर्ति रंजन गोगोई के कथन ष्लोकतंत्र खतरे में हैष् से होकर संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और सत्ता के दुरुपयोग पर जा ठहरता है। यदि भाजपा सही में निष्पक्षता और पारदर्शिता से शासन चलाने के लिए कटिबद्ध है तो पहले उसे अपना घर दुरुस्त करना चाहिए। ष्हर दिल अजीजष् उमेश कुमार उत्तराखण्ड के वर्तमान मुख्यमंत्री पर लगातार भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप लगा रहे हैं। जिस वीडियो स्टिंग के चलते हरीश रावत पर मुकदमा दर्ज हुआ हैए ठीक वैसे ही कई स्टिंग उमेश कुमार वर्तमान सीएम की बाबत जारी कर चुके हैं। निष्पक्षता कहती है कि उन पर भी जांच होए मुकदमा दर्ज हो। लेकिन भाजपा नेतृत्व इस मुद्दे पर खामोश है। यानी ष्हमारा भ्रष्टाचार निराधारए तुम्हारा अनाचारष् की नीति पर अमल हो रहा है। अति सर्वत्र वर्जयते पुरानी कहावत है। इसे सभी स्वीकारते भी हैंए लेकिन अमल नहीं करते। आपातकाल में इंदिरा गांधी ने इसे भुला दियाए अब भाजपा इसे भुला चुकी है लेकिन समय बड़ा निष्ठुर होता हैए समय हमेशा एक का और एक सा नहीं रहता। फिर समय करवट लेगाए कांग्रेस के दिन बहुरेंगे जरूरए लेकिन तब भी तोता कैद में रहेगा। मालिक बदलेगा बाकी कुछ नहीं।

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