Editorial

हर शाख पे उल्लू…. 

हर शाख पे उल्लू …
मेरा मानना है कि ऐसे संवेदनहीन और घमंड़ी अफसरों पर राज्य सरकार को तत्काल कार्यवाही कर कम से कम इन्हें डीएम जैसे महत्वपूर्ण पद से तत्काल हटा देना चाहिए। इन अफसरों को भी यह याद रखना चाहिए और यदि याद नहीं रखें तो हमारा दायित्य इन्हें स्मरण कराने का है कि ये जनता के सेवक हैं, साहब बहादुर नहीं। सिविल सर्विस उत्तीर्ण कर इन्होंने आम जनता पर कोई एहसान नहीं किया है। टैक्स पेयरर्स के पैसों से इनका घर चलता है इसलिए हेकड़ी, घमंड और स्वयं को ‘साहब बहादुर’ मानने की प्रवृत्ति से बाज आएं अन्यथा जिस दिन जनता जनार्दन के सब्र का बांध टूटेगा, सारी अकड़ ट्टारी की ट्टारी रह जाएगी
An efficient bureaucracy is the greatest threat to liberty .The only thing that saves us from bureaucracy is its inefficiency.
Bureaucracy is more people doing less things, and taking more time to do them worse. A bureaucrat is an official who is clothed with and whome it doesn’t fit -Eugene Mccarthy, American politician, newpaper columnist, poet
अमेरिकी राजनीतिज्ञ, कवि और पत्रकार इम्यून मैकार्टी की नौकरशाही पर की गई उपरोक्त टिप्पणी मुझे यूं ही याद नहीं आई। उपरोक्त कथन को आपसे साझा करने के पीछे नैनीताल जनपद के वर्तमान जिलाधिकारी सविन बंसल, उनके कार्यालय के बाबुओं और जिले के मुख्य चिकित्साधिकारी का बेहद उदासीन और कुछ हद तक संवेदनहीन रवैया रहना है जिसके चलते एक बेहद सक्रिय गैरसरकारी संस्था द्वारा जनहित में किए गए प्रयासों को धक्का तो पहुंचा ही, इस संस्था के मनोबल पर भी चोट पहुंची है। तो चलिए आज चर्चा ऐसे संवेदनहीन नौकरशाही की जो खुद तो कुछ करने की चेष्टा करती नहीं, लेकिन जो अति उत्साही, समाज को कुछ वापस देने की नीयत से सक्रिय लोग, अपने स्तर पर कुछ करना चाहते हैं, उन्हें भी ऐसा कुछ करने से रोक, ये नौकरशाह अपनी चरम नकारात्मकता और अमानवीय सरोकारों का परिचय देते हैं।
नैनीताल जनपद में मुख्य रूप से सक्रिय वत्सल फाउंडेशन पिछले कई वर्षों से जनसेवा के कार्यक्रम आयोजित कराता रहा है। भारतीय जनता पार्टी के युवा नेता सुदीप मासीवाल की आकस्मिक मृत्यु के पश्चात उनकी बहन श्वेता द्वारा इस फाउंडेशन की नींव रखी गई और पिछले कई बरसों से ही लगातार वे आमजन को राहत पहुंचाने के उद्देश्य से इस फाउंडेशन के जरिए सक्रिय रहती हैं। श्वेता को हालांकि ऐसा करने की कोई जरूरत है नहीं। वे आर्थिक रूप से संपन्न हंै। विवाह पश्चात मुंबई में एक लक्जरी जीवन जीने की तमाम सुविधाएं उनके पास हैं। इसके बावजूद अपनी जन्मभूमि के प्रति उनका विलक्षण प्रेम, निष्ठा और मानवीय सरोकार उन्हें लगातार उत्तराखण्ड में सक्रिय रखते हैं। भाजपा और खांटी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की पृष्ठभूमि वाले परिवार की श्वेता किसी भी विचारधारा विशेष से परे लगातार उत्तराखण्ड के हितों की रक्षा से जूझती रहने वाली ऐसी योद्धा हैं जिन्होंने अन्ना आंदोलन के दौरान सक्रिय भागीदारी कर अपने जनपक्षीय तेवरों का परिचय दिया था। कुछ बरस पहले मुंबई से लापता हुए एक पहाड़ी युवा की मां का रोना भले ही पहाड़ की फिजाओं में रह रहे खांटी पहाड़ियों के कानों तक न पहुंचा हो, श्वेता तक जरूर पहुंचा। उन्होंने न केवल उस युवक को खोजा, बल्कि बगैर अपराध मुंबई की जेल में बंद इस युवक को न्याय भी दिलाया था। बहरहाल वत्सल फाउंडेशन के तत्वावधान में श्वेता मासीवाल और ‘हल्द्वानी आॅन लाईन’ के कर्ताधर्ता अमित खोलिया ने 26 नवंबर, 2019 के दिन केवीएम स्कूल हल्द्वानी में एक निःशुल्क स्वास्थ्य परामर्श शिविर लगाने का निर्णय लिया। इस शिविर में एम्स, ऋषिकेश के विशेषज्ञ डाॅक्टरों ने अपनी सहभागिता के लिए स्वीकृति दी। कैंसर, हड्डी, स्त्री रोग, ईएनटी, आंख समेत कई बीमारियों के एक्सपर्ट डाॅक्टरों के हल्द्वानी में आने का समाचार पाकर पूरे कुमाऊं क्षेत्र से पांच सौ से अधिक मरीजों ने रजिस्टेªशन कराया। ‘आरोही’ संस्था, जो कि एक गैरसरकारी संगठन हैं, इसमें मोबाइल मेडिकल यूनिट तथा पैरामेडिकल स्टाफ देने के लिए आगे आया। नियमानुसार मोबाइल मेडिकल यूनिट जिसमें गंभीर बीमारियों को चिन्हित करने के लिए अल्ट्रासाउण्ड, एक्सरे इत्यादि सुविधाएं मौजूद हैं, को जिला प्रशासन से अनुमति आवश्यक है। यही अनुमति जिला प्रशासन की संवेदनहीनता का चरम प्रदर्शन सामने लाई। 22 नवंबर को मेरे अभिन्न मित्र, एक्टिविस्ट एडवोकेट दुष्यंत मैनाली ने मुझसे संपर्क साध जानना चाहा कि इस विषय पर क्या मैं वत्सल फाउंडेशन की मदद कर सकता हूं। उन्होंने बताया कि लगातार प्रयास करने पर भी डीएम नैनीताल से संपर्क नहीं हो पा रहा है। मेरे द्वारा तत्काल एक संदेश डीएम नैनीताल सविन बंसल को भेज संपर्क साधने का प्रयास शुरू हुआ। जैसा नौकरशाही और नौकरशाहों का मिजाज है, मेरे द्वारा उन्हें किए गए फोन उठाए नहीं गए और वट्सअप मैसेज को उन्होंने पढ़ा जरूर लेकिन जवाब देना शायद उन्हें अपनी तौहीन लगा। मैंने इसके बाद आयुक्त, कुमाऊं  राजीव रौतेला से संपर्क किया। रौतेला उस समय, 22 नवंबर को देहरादून में थे। उन्होंने सलाह दी कि एक बार डीएम की जानकारी में मामला ले आएं। यदि कोई कठिनाई हो तो पुनः संपर्क करें। इसके बाद इस ‘दुष्कर कार्य’ यानी ‘डीएम साहब’ से संपर्क साधने का जिम्मा मेरे द्वारा इस अखबार के हल्द्वानी प्रतिनिधि संजय स्वार को सौंपा गया। संजय स्वार के अनुसार उन्होंने भी डीएम नैनीताल से संपर्क साधने का प्रयास किया, लेकिन न तो डीएम साहस हल्द्वानी स्थित अपने कैंप कार्यालय में मौजूद थे, न ही उन्होंने फोन उठाना गंवारा किया।
इसके बाद मुझे बैंगलुरू में आईटी क्षेत्र में कार्य कर रहे अमित पाण्डे का फोन आया। अमित का भी अपनी जन्मभूमि से लगाव अद्भुत है। बैंगलुरू से हल्द्वानी वे केवल इस चिकित्सा शिविर में हाथ बंटाने पहुंच गए। उन्हें भी इसका हल्का सा इल्म नहीं रहा होगा कि हमारी संवेदनहीन नौकरशाही खुद तो कुछ करती नहीं, नागरिकों को भी हतोत्साहित कर, कुछ सार्थक करने से रोकती जरूर है। अमित डीएम आॅफिस के चक्कर लगाते थक गए। लेकिन उन्हें भी सफलता हाथ नहीं लगी। श्वेता मासीवाल स्वयं डीएम से संपर्क करने में जुटी रहीं, लेकिन उनके तमाम वट्सअप मैसेज का ‘साहब बहादुर’ पर कोई असर नहीं पड़ा। थक हारकर उनके कुछ सहयोगियों ने क्षेत्रीय सांसद से अनुरोध किया। डीएम साहब से सांसद महोदय ने संपर्क साधा, पूरी विनम्रता से उनसे मोबाइल वाहन की अनुमति देने का आग्रह किया। यहां तक कि सांसद जो प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष भी हैं, ने ‘डीएम साहब’ से कहा कि यदि उनके क्षेत्र में कार्य कर रहे एनजीओ से सरकारी परमिशन लेने में कोई कमी रह गई हो तो वे माफी मांगते हैं। तब जाकर डीएम साहब ने परमिशन देने की ‘महती कृपा’ की। लेकिन इसमें भी एक पेंच है। सविन बंसल ने सांसद महोदय को कहा कि उन्हें इस प्रकार के किसी आयोजन की कोई जानकारी नहीं थी। श्वेता कहती हैं कि कम से कम डीएम इतना सफेद झूठ तो न बोलें। स्वयं डीएम ने फोन करके श्वेता से यह सारी जानकारी ली थी, इसके बावजूद सांसद से बातचीत के दौरान वे पूरी तरह से मुकर गए। दरअसल इस आयोजन से जुड़ी एक अन्य संस्था ‘नेशनल मेडिकोज एसोसिएशन’ ने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और क्षेत्रीय सांसद अजय भट्ट से 25 तारीख यानी इस मेडिकल कैंप की तारीख से एक दिन पहले तक मोबाइल मेडिकल वैन के लिए जिला प्रशासन की स्वीकृति न मिलने से परेशान होकर गुहार लगाई। अजय भट्ट के पूछे जाने पर ‘साहब बहादुर’ इस विषय की जानकारी होने से ही मुकर गए। सच यह है कि इससे एक दिन पूर्व ही डीएम ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी नैनीताल को बकायदा पत्र लिखकर मोबाइल मेडिकल वैन की बाबत प्रस्ताव भेजने को कहा था। सीएमओ नैनीताल डाॅ ़ भारती राणा की संवेदनहीनता देखिए। बजाए प्रायोजकों का उत्साहवर्धन करने के, उन्होंने ज्ञान बघार डाला कि हल्द्वानी के बजाए किसी दुर्गम क्षेत्र में कैंप लगाना चाहिए। इतना ही नहीं उन्होंने ‘आॅफिस- आॅफिस’ खेलते हुए आयोजकों को अपने कनिष्ठ अधिकारी के पास भेज दिया। ये साहब जिनका नाम बमोला है, ज्यादा शानदार और कर्तव्यनिष्ठ निकले। इन्होंने 25 तारीख की शाम तक नाना प्रकार के शपथ पत्र आयोजकों से मांगे और अंत में फाइल में लिख दिया कि चूंकि एम्स के डाॅक्टरों के शपथ पत्र इसमें नहीं हैं इसलिए मोबाइल मेडिकल यूनिट की परमिशन नहीं दी जा सकती। यह परमिशन दरअसल Pre Conception and Pre Natal Diagnostic Techniques act, 1994 के अंतर्गत किसी भी प्रकार के अल्ट्रासाउण्ड के लिए जरूरी होती है। क्योंकि आयोजकों ने स्वयं के और आरोही संस्था के शपथ पत्र लगा रखे थे जिनमें कहा गया था कि भ्रूण जांच नहीं की जाएगी, ऐसे में संबंधित अधिकारी का रवैया बेहद दुर्भाग्यपूर्ण था। कहानी अभी खत्म नहीं होती है। क्षेत्रिय सांसद के फोन बाद डीएम नैनीताल की नींद टूटती है और वे मंगलवार यानी कैंप के दिन यह अनुमति जारी कर देते हैं। चूंकि कैंप शुरू हो चुका था इसलिए इस प्रकार की अनुमति का कोई अर्थ नहीं रह गया था। कैंप आयोजकों ने एक निजी अस्पताल में भुगतान कर ऐसे मरीजों का अल्ट्रासाउण्ड कराया ताकि कम से कम दूर-दराज से आए मरीज परेशान और हताश न हों।  इतना ही नहीं जिन सीएमओ डाॅ . भारती राणा ने चिकित्सकों के शपथ पत्र न होने की बात कह परमिशन नहीं दी थी सांसद के फोन के बाद आॅब्जक्श भूल गई, डीएम भी सक्रिय हो गए और अंतः परमिशन दे दी गई। जाहिर है परमिशन देने के पीछे नैतिक दायित्यों का निर्वहन न डीएम ने, न ही सीएमओ ने किया, क्षेत्रीय सांसद की नाराजगी ने उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर किया। मेरा मानना है कि ऐसे संवेदनहीन और घमंड़ी अफसरों पर राज्य सरकार को तत्काल कार्यवाही कर कम से कम इन्हें डीएम जैसे महत्वपूर्ण पद से तत्काल हटा देना चाहिए। इन अफसरों को भी यह याद रखना चाहिए और यदि याद नहीं रखें तो हमारा दायित्य इन्हें स्मरण कराने का है कि ये जनता के सेवक है, ‘साहब बहादुर’ नहीं। सिविल सर्विस उत्तीर्ण कर इन्होंने आम जनता पर कोई एहसान नहीं किया है। टैक्स पेयरर्स के पैसों से इनका घर चलता है इसलिए हेकड़ी, घमंड और स्वयं को ‘साहब बहादुर’ मानने की प्रवृत्ति से बाज आएं अन्यथा जिस दिन जनता जनार्दन के सब्र का बांध टूटेगा, सारी अकड़ धरी की धरी रह जाएगी। चलते-चलते सविन बंसल को उनके ही एक कथन का स्मरण करा दूं। एक साक्षात्कार के दौरान इन साहब से पूछा गया कि उन्हें किस बात ने सिविल सेवा की तरफ प्रेरित किया, तो उनका जवाब था ‘बाल मजदूरी जैसी सामाजिक बुराई और समाज के गरीब तबके संग अन्याय होते देख मुझे प्रेरणा मिली कि मैं सिविल सेवा में जाऊं।’ तो बंसल साहब क्या इसी प्रकार गरीब-गुरबा की सेवा का मन लिए आप काम करते हैं या फिर वह सब वक्ती जोश या फिर जैसा अनुमन होता है, ज्ञान बघारने की बात थी बल!

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