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मेरी बात

लबरेज़ है शराब-ए-हक़ीक़त से जाम-ए-हिंद
सब फ़लसफ़ी हैं खित्ता-ए-मग़रिब के राम-ए-हिंद

ये हिन्दियों की फ़िक्र-ए-फ़लक-रस का है असर
रिफ़अत में आसमां से भी ऊंचा है बाम-ए-हिंद

इस देस में हुए हैं हज़ारों मलक-सरिश्त

मशहूर जिनके दम से है दुनिया में नाम-ए-हिंद
है राम के वजूद पे हिन्दोस्तां को नाज़

अहल-ए-नज़र समझते हैं इस को इमाम-ए-हिंद
एजाज़ इस चराग़-ए-हिदायत का है यही

रोशन-तर-अज़-सहर है ज़माने में शाम-ए-हिंद
तलवार का धनी था शुजाअ‘त में फ़र्द था
पाकीज़गी में जोश-ए-मोहब्बत में फ़र्द था

                                                                                     -अल्लामा इकबाल

बाईस जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में रामलला की मूर्ति का भव्य प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम संपन्न हुआ। पूरे देश, विशेषकर उत्तर भारत में इन दिनों राममय माहौल है। ऐसा महसूस हो रहा है कि दशकों का वनवास काट अब कलयुग में ही भगवान राम की घर वापसी हो पाई है। धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में एक धर्म विशेष के आराध्य की मूर्ति के प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम अवसर पर संविधान की शपथ लेकर सत्ता में बैठी सरकारों ने सार्वजनिक अवकाश घोषित करने में जरा भी संकोच नहीं किया। जाहिर है अब धर्मनिरपेक्षता के अर्थ, उसके मायने पूरी तरह बदल गए हैं। बहुसंख्यक को जो सुहाता हो उसे ही सत्य मान लेना आज के भारत का सच है। जो इस आज के सच से इत्तेफाक न रखता हो, वह देशभक्त कहलाने का हकदार नहीं है। बहरहाल ऐसे सर्द समय में मुझे अल्लामा इकबाल की उपरोक्त नज़्म याद हो आई। मेरे लिए इस नज़्म में वर्णित राम ही असली राम है। ऐसे राम जिन्होंने कभी मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं किया। ऐसे राम जो राज परिवार में जन्मे जरूर लेकिन तमाम ऐश्वर्य को दरकिनार कर जिन्होंने दलितों, वंचितों, आदिवासियों, महिलाओं के दर्द को समझने और उसका निवारण करने में अपना पूरा जीवन लगा दिया। मैं ऐसे परिवार में जन्मा जहां हर रोज सुबह और शाम विधिवत पूजा-अर्चना की जाती थी। मेरे पिता शिव के परम्भक्त थे। उनकी भक्ति लेकिन उनकी निजी आस्था और विश्वास का प्रतीक थी। दूसरे धर्मों का सम्मान करना उनके हिंदू होने का धर्म था। ऐसे माहौल में परवरिश का असर है कि मैं हरेक धर्म का उतना ही सम्मान करता हूं जितना अपने धर्म का। मेरे लिए भी ईश्वर निजी आस्था का विषय है। इसलिए इस चौतरफा राममय माहौल में मैं स्वयं को बेहद असहज महसूस रहा हूं। इतिहास में कई बार ऐसे क्षण, ऐसा वक्त आता है जब तमाम तर्क, मर्यादाएं और मानवीय सरोकार धरे के धरे रह जाते हैं, केवल और केवल उन्माद की सत्ता स्थापित हो जाती है। मेरी दृष्टि में वर्तमान समय ऐसा ही है। भगवान राम के नाम पर सनातन धर्म को बाकी धर्मों से श्रेष्ठ बताया जा रहा है। निःसंदेह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी वह कर पाने में बेहद सफल रही है जो सौ वर्षों की अपनी यात्रा के दौरान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी नहीं कर पाया। 22 जनवरी और उसके पहले के एक पखवाड़े में अद्भुत-अद्वितीय इवेंट मैनेजमेंट भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों ने बखूबी आयोजित कर उनके लिए भी राम को अनिवार्य बना डाला जो खुद को पंथ निरपेक्ष कहलाने का दावा करते रहे हैं। यह मामूली बात नहीं हैं, यह नरेंद्र मोदी के सबसे बड़े हिंदू नेता बनने का प्रमाण है कि करोड़ों आम भारतीयों से लेकर कारपोरेट के दिग्गज, देश का मीडिया और कथित धर्मनिरपेक्ष राजनेता, सभी राममय हो चले हैं। फिर चाहे समाजवादी अखिलेश यादव हों या फिर पंथनिरपेक्षता का दावा करने वाले राहुल गांधी, हरेक खुद को राम भक्त प्रमाणित करने का प्रयास करता नज़र आ रहा है। इकबाल ने राम को भले ही अलग अर्थों में ‘इमाम-ए-हिंद’ कह पुकारा हो, वर्तमान में राम अनिवार्य बन चुके हैं। हालात यह है कि यदि आप राम की अवधारणा से सहमत न भी हों तो भी आप संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी का वास्ता दे अपनी बात करने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं। फिर भी यदि आप दुस्साहस करते हैं तो आपको देशद्रोही तक करार दिया जा सकता है। यही कारण है कि हर कीमत पर राजसत्ता पाने को आतुर हमारे कथित धर्मनिरपेक्ष राजनेता भी किसी न किसी प्रकार से खुद को रामभक्त साबित करने में जुटे हैं। कांग्रेस शासित हिमाचल प्रदेश ने 22 जनवरी को राजकीय अवकाश इसी नीयत और मजबूरी से किया तो राहुल और अखिलेश भी रामलला के दर्शन करने जाने की बात कह रहे हैं। भगवत गीता के 17वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि –

सत्कार मान पूजार्थ तपो दम्भेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमधु्रवम।।

अर्थात जो तप आदर पाने की कामना से, सम्मान पाने की इच्छा से और पूजा कराने के लिए स्वयं को निश्चित रूप से कर्ता मानकर किया जाता है, उसे क्षणिक देने वाला राजसी (राजोगुणी) तप कहा जाता है।

अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, प्राण प्रतिष्ठा इत्यादि इसी प्रकार का राजसी तप है जिसका फल स्थाई नहीं क्षणिक है। लेकिन वर्तमान का सबसे बड़ा संकट यही है कि तर्क को सुनने के लिए कोई तैयार नहीं। तार्किकता एक प्रकार का अभिशाप बन चुकी है। मुझे लेकिन कहने में कोई गुरेज नहीं कि मेरे राम गली-मोहल्लों में टंगे भगवा ध्वज वाले राम कतई नहीं हैं। मेरे राम भोग के नहीं, बल्कि त्याग के प्रतीक हैं। वे क्रोध के नहीं, करुणा के महासागर हैं। राम मेरे लिए मर्यादा के शिखर पुरुष हैं जिन्हें किसी मंदिर की चारदिवारी तक सीमित नहीं रखा जा सकता है। राम को पाना है तो गरीबों-वंचितों के आंसुओं को पोछने का काम करना होगा। राम भक्ति नारों में नहीं मिल सकती है, न ही खरबों खर्च कर बने मंदिर में उनके दर्शन हो सकते हैं। राम को पाने का सबसे सरल लेकिन उतना ही कठिन मार्ग है मर्यादित जीवन जीने का, अपने वचनों को निभाने का, अहिल्या सरीखी पीड़िताओं के रक्षक बनने का, शबरी के जूठे बेरों को खाने की करुणा रखने का। मेरे राम तो यही राम हैं। इसलिए इस प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के दिन मैंने खुद को असहज महसूसा। मैं हिंदू हूं क्योंकि मैं हिंदू परिवार में जन्मा। मुझसे पूछा नहीं गया था लेकिन यदि मुझसे यह पूछा जाए कि मैं अगला जन्म किस धर्म में लेना चाहूंगा तो मैं निःसंकोच कह दूंगा हिंदू धर्म में। ऐसा इसलिए क्योंकि मेरा धर्म सहिष्णुता सिखाता है, वह मुझे करुणामयी बनने की शिक्षा देता है। मेरा धर्म किसी एक पुस्तक में दी गई हिदायतों से नहीं बंधा है। वह इतनी विराट सोच वाला है कि खुद अपनी पुस्तकों में वह अपने ही भगवान के अवतारों तक को उनकी गलतियों के लिए दंडित करने की शक्ति रखता है। यह धर्म मुझे जीवन और मृत्यु के परे ले जाता है। कोई दूसरा धर्म नहीं जो मुक्ति का ऐसा मार्ग बताता हो। इतने विराट धर्म का उपासक होने के कारण मुझे समदर्शी होने की दृष्टि मिली है। यह दृष्टि ही मुझे बेचैन कर रही है क्योंकि मैं समझ पा रहा हूं कि वर्तमान समय में छद्म हिंदुत्व चारों तरफ छा गया है।

राम रघुकुल से आते हैं। उस रघुकुल से जिसकी रीत है-प्राण जाई पर वचन जाई। कोई याद रखना नहीं चाहता, न ही कोई याद दिलाना चाहता है कि राम को अपना आराध्य मानने वाले भाजपा नेता कल्याण सिंह ने 1992 में बतौर मुख्यमंत्री सुप्रीम कोर्ट को यह वचन दिया था कि विवादित ढांचे की हर कीमत रक्षा की जाएगी। लेकिन 6 दिसंबर को इस वचन का पालन नहीं किया गया। इसलिए मैं कहता हूं कि राम की तरह मर्यादित जीवन कोई नहीं जीना चाहता है। भगवान राम का पूरा जीवन वचन निभाने में बीता। उन्होंने विषम परिस्थिति में भी विवेक के साथ मर्यादा की स्थापना और रक्षा की।

प्रधानमंत्री मोदी ने रामलला की मूर्ति के प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम बाद दिए अपने वक्तव्य में एक महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि काम का चरित्र न तो संकीर्णता सिखाता है और न संघर्ष। उन्होंने कहा कि राम ऊर्जा हैं आग नहीं, वह समाधान हैं, विवाद नहीं। मैं पूरी तरह अपने प्रधानमंत्री के इस कथन से सहमति रखता हूं। भगवान राम का पूरा जीवन दर्शन विवाद पर नहीं, बल्कि सर्वमान्य समाधान की बात करता है। प्रधानमंत्री ने राम मंदिर निर्माण पूरा होने के बाद अब एक हजार साल के भारत की नींव रखने का आह्नान देशवासियों से किया है। उन्होंने देशवासियों से अपनी चेतना को विस्तार देने का अनुरोध करते हुए कहा है कि चेतना का विस्तार देव से देश और राम से राष्ट्र तक होना चाहिए। उम्मीद पर ही दुनिया टिकी है इसलिए यह उम्मीद की जानी चाहिए कि जैसा प्रधानमंत्री ने कहा उसका पालन देशवासियों के साथ-साथ उनकी पार्टी और भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का सपना पाले अन्य सभी संगठन भी करेंगे। हालांकि ऐसा होता मुझे संभव नहीं लगता है।

कहा जाता है कि वेदव्यास पूरी महाभारत लिखने के पश्चात बेहद निराश हो उठे थे। तब उन्होंने कहा था ‘मैं हाथ-ऊंचा उठाकर पुकार रहा हूं लेकिन मेरी कोई नहीं सुन रहा है। धर्म का पालन करने से अर्थ, काम और मोक्ष तीनों सधते हैं लेकिन धर्म का पालन कोई नहीं करता।’ आज भी हालात ठीक वैसे ही हैं। पूरा देश राममय जरूर है लेकिन भगवान राम की तरह मर्यादित कोई नहीं।

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