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Editorial

अब मैं मार दिया जाऊंगा…

पच्चीस मार्च का दिन उत्तराखण्ड के पत्रकारों को हमेशा याद रखते हुए, इस दिन विशेष रूप से सतर्कता बरतनी चाहिए। यूं तो जैसे हालात इस समय विश्वभर के हैं, पत्रकारों पर हर क्षण जान का खतरा बना रहता है। मैं बात उन पत्रकारों की कर रहा हूं जो खुद को सत्ता प्रतिष्ठानों, पूंजीपतियों और नाना प्रकार के माफियाओं का चारण-भाट बनाने से बचे हुए हैं। 25 मार्च, 1988 के दिन दैनिक ‘अमर उजाला’ के पत्रकार उमेश डोभाल शराब माफियाओं के षड्यंत्र का शिकार हो गए थे। साप्ताहिक ‘बिजनौर टाइम्स’ से अपनी पत्रकारिता यात्रा शुरू करने वाले उमेश डोभाल उन दिनों लगातार पहाड़ में पसराई जा रही शराब संस्कृति के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे। अड़तीस वर्षीय उमेश ‘बिजनौर टाइम्स’ के बाद ‘पौड़ी टाइम्स’ साप्ताहिक से जुड़े। उनकी धारदार कलम शराब संस्कृति के खिलाफ आग उगलती थी। यह वह दौर था जब उत्तराखण्ड के कुमाऊं क्षेत्र से शुरू हुआ ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आंदोलन एक छोटे से कस्बे बसभीड़ा से शुरू होकर सभी पर्वतीय जिलों में फैल चुका था। आंदोलन की ताप से झुलसी उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकार को इन पर्वतीय क्षेत्रों में मदिरा निषेध का फैसला लेना पड़ा था। 1988 आते-आते आंदोलन ठंडा पड़ा तो शराब लॉबी की सक्रियता बढ़ी। उत्तर प्रदेश सरकार ने पुनः इन इलाकों में शराब के ठेके शुरू करवा डाले। मुरादाबाद के शराब कारोबारी कुलवंत चड्ढ़ा की उन दिनों उत्तर प्रदेश सरकार में तूती बोला करती थी। उमेश डोभाल ने पौड़ी जिले में अवैध शराब के फल-फूल रहे कारोबार की बाबत फिर से कलम उठा ली। उनकी खबरों का सीधा असर स्थानीय शराब व्यवसायी मनमोहन सिंह नेगी के काले कारोबार पर पड़ा। नतीजा रहा डोभाल की 25 मार्च, 1988 के दिन रहस्यमय गुमशुदगी। शुरुआती दौर में स्थानीय पुलिस ने डोभाल के परिजनों की शिकायत पर कोई संज्ञान नहीं लिया। बाद में जब पत्रकार संगठनों ने आवाज उठाई तो पहले सीआईडी और बाद में सीबीआई को मामले की जांच सौंप दी गई। सीबीआई ने मनमोहन नेगी समेत तेरह लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की, लेकिन कोर्ट से सभी 1994 में सबूतों के अभाव में बरी कर दिए गए। उमेश का पता केंद्र की शीर्ष जांच एजेंसी भी न लगा सकी। इस घटना के ठीक इकतीस बरस बाद 25 मार्च, 2019 को इस साप्ताहिक समाचार पत्र के पत्रकार मनोज बोरा को गोली मार दी गई। हालांकि संयोग से अब मनोज बोरा खतरे से बाहर हैं। लेकिन नैनीताल की पुलिस का रवैया इस पूरे प्रकरण में खासा संदेहास्पद रहा है। मनोज बोरा पर हुए जानलेवा हमले की पटकथा काफी अर्सा पहले लिखी जा चुकी थी। ‘दि संडे पोस्ट’ से जुड़े दिव्य प्रकाश रावत ने अर्सा पहले ही एसएसपी नैनीताल को अपनी हत्या की आशंका व्यक्त करते हुए पुलिस सुरक्षा दिए जाने संबंधी पत्र सौंपा था। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने इस पर कोई कार्यवाही नहीं की। इसके बाद दिव्य प्रकाश के एक अन्य साथी को फोन पर जान से मारने की धमकी मिली।
इत्तेफाक उस दिन मैं भी हल्द्वानी में था। मामले की गंभीरता को भांपते हुए और जनपद की पुलिस विशेष रूप से कोतवाली हल्द्वानी के रवैये को समझ मैंने पुलिस (कानून व्यवस्था) श्री अशोक कुमार से संपर्क साधा। अशोक कुमार ने तत्काल कार्यवाही के निर्देश जब हल्द्वानी शहर के पुलिस अधीक्षक को दिए तब हमारे रक्षकों की कुंभकर्णी नींद टूटी जरूर लेकिन जिन बदमाशों को पुलिस ने पकड़ना था उन्हें सचेत कर दिया गया कि वह शहर में प्रवेश न करें। यानी कोतवाली हल्द्वानी की इन बदमाशों संग या तो कुछ मिलीभगत थी या फिर पुलिस पर कहीं कोई राजनीतिक दबाव था। इस पूरे प्रकरण में भाजपा से बागी हुए एक कार्यकर्ता प्रमोद नैनवाल और उसके भाई सतीश नैनवाल की भूमिका संदिग्ध है। सतीश नैनवाल कुछ अर्सा पहले दिव्य रावत को एक झूठे मुकदमे में फंसाने का प्रयास कर चुका है। उसने दिव्य रावत के खिलाफ मारपीट करने संबंधी एक पूरी तरह फर्जी एफआईआर हल्द्वानी कोतवाली में कराई लेकिन उसका दांव उल्टा पड़ गया। जिस दिन और समय मारपीट की घटना का एफआईआर में उल्लेख था उस दौरान दिव्य रावत अस्पताल में भर्ती थे। कमाल है जनपद की मित्र पुलिस का जो आज तक इस प्रकरण की जांच पूरी नहीं कर पाई है। होना तो यह चाहिए था कि झूठी रपट लिखवाने के दोषी सतीश नैनवाल और उसके परिजनों को भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी का दोषी बना चार्जशीट फाइनल करे लेकिन ऐसा घटना के कई सप्ताह बीत जाने के बाद भी नहीं किया गया। इससे अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हो गए कि उन्होंने अपनी धमकी को अमलीजामा पहनाने का दुस्साहस कर डाला। गौरी लंकेश की निर्मम हत्या के बाद ‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट’ नामक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने अपनी एक रिपोर्ट में खुलासा किया था कि 1992 से लेकर 2018 तक भारत में इकतालीस पत्रकारों की हत्या की जा चुकी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से अधिकांश भाषाई पत्रकार थे जिनमें से अधिकतर के हत्यारों का पता नहीं लगाया जा सका है। 2016 में जारी एक लिस्ट के अनुसार उन देशों में जहां पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं भारत तेरहवें स्थान पर है। मैं पाकिस्तान के एक वरिष्ठ पत्रकार जो स्वयं हत्या के षड्यंत्र का शिकार हो चुके हैं, का कथन आप सबके सामने रखना चाहता हूं। हामिद मीर ने गौरी लंकेश की हत्या के बाद लिखाः- There is one big difference. I can’t claim that democracy and media is very strong in Pakistan but Gauri Lankesh lived and worked and was a citizen of the biggest democracy of the world. So what happened? How did “they” dare target her? Don’t “they” care what Gauri’s colleagues and friends in the world’s largest democracy will say? Aren’t “they” worried that “they” will be exposed? And what about the collective democratic conscience and pride of the Indian media? How do they deal with this direct challenge to their credibility? हामिद मीर ने जो प्रश्न भारतीय लोकतंत्र और मीडिया पर गौरी लंकेश की हत्या के बाद उठाए वे बेहद मौजू हैं। सही कहते हैं वे कि क्या लंकेश के हत्यारों को डर नहीं था कि वे पकड़े जाएंगे? जिस भयावह दौर से हम गुजर रहे हैं उसमें हत्यारों को कोई भय नहीं है। सच तो यह है कि वे सत्ता पोषित हैं इसलिए निर्भीक और दुस्साहसी हैं। रही बात मीडिया बिरादरी की तो वहां चारण-भाटों का दौर चल रहा है। सच से मुंह छिपाने का, झूठ को सच बताने का और इस पवित्र पेशे को व्यापार में बदलने के षड्यंत्र का हिस्सा बन खुद को पल्लवित करने के इस दौर में किसको फुर्सत है कि कोई डोभाल या लंकेश के लिए अपना समय बर्बाद करे। इस अखबार और इसके पत्रकारों के खिलाफ पिछले अठारह बरसों में कई फर्जी मुकदमे दर्ज हुए, नाना प्रकार से हमें दबाव में लेने का प्रयास किया गया। हम डिगे नहीं, डटे रहे लेकिन अपने दम पर। अपनी सच्चाई के दम पर। जब योगगुरु रामदेव के व्यापारिक संस्थान में चल रहे घोटालों, कर चोरी, उनके कारोबारी पार्टनर बालकृष्ण की नागरिकता आदि मुद्दों पर हमने लिखा तो मुख्यधारा का मीडिया खामोश रहा, पिछले दिनों त्रिवेंद्र रावत सरकार की मंत्री रेखा आर्या के हिस्ट्रीशीटर पति गिरधारी लाल साहू के काले कारनामों से हमने पर्दा उठाया तो भी हमारे साथी मूकदर्शक बने रहे। सभी अपने-अपने हितों की रक्षा करते  नजर आते हैं। लोकतंत्र की खोखली होती बुनियाद चीत्कार रही है लेकिन इसके सभी स्तंभ खामोश हैं। ज्यादा सही यह कहना होगा कि इस बुनियाद को खोखला करने के षड्यंत्र का हिस्सा बन चुके हैं। हालांकि इस बार मनोज बोरा पर हुए प्राणघातक हमले और उससे पहले हल्द्वानी के पत्रकार मोहन भट्ट पर तमंचा लहराए जाने पर पत्रकार जगत ने जो एकजुटता दिखाई उससे हम जैसे सभी को साहस मिलता है, सुकून भी कि हम अकेले नहीं हैं, संकट की घड़ी में हमारे साथी साथ खड़े हैं, समाज का एक हिस्सा अभी तक जिंदा है और अपने निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर सोचने की उसकी समझ जिंदा हैं। स्व उमेश डोभाल कविता भी लिखते थे। उनकी एक कविता इस समय विशेष रूप से याद आ रही है :-
अब मैं मार दिया जाऊंगा
मैंने जीने के लिए हाथ उठाया
और वह झटक दिया गया
मैंने स्वप्न देखे
और चटाई की तरह अपनों के बीच बिछा
उठा कर फेंक दिया गया
अंधेरी भयावह सुरंग में . . .।
रोशनी
मैंने वहां भी रोशनी तलाश की
अब मैं मार दिया जाऊंगा
उन्हीं के नाम पर
जिनके लिए संसार देखा है मैंने।

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