Editorial

अधिकारों ही नहीं, कर्तव्यों की चिंता भी जरूरी

‘आपने ऐसे-ऐसे लोग भरे हैं नए चैनल में जिनके लड में मुझे गाली देना है।’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी टीवी 9 भारतवर्ष चैनल के राष्ट्रीय सम्मेलन में समूह के चेयरमैन रवि प्रकाश से कहते हैं। जवाब में रवि प्रकाश ‘बदलाव ला रहे हैं इसमें’ कहते एक वीडियो क्लिप में सुने गए जो सोशल मीडिया में खासी वायरल हुई। हालांकि पीएम इसके जवाब में कहते हैं ‘ऐसा मत करो भाई . . . उनको जीने दो बेचारों को। उनकी आत्मा मर जाएगी तो फिर मजा नहीं आएगा उनको।’
पीएम की इस बात पर बहुतों ने, लाखों ने अपना प्रतिरोध सोशल मीडिया में दर्ज कराया। यह कहा गया कि पीएम एक तरह से मीडिया को धमका रहे हैं। हालांकि पिछले पांच सालों यानी मोदी सरकार के केंद्र में काबिज होने से लेकर अब तक प्रत्यक्षतः एक भी उदाहरण ऐसा सामने नहीं आता जिसमें सीधे तौर पर पत्रकारों को टारगेट पर लेने का प्रयास किया गया हो, लेकिन पत्रकारों पर देशभर में हमले बढ़े हैं जिसके चलते देश का एक बड़ा वर्ग अघोषित आपातकाल की बात लंबे अर्से से कर रहा है। ताजा उदाहरण उत्तर प्रदेश का है जहां एक फ्रीलांस पत्रकार प्रशांत कनौजिया को उत्तर प्रदेश की पुलिस ने तब गिरफ्तार कर डाला जब उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बाबत एक पोस्ट अपनी फेसबुक वॉल पर डाली। प्रशांत पहले न्यूज पोर्टल ‘द वायर’ में काम कर चुके हैं। उन्होंने एक महिला का वीडियो अपनी वॉल पर शेयर किया जिसमें वह उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ संग प्रेम का इजहार करते हुए यह दावा कर रही है कि उनके और योगी आदित्यनाथ के मध्य पिछले एक बरस के दौरान कई मर्तबा वीडियो चैटिंग हुई है। लखनऊ में सीएम आवास के बाहर पत्रकारों से बातचीत के दौरान रिकॉर्ड इस वीडियो से हालांकि यह साफ जाहिर है कि महिला का प्यार एकतरफा है और वह केवल एक बार योगी के जनता दरबार में अपनी निजी समस्या के निदान की अपील करते समय उनसे मिली थी, लेकिन उसके इस दावे को आधार बना कि योगी संग वह वीडियो चैट करती है, प्रशांत कनौजिया ने फेसबुक में यह वीडियो शेयर करते हुए लिख मारा ‘योगी जी वीडियो चैटिंग कर सकते हो तो इश्क का इजहार क्यों नहीं?
योगीजी आप डरो नहीं, मत सोचो समाज क्या कहेगा बस भाग जाओ, हम सब आपकी शादी करवा देंगे।’ लखनऊ की हजरतगंज पुलिस के एक सब इंस्पेक्टर ने इस फेसबुक पोस्ट को आपत्तिजनक मानते हुए एक एफआईआर प्रशांत कनौजिया के खिलाफ दर्ज करा डाली। जघन्य अपराधों तक पर जिस यूपी पुलिस की कुंभकर्णी नींद टूटती नहीं, वह पुलिस अपने सीएम के इस कथित अपमान पर इतनी सक्रिय हो उठी कि कनौजिया को दिल्ली जाकर पकड़ लाई। इस पुलिसिया कार्यवाही का भारी विरोध हुआ। ‘द वायर’ के संस्थापक सिद्धार्थ वरदराजन ने ट्वीट कर कहा कि ‘Yes, Prashant Kanaujia has been picked up by UP Police in a shocking abuse of law and attack on free speech rights. He used to be a journalist for ‘ the wire hindi’, but is now a freelancer. Arrest shows the fate of law in U.P’s jungle raj.’ आठ जून 2019 को यह गिरफ्तारी की गई। ग्यारह जून को देश की शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश पुलिस को लताड़ते हुए प्रशांत कनौजिया को तत्काल रिहा करने के आदेश दे डाले। उच्चतम न्यायालय ने प्रशांत को रिहा करने का आदेश देते समय स्पष्ट किया कि वह फेसबुक में डाली गई उनकी पोस्ट का समर्थन नहीं करती है, लेकिन बोलने की स्वतंत्रता के अधिकार से किसी को वंचित नहीं किया जा सकता। तो चलिए कुछ चर्चा अभिव्यक्ति के अधिकार पर मंडरा रहे खतरे की। पहली बात मैं प्रशांत कनौजिया की पोस्ट पर सख्त ऐतराज दर्ज कराना चाहता हूं। महिला के वीडियो से स्पष्ट है कि योगी आदित्यनाथ संग जिस कथित प्रेम का वह इजहार कर रही है वह एकतरफा है, स्वयं महिला इसे स्वीकारती नजर स्पष्ट आ रही है। मात्र इसलिए कि योगी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, वे भाजपा से हैं या फिर उग्र हिंदुत्व के पैरोकार हैं, उनके ऊपर इस प्रकार का कीचड़ उछाला जाना बेहद आपत्तिजनक है। कनौजिया को इसके लिए माफी मांगनी चाहिए। दूसरी बात उत्तर प्रदेश की पुलिस का एक्शन भी बेहद आपत्तिजनक, चिंताजनक और दुराग्रहपूर्ण है। यह वही पुलिस है जो नृशंस अपराधों की तक एफआईआर नहीं करती, यह वही पुलिस है जिसके दामन में इतने दाग हैं कि दामन अब नजर ही नहीं आता। दाग, दाग और दाग ही नजर आते हैं। इसलिए योगी आदित्यनाथ को चाहिए कि वे एफआईआर करने वाले सब इंस्पेक्टर और गिरफ्तारी करने वाली टीम पर कार्यवाही करें। तत्काल करें ताकि उत्तर प्रदेश सरकार पर लग रहे आरोपों का आप निस्तारण कर सकें। प्रशांत कनौजिया सोशल मीडिया में व्यर्थ ही किसी व्यक्ति विशेष का चारित्रिक हनन करने वाले अकेले नहीं हैं, लाखों की संख्या में ऐसे ‘एक्टिविस्ट’ मौजूद हैं जो ऐसा हर रोज करते हैं। यह सही है कि अभिव्यक्ति की स्वंतंत्रता हमारा मौलिक अधिकार है, लेकिन उतनी ही अपेक्षा संविधान निर्माताओं को हमसे हमारे कर्तव्यों के निर्वहन की भी रही है। अधिकार हमें याद रहते हैं, कर्तव्य हम याद रखना नहीं चाहते। अराजकता की स्थिति इन्हीं कारणों के चलते है।
अब आते हैं ‘टीवी नाइन भारतवर्ष’ के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर। मुझे वीडियो सुनने के बात कतई ऐसा महसूस नहीं हुआ कि पीएम मोदी चैनल के चेयरमैन को धमका रहे थे। बेहद हल्के-फुल्के अंदाज का वार्तालाप था जिसे कांग्रेस के प्रवक्ता रणजीत सुरजेवाला ने व्यर्थ का विवाद और विरोध पैदा करने की नीयत से जारी किया। अब कुछेक ‘धर्म निरपेक्ष’ मित्रों को लगने लगेगा कि मोदी की दोबारा सरकार आते ही मेरे सुर बदल गए हैं। पिछले दिनों मेरे एक वीडियो ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी’ पर कुछ ऐसी ही प्रतिक्रियाएं सुनने को मिली थी। दरअसल, हमारे यहां निष्पक्ष होने का तात्पर्य कुछेक के लिए सत्ता का हर हाल में विरोधी होना है। सरकारें, जहां किसी की भी हों, कुछ भी अच्छा करें तो ऐसे ‘निष्पक्षों’ का दायित्व उनमें कमी ढूंढ़ना मात्र रहता है। यह निष्पक्षता नहीं, निगेटिविटी है। किन्हीं के साथ विचारधारा का बोझ इस कदर हावी है कि वे दक्षिणपंथी सोच की सरकार के अच्छे प्रयासों की सराहना ही नहीं चाहते। तो कई ऐसे हैं जिन्हें विरोध करने की नीयत के चलते विरोध करना ही अपना परम धर्म लगता है। जरूरत यह समझने की है कि विरोध किस प्रवृत्ति का होना चाहिए, कितनी शिद्दत और ईमानदारी होना चाहिए। इसमें कोई शक-शुबहा नहीं कि देश गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है। ‘संविधान खतरे में है’, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश खुलकर कह चुके हैं। क्या संकट है यह? प्रचंड बहुमत पा दोबारा सरकार में काबिज हुए लोग ऐसा क्या करने जा रहे हैं या कर रहे हैं जिससे लोकतंत्र पर खतरे की बात कहने को देश की शीर्ष न्यायपालिका विवश हो चुकी है? मेरी समझ से सबसे बड़ा खतरा संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर कुठाराघात का है। उदाहरण के लिए चुनाव आयोग को ले लीजिए। टीएन शेषन और उनके बाद लिंगदोह के मुख्य चुनाव आयुक्त रहने तक इस संस्था की निष्पक्षता पर जनता को भरोसा था। अब लेकिन ऐसा नहीं है। इन चुनावों के दौरान पूरे देश ने देखा-महसूसा कि किस प्रकार चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री के खिलाफ आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतों का निपटारा किया। एक चुनाव आयुक्त ने तो अपना विरोध तक दर्ज कराया। न्यायपालिका पहले ही खुलकर अपनी चिंता को सार्वजनिक कर चुकी है। सेना की शूरवीरता का राजनीतिक लाभ लेते सत्ताधारी दल को हमने इन चुनावों में देखा। यह भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। सेना को राजनीति से हर कीमत में दूर रहना चाहिए। इसी प्रकार इस मुल्क की गंगा-जमुनी संस्कृति को हर हाल में बनाए रखना बेहद जरूरी है। यदि उग्र हिंदुत्व की अवधारणा मोदी सरकार के इस टर्म में विस्तार पाती नजर आती है तो उसका पुरजोर विरोध किया जाना आवश्यक है। आवश्यकता है प्रज्ञा ठाकुर जैसी मानसिकता वालों के महिमामंडन को रोके जाने की। भले ही प्रधानमंत्री ने प्रज्ञा ठाकुर के गांधी-गोडसे बयान से किनारा कर लिया हो, मैं तो कम से कम संतुष्ट नहीं हूं, यूं कहना ज्यादा ठीक होगा कि मैं आशंकित हूं, कुछ हद तक भयभीत हूं कि पीएम ने भले ही सार्वजनिक रूप से उन्हें लताड़ लगाई, वे भाजपा की सांसद हैं और उन्हें उन पर चल रहे तमाम मुकदमों के बावजूद भाजपा ने ही टिकट दिया है। ऐसे में यह मान पाना मुश्किल है कि मोदी प्रज्ञा ठाकुर जैसों की सोच से इत्तेफाक नहीं रखते। प्रशांत कनौजिया को चाहिए था कि वे जस्टिस लोया की संदेहास्पद मृत्यु और सोहराबुद्दीन शेख के कथित एन्काउंटर पर कुछ सार्थक पोस्ट डालें ताकि अभिव्यक्ति की आजादी पर उनकी चिंता से समाज बावस्ता हो सके। योगी आदित्यनाथ की निजी जिंदगी पर की गई उनकी टिप्पणी मेरी समझ से उतनी ही बेहूदी, घटिया और आपत्तिजनक है जितनी योगी की यूपी पुलिस द्वारा उनकी गिरफ्तारी। पुनः दोहराता हूं प्रशांत कनौजिया को कोई हक नहीं कि वे योगी आदित्यनाथ की निजी जिंदगी पर बगैर किसी आधार के छींटाकसी करें, साथ ही उत्तर प्रदेश की निकम्मी, काहिल और महाभ्रष्ट पुलिस द्वारा उनकी गिरफ्तारी की भी मैं सख्त भर्त्सना करता हूं। निश्चित ही आपातकाल के बाद दोबारा इस मुल्क में ऐसा कुछ घटित होता नजर आ रहा है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बड़ा खतरा बन चुका है। अकेले 2017-18 में पचास से ज्यादा गिरफ्तारियां सोशल मीडिया में डाली गई पोस्ट पर हुई हैं। लेकिन असल खतरा, असल चिंता का विषय मेरी समझ से ऐसी छिछली पोस्ट और उन पर पुलिसिया कार्यवाही से कहीं ज्यादा उस प्रवृत्ति के शक्तिशाली होने की है जो किसी भी प्रकार का प्रतिरोध बर्दाश्त करने को तैयार नहीं। फिर चाहे वह कर्नाटक के सीएम कुमार स्वामी हों या फिर यूपी के सीएम योगी।

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