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Editorial

कश्मीर से नेहरू का भावनात्मक लगाव

पिचहत्तर बरस का भारत/भाग-39

मेनन जूनागढ़ की बाबत अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि नवाब सर महाबत खान रसूल खान परले दर्जे का सनकी व्यक्ति था। उसे कुत्तों से बेहद लगाव था। उसके पास कई सौ अलग-अलग नस्लों के कुत्ते थे। एक बार उसने अपने दो कुत्तों की शादी कराई जिसमें तीन लाख का खर्च किया गया और शादी के दिन रियासत में सार्वजनिक अवकाश रखा गया। नवाब अपनी रियासत को स्वतंत्र रखने का पक्षधर था। 25 जुलाई, 1947 को जब लॉर्ड माउंटबेटन ने राजे-रजवाड़ों की बैठक बुलाई थी तब नवाब यूरोप में छुट्टियां मना रहा था। जूनागढ़ के प्रतिनिधि बतौर नवाब ने अपने सलाहकार नबी बक्श को इस बैठक में भेजा था। नबी बक्श ने माउंटबेटन और पटेल संग अलग-अलग हुई वार्ता में दोनों को भरोसा दिलाया था कि जूनागढ़ भारत के साथ ही विलय करेगा लेकिन नवाब के मन में कुछ और ही चल रहा था। उसने नबी बक्श को ही सलाहकार पद से हटा दिया। नवाब को भारत में शामिल होने के लिए 12 अगस्त, 1947 को विलय पत्र भेजा गया जिस पर हस्ताक्षर करने के बजाए नवाब ने 15 अगस्त के दिन पाकिस्तान में शामिल होने का एलान कर दिया। पाकिस्तान सरकार ने इस पर तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी। जूनागढ़ में नवाब के इस फैसले का भारी विरोध हुआ क्योंकि यहां की पौने सात लाख की जनसंख्या में 81 प्रतिशत हिंदू थे। जूनागढ़ के नवाब का फैसला सरदार वल्लभ भाई पटेल को खासा नागवार गुजरा था। पटेल इसी इलाके (कठियावाड़) से आते थे। पटेल ने वी ़पी ़ मेनन को जूनागढ़ की समस्या पर सबसे पहले ध्यान देने को कहा। नवाब के फैसले का विरोध करते हुए महात्मा गांधी के भतीजे सामलदास गांधी के नेतृत्व में जूनागढ़ की एक ‘समानांतर सरकार’ का गठन मुंबई में किया गया। इस सरकार ने नवाब के खिलाफ  जनआंदोलन छेड़ दिया। स्थितियां बिगड़ती देख नवाब महाबत खान अक्टूबर के अंत में सरकारी खजाने समेत कराची भाग गया। सरदार पटेल की सलाह पर अमल करते हुए नेहरू ने भारतीय फौजों को जूनागढ़ के आस-पास तैनात कर डाला था। लॉर्ड माउंटबेटन जूनागढ़ का मसला संयुक्त राष्ट्र संघ के हवाले करना चाहते थे लेकिन पटेल ने ऐसा होने नहीं दिया। 9 नवंबर, 1947 के दिन नवाब के प्रधानमंत्री सर शहनवाज भुट्टो ने जूनागढ़ की सत्ता भारत के हवाले कर दी। माउंटबेटन की सलाह पर बाद में यहां 20 फरवरी, 1948 को जनमत संग्रह कराया गया जिसमें 91 प्रतिशत ने भारत में विलय को अपनी मंजूरी दे जूनागढ़ का भारतीय संघ में विलय सुनिश्चित कर डाला। ठीक इसी समय भारत सरकार हैदराबाद के मसले को भी सुलझाने में जुटी हुई थी। हैदराबाद की सत्ता पर एक मुस्लिम नवाब काबिज थे लेकिन बहुसंख्यक आबादी हिंदुओं की थी। यहां के नवाब को निजाम कह पुकारा जाता था। आजादी के वक्त हैदराबाद के सातवें निजाम मीर उस्मान अली थे। इस निजाम के पास अकूत संपत्ति थी जिसे वे हर कीमत पर बचाए रखना चाहते थे। 3 जून, 1947 के दिन जैसे ही ब्रिटिश सरकार ने भारत विभाजन और सत्ता हस्तांतरण की घोषणा की निजाम ने एक फरमान जारी कर डाला कि उनके प्रतिनिधि संविधान सभा का हिस्सा नहीं बनेंगे और 15 अगस्त के बाद हैदराबाद एक स्वतंत्र राष्ट्र बन जाएगा। निजाम ने लॉर्ड माउंटबेटन और वीपी मेनन संग अपनी कई दौर की बातचीत के दौरान यह स्पष्ट कर दिया कि वे न तो भारत और न ही पाकिस्तान का हिस्सा बनने के इच्छुक हैं। गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन, गृहमंत्री सरदार पटेल और वी ़पी ़ मेनन के भरसक प्रयास करने के बाद भी निजाम मीर उस्मान अली टस से मस नहीं हो रहे थे। वे हर कीमत पर अपनी सत्ता हैदराबाद रियासत में बनाए रखने पर अड़े रहे। भारत सरकार को दबाव में लेने की नीयत से निजाम ने पाकिस्तान सरकार संग भी बातचीत शुरू कर दी थी। महीने-दर-महीने गुजरते गए लेकिन कोई सार्थक हल इस समस्या का नहीं निकल पाया।

इस बीच जम्मू-कश्मीर के रास्ते नेहरू सरकार के समक्ष भारी संकट आन खड़ा हुआ। जूनागढ़ और हैदराबाद समान ही जम्मू-कश्मीर रियासत भी दोनों नवगठित राष्ट्रों में से किसी एक का हिस्सा बनने के बजाए स्वतंत्र राष्ट्र बने रहना चाहती थी। जम्मू-कश्मीर रियासत 1846 में अस्तित्व में आई थी। 14वीं शताब्दी तक कश्मीर में बौद्ध एवं हिंदू वंश के शासकों का राज था। इनके राज के बाद यहां की सत्ता एक मुस्लिम शासक के पास 1587 तक रही। 1587 में मुगल बादशाह अकबर ने इस इलाके पर अपना कब्जा कर इसे मुगल साम्राज्य का हिस्सा बना लिया। अगले दो सौ साल तक यहां मुगलों की सत्ता बनी रही थी। 1752 में मुगलों को परास्त कर अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली ने इसे अपने कब्जे में ले लिया। 67 बरस यहां अफगानी सत्ता रही जिसे परास्त कर 1819 में सिख महाराजा रंजीत सिंह ने अपना शासन यहां स्थापित किया। महाराजा किशोर सिंह के प्रतिनिधि बतौर डोगरा राजपूत रंजीत सिंह यहां के नए राजा बनाए गए जिनकी मृत्यु पश्चात् उनके भतीजे गुलाब सिंह को यहां की सत्ता मिली।

1839 में सिख महाराजा रंजीत सिंह की मृत्यु बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने पंजाब में अपना विस्तार करना शुरू किया। लंबे संघर्ष के बाद अंततः सिख सत्ता को ईस्ट इंडिया कंपनी के समक्ष घुटने टेकने ही पड़े। कंपनी ने तत्कालीन सिख महाराजा खड़क सिंह से एक करोड़ रुपया नकद और पंजाब के कुछ हिस्से को कंपनी के अधीन रखने की शर्त रखी। लंबी लड़ाई (1839-1845) चलते महाराजा का राजकोष खाली हो चला था। महाराजा खड़क सिंह ने कंपनी को जम्मू और कश्मीर दिए जाने का प्रस्ताव रखा जिसे तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग ने नहीं स्वीकारा। ऐसे में डोगरा राजा गुलाब सिंह ने अंग्रेजों के समक्ष प्रस्ताव रखा कि यदि उन्हें जम्मू-कश्मीर रियासत का स्वतंत्र राजा घोषित किया जाता है तो वे ईस्ट इंडिया कंपनी को नकद हर्जाना देने को तैयार हैं। 16 मार्च 1946 को कंपनी और राजा गुलाब सिंह के मध्य संधि पर हस्ताक्षर गिए गए और इस तरह से जम्मू-कश्मीर रियासत अस्तित्व में आ गई। इस संधि को अमृतसर संधि (Treaty of Amritsar) कहा जाता है। भारत विभाजन के समय राजा गुलाब सिंह के वंशज ले.जनरल सर हरि सिंह जम्मू- कश्मीर के राजा थे जिनके राज्य की सीमा पूरब में तिब्बत, उत्तर-पूर्व में चीन और अफगानिस्तान से जुड़ती थी। इस रियासत के केंद्र में कश्मीर घाटी, उत्तर में गिलगिट, दक्षिण में जम्मू और कश्मीर घाटी और तिब्बत के मध्य लद्दाख स्थित था। हालांकि रिसायत की बहुसंख्यक आबादी मुसलमानों की थी लेकिन हिंदू राजा होने के नाते सरकारी पदों और सेना में हिंदुओं की बाहुल्यता थी। इस कारण रियासत के बहुसंख्यक मुसलमानों में हिंदू राजा के प्रति भारी आक्रोश बना रहता था। महाराजा सर हरि सिंह की सत्ता को चुनौती देने का काम अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा प्राप्त एक नवयुवक शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह कर रहे थे। 1932 में शेख अब्दुल्लाह ने रियासत के मुसलमानों के हकों की आवाज बुलंद करने के उद्देश्य से ‘ऑल जम्मू-कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस’ नामक संगठन का गठन किया जिसका नाम 1938 में ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस’ करते हुए शेख अब्दुल्लाह ने इसमें हिंदू और सिखों को भी शामिल कर लिया। इसी दौरान शेख जवाहर लाल नेहरू के संपर्क में आए और उनके करीबी मित्र बन गए। इस मित्रता के चलते नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के मध्य भी रिश्ता प्रगाढ़ हो गया। शेख अब्दुल्लाह और महाराजा सर हरि सिंह के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण रहते थे। 1940 के दशक में कई बार अब्दुल्लाह को महाराजा ने गिरफ्तार कर लंबे अर्से तक जेल में रखा। 1946 में शेख ने ‘डोगरा वंश कश्मीर छोड़ो’ आंदोलन शुरू किया जिसके चलते रियासत में भारी हिंसा फैल गई। शेख को महाराजा सर हरि सिंह ने बगावत के आरोप में तीन वर्ष की सजा सुना जेल भेज दिया। नेहरू और कांग्रेस ने इसका भारी विरोध तब किया था। विभाजन पश्चात् जब महाराजा सर हरि सिंह ने भारत अथवा पाकिस्तान के साथ विलय के बजाय एक स्वतंत्र राष्ट्र के बतौर बने रहने का निर्णय लिया तब शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह और नेहरू की दोस्ती उन्हें भारत के पक्ष में लाने का महत्वपूर्ण कारक बनी। 1946 में ही महाराजा सर हरि सिंह ने अपने इरादे स्पष्ट कर दिए थे। दोनों में से किसी एक राष्ट्र में विलय के बजाए महाराजा हरि सिंह ने दोनों नव सृजित राष्ट्रों को ‘ठहराव समझौता’  ‘(Stand still Agreement) का प्रस्ताव भेजा जिसके अनुसार भारत, पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर रियासत के मध्य खुला व्यापार और सीमाओं के इधर-उधर नागरिकों के आने -जाने की आजादी की बात कही गई थी। पाकिस्तान ने तुरंत ही इस प्रस्ताव को स्वीकार लिया लेकिन भारत ने इस पर तत्काल हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया। सितंबर, 1947 के मध्य में पाकिस्तान ने महाराजा सर हरि सिंह को तगड़ा झटका देते हुए सड़क एवं रेल संपर्क पर पाबंदी लगा डाली जिसके चलते रियासत में ईंधन और खाने-पीने की आवश्यक वस्तुओं का अकाल पड़ने लगा जिसने जवाहरलाल नेहरू की चिंताओं में भारी इजाफा करने का काम किया। नेहरू आशंकित थे कि अपनी बहुसंख्यक मुस्लिम प्रजा के दबाव में आकर महाराजा हरि सिंह पाकिस्तान संग विलय के लिए मजबूर हो सकते हैं। कश्मीरी होने के नाते नेहरू का इस रियासत से गहरा भावनात्मक लगाव भी उनकी बेचैनी बढ़ाने का काम कर रहा था। सितंबर अंत में उन्होंने सरदार वल्लभ भाई को लिखे अपने पत्र में कश्मीर की बाबत लिखा ‘मुझे मिल रही नाना प्रकार की जानकारियों से स्पष्ट है कि कश्मीर में हालात तेजी से खराब और खतरनाक होते जा रहे हैं…सर्दी का मौसम आते ही कश्मीर का रास्ता शेष भारत से कट जाएगा… इसलिए सर्दियों से पहले ही कुछ किया जाना जरूरी है…अक्टूबर अथवा देर से देर नवंबर तक…कृपया इस मुद्दे पर कुछ कार्यवाही जरूर करें…हमारे लिए कश्मीर बेहद महत्वपूर्ण है…इसे खो देना भारी नुकसान साबित होगा.. वक्त बेशकीमती है…चीजों को कुछ इस तरह करना होगा कि भारत संग कश्मीर का विलय शीघ्र हो सके।’

क्रमशः

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