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Editorial

विराट व्यक्तित्व के स्वामी थे नेहरू

पिचहत्तर बरस का भारत/भाग-37

ब्रिटिश हुकूमत भारत में लगभग 250 बरस तक रही। इस लंबे शासनकाल के दौरान अधिकांश ब्रिटिश नौकरशाहों ने भारत में अपने सेवाकाल के दौरान अर्जित अनुभवों को आधार बना एक निश्चित राय कायम कर ली थी कि न तो इंडिया नाम का कोई देश पहले कभी एक इकाई के रूप में था और न ही भविष्य में जब कभी भी ब्रिटिश हुकूमत यहां से समाप्त होगी, यह एक राष्ट्र के रूप में बना रह पाएगा। ऐसे नौकरशाहों में एक थे सर जॉन स्टै्रचे (Sir John Strachey)। स्टै्रचे ब्रिटिश भारत में बतौर अफसर 1842 में तैनात किए गए थे। विभिन्न पदों में काम करते हुए 1868 में वे वायसराय की परिषद के सदस्य पद तक पहुंचे। 1872 में तत्कालीन वायसराय रिचर्ड बुर्कें(Richard Bourke) की पोर्ट ब्लेयर में हत्या के बाद स्टै्रचे कुछ समय के लिए भारत के कार्यवाहक वायसराय भी रहे। स्टै्रचे ने भारत पर कई पुस्तकें लिखी जिनमें ‘द फाइनेंसेस एंड पब्लिक वर्क ऑफ इंडिया’ (1882), ‘इंडिया’ एवं ‘हैशटिंग एंड द रोहिल्ला वॉर’ (1892) शामिल हैं। ब्रिटेन वापसी के बाद स्टै्रेचे भारत मामलों के विशेषज्ञ बन गए। अपनी पुस्तक ‘इंडिया’ में वे लिखते हैं ‘There is the first and most essential thing to learn about India-that there is not, and never was an India, or even any country of India, possessing, according to european ideas, any short of unity, physical, political, social or religious; no India nation and especially no people of India, of which we hear as much… However long may be the duration of our dominion, how ever powerful may be the centralising attraction of our Government, or the influence of the common interest which grow up, no such issue can follow. It is conceivable that national sympathies may arrise in particular Indian countries; but that they should ever extend to India generally, that men of Punjab, Bengal, North-west poovinces, and Madras, should ever feel that they belong to one great Indian nation, is impossible’1 (भारत के विषय में सीखने वाली सबसे जरूरी बात यह है कि भारत कभी था ही नहीं। यहां तक की यूरोपीय अवधारणा के अनुसार भारत का कोई भी राज्य (देश) ऐसा नहीं है जिसके पास किसी भी प्रकार की एकता, सीमाओं के रूप में, राजनीतिक रूप में, सामाजिक रूप में अथवा धार्मिक रूप में, जिसके बारे में हम बहुत कुछ सुनते हैं, कभी भी नहीं थी। हमारे शासन की अवधि चाहे कितनी भी अधिक क्यों न रहे, हमारे द्वारा स्थापित केंद्रीयकृत सत्ता का चाहे कितना भी प्रभाव क्यों न रहे, यहां तक कि इससे आम जनता को मिलने वाले लाभ कितने भी प्रभावशाली क्यों न हों, कोई भी मुद्दा भारत को एक राष्ट्र नहीं बना सकता है, क्योंकि पंजाब, बंगाल, नॉर्थ-वेस्ट फ्रंट और मद्रास के लोग एक राष्ट्र की भांति सोचे, ऐसा हो पाना असंभव है)।

ऐसा लेकिन हुआ और इस असंभव को संभव करने की जिम्मेदारी जिन कंधों पर आई वे थे आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू। ख्याति प्राप्त वकील मोतीलाल नेहरू और स्वरूप रानी की पहली संतान जवाहरलाल का जन्म 14 नवंबर 1861 को इलाहाबाद में हुआ था। मोतीलाल नेहरू मूल रूप से जम्मू-कश्मीर से थे। जवाहर लाल ने उच्च शिक्षा इंग्लैंड के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों, ‘हैरो स्कूल’ एवं ‘ट्रिनिटी कॉलेज’, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से प्राप्त की। लंदन की प्रख्यात कानूनी संस्था ‘इनर टैम्पल’ से कानूनी पढ़ाई बाद जवाहर लाल हिंदुस्तान जब 1912 में वापस लौटे तब तक उनकी राजनीतिक चेतना प्रखर हो चली थी। मोतीलाल नेहरू कांग्रेस की गतिविधियों में सक्रिय थे लेकिन जवाहर लाल कांग्रेस की नीतियों से इत्तेफाक नहीं रख पा रहे थे। उनका इस नरपंथी संगठन से जुड़ाव गांधी की भारत वापसी और कांग्रेस की कमान संभालने के दौर में हुआ। गांधी द्वारा 1920 में शुरू किए गए असहयोग आंदोलन के दौरान जवाहर लाल की सक्रिय भागीदारी ने उन्हें गांधी के करीब लाने का काम किया था। इसी आंदोलन में वे पहली बार ब्रिटिश सत्ता की नजरों में खटके और गिरफ्तार किए गए। चौरी-चौरा कांड के बाद गांधी ने इस आंदोलन को स्थगित करने का निर्णय लिया। चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने गांधी की नीतियों से नाराज हो एक अलग राजनीतिक दल ‘स्वराज पार्टी’ का गठन का ऐलान कर एक तरह से गांधी के खिलाफ मोर्चा खोल डाला। नेहरू अपने पिता के इस कदम की मुखालिफत करते हुए गांधी के साथ बने रहे। इसी कालखंड में उन्होंने गुलाम भारत की स्थिति को विश्व के सामने रखने की मुहिम शुरू की थी जिसमें उन्हें खासी सफलता और विश्वभर में पहचान मिली। उनके प्रयासों का ही परिणाम था कि 1927 में बु्रसेल्स (बैल्जियम) में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ आयोजित सम्मेलन में कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल को आमंत्रित किया गया। नेहरू ने इस सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया और वे ‘लीग अगेंस्ट इम्पिरियलिज्म’ की कार्यकारी परिषद के सदस्य चुने गए। युवा नेहरू कांग्रेस के उन चुनिंदा नेताओं में से एक थे जिन्होंने नरमपंथी कांग्रेस को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ मजबूती और दमदारी से खड़ा करने का काम किया। 1927 में कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में, जो मद्रास में आयोजित किया गया था, नेहरू ने ब्रिटिश हुकूमत से पूरी स्वतंत्रता पाने का संकल्प पारित कराने में सफलता पाई थी। 1928 में उनके द्वारा तैयार दस्तावेज जिसे ‘नेहरू रिपोर्ट’ कहा जाता है, इस दस्तावेज को तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष मोती लाल नेहरू थे। भविष्य के भारत को लेकर तय की गई कांग्रेस की नीतियों का आधार बनी। नेहरू ने कांग्रेस के लक्ष्यों को इस रिपोर्ट में चिन्हित करते हुए भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाने, विचारों की स्वतंत्रता, सबके लिए समान कानून, छूआ-छूत का निराकरण, वयस्क मताधिकार, समाजवाद का सिद्धांत इत्यादि पर विशेष बल दिया। 29 दिसंबर, 1929 में कांग्रेस ने अपने लाहौर अधिवेशन में इस युवा नेता को अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना। इसी अधिवेशन में नेहरू ने ‘पूर्ण स्वराज’ की मांग उठाते हुए वह ऐतिहासिक प्रस्ताव सामने रखा जिसने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस प्रस्ताव में कहा गया था ‘We believe that it is the inalienable right of the Indian people, as of any people, to have freedom and to enjoy the fruits of their toil-and have the necessities of life, so that they may have full opportunities for growth. We believe also that if any government deprives a people of these rights and oppresses them, the people have a further right to alter it or aboliish it. The British government in India has not only deprived the Indian people of their freedom but has based itself on the exploitation of the masses, and has ruined India economically, politically, culturally, and spiritually. We believe, therefore, that India must sever the British concection and attain ‘Purna Swaraj’ or complete independence’2 (हम मानते हैं कि किसी भी अन्य लोगों की तरह, भारतीय लोगों का भी यह अनिवार्य अधिकार है कि वे स्वतंत्रता प्राप्त करें और अपने परिश्रम का फल भोगें और जीवन की आवश्यकताएं प्राप्त करें ताकि उन्हें विकास के पूर्ण अवसर मिल सकें। हम यह भी मानते हैं कि यदि कोई सरकार किसी व्यक्ति को इन अधिकारों से वंचित करती है और उनका दमन करती है तो लोगों को इसे बदलने या समाप्त करने का एक और अधिकार है, भारत में ब्रिटिश सरकार ने न केवल भारतीय लोगों को उनकी स्वतंत्रता से वंचित किया है बल्कि उसकी सत्ता का आधार जनता शोषण मात्र है जिसने भारत को आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से बर्बाद कर दिया है। इसलिए, हम मानते हैं कि भारत को ब्रिटिश सत्ता संग अपने संबंध तोड़ पूर्व स्वराज्य या पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करनी चाहिए)।

इसी अधिवेशन में नववर्ष की संध्या पर लाहौर में रावी नदी के तट पर पहली बार तिरंगा लहराया गया था। इस अधिवेशन के उपरांत नेहरू स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई के मुख्य नायक बन उभरे और उन्हें गांधी के स्वाभाविक वारिस बतौर देखा जाने लगा। नेहरू विदेशी मामलों में विशेष दिलचस्पी रखने वाले उन चंद स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में एक थे जिन्होंने ब्रिटिश सामंतवाद के खिलाफ विश्व मंच में भारत की बात रख ब्रिटिश हुकूमत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने का काम किया। वे अपनी यूरोपीय यात्राओं के दौरान मार्क्स के सिद्धांत और समाजवाद की अवधारणा के करीब आए जिसने आगे चलकर आजाद भारत की आर्थिक नीतियों को गढ़ने का काम किया। नेहरू का कांग्रेस में उदयकाल और गांधी से उनकी निकटता मोहम्मद अली जिन्ना के कांग्रेस से दूर जाने का एक बड़ा कारण बनी। नेहरू और जिन्ना के मध्य मतभेद और मनभेद इस कालखंड में तेजी पकड़े। 1937 में हुए प्रांतीय सभाओं के चुनाव बाद नेहरू ने मुस्लिम लीग को दरकिनार करने और जिन्ना को हाशिए में डालने की ऐतिहासिक भूल की जिसका नतीजा जिन्ना का एक कौम विशेष के नेता बनने और अंततः बंटवारे का कारण बना। नेहरू ने राजे-रजवाड़ों द्वारा शासित भारतीय राज्यों में आमजन की पीड़ा और उत्पीड़न को समझ 1927 में ही ऐसे इलाकों में ‘प्रजा मंडल’ गठित करने का काम किया। इन प्रजा मंडलों ने आजादी के काल में राजे-रजवाड़ों को भारतीय संघ में शामिल होने के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन प्रजा मंडलों के प्रतिनिधि संगठन ‘अखिल भारतीय राज्य जन सम्मेलन’ के नेहरू 1939 में अध्यक्ष भी चुने गए। गांधी के निकटतम अनुयायी नेहरू कई मुद्दों पर महात्मा से गंभीर मतभेद भी रखते थे लेकिन उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कभी भी गांधी की तय की दिशा के खिलाफ जाने का प्रयास नहीं किया। हालांकि दोनों के मध्य गहरे मतभेदों की बात कांग्रेस भीतर और बाहर जोर लगी थी। द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत के साथ ही भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने इस युद्ध में भारत के मित्र राष्ट्रों संग शामिल होने की एकतरफा घोषणा कर दी थी। कांग्रेस ने इस फैसले का विरोध करते हुए आठ प्रांतों की अपनी सरकारों का इस्तीफा करा डाला।

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