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Editorial

चीन को लेकर गलत नहीं थे नेहरू/भाग एक

चीन के साथ संबंधों को लेकर प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को दोषी ठहराने की रवायत बन चुकी है। वाट्सअप युनिवर्सिटी में तो नेहरू को खलनायक साबित करने वली ‘कथाओं’ की भरमार है। जाहिर है ये सब ‘कथाएं’ भ्रामक हैं, कई तो 100 प्रतिशत झूठी हैं। नेहरू हमारे आजाद मुल्क के पहले प्रधानमंत्री थे। ऐसा मुल्क जो बनने के साथ ही बंटवारे का दंश झे चुका था। राजकोष खाली था। सोने की चीड़िया को अंग्रेज पूरी तरह नोच-खसोट चुके थे। नेहरू ने देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए पंच वर्षीय योजना के कॉन्सेप्ट को लागू किया। उनके गृहमंत्री पटेल ने छोटी-बड़ी रियासतों को भारत का हिस्सा बनने के लिए राजी किया। मौलाना आजाद ने शिक्षा नीति पर ध्यान केंद्रित किया। आज इस सबकी कोई चर्चा नहीं होती। नेहरू जो विजनरी थे, दूरदर्शी थे, जिन्होंने खजाना खाली होने के बावजूद भविष्य के भारत की जरूरतों को समझते IIM, IIt, ISRO जैसे संगठनों की नींव रही। Agriculture Institutes बनाए, Bhilal Steel Plant, Bokaro Steel Limited, Bhabha Atomic Research Centre, Ordinance Factories, DRDO, HEL, BHEL, AIIMS, NIT आदि नेहरू की Visionary सोच का ही नतीजा है। इसके बावजूद नेहरू को गलियाना-लतियाना बदस्तूर जारी है। नेहरू चीन से धोखा खा गए, नेहरू अदूरदर्शी थे, नेहरू के चलते हम 1962 का युद्ध हार गए आदि जैसा मैंने कहा दस्तूर बन चुका है। तो चलिए समझते हैं नेहरूकाल को चीन के संदर्भ में।

नेहरू के नोट्स, उस दौर के Documents, सरकारी भारत-चीन के उस दौर के संबंधों पर, CIA समेत कई देशों के Declassified Reports इस दौर पर रोचक प्रकाश डालती हैं।

नेहरू तिब्बत पर चीन के दावे को लेकर गंभीर असमंजस में थे। एक तरफ वे चीन के साम्राज्यवादी नीति को समझते थे तो दूसरी तरफ तिब्ब्त के सामंती शासन पर भी उनका भरोसा नहीं था। नेहरू के शब्दों में “Policy of encouraging the Tibetans to oppose Chines over lordship over Tibet would be raising false hope in the Tibetans which tue cannot fulfill”

जो इस मुगालते में हैं कि नेहरू चीन के असल इरादे नहीं पहचान पाए थे उन्हें बताना चाहूंगा कि 1954 में ही यानी पंचशील समझौते से पहले नेहरू ने चीन पर अपने नोट्स में लिखा था”Chinese expansionism has been evident during various periods of Asian history for a thousand years or so. We are perhaps facing a new period of such expansionism. Let us consider that and fashion our policy to prevent it coming in the way of our interest and the interest that we consider important.”

 

नेहरू चीन के साथ मित्रता का महत्व इस दृष्टि से समझते थे कि चीन को भारत की जरूरत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता पाने की है तो भारत की जरूरत सीमाओं पर शांति बनाए रखने की है। नेहरू का कद International political Arena में माओ से कहीं ज्यादा बड़ा था। अमेरिका ने People’s Republic of China को मान्यता नहीं दी थी। विश्व के अधिकांश देश Follow America नीति के थे इसके चलते उस दौर में चीन अलग-थलग पड़ा मुल्क था। नेहरू ने चीन की इस असहायता का लाभ उठाने की सोची और चीन को AFRO ASIAN CONFERENCE में शामिल करवाने के लिए अफ्रिकन देशों पर भारी दबाव बनाया। यह कॉन्फ्रेस इन्डोनेशिया के बैनडुंग शहर में आयोजित होने वाला था। नेहरू चीन को शामिल कराने के लिए अड़ गए। अंतः चीन को न्यौता भेजा गया। People Republic of China के प्रधानमंत्री झू इनलाई के लिए नेहरू ने Air India का विमान ‘कश्मीर प्रिसेंज’ बैजिंग भेजा। यहां पर कहानी में Twist है। झू इनलाई यकायक बीमार हो गए। उनके अलावा चीन का डेलीगेशन व कुछ पत्रकार इस विमान से इन्डोनेशिया के लिए उड़े। विमान हांकांग में कुछ देर रूका शायद Refueling के लिए। वहां से इन्डोनेशिया के लिए उड़ान भरने कुछ घंटों बाद उसमें बम विस्फोट हुआ। 19 यात्रियों में से 16 मारे गए। तीन बचे। माना जाता है इस विमान में बम ताइवान ने झू इनलाई को मरवाने की नीयत से हांगकांग में रखवाया था। बहरहाल यह अलग कहानी है। नेहरू का चीन को सपोर्ट करना कई अफ्रीकी और एशियाई नेताओं को नहीं रास आया था लेकिन नेहरू पीछे नहीं हटे। चीन लेकिन नेहरू के इस Gesture इस विशाल सोच के बावजूद सीमाओं पर अपनी हरकतें करता रहा जिससे नेहरू परेशान हो गए।

(Yugoslavia पर नेहरू -1950)

June 1958 में नेहरू का एक Circular गौरतलब है जिसमें उन्होंने लिखा “It seems to me what ever the internal reasons might be to in China, the altitude of chinese government has stiffened even in regard to India. I am thinking of the long discussions about our from tier with Tibet… All this signifies that we have to be particularly careful in the future in what we say and do in regard to china specially”

 

नेहरू जी ने दिसंबर 1958 में पत्र लिखकर कड़ा ऐतराज जताया कि चीन के नक्शों में भारत के इलाकों को दिखाया जा रहा है जो 1956 में हम दोनों के बीच हुई सहमति के खिलाफ है। नेहरू ने अपने पत्र में यह भी याद दिलाया कि हम दोनों 1914 में ब्रिटिश सरकार द्वारा तय की गई सीमा (Macmohan Line)  को मानने के लिए भी सहमत हो गए तब क्योंकर चीन के नक्शों में भारत के हिस्सों को दर्शाया जा रहा है।

23 जनवरी 1959 को झू इनलाई ने नेहरू को एक कड़ा उत्तर भेजा जिसमें ऐसी किसी भी सहमति से साफ इंकार कर दिया।

माओ, नेहरू के विश्व पटल पर दिनोंदिन बढ़ रहे कद के चलते निजी तौर पर नाराज और खिन्न थे। नेहरू के रिश्ते तत्कालीन सोवियत संघ के Politbureo मेंबर्स के साथ बेहद घनिष्ठ थे। सोविय प्रधानमंत्री निमिता खुशचेव नेहरू का बड़ा आदर करते थे। एशिया और अफ्रीका में नेहरू का खासा सम्मान था। नेहरू का विजन अमेरिकी और सोवियत खेमे से अलग एक निर्गुट देशों की ताकत बनना था। 1956 में उनके प्रयास रंग लाए और Non allon movement अस्तित्व में आया। नेहरू के साथ युगोस्लाविया, इजिप्ट के राष्ट्रपति इसके Founding Member बने। इस संगठन के गठन के बाद नेहरू का कद विश्व स्तर के बड़े नेताओं में शुमार हो गया। तो दूसरी तरफ माओ के नेतृत्व में चीन के अमेरिका के चलते Western और European देश मान्यता तक नहीं देने को तैयार थे। यही वह कारण था जिसके चलते माओ नेहरू से बेहद रंजिश रखने लगे। रही-सही कसर दलाई लामा को 1959 में राजनीतिक शरण देकर पूरी हो गई।

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