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Editorial

संकट में मोदी, भाजपा और संघ-2

मेरी बात

‘संघ शक्ति कलियुगे’ (वर्तमान समय में संगठन ही शक्ति है) के मूल मंत्र पर चलने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का संकट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस कार्यशैली से शुरू होता है जो व्यक्तिवाद पर केंद्रीत है और संगठन से खुद को बढ़कर मानती- आंकती है। 4 जून को आए चुनावी नतीजों ने इस मिथक को ध्वस्त करने का काम कर दिखाया कि मोदी नामक ब्रांड भाजपा और उसके पितृ संगठन संघ से कहीं ज्यादा बड़ा और विश्वसनीय है। बीते कुछ वर्षों से संध को जिस प्रकार दरकिनार कर भाजपा का वर्तमान नेतृत्व हर बड़ा फैसला स्वयं लेने लगा था, अब उस प्रवृत्ति पर रोक लगने की संभावनाएं बनने लगी हैं और एक बार फिर से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शरण में जाना भाजपा के लिए आवश्यक बनता नजर आने लगा है। 4 जून के चुनाव नतीजों से ठीक पहले विभिन्न एजेंसियों द्वारा कराए गए एक्जिट पोल नतीजों ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भाजपा की प्रचंड जीत का दावा किया था। भाजपा का अहंकार इन एक्जिट पोल नतीजों ने कई गुना तो बढ़ाया ही, शेयर बाजार में भी भारी उछाल ला दिया था। 4 जून ने लेकिन भाजपा और शेयर बाजार, दोनों को एक झटके में धरातल पर ला पटका। 18 मई को अंग्रेजी दैनिक ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का एक साक्षात्कार प्रकाशित किया था जिसमें जगत प्रकाश नड्डा ने दावा किया कि ‘पहले हम ज्यादा सक्षम नहीं थे इसलिए संघ पर निर्भर थे, अब हम बड़े हो गए है, ज्यादा सक्षम है और खुद का ख्याल रख सकते है’। नड्डा ने अपने इस वक्त्व्य के जरिए संघ परिवार को स्पष्ट रूप से यह जतलाया था कि अब भाजपा को संघ की बैसाखियों की जरूरत नहीं है और ब्रांड मोदी के सहारे अब भाजपा अपने दम पर ही चुनाव जीतने के काबिल बन चुकी है। नड्डा का यह बयान संघ को खासा नागवार गुजरा। स्मरण रहे कि 1951 में भारतीय जन संघ की स्थापना कर सीधे राजनीति में प्रवेश लेने वाले संघ के भरोसे ही 1980 में भाजपा का गठन किया गया था। तब जनसंघ से निकले अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की तिकड़ी ने संघ के कंधों में चढ़कर ही नवगठित पार्टी की नींव रखी थी और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को भी संघ के सहारे ही हिंदी पट्टी वाले भारत में एक बड़े जनआंदोलन में बदलने का काम किया था। अटल बिहारी के प्रधानमंत्रित्वकाल में भी संघ और भाजपा कई मुद्दों पर असहमत रहे थे लेकिन तब नागपुर को दिल्ली के समक्ष कभी भी झुकते नहीं देखा गया था। जब कभी अटल सरकार पर संकट आता अथवा संघ किसी मुद्दे पर नाराज होता था तब दिल्ली ही नागपुर जा समस्या का हल तलाशता, नागपुर उन दिनों दिल्ली नहीं आता था। नरेंद्र मोदी ने लेकिन इस व्यवस्था को स्वीकारा नहीं। उन्होंने संघ के देशभर में फैले विशाल नेटवर्क पर भाजपा की निर्भरता को कम करने के लिए खुद को एक ब्रांड बतौर आगे करा। इसके तात्कालिक नतीजे भाजपा के लिए उत्सावर्धक उत्साहवर्धक भी रहे लेकिन 4 जून ने सब कुछ बदल डाला है। भाजपा अध्यक्ष के बयान से नाखुश संघ का इस आम चुनाव के समय तटस्थ होना भाजपा को भारी पड़ा है और प्रधानमंत्री मोदी की ‘ब्रांड राजनीति’ को भी बड़ा आघात पहुंचा है। ऐसा बताया जा रहा है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ चाहता था कि इस आम चुनाव को तीन मुद्दों के सहारे लड़ा जाए। प्रधानमंत्री  मोदी की व्यक्तिगत छवि, उनकी सरकार द्वारा बीते दस वर्षों के दौरान अर्जित उपलब्धियों तथा संघ के अथक प्रयासों से हासिल सांस्कृतिक पुर्नजागरण। भाजपा ने लेकिन संघ के सुझाव को दरकिनार कर पूरा चुनाव ‘मोदी की गारंटी’ के सहारे लड़ा जिसका परिणाम रहा ‘चार सौ पार’ का सपना देख रही भाजपा का 242 पर सिमट जाना। संघ और भाजपा के मध्य तनावपूर्ण रिश्तों के पीछे मोदी की एकलवादी-व्यक्ति केंद्रीत राजनीति के साथ-साथ उन मुद्दों से दूरी बनाना भी एक महत्वपूर्ण कारण बन उभरा जिन्हें संघ अपनी मूल विचारधारा कहता है और बीते सौ वर्षों से जिन्हें हिंदू समाज में स्थापित करने का काम वह करता आया है। मोदी-शाह के नेतृत्व में हर कीमत सत्ता पाने की मनोवृति ने भाजपा को पूरी तरह बदल डाला है। संघ इससे खासा बैचेन बताया जाता है। बीते दस वर्षों के दौरान भाजपा ने अन्य राजनीतिक दलों, विशेषकर कांग्रेस से बड़ी संख्या में ऐसे नेताओं का आयात किया है जिनका दूर-दूर तक संघ की विचारधारा से कोई वास्ता नहीं है। नब्बे के दशक में जब भाजपा खुद को उच्च नैतिक मूल्यों वाला संगठन बता अपनी राजनीतिक जमीन को तैयार कर रही थी तब वह अपने ‘चाल-चरित्र और चेहरे’ को कांग्रेस की बनिस्पत शत-प्रतिशत बेदाग बताया करती थी। संघ ने भाजपा से पहले जनसंघ के जरिए राजनीति में सीधे हस्तक्षेप किया था। तब भी उसका प्रयास जनसंघ को हर दृष्टि से नैतिक और पाक साफ साबित करना रहा था। 1967 के आम चुनाव में जनसंघ ने कांग्रेस को भ्रष्ट करार देते हुए नारा गढ़ा था- ‘जन संघ को वोट दो, बीड़ी पीना छोड़ दो/बीड़ी में तंबाकू है, कांग्रेस वाला डाकू है।’ कालांतर में भाजपा गठन के बाद भी संघ का प्रयास नई पार्टी को ‘पार्टी विद ए डिफरेंस’ यानी अलग चाल, चरित्र और चेहरे वाली पार्टी बतौर स्थापित करने का रहा। मोदी युग में यह अंतर लेकिन समाप्त कर दिया गया। संघ-भाजपा की हिंदुत्व वाली विचारधारा से जिनका कभी कोई सरोकार नहीं था और जिन पर भाजपा ही महाभ्रष्ट होने के आरोप लगाती आई थी, ऐसे सभी को थोक के भाव पार्टी में मोदी-शाह ने शामिल करा भले ही भाजपा को विस्तार देने और ऐसे दागियों के जरिए कई राज्यों में सरकार बनाने में सफलता पाई, संघ और संघनिष्ठ भाजपा नेताओं को एक-एक कर हाशिए में डालने का काम तेजी से हुआ। आडवाणी और जोशी सरीखे दिग्गजों को ऐसा मार्गदर्शक घोषित कर दिया गया जिनके मार्गदर्शन की जरूरत मोदी-शाह वाली भाजपा को थी नहीं। विभिन्न राज्यों में कद्दावर नेताओं को भी ठिकाने लगा नई पीढ़ी के नेताओं को आगे कर मोदी-शाह ने स्पष्ट संकेत दिए कि अब भाजपा का चाल-चरित्र और चेहरा बदलने का समय आ गया है। उनकी हर कीमत सत्ता पाने की भूख को आम संघ कार्यकर्ता पचा नहीं पा रहा है। उसके लिए मतदाताओं को समझा पाना खासा कठिन हो चला है कि भाजपा के पास ऐसी कौन सी ‘वाशिंग मशीन’ है जिसमें प्रवेश करते ही सभी दागियों के दामन साफ हो जाते हैं? ब्रांड मोदी को मिल रही सफलता ने अब तक संघ और संघनिष्ठ भाजपाईयों को खामोश रहने पर मजबूर कर रखा था। 4 जून ने लेकिन सब कुछ बदल दिया है। संघ किसी भी कीमत पर अपने सौ बरस की मेहनत पर पानी फिरता नहीं देख सकता है। वह सही मौके का इंतजार कर रहा था जो 4 जून ने उसे दे डाला है। संघ प्रमुख मोहन भागवत का यह कहना कि ‘एक सच्चा स्वयं सेवक कभी अहंकारी नहीं हो सकता’ स्पष्ट तौर पर प्रधानमंत्री को निशाने पर कहा गया कथन है। संघ के मुख पत्र ‘आर्गेनाइजर’ ने तो खुलकर भाजपा नेतृत्व को अपने निशान पर लेना शुरू कर दिया है। संघ के स्वयं सेवक रतन शारदा का ‘आर्गेनाइजर’ में यह लिखना खासा महत्व रखता है कि महाराष्ट्र में अजीत पवार सरीखों संग गठबंधन कर भाजपा ने अपनी साख गंवाने का काम किया है और अब वह भी अन्य राजनीतिक दलों समान बन चुकी है। संघ के एक अन्य वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार ने भी भाजपा पर सीधे निशाना साधते हुए कहा था कि जिस पार्टी ने राम की भक्ति की लेकिन अहंकारी हो गई उसकी सीटें 241 रह गई। उनका बयान संघ प्रमुख के उस बयान से जुड़ता है। जिसमें मोहन भागवत ने कहा था कि ‘जो मर्यादा का पालन करता है लेकिन गर्व नहीं करता वही सही अर्थो में सेवक कहलाने का अधिकारी है।’

यह तय है कि आने वाले दिनों में संघ और संघनिष्ठ भाजपा नेता मुखर हो अपनी बात रखेंगे। क्या मोदी इस मुखरता को लोकतंत्रिक व्यवस्था की खूबसूरती मान स्वीकार पाएगे? या फिर और आक्रमक तरीके से अपनी व्यक्ति केंद्रीत राजनीति को विस्तार देने का प्रयास करेंगे? मैं समझता हूं मोदी अपने तौर तरीकों में शायद ही बदलाव करेंगे। उनका प्रयास होगा कि संघ पर भाजपा की आत्मनिर्भरता कम हो तो दूसरी तरफ संघ एक बार फिर से मुख्य अभिभावक की अपनी भूमिका पर वापस लौटने का प्रयास करेगा। होगा क्या यह तो भविष्य के गर्भ में है, जो भी होगा वह अपने वाले दिनों में भारतीय राजनीति को गहरा प्रभावित करेगा ही करेगा। संभवतः अच्छे के लिए, संभवतः

क्रमशः

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