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अगर राजनीति में वंशवाद की बहस छोड़ बात करूं तो मुझे राहुल गांधी बतौर व्यक्ति और राजनेता पसंद हैं। मैं उनकी स्पष्टवादिता का खासा कायल रहता आया हूं। भक्तगणों की फौज भले ही खुद ‘महा पप्पू’ होते हुए भी उनका पप्पू कह मखौल उड़ाए, आरजी आज के दौर के कथित ‘महानायकों, ‘नायकों’ और ‘बोनसाई नायकों’ की बनिस्पत कहीं अधिक संवेदनशील, स्पष्टवादी और भरोसेमंद नेता नजर आते हैं। राजनीति अनादिकाल से परशेप्शन का खेल रही है। परशेप्शन बन जाता है, बनाया जाता है। पहले यह बनने और बनाए जाने का खेल अलग तरीके का था। इस खेल में प्रयोग लाए जाने वाले औजार अलग हुआ करते थे। सूचना क्रांति में बाद ये औजार तेजी से बदल गए। अब ‘टूलकिट’ का दौर है। सोशल मीडिया के सहारे किसी की भी छवि को किसी भी स्तर तक बनाया-बिगाड़ा जा सकता है।

 

सोशल मीडिया की ताकत का पहला अनुभव इस देश ने अन्ना हजारे के जन लोकपाल आंदोलन के दौरान महसूसा- समझा। टीम अन्ना को इसका श्रेय जाता है। उन्होंने इसके सहारे पूरे देश में एक अजब किस्म का जुनून, कांग्रेस के खिलाफ जनमानस के एक बड़े वर्ग को एकजुट करने में सफलता पाई। असल फायदा लेकिन इस नए औजार का भाजपा ने उठाया। 2014 के लोकसभा चुनाव इसकी गवाही हैं। नरेंद्र मोदी को एक दूरदर्शी राजनेता, विकास परख राजनीति पर भरोसा करने वाला राजनेता, भ्रष्टाचार से दूर रहने वाला नेता, गुजरात को संपन्न राज्य बनाने वाला मुख्यमंत्री आदि-आदि कह स्थापित करने के पीछे इस हथियार यानी सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका रही। एक अद्भुत नैरेटिव रचा-गढ़ा गया। ठीक इसी तर्ज पर राहुल गांधी के खिलाफ एक निगेटिव नैरेटिव तैयार किया गया। ‘शहजादा’, ‘पप्पू’, ‘राहुल  बाबा’, ‘नामदार’ आदि इस नैरेटिव को धारदार करने के लिए इस्तेमाल किए गए अलंकार हैं। इनके सहारे राहुल की छवि एक गैर जिम्मेदार, अपरिपक्व, वशंवाद की राजनीति चलते जबरन थोपे जा रहे व्यक्ति की स्थापित करने का प्रयास किया गया जो काफी हद तक सफल भी रहा। मैं राहुल गांधी के धैर्य का कायल हूं। इन तमाम नकारात्मकता बाद भी उन्होंने अभी तक उस राह को छोड़ा नहीं जिस पर चलने का दुस्साहस उन्होंने पार्टी का उपाध्यक्ष बनने के साथ ही कर डाला था। राहुल ने कांग्रेस को वापस ग्रासरुट यानी जमीन से जोड़ने की बात कही। नई प्रतिभाओं को पार्टी में आगे लाने की बात कही जो वंशवाद चलते आगे आ नहीं पाते हैं। कांग्रेस को यह बीमारी गहरे जकड़ चुकी है। हर बड़े-छोटे नेता की संतति इस बिमारी चलते इस बिमारी के चलते पार्टी के शीर्ष पदों, विधायक-सांसद बन पाने में सफल हो जाती है। इन पदों में बैठने की असल प्रतिभाएं आगे बढ़ ही नहीं पाती। राहुल गांधी ने कांग्रेस को इस महामारी से निजात दिलाने का संकल्प लिया। फिर क्या था कांग्रेस भीतर ही उनकी मुखालफत शुरू हो गई, उनके खिलाफ षड्यंत्रों का दौर शुरू हो गया। कांग्रेस के बड़े नेता राहुल गांधी के खिलाफ एकजुट हो गए। उनके हर प्रयास को विफल करने का काम इन कांग्रेसियों ने ही किया। घोषित शत्रु से कहीं ज्यादा घातक धर में मौजूद विभीषण होते हैं। रावण की लंका का नाश राम ने किया जरूर लेकिन उस नाश के लिए ‘टूलकिट’ विभीषण ने ही बनाया था। राहुल गांधी को असफल करने का काम कांग्रेस के ऐसे ही विभीषणों ने किया। स्मरण रहे राहुल की राजनीति में एन्ट्री के वक्त केंद्र की सत्ता में पूरी मजबूती से कांग्रेस काबिज थी। भाजपा उस दौर में स्वयं अपने अंर्तकलहों से निपटने में व्यस्त थी। उसके समक्ष तब राहुल गांधी को ‘पप्पू’ साबित करने से कहीं ज्यादा अपने बिखरते कुनबे को संभालने की चुनौती थी। भाजपा के लौहपुरुष आडवाणी किसी भी सूरत में अगली पीढ़ी को पार्टी की कमान सौंपने को राजी नहीं थे। नरेंद्र मोदी एक चमत्कारी छवि के दिव्य पुरुष तब तक बन कर नहीं उभरे थे। मोदी की महत्वाकांक्षाओं को गुजरात तक सीमित रखने के लिए आडवाणी के कई विश्वस्त दिन रात लगे रहते थे। फिर तीन अन्य भाजपाई क्षत्रपों, मध्य प्रदेश के शिवराज सिंह चैहान, राजस्थान की वसुन्धरा राजे और छत्तीसगढ़ के रमन सिंह भी अपनी राजनीति बिसात उस दौर में बिछा चुके थे। स्वयं टीम आडवाणी के राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज तो पुरानी पीढ़ी के मुरली मनोहर जोशी भी अपने लिए मौका तलाशने में जुटे थे।

 

ऐसे दौर में राहुल गांधी को आगे बढ़ने से रोकने का काम उन कांग्रेसियों ने किया जिनके लिए, जिनकी सन्तानों के लिए राहुल बड़ा खतरा बनने जा रहे थे। इंदिरा गांधी की हत्या पश्चात् जब उनके पुत्र राजीव गांधी ने कांग्रेस की बागडोर संभाली थी तब भी कांग्रेस के दिग्गजों ने कुछ ऐसा ही किया था। राजीव गांधी ने कांग्रेस को दलालों से छुटकारा दिलाने का संकल्प घोषित तौर पर पार्टी के मुंबई अधिवेशन में लिया था। उनके इस संकल्प को पलीता कांग्रेसियों ने ही लगाया। राजीव जल्द ही समझ गए कि इस चक्रव्यूह को भेद पाना उनके लिए संभव नहीं। आप्शन केवल दो ही थे। या तो अभिमन्यु बनने का खतरा उठाओ या फिर यथास्थिति से समझौता कर लो। राजीव गांधी ने दूसरा विकल्प चुना। राहुल लेकिन अभी तक डटे हुए हुए हैं। वे न केवल नाना प्रकार के ‘टूलकिटों’ से सुसज्जित भाजपा का ताल ठोंककर मुकाबला कर रहे हैं, बल्कि अपनी पार्टी भीतर बैठे विभीषणों से भी जूझ रहे हैं। इसलिए मैं राहुल गांधी की प्रशंसा खुले दिल से करना चाहता हूं। अंधभक्ति के इस चरमकाल में राहुल गांधी की प्रशंसा करना भी कम जोखिम भरा काम नहीं। जो भाजपा अथवा केंद्र सरकार से खफा भी हैं, वे तक राहुल गांधी को एक परिपक्व नेता मानने को तैयार नहीं। उन्हें भी राहुल की क्षमता, उनकी कार्यशैली और उनके नेतृत्व पर भरोसा नहीं। परशेप्शन सच पर भारी पड़ चुका है। इसके बावजूद मैं राहुल को एक संवेदनशील और सद्नीयत वाला राजनेता मान रहा हूं तो इसकी ठोस वजह है। पहली वजह तो यह कि तमाम खतरों के बावजूद वे अपनी बात पर, अपनी शर्त पर राजनीति करने का जोखिम उठाने वाले नेता हैं। भाजपा, विशेषकर केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ राहुल गांधी ने जितने भी प्रश्न उठाए, जितनी भी आशंकाएं सामने रखी, वक्त की कसौटी पर सभी खरी उतरी हैं। राहुल ने राफेल विमान खरीद में भारी भ्रष्टाचार का मामला उठाया। उन्होंने ‘चैकीदार’ को ‘चोर’ करने का साहस किया। पिछले दिनों फ्रांस सरकार की ही एक एजेंसी ने इस डील में कमीशन दिए जाने का प्रमाण देकर राहुल गांधी के आरोपों की पुष्टि कर डाली। राफेल विमान सौदे को लेकर बहुत सी बातें, बहुत से तथ्य ऐसे हैं जो प्रथम दृष्टया ही इस डील को अपारदर्शी बना देते हैं। जो भी दस्तावेज इस रक्षा सौदे को लेकर सार्वजनिक पटल पर हैं उन्हें पढ़-समझ कर इतना तो दावे से कहा जा सकता है कि दाल में कुछ काला नहीं बल्कि दाल ही पूरी काली है। राहुल गांधी काफी हद तक इस मामले की सच्चाई जनता जनार्दन तक पहुंचाने में सफल भी रहे। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनना राहुल गांधी की एक बड़ी सफलता थी। लेकिन परशेप्शन की ताकत आगे वे हार गए। धर्म और जाति के मकड़जाल को वह ध्वस्त नहीं कर पाए। 2019 के लोकसभा चुनावों के नतीजे विस्मयकारी रहे। देश एक बार फिर से मोदी मैजिक की जकड़ में आ गया। इस मैजिक को लेकिन कभी न कभी तो टूटना ही है। इसके टूटने की शुरुआत हो भी चुकी है।

 

पिछले सात बरस का मोदी काल इस मुल्क की 75 बरस की यात्रा का सबसे भयावह काल रहा है। आर्थिक स्थिति रसातल में, बेरोजगारी चरम पर, स्वास्थ्य सेवाएं पाताल में, देश की गंगा-जमुनी संस्कृति रसातल में, लोकतंत्र खतरे में, इससे ज्यादा त्रासदी और क्या हो सकता है? चौतरफा हाहाकार-चित्कार। पवित्र पावनी गंगा में शवों का अंबार। कभी न कभी तो अंधभक्ति टूटनी ही थी। वह अब टूटने लगी है। राहुल ने मोदी सरकार को ‘सूट-बूट’ की सरकार कहा तो बड़ी आलोचना हुई। अब सच सामने है। सरकार हर दृष्टि से ‘सूट-बूट’ वालों की सरकार है। देश महामारी की चपेट में है। लाखों असमय मौत के आगोश में चले गए लेकिन मोदी सरकार कई हजार करोड़ सरकारी खजाने से एक ऐसे प्रोजेक्ट में लुटा रही है जिसका कोई औचित्य नहीं बनता। कहा जा रहा है कि अतिआधुनिक संसद, अति आधुनिक मंत्रालय और पीएम आवास वक्त की मांग हैं। एक तरफ कोविड वैक्सीन खरीदने के लिए कार्ययोजना नहीं, ऑक्सीजन प्लांट लगाने के लिए योजना नहीं, रोजगार बढ़ाने के लिए कोई कार्यनीति नहीं। सरकारी खजाने की कमी को रिजर्व बैंक के खजाने को खाली कर भरा जा रहा है तो दूसरी तरफ ‘सेंट्रल विस्टा’ नामक इस प्रोजेक्ट पर खरबों लुटाए जा रहे हैं। ‘सूट-बूट’ वालों की सरकार ही ऐसा कर सकती है। इस लिए यह लिखने का दुस्साहस कर रहा हूं कि ऐसे समय में जब दोमुंहापन, झूठ का व्यापक प्रचार तंत्र, धर्म और जाति के नाम पर समाज को बांटने का खेल और इन सबके जरिए लोकतंत्र की बुनियाद को पूरी तरह से ध्वस्त किया जा रहा हो, ‘अपरिपक्व’, ‘पप्पू’, ‘अदूरदर्शी’ राहुल गांधी कहीं भले हैं, भले साबित होंगे बनिस्पत इन ‘सूट-बूट’ वाली मानसिकता के रहनुमाओं से।

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