Editorial

रोशनी मय्यसर नहीं शहर के लिए

वर्ष 2018 मेरे लिए बेहद संघर्षमयी रहा। सोचा ना था कि इतना कठिन समय भी कभी देखना- भोगना होगा। लेकिन यही जीवन चक्र का अटल सत्य है। स्थितियां कभी समान नहीं रहती। हरेक के जीवन में उतार-चढ़ाव का आना निश्चित है। यह भी तय है कि समय का चक्र बदलता रहता है इसलिए अंधकार से घबरा कर हथियार डालना सही मार्ग नहीं। सही है उससे जूझना। हरिवंश राय बच्चन जी की कविता संघर्ष काल में प्रेरणा देने का काम करती है। कवि कहता है- ‘कोई दुख मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं, वही हारा जो लड़ा नहीं।’ हर किसी के अपने-अपने कष्ट हैं, संघर्ष हैं और उनसे लड़ने की क्षमता है। मैं जब कभी भी किसी अन्य के दुखों को, उनके मानसिक अवसाद को देखता हूं तो मुझे अपनी समस्याएं कमतर लगने लगती हैं। संकट लेकिन यही है कि अधिकांश इस हद तक संकटों के भवसागर में डूब जाते हैं कि पार पाने का हौसला खो बैठते हैं। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि अपने संघर्ष को, पूरी ऊर्जा और पूरे विश्वास के साथ जारी रखें कि पार अवश्य नाव लगेगी, साथ ही यह भी आत्म विश्लेषण अवश्य करें कि हमारे दुखों के, समस्याओं के मूल में क्या है? क्या हमारी महत्वाकांक्षाएं हैं जो हमें ऐसे भवर में फंसा देती हैं या फिर हमारे खुद के कर्म हैं जो इन महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए हम करते हैं। बहरहाल दुख-सुख पर, जीवन संघर्षों पर बातचीत फिर कभी। अभी तो वक्त है 2018 के सिंहावलोकन का। उसी को लिखने बैठा तो स्वयं के लिए यह वर्ष कैसा गया, इस पर कलम चलने को आतुर हो उठी। तो चलिए इसे विराम दे 2018 की बात की जाए। पहले चर्चा कुछ पॉजिटिव घटनाओं की जिनसे जीवन ऊर्जा में संचार महसूस हो। इस वर्ष की शुरूआत में सबसे ज्यादा उत्साहवर्धक समाचार हमारे प्रतिष्ठत इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेसन द्वारा 12 जनवरी को अंतरिक्ष में भेजा गया सौंवा यान रहा जिसके जरिए 31 सैटेलाइट अंतरिक्ष कक्ष में सफलता पूर्वक स्थापित की गई। इनमें 28 विदेशी उपग्रह शामिल हैं। निश्चित ही हमारे दूरदर्शी प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को इसका पूरा श्रेय जाता है जिन्होंने अपने कैबिनेट का विरोध दरकिनार कर इस अति महत्वाकांक्षी परियोजना की आधारशिला रखी थी। भले ही आज के हुक्मरान नेहरू को गरियाए-गलियाए, आजाद भारत में चाहे विज्ञान हो, उद्योग हो या फिर कृषि, स्वास्थ्य आदि क्षेत्र, नेहरू जी का योगदान अतुलनीय है। 2018 की पहली सुबह यानी एक जनवरी को तेलंगाना सरकार ने अपने प्रदेश के किसानों को चौबीस घंटे फ्री बिजली देने का लक्ष्य पूरा करने में सफलता पाई। केसी रामचंद्रन को पिछले दिनों मिली चुनावी सफलता के पीछे यह एक बड़ा कारण रहा है। बीस जनवरी को हमारे देश का नाम रोशन किया उन बच्चों ने जिन्हें जन्मजात ही अंधेरा मिला। सोचिए उनके दुख, उनकी पीड़ाओं को, तौलिए अपने कष्टों की उनसे तुलना कर। तब शायद समझ पाएं कि हमें कितना कुछ मिला है और उनके साथ प्रवृत्ति ने, ईश्वर ने कितना अन्याय किया है। हमारी नेशनल ब्लांइड क्रिकेट टीम ने पाकिस्तान को पराजित कर इस दिन हमें विश्व कप दिलाया। मैं समझता हूं यह 1984 में मिले क्रिकेट विश्वकप से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण उपलब्धि है। चार फरवरी को हमें क्रिकेट में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि मिली जब अंडर नाइन्टीन टीम ने चौथी बार हमें विश्वकप दिलाया। अहमदाबाद निवासी बालकृष्ण दोषी पहले ऐसे भारतीय वास्तुविद् बने जिन्हें ख्याति प्राप्त अंतरराष्ट्रीय ‘प्रित्जकर पुरस्कार’ से मार्च, 2018 में नवाजा गया। बालकृष्ण दोषी वही ऑर्किटेक्ट हैं जिन्होंने चंडीगढ़ जैसे अति आधुनिक शहर का मॉडल तैयार किया था। अप्रैल 2018, में हुए कॉमनवैल्थ खेलों में छियासठ मैडल से हम तीसरे स्थान में रहे जो हमारे लिए बड़ी उपलब्धि है। एक बेहद महत्वपूर्ण उपलब्धि हमारे लिए क्लीन एनर्जी के लक्ष्य को पाना रहा है। इस सदी की शुरूआत में भारत ने 2022 तक 175 मेगावाट सोलर और विंड एनर्जी पाने का लक्ष्य निर्धारित किया था। जून, 2018 में केंद्र सरकार ने आधिकारिक तौर पर इस लक्ष्य को 2022 तक पा लेने की पुष्टि की जो एक बड़ी सफलता है। महाराष्ट्र सरकार का प्रदूषण रोकने की दिशा में लिया गया एक निर्णय भी मेरी समझ से बहुत बड़ा कदम है। सरकार ने पूरे महाराष्ट्र प्रदेश में पॉलीथीन की बिक्री पर जून, 2018 में प्रतिबंध लगाते हुए इसे दण्डनीय अपराध भी बना डाला। वर्ष के अंत में इसके सकारात्मक नतीजे भी सामने आ चुके हैं। महाराष्ट्र सरकार काफी हद तक अपने निर्णय को लागू करा पाने में सफल रही है। जुलाई, 2018 में केंद्र सरकार ने सार्वजनिक शौचालयों की बाबत एक घोषणा की जो यदि वास्तविक आंकड़ों पर आधारित है तो निश्चित ही एक बेहद सफल परियोजना नरेंद्र मोदी सरकार की कही जा सकती है। स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत सरकार ने आठ करोड़ ऐसे शौचालय बनाये जाने का दावा किया। हालांकि इस दावे पर मुझे संदेह है क्योंकि कई राज्य सरकारें अपने प्रदेशों को खुले में शौच से मुक्त की घोषणा तो कर चुकी हैं लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट है। फिर भी इसे 2018 की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि कहा जा सकता है। जुलाई में ही दो भारतीयों का रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित होना ऐसे सभी के लिए प्रेरणास्रोत है जो सार्वजनिक जीवन में कुछ सार्थक करने का प्रयास कर रहे हैं। एशिया का नोबल पुरस्कार कहे जाने वाले इस सम्मान से डॉ. भारत वासवानी को नवाजा गया। डॉ. वासवानी मानसिक रूप से बीमार भिखारियों का ईलाज करने, उन्हें वापस उनके परिवारों से मिलाने के मिशन में लगे हैं तो सोनम वांगचुक पेशे से इंजीनियर होते हुए भी लद्दाख जैसे अति दुर्गम क्षेत्र में नौजवानों को, बच्चों को शिक्षा देने का पुनीत कार्य करते हैं। आसाम की खिलाड़ी हेमा दास को अंडर टवेंटी वर्ल्ड चैपियनशिप में चार सौ मीटर की दौड़ का गोल्ड मैडल जुलाई, 2018 की एक बड़ी उपलब्धि है। हेमा दास का संघर्षमय जीवन अवश्य जानिएगा ताकि अपनी पीड़ा के कमतर होने का एहसास हो सके। सितंबर 2018 में उच्चतम न्यायालय का एक निर्णय भी बदलती सामाजिक स्थितियों और मान्यताओं के दृष्टिकोण बेहद महत्वपूर्ण है। 6 सितंबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने गे सेक्स यानी समलैंगिता को अपराध की श्रेणी से हटा डाला। संविधान की धारा 377 में इस प्रकार के संबंधों को मान्यता नहीं होने के कारण समलैंगिक समाज में जारी रोष इस निर्णय के चलते समाप्त हो गया है। अक्षांश गुप्ता नाम के पैंतीस वर्षीय व्यक्ति का पीएचडी की डिग्री पाना मेरी दृष्टि में हमारे लिए 2018 की एक बड़ी सफलता है। अक्षांश ने 95 प्रतिशत विकलांग होने के बावजूद अपना धैर्य नहीं खोया। जौनपुर, उत्तर प्रदेश के इस शूरवीर ने कम्प्यूटर साइंस जैसे विषय पर इस वर्ष डाक्ट्रेक्ट कर हरेक निराश, प्रयास, हताश के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत किया है कि लड़ने वाले की कभी हार नहीं होती। विराट कोहली का 24 अक्टूबर के दिन एक दिवसीय क्रिकेट मैच का विश्व रिकॉर्ड तोड़ना खेल प्रेमियों के लिए बड़ी उपलब्धि है। इस दिन भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान ने दस हजार रन पूरे कर नया कीर्तिमान रच डाला। इससे पहले 259 इनिंग्स में इतने रन बनाने का रिकॉर्ड सचिन तेंदुलकर को हासिल था। मात्र 205 इनिंग्स में ही दस हजार रन बना विराट कोहली ने क्रिकेट में उभरती, उभरने की प्रयासरत भारतीय प्रतिभाओं को प्रेरणा देने का शानदार काम किया है।
अब बात कुछ उन मुद्दों की जिनके चलते पूरे देश में हताशा, निराशा, दिशाहीनता का माहौल है। 2014 में भाजपा प्रधानमंत्री पद उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को चुनते समय सबसे महत्वपूर्ण कारण बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई और कुछ हद तक शासन व्यवस्था में गहरे पसर चुका भ्रष्टाचार था। नरेंद्र मोदी के वायदों और बतौर मुख्यमंत्री, गुजरात उनकी उपलब्धियों के चलते आमजन को एक आस जगी थी कि शायद वे ही हमारे पालनहार बनें। यह आस उनके कार्यकाल के शुरूआती दो साल तक यथावत रही। फिर धीरे-धीरे लोगों का मोहभंग शुरू हुआ जो आज अपने चरम पर है। नरेंद्र मोदी, मेरी दृष्टि में, हरेक मोर्चे पर विफल रहे हैं। वे हद से हद एक बेहतरीन जुमलेबाज हैं, शानदार बाजीगर हैं, जो अपने लच्छेदार भाषणों से जनमानस का हृदय जीत प्रधानमंत्री तो बन गए लेकिन ऐसा एक भी कार्य मुकाम तक ना पहुंचा सके जिससे आमजन के घावों पर मरहम लग सके। विडंबना यह कि जिन मुद्दों पर उन्होंने चुनाव लड़ प्रधानमंत्री पद की कुर्सी पाई, उनकी सरकार ने उन्हीं मुद्दों को ज्यादा खराब करने का काम इन पौने पांच वर्ष में किया। नतीजा, 2018, हर दृष्टि से आम से खास तक के लिए कष्टकारी रहा। कइयों को लगता है कि मोदी सरकार के प्रति मैं बाधित दृष्टिकोण का शिकार हूं। इसलिए मय तर्क अपनी बात कर रहा हूं। मोदी खुद को बहुत शानदार तरीके से प्रस्तुत करने की कला में पारंगत हैं। वे विज्ञापन के महत्व को समझते हैं। इसीलिए अब तक उनकी सरकार लगभग पांच हजार करोड़ रुपया मात्र विज्ञापनबाजी में स्वाह कर चुकी है। लेकिन गौर करें, इन दिनों प्रधानमंत्री अपने भाषणों में अपनी ही सरकार की उपलब्धियों पर कुछ नहीं बोल रहे। इसे समझा जाना बेहद महत्वपूर्ण है। कारण स्पष्ट है, कुछ विशेष कहने को है ही नहीं। इसलिए वे गांधी परिवार और कांग्रेस के शासनकाल की कमियों पर ही इन दिनों बोल रहे हैं। मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता कहें या फिर चूक रही है नोटबंदी का निर्णय। यह अकेला ऐसा कदम रहा जिसके चलते उद्योग-धंधे बर्बादी की कगार पर पहुंच गए हैं और बेरोजगारी में भारी इजाफा हुआ। नोटबंदी की एक बड़ी विशेषता यह रही कि इस निर्णय से पहले देश को संबोधित करते समय प्रधानमंत्री ने इस ‘एतिहासिक’ कदम से होने वाले जिन फायदों को गिनाया था, उनमें से हरेक में केवल विफलता ही हाथ लगी है। कालाधन सफेद हो गया, बैंकों की दशा और खराब हो गई, व्यापार पूरी तरह चौपट हो गया। किसानों की दुर्दशा मोदी राज में बढ़ी है। यह उनकी दूसरी बड़ी विफलता है। सरकार इन पौने पांच सालों में किसानी को लेकर एक स्पष्ट नीति तक तैयार ना कर पाई। उल्टे दाल और आटा का बहुतायत में आयात कर भारतीय बाजार में मूल्यों में गिरावट के चलते भारतीय उत्पादकों यानी किसानों को बड़ा नुकसान पहुंचा है। सबसे खेदजनक यह कि केंद्र सरकार धरना दे रहे, प्रदर्शन कर रहे किसानों से बातचीत तक करने को इच्छुक नहीं दिख रही। ठीक इसी प्रकार बेरोजगारी का मसला सरकार की बड़ी विफलता का परिचायक है। यह अकेला ऐसा मुद्दा है जिस पर मोदी जी ने सबसे ज्यादा वोट बटोरे। आज बेरोजगारी का आलम यह है कि दो करोड़ रोजगार प्रति वर्ष देने का वायदा तो दूर, अपने गलत निर्णयों के चलते रोजगारों को भी सरकार ने पैदल कर डाला। मीडिया का क्षरण इस दौर में सबसे ज्यादा देखने को मिला है। पुण्य प्रसून वाजपेयी, अभिषार शर्मा आदि का उदाहरण सामने है जो सरकार की निरंकुशता और मीडिया संस्थानों की कमजोरी को सामने लाता है। ठीक इसी प्रकार लोकतंत्र की महत्वपूर्ण संस्थाओं का लगातार कमजोर होना, उनका राजनीतिकरण होना, इस सरकार की विफलताओं में गिने जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट, सीबीआई, सेंट्रल विजिलेंस कमीशन से लेकर लगभग सभी संस्थाओं में भारी गिरावट का रिकॉर्ड बनना बेहद अफसोसजनक और चिंताजनक है। देश की गंगा-जुमनी संस्कृति का इस दौर में रसातल में जाना भी बड़ी निराशा और चिंता का कारण बना है। कुल मिलाकर 2018 मेरी समझ से उपलब्धियां कम और निराशा, हताशा का वर्ष रहा। दुष्यंत कुमार के शब्दों में कहूं तो- ‘कहां तो चिरागा तय था हरेक घर के लिए, कहां रोशनी नहीं मय्यसर शहर के लिए।’ चूंकि लड़़ने वालों की कभी हार नहीं होती, इसलिए उम्मीद का दिया जलाए रखना जरूरी है कि नववर्ष कुछ नई ताजगी और ढेर सारी उपलब्धियों का वर्ष होगा।

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