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Editorial

महामारी से मिले सबक

कोविड-19 उर्फ कोरोना ने मनुष्य और प्रकृति के मध्य का अंतर एक बार फिर से हमें समझाने का प्रयास किया है। हमारी लघुता, हमारे बौनेपन का अहसास प्रकृति नाना प्रकार से हमें कराती रहती है। विनाश की तरफ दौड़ रही मानव सभ्यता को लगातार चेतावनी प्रकृति देती आई है। हम लेकिन सुधरने का काम नहीं लेते। चैतरफा हाहाकार है, केवल कोरोना चलते नहीं, बल्कि प्रकृति जनित तुफानों, दैवीय आपदाओं के चलते भी। बार-बार मानव सभ्यता को चेतावनी के बतौर ऐसे तुफान आते हैं। हजारों जानें चली जाती हैं। कुछ समय हो-हल्ला मचता है फिर सब कुछ पहले की तरह चलने लगता है। कथित विकास के नाम पर जमकर प्रकृति का दोहन-शोषण शुरू हो जाता है। पूरे विश्व में मनुष्य के लालच का, विनाशकारी लालच का, खेल चल रहा है। 16 जून, 2013 को उत्तराखण्ड के केदारनाथ में ऐसा ही कुछ हुआ। नाराज प्रकृति ने तांडव शुरू किया। नतीजा हजारों की अकाल मृत्यु। हजारों की, कितने हजार कह पाना आज आठ बरस बाद भी संभव नहीं। सरकारी आंकड़ों अनुसार 5748 मारे गए, 4550 गांव-कस्बे बर्बाद हुए। गैरसरकारी आंकड़े 20 हजार से ज्यादा मौत का दावा करते हैं। इसे सरकारी भाषा में दैवीय आपदा यानी ‘एक्ट ऑफ गाॅड’ कहा गया। इसका ज्यादा क्रूर मजाक भला और क्या हो सकता है? हमारे पुराण, उपनिषद्, रामायण, महाभारत आदि सभी में मध्य हिमालयी क्षेत्र को देवताओं की भूमि कहा गया है। उपनिषद् में इसे ‘उत्तर पांचाल’, ऋषि बाल्मीकि ने ‘उत्तर कौशल’, ऋषि वेदव्यास ने ‘उत्तरकुरू’ तो कौटिल्य ने ‘उत्तरापत्ती’ कह इस क्षेत्र को पुकारा है। केदारनाथ गंगा की सहायक नदी मंदाकिनी के निकट स्थापित भगवान शिव का स्थान है। पौराणिक कथाओं अनुसार महाभारत युद्ध की समाप्ति बाद अपने ‘पापों’ का प्रायश्चित करने पांडव भगवान शिव की तलाश में यहां आए थे। उनके द्वारा ही यहां पहला मंदिर बना। हालांकि वेदव्यास रचित महाभारत ग्रंथ में केदारनाथ का कोई उल्लेख नहीं है। स्कंद पुराण में अवश्य इस स्थान का उल्लेख करते हुए लिखा गया है कि गंगा को यहीं पर भगवान शिव ने अपनी जटाओं से मुक्त किया था। बहरहाल केदारनाथ में शिव मंदिर कब और कैसे, किसके द्वारा स्थापित किया गया यह स्पष्ट नहीं है। स्पष्ट केवल इतना भर है कि यह पवित्र स्थान है जहां पहुंचना आम इंसान के लिए बेहद कठिन था। 22 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर यहां पहुंचना एक यज्ञ समान था इसलिए इसे बड़ा तीर्थ माना गया। विनाशरूपी विकास के पीछे भाग रहा मानव भला ईश्वर को भी क्योंकर शांति से वास करने देता। अंधाधुंध प्रकृति दोहन कर, हवाई मार्ग तैयार कर उसने केदारनाथ-बद्रीनाथ को भी ‘तीर्थ’ के बजाय ‘फन’ यानी मौज-मस्ती का स्थान बना डाला। नतीजा 16 जून 2013 का तांडव। लेकिन हम सुधरने वालों में नहीं। चारधाम मार्ग के नाम पर पहाड़ों में जबर्दस्त तोड़-फोड़ लगातार जारी है। ऐसा केवल हमारे यहां नहीं पूरे विश्व में हो रहा है। ब्राजील के अमेजोन जंगल जिन्हें ‘विश्व के फेफड़े’ होने का दर्जा मिला है, मनुष्य के लालच चलते धूं-धूं कर जल रहे हैं। कोरोनाकाल में जिस ऑक्सीजन की कमी चलते सैकड़ों मारे गए हैं, इस धरती में मौजूद प्राकृतिक ऑक्सीजन का 20 प्रतिशत इन अमेजोन जंगल चलते हैं। इन जंगलों का एक बड़ा हिस्सा मानव जनित विनाश लीला, जिसे विकास का नाम दिया गया है, की भेंट चढ़ चुका है। बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट, रोड, हाइवे आदि विश्व के फेफड़े का सर्वनाश कर रहे हैं। इन जंगलों का लगभग सात अरब एकड़ जो 12 प्रतिशत बनता है, मनुष्य के लालच या कथित विकास की भेंट चढ़ चुका है। ऐसे एक नहीं सैकड़ों उदाहरण मैं आपको बता सकता हूं, आप स्वयं भी इनसे वाकिफ हैं। सबक लेने को कोई लेकिन तैयार नहीं। न शासक, न प्रजा। कोरोना महामारी के दौरान एक भयावह सच विकराल रूप धर हमारे सामने आ खड़ा हुआ है। हमारी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का सच। मार्च 2020 में जब इस महामारी का आगमन हुआ, जैसे-जैसे इसने विकाराल रूप लेना शुरू किया, हमारी कलई खुलनी शुरू हो गई। सच से पर्दा उठता देख सत्तातंत्र सक्रिय हुआ। प्रधान सेवक ने ‘ताली-थाली’ का सहारा लिया। सितंबर 2020 के मध्य तक इस महामारी ने कहर ढहाया फिर थोड़ी राहत मिलनी शुरू हुई। अपन लोग यानी प्रजा ने प्रधान सेवक को तहे दिल से धन्यवाद दिया कि ‘महामना’ ने हमें बचा लिया। ‘महामना’ की आत्ममुग्धता चरम् पर पहुंच गई। स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने के बजाय उन्होंने अपना ध्यान अपने ‘मन की बात’ को फंतासी की दुनिया से बाहर निकाल धरातल में उतारने पर लगा डाला। दिल्ली के केंद्र में स्थित संसद भवन, मंत्रालय, प्रधानमंत्री आवास आदि से उनका मन उखड़ चुका था। उनके ‘मन’ ने कहा यहां पर नव निर्माण करो ताकि आने वाली कई पीढ़ियों को उनका योगदान याद रहे। शायद यह भी उनके ‘मन’ ने कहा हो कि अंग्रेज वास्तुकार लुटियन के नाम से पुकारे जाने वाला यह इलाका उनके नाम से पुकारा जाएगा। फिर क्या था 22 हजार करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट उन्होंने अपने ‘मन की बात’ मान प्रजा पर थोप डाला। इस बीच वैश्विक स्तर पर भी उनका कद कोरोना महामारी को रोकने की सही रणनीति बनाने के लिए खासा चमका, पीआर एजेंसियों, चारणी मीडिया आदि के सहयोग से चमकाया गया।

अंग्रेजी की एक पुरानी कहावत है-“All that glitter’s is not gold”, हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती। कोरोना की दूसरी लहर, घातक लहर सामने आ गई। साथ ही पहली लहर के दौरान सैकड़ों जानें गंवाने के दौरान देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए किए गए वायदों का सच भी सामने आ गया। शताब्दियों पहले रोम में भयंकर आग लगी थी। इतनी भीषण आग जिसे काबू करने में छह दिन लग गए। रोम शहर का दो तिहाई हिस्सा इन छह दिनों में जलकर राख हो गया। कहा जाता है इस आग की शुरुआत वहां के शासक ‘नीरो’ के पागलपन चलते हुए। जिस इलाके से यह आग शुरू हुई थी, वहां पर नीरो एक भव्य महल खड़ा करना चाहता था। कहा यह भी जाता है कि बादशाह के इशारे पर ही आग लगाई गई जो बेकाबू हो पूरे शहर में फैल गई थी। बहरहाल इस भीषण तबाही का दोष बादशाह पर लगा। आज भी एक कहावत उन क्रूर शासकों के लिए इस्तेमाल की जाती है जो जन से दूर, अपने मन अनुसार निर्णय लेते हैं। यह कहावत है ‘जब रोम जल रहा था, नीरो बांसुरी बजा रहा था’ मैं हमेशा से कहता आया हूं, इतिहास बड़ा क्रूर होता है। उन तानाशाहों से कहीं अधिक क्रूर जो इतिहास में भगवान का दर्जा पाना चाहते हैं। ऐसे सभी को लेकिन इतिहास उनके कर्मों अनुसार स्थान देता है। क्या पता प्रधान सेवक के इस ड्रीम प्रोजेक्ट जिसे ‘सेंट्रल विस्टा’ का नाम दिया गया है, जिसका निर्माण कोरोना महामारी के काल में सरकारी खजाने से 22 हजार करोड़ रुपया निकाल किया जा रहा है, इतिहास इसे किस रूप में याद करेगा। शायद एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर या फिर कोरोना महामारी के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने के बजाय महल बनने का अक्षम्य अपराध के बतौर। हो सकता है नीरो बंसी बजा रहा है, की तर्ज पर ही कोई मिलती-जुलती कहावत इस निर्माण योजना चलते जन्म लेगी।
कोरोना की दूसरी लहर आते ही पीएम की चमक फीकी पड़ने लगी। चौतरफा मचे हाहाकार ने देश की बदहाल स्वास्थ्य सेवा को बेपर्दा कर डाला। यह भी स्पष्ट हो गया कि पहली लहर के कम होते ही पूरी राज व्यवस्था ‘ताली-थाली’ के शोर में डूब गई, मस्त हो गई। जो समय अस्पतालों को दुरुस्त करने, ऑक्सीजन जैसी बुनियादी जरूरत के उत्पादन और सप्लाई चैन को दुरुस्त करने का था, उस समय को हमारे हुक्मरानों ने चुनावी जंग जीतने में लगा डाला। हालात बिगड़ते चले गए। देश की अतिविकसित राजधानी तक में ऑक्सीजन की कमी चलते रोज सैकड़ों लोगों ने दम तोड़ दिया। कथित स्मार्ट शहरों का सच भी पूरे देशभर में हमने देख लिया। और अब जब हमारे वैज्ञानिक इस महामारी की तीसरी लहर की आशंका व्यक्त कर रहे हैं, कोविड-19 वायरस के नए म्यूटेंट सामने आने लगे हैं। ‘ब्लैक फंगस’ नामक बीमारी इस महामारी का बाई प्रोडक्ट बन उभर चुकी है। यक्ष प्रश्न है कि हमने, हमारे हुक्मरानों ने कुछ सबक सीखा? शायद नहीं। यदि सीखा होता तो इस आपदाकाल में सारा फोकस, राजखजाने का सारा धन केवल और केवल स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने, वैज्ञानिक रिसर्च को आगे बढ़ाने, देश के हर कोने में ऑक्सीजन प्लांट लगाने, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को उच्चीकृत करने, वहां कम से कम पचास बिस्तरों वाला आईसीयू सेंटर खोलने में लगाया जाता। ऐसा लेकिन कुछ होता नजर नहीं आ रहा। दिल्ली के केंद्र में  भव्य पंचायत भवन, प्रधान सेवक का घर, शीर्ष पंचायत के सदस्यों के लिए ठाट-बाट से रहने के इंतेजामात का प्रोजेक्ट चालू है। राजा तो ऊंचे सिंहासन में विराजमान हैं, इतने ऊंचे कि उसे समय का सच दिखाई पड़ना बंद हो चला है, जनमानस की चित्कार उस तक नहीं पहुंच रहीं, प्रजा जो सबसे ज्यादा इस महामारी से प्रभावित है, इतना सब कुछ होने के बाद भी चेती नहीं है। चेत गई होती तो बहुत कुछ बदलता। जनता चेतावनी देती कि कोई भी राजा ‘बंसी’ बजाने का दुस्साहस कतई न करे यदि उसकी बंसी का स्वर उसकी प्रजा को कर्कश लगने लगे। अपने यहां अभी तक ऐसा होता नजर नहीं आ रहा। इसलिए तीसरी लहर की कल्पना मात्र से मैं थर्रा रहा हूं। न जाने कब हमारे मुल्क की प्रजा जागेगी? न जाने कब?

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