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जूलियस सीजर रोम का वह तानाशाह शासक था जिसके शासनकाल में रोम एक गणतंत्र से तानाशाही के निजाम में बदला। सीजर अति महत्वाकांक्षी शासक था। उसने रोम साम्राज्य का विस्तार अपनी विशाल सैन्य शक्ति के बल पर किया। उसने अपने साम्राज्य में कई ऐसे काम भी किए जिसके चलते उसे आम जनमानस का खासा समर्थन मिला। उसके शासनकाल में बड़े पैमाने पर लैंड रिफार्म्स यानी जमीनों की बंदोबस्ती का काम हुआ, उसने सैन्य आक्रमण के बल पर जीते देशों को रोमन साम्राज्य का हिस्सा तो बनाया ही, वहां के नागरिकों को पूरे अधिकार दे उनका मन भी जीता। सीजर के भू-सुधारों का बड़ा असर रोमन साम्राज्य के उच्च वर्ग पर पड़ा जो जमींदार हुआ करते थे। अपने सम्राट के इन भू-सुधारों से नाराज ऐसे सामंतों ने सीजर की सत्ता को उखाड़ फेंकने का षड्यंत्र रचा। सीजर की हत्या के समय अपने सबसे विश्वस्त सिपहसालार ब्रूट्स को भी हत्यारों के साथ देख बकौल विलियम शेक्सपियर सीजर के आखिरी शब्द थे ‘तुम भी ब्रूट्स’। एक विश्वस्त सलाहकार और मित्र के विश्वासघात को देख कहा गया सीजर के इस कथन का प्रयोग ऐसे ही किसी अपने के द्वारा किए गए विश्वासघात के लिए किया जाता है। सीजर से जुड़े एक अन्य प्रसंग की चर्चा मैंने पिछले संपादकीय में की थी। संदर्भ भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई पर लगे यौन उत्पीड़न का था। सीजर की पत्नी पोमपिया बेहद रूपवान थी। उसे रिझाने की कोशिश करने वाले एक व्यक्ति पब्लियस क्लोडियस को सीजर मृत्यु दंड देता है। साथ ही वह अपनी पत्नी को भी तलाक दे डालता है। जब सीजर से पूछा गया कि उसने क्यों अपनी बेकसूर पत्नी को त्याग दिया तो तानाशाह का उत्तर था ‘My wife ought not even to be under suspicion’ यानी मेरी पत्नी संदेह के घेरे में नहीं हो सकती। तभी से यह कहावत प्रचलन में आई ‘Ceaser’s wife must be above suspicionA  इसे हम अपनी पौराणिक कथा रामायण में भी पाते हैं जब अयोध्यापति राजा राम धोबी के कहने भर पर अपनी पत्नी को अग्नि परीक्षा देने को कहते हैं। बहरहाल सीजर से जुड़े दो प्रसंगों की प्रासंगिकता, आज हमारे मुल्क की शीर्ष न्यायपालिका के शीर्ष न्यायाधीश पर लगे यौन शोषण के आरोपों के चलते स्थापित होती है। वर्तमान दौर में हमने लोकतंत्र के चारों स्तंभों का भारी क्षरण होते देखा। हालांकि भारतीय जनता पार्टी के समर्थक प्रश्न उठा सकते हैं, मेरे कथन से घोर असहमत हो सकते हैं कि क्या न्यायपालिका, कार्यपालिका, मीडिया और विधायिका के जिस अवमूल्यन की बात आज की जा रही है, उसके लिए मात्र भाजपा जिम्मेदार है? यह जायज प्रश्न है। सत्तर के दशक में, विशेषकर जब इंदिराजी ने बगैर किसी वाजिब कारण के देश में आपातकाल लगाया तभी से स्थापित लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं और मूल्यों संग छेड़छाड़ शुरू हो गई थी। इंदिरा गांधी ने उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश अजीत नाथ रे को आपातकाल लगाए जाने के दो वर्ष पूर्व 1973 में देश का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया था। न्यायमूर्ति रे की नियुक्ति को भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में ‘लोकतंत्र का सबसे काला दिन’ कह तब पुकारा गया। दरअसल, न्यायमूर्ति अजीत नाथ रे तीन अन्य वरिष्ठ जजों को नजरअंदाज कर मुख्य न्यायाधीश बनाए गए थे। इंदिरा गांधी सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से उन दिनों खासी विचलित थीं। ग्यारह जजों की बेंच ने निजी बैंकों के राष्ट्रीयकरण पर अपना जो फैसला सुनाया था उसमें जस्टिस अजीत रे अकेले जज थे जिन्होंने इंदिरा सरकार के निर्णय का पक्ष लिया। इस निर्णय पर चर्चा फिर कभी। मुद्दा न्यायपालिका समेत लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण का है तो निश्चित ही इसकी नींव सत्तर के दशक में कांग्रेस सरकार ने रखी। लेकिन जो भयावह हालात पिछले पांच सालों में दौरान हम सभी ने देखे, महसूसे हैं वह अभूतपूर्व हैं। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश यदि मीडिया के जरिए अपनी पीड़ा को, अपनी घुटन को सार्वजनिक करने लगें, यदि उन्हें कहना पड़े कि लोकतंत्र खतरे में है, तो समझ लीजिए सिस्टम के भीतर क्या कुछ नहीं चल रहा होगा। ऐसे खौफनाक दौर में सामने आता है देश के मुख्य न्यायाधीश पर यौन शोषण का गंभीर आरोप। इस आरोप से व्यथित मुख्य न्यायाधीश छुट्टी के दिन कोर्ट लगवाते हैं और आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए आशंका व्यक्त करते हैं कि उनके समक्ष दायर कुछेक महत्वपूर्ण याचिकाओं पर उनके निर्णय को प्रभावित करने की नीयत से एक षड्यंत्र के तहत ऐसा किया गया है। अनुमान लगाया जा रहा है कि मुख्य न्यायाधीश का इशारा वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान की तरफ है। उनके समक्ष राफेल विमान सौदे में कथित घोटाले से संबंधित जनहित याचकाओं समेत कई महत्वपूर्ण ऐसे मामले हैं जिन पर प्रतिकूल निर्णय आने से मोदी सरकार का संकट गहरा सकता है। स्मरण रहे गत् वर्ष जब सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी तब वह न्यायमूर्ति गोगोई ही थे जिन्होंने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ दायर एक मामले की जांच कर रहे न्यायाधीश लोया की संदेहास्पद मृत्यु का जिक्र किया था। शीर्ष न्यायालय संग मोदी सरकार के रिश्ते 2014 में सरकार गठन के बाद से ही कभी सौहार्दपूर्ण नहीं रहे। एक समय ऐसा भी आया जब जब न्यायमूर्ति बीएस ठाकुर के मुख्य न्यायाधाश रहते केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट में जबर्दस्त ठन गई। सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति की जो भी संस्तुति केंद्र सरकार को भेजी जाती सरकार उस पर किसी न किसी बहाने अपनी सहमति न दे वापस सुप्रीम कोर्ट को पुनर्विचार के लिए भेज देती। इसके चलते काफी अर्से तक उच्च व उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति न हो सकी। न्यायमूर्ति ठाकुर ने इस सबसे खिन्न होकर प्रधानमंत्री की उपस्थिति वाले एक कार्यक्रम में अपना रोष भी व्यक्त कर डाला था। ऐसे में उनकी आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता कि कुछ शक्तियां उनके विरुद्ध षड्यंत्र रच रही हैं। किंतु इससे भी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है कि न्यायपालिका, विशेषकर उच्च और उच्चतम न्यायालय अपने ऊपर लगने वाले आरोपों के प्रति कितनी संजीदा रहती है। प्रश्न सीजर की पत्नी का संदेह से ऊपर रहने का उठता है। यहां संकट है। संकट यह है कि हमारे न्यायाधीश खुद पर लग रहे आरोपों को स्थापित कानूनी प्रक्रिया से इतर तलाशते नजर आ रहे हैं। उदाहरण के लिए मुख्य न्यायाधीश पर लग रहे आरोपों पर उच्चतम न्यायालय ने कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न कानून (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम 2013, जो सुप्रीम कोर्ट के ही एक महत्वपूर्ण निर्णय जिसे ‘विशाखा’ केस के नाम से जाना जाता है, पर आधारित कानून के अनुसार जस्टिस गोगोई के ऊपर लगे आरोपों की जांच नहीं की। इस कानून के अनुसार यौन शोषण के कार्यस्थल पर रोकथाम के लिए बनी कमेटी का प्रमुख एक महिला का होना जरूरी है। इस कमेटी में समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति का भी होना कानूनन जरूरी है। यह कमेटी हर उस सरकारी, गैरसरकारी संस्थान में होनी आवश्यक है जहां दस या दस से अधिक कर्मचारी हों। मुख्य न्यायाधीश के मामले में लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ‘विशाखा बनाम राजस्थान सरकार’ केस में दिए अपने निर्णय अनुसार कमेटी का गठन नहीं किया। न ही नियमानुसार कमेटी की बैठक की वीडियो रिकॉर्डिंग की गई, न ही शिकायत करने वाली महिला को नियमानुसार अपना वकील साथ लाने की इजाजत दी। नतीजा यह रहा कि उक्त महिला ने कमेटी का बहिष्कार कर डाला। सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की इस कमेटी ने इस बहिष्कार के बाद भी अपनी जांच जारी रखी और अपनी रिपोर्ट में मुख्य न्यायाधीश को दोषमुक्त करार दिया है। यह रिपोर्ट भी न तो सार्वजनिक की गई, न ही शिकायतकर्ता को इसकी प्रति उपलब्ध कराई गई है। यह मेरी समझ से कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग की परिधि में आता है। प्राकøतिक न्याय व्यवस्था के प्रतिकूल भी यह है। उच्चतम न्यायालय हमारी यानी आमजन की अंतिम आस है, न्याय पाने की, इसलिए बेहद जरूरी है कि उस पर हमारी आस्था बनी रहे, दरके नहीं। इस विश्वास को बनाए रखने के लिए न्यायपालिका का हर प्रकार के संदेह से ऊपर रहना जरूरी है। दुखद है कि हमारे सुप्रीम कोर्ट ने नैसर्गिक न्याय प्रणाली का मार्ग इस विषय में नहीं चुना। नतीजा लोकतंत्र के इस स्तभ पर सवाल खड़े हो रहे हैं। जनकवि धूमिल मुझे अपनी कलम को विराम देते समय याद आ रहे हैं। वे कहते हैं-
मुर्गे की बांग पर/सूरज को टांग कर
सो जाओ हत्याओं के खिलाफ ओढ़कर
निकम्मी आदतों का लिहाफ…
और भूल जाओ कि नींद में
पेड़ के लिए तुमने जंगल से बहस की है

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